मत्ती 22
पाठ
राजा अपने पुत्र के विवाह का भोज तैयार करता है, पर निमंत्रित लोग नहीं आते; कोई खेत की ओर, कोई व्यापार की ओर मुड़ जाता है, और कुछ तो दासों को ही मार डालते हैं। तब राजा सड़कों से "क्या बुरे, क्या भले" सबको बुलवा लेता है, पर एक अतिथि विवाह का वस्त्र पहने बिना पकड़ा जाता है और बाहर अंधकार में डाल दिया जाता है। इसके बाद यरूशलेम की तीन टोलियाँ बारी-बारी यीशु को फँसाने आती हैं: कर के सिक्के पर फरीसी, पुनरुत्थान पर सदूकी, और सबसे बड़ी आज्ञा पर एक व्यवस्थापक। हर बार उत्तर उन्हें चुप कर देता है। अंत में यीशु स्वयं प्रश्न पूछते हैं, दाऊद के पुत्र और दाऊद के प्रभु का, और "उसके उत्तर में कोई भी एक बात न कह सका।"
केंद्र
इस अध्याय की धड़कन एक ही सत्य है: परमेश्वर का राज्य निमंत्रण से खुलता है, पर निमंत्रण हल्की चीज़ नहीं है। भोज तैयार है, बैल मारे जा चुके हैं, कीमत राजा ने चुकाई है, यही अनुग्रह है। मनुष्य के पास लाने को कुछ नहीं, इसीलिए बुरे और भले दोनों भीतर आते हैं। पर वही अनुग्रह एक वस्त्र देता है, और जो उसे ठुकराकर अपने ही कपड़ों में बैठना चाहता है, वह अनुग्रह को नहीं, अपने आपको पकड़े हुए है। यहीं अनुग्रह और न्याय एक ही मेज़ पर मिलते हैं। और आगे के तीनों विवादों में यही बात दूसरे रूप में लौटती है: सिक्के पर कैसर की आकृति है, मनुष्य पर परमेश्वर की; इसलिए पूरा मन, पूरा प्राण, पूरी बुद्धि उन्हीं का हक़ है। जो जीवितों के परमेश्वर हैं, वे आधे-अधूरे उत्तर से संतुष्ट नहीं होते।
सूत्र
यह दृष्टान्त शून्य में नहीं बोला गया। भविष्यद्वक्ताओं ने बार-बार परमेश्वर के राज्य को भोज के रूप में देखा था: पहाड़ पर चरबी भरे पदार्थों का भोज, जहाँ आँसू पोंछे जाते हैं और मृत्यु निगल ली जाती है। यीशु उसी चित्र को उठाते हैं और उसमें एक नई बात जोड़ते हैं, यह विवाह का भोज है, और दूल्हा राजा का पुत्र है। वाचा की पूरी कहानी विवाह की भाषा में चलती रही: सीनै पर्वत की प्रतिज्ञा, होशे की टूटी हुई पत्नी, और अंत में मेम्ने का ब्याह। इसलिए जब पुत्र यरूशलेम में खड़ा होकर यह कहानी सुनाता है, तो वह अपने ही विवाह का निमंत्रण बाँट रहा है, और जानता है कि जिस मेज़ के लिए बैल मारे गए, उसकी असली कीमत कुछ ही दिनों बाद क्रूस पर चुकाई जाएगी।
दर्पण
"कोई अपने खेत को, कोई अपने व्यापार को।" ध्यान दीजिए, ये पापी नहीं, व्यस्त लोग हैं। खेत बुरा नहीं है, व्यापार पाप नहीं है; ठुकराना इनकार के शब्दों से नहीं, कैलेंडर से होता है। हममें से बहुत कम लोग परमेश्वर को खुलकर "नहीं" कहते हैं; हम बस बाद में कहते हैं। सोमवार की मीटिंग, बच्चों की परीक्षा, घर की किस्त, बीमार माता-पिता, सब असली हैं, और सबके पीछे छिपकर हम राजा को टालते रहते हैं जब तक टालना ही हमारा उत्तर बन जाता है। और दूसरा दर्पण वह चुप आदमी है जो भीतर तो आ गया पर वस्त्र नहीं पहना: कलीसिया में बैठा, गीत गाता, पर मसीह की धार्मिकता ओढ़ने से इनकार करता, अपनी ही योग्यता में सम्मानित दिखना चाहता।
आज ही अपने अगले सात दिनों का कैलेंडर खोलिए और उसमें एक ऐसा समय लिखकर तय कीजिए जिसे आप परमेश्वर के साथ बिताने के लिए किसी काम को मना करके सुरक्षित रखेंगे।
विवरण
राजा उस बिन-वस्त्र वाले मनुष्य को "हे मित्र" कहकर पुकारता है। यह ठंडा शब्द नहीं है; मत्ती में यही संबोधन उस समय भी आता है जब यहूदा बगीचे में यीशु को चूमने आता है। यानी न्याय का क्षण भी शत्रुता से नहीं, एक टूटे हुए संबंध से बोलता है। राजा चीखता नहीं, प्रश्न पूछता है, और प्रश्न में द्वार अब भी खुला है: "तू विवाह का वस्त्र पहने बिना यहाँ क्यों आ गया?" उत्तर देने की जगह वह मनुष्य चुप हो जाता है, और यही चुप्पी उसका निर्णय बन जाती है। अंतिम दिन का सबसे भयावह चित्र शायद यही है, कोई बहाना नहीं बचता, कोई तर्क नहीं, केवल मौन।
संदर्भ
यह पवित्र सप्ताह है। यीशु गधे पर यरूशलेम में आ चुके हैं, मंदिर की मेज़ें पलट चुके हैं, और अब मंदिर के आँगन में खड़े हैं, जहाँ हर सवाल दर्शकों के सामने पूछा जाता है और इज़्ज़त सार्वजनिक रूप से जीती या खोई जाती है। फरीसी और हेरोदी सामान्यतः एक-दूसरे के विरोधी थे, एक रोम से घृणा करता था, दूसरा रोम से लाभ उठाता था; पर यीशु को गिराने के लिए वे साथ आ जाते हैं। कर का प्रश्न जाल है: "हाँ" कहो तो जनता नाराज़, "नहीं" कहो तो रोम के सामने राजद्रोह। सदूकी मंदिर के धनी वर्ग थे, केवल मूसा की पुस्तकों को प्रमाण मानते थे, इसलिए यीशु उन्हें उन्हीं की ज़मीन पर, मूसा की पुस्तक से उत्तर देते हैं।
प्रश्न
"बुलाए हुए तो बहुत हैं परन्तु चुने हुए थोड़े हैं।" यह वाक्य आराम नहीं देता। यदि राजा ने सचमुच सबको बुलाया, तो "चुने हुए" का क्या अर्थ? पाठ हमें चुनाव के तंत्र में झाँकने नहीं देता; वह केवल दो बातें साथ रखता है और अलग नहीं करता: निमंत्रण सचमुच सबके लिए खुला है, और भीतर बैठना अपने आप में पर्याप्त नहीं। यीशु यह नहीं बताते कि परमेश्वर की संप्रभुता और हमारी ज़िम्मेदारी भीतर से कैसे जुड़ती हैं। शायद इसलिए कि जिस क्षण हम यह समझने बैठते हैं, हम मेज़ से उठ जाते हैं। इस वचन का उद्देश्य हमें गिनती करना नहीं, वस्त्र पहनना सिखाना है।
चिंतन
कौन-सा "खेत" या "व्यापार" इस समय आपके जीवन में इतना जायज़ है कि उसके पीछे आप परमेश्वर के निमंत्रण को टालते जा रहे हैं?
यदि राजा आज भीतर आकर आपसे "हे मित्र" कहकर पूछें, तो आप किस वस्त्र में बैठे मिलेंगे, अपनी योग्यता में या मसीह की धार्मिकता में?
Matthew में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
Short, fresh readings that make Matthew feel newly written.
The King and his kingdom, traced through the whole Gospel.
Matthew: An Introduction and Commentary
A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.
The Message of the Sermon on the Mount
Stott's classic on Matthew 5-7, the charter of the kingdom.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
Matthew 22 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मत्ती 22 का क्या अर्थ है?
मत्ती 22 किस विषय में है?
मत्ती 22 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मत्ती 22 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मत्ती 22 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Matthew 22 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यीशु फिर उनसे दृष्टान्तों में कहने लगा।" ज़रा सोच, जो लोग अभी अभी उसे पकड़ने की ताक में थे, उन्हीं से वह "फिर" बात करता है। और इस बार कहानी किसी अदालत की नहीं, एक विवाह के भोज की है। ठुकराए जाने के बाद भी उसने बुलावा ही भेजा। तूने जितनी बार मुँह मोड़ा, क्या उसने उतनी ही बार बोलना बंद किया? नहीं। वह अब भी तुझसे कह रहा है।
पिता, तूने सब कुछ पहले से तैयार कर रखा है, और फिर भी मैं बहाने बनाकर देर करता रहता हूँ। मेरे मन की झिझक हटा दे। तेरा बुलावा सुनकर आज ही उठूँ और तेरी मेज़ पर आकर बैठूँ, जहाँ तेरी उदारता मेरा इंतज़ार कर रही है।
जितने भले बुरे मिले, सब को इकट्ठा कर लाए; और विवाह का घर मेहमानों से भर गया।" ध्यान दे, दासों ने सड़क पर किसी का चरित्र नहीं जाँचा। जो निमंत्रित थे, वे न आए; जो सड़क पर पड़े थे, वे मेज़ पर बैठे। तू भी वहीं से उठाया गया है। तो फिर किसी को यह कहने का हक तुझे कहाँ से मिला कि वह इस घर के लायक नहीं?
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें
