बाइबल व्याख्या

मत्ती 22:6

बाइबल

पाठ

निमंत्रण दो बार भेजा जा चुका है, और दोनों बार ठुकराया गया है। कुछ लोगों ने बस कंधे उचकाए और चल दिए, एक अपने खेत की ओर, दूसरा अपने व्यापार की ओर। पर पद 6 में कहानी अचानक ठंडी उदासीनता से निकलकर खून तक पहुँच जाती है: "अन्य लोगों ने जो बच रहे थे उसके दासों को पकड़कर उनका अनादर किया और मार डाला।" ये वही दास हैं जो हाथ में केवल एक संदेश लेकर आए थे, कोई हथियार नहीं, कोई माँग नहीं, सिर्फ इतना कि भोज तैयार है, आ जाइए। और उन्हें पकड़ा गया, अपमानित किया गया, और मार डाला गया। एक विवाह के निमंत्रण का उत्तर हत्या से दिया गया।

मूल मर्म

यह पद बताता है कि परमेश्वर के प्रेम को ठुकराना कभी तटस्थ नहीं रहता। पद 5 की उपेक्षा और पद 6 की हिंसा अलग-अलग प्रजातियाँ नहीं, एक ही बीज की दो फसलें हैं। जो निमंत्रण को टाल देता है, वह देर-सबेर निमंत्रण देनेवाले से चिढ़ने लगता है, और फिर संदेशवाहक से। मनुष्य का हृदय अनुग्रह के सामने तटस्थ खड़ा नहीं रह सकता; या तो वह झुकता है, या वह मुट्ठी बाँधता है। और ध्यान दीजिए कि राजा ने कुछ माँगा नहीं था; उसने देना चाहा था। यही सबसे कड़वी सच्चाई है: विद्रोह का चरम रूप किसी कठोर आज्ञा के विरुद्ध नहीं, बल्कि एक खुले हुए भोज-गृह के द्वार के विरुद्ध खड़ा होता है।

सूत्र

यह दृश्य मत्ती के पाठक के लिए नया नहीं था। ठीक इससे पहले, दाख की बारी के दृष्टान्त में, वही पैटर्न चल चुका है: मालिक दास भेजता है, किसान उन्हें पीटते और मार डालते हैं, और अंत में मालिक कहता है, अपने पुत्र को भेजूँगा। पद 6 उसी लंबी, लहूलुहान कतार का हिस्सा है, जो भविष्यद्वक्ताओं से होकर उस व्यक्ति तक पहुँचती है जो यह दृष्टान्त सुना रहा है। यीशु अपनी ही मृत्यु के बारे में बोल रहे हैं, यरूशलेम में, अपने पकड़े जाने से कुछ ही दिन पहले। और यहाँ एक बात चुभती है: कहानी में पुत्र दूल्हा है, पर बाइबल की असली कहानी में दूल्हा स्वयं मारा गया। भोज देनेवाला ही भोज की कीमत बन गया। निमंत्रण जिस लहू से लिखा गया, वह उसका अपना था।

दर्पण

सबसे पहले यह पूछिए कि आप इस दृश्य में कहाँ खड़े हैं। शायद आप वह व्यक्ति हैं जिसे किसी की ईमानदार बात चुभती है: वह बहन जो बार-बार आपसे वही सवाल पूछती है जिसे आप टालना चाहते हैं, वह मित्र जिसने आपके पैसे के फैसलों पर, आपकी शराब पर, आपकी शादी में आपके रूखेपन पर उँगली रखी थी, और जिससे आपने धीरे-धीरे दूरी बना ली। हमने उसे मारा नहीं, हमने बस उसे संदेशों की सूची से हटा दिया, उसका नाम आते ही विषय बदल दिया। यह पद कहता है कि यह वही सड़क है, बस उसका शुरुआती छोर। और शायद आप दूसरी ओर हैं: आपने किसी को सच कहा और बदले में अपमान मिला। यह पद आपको बताता है कि यह असामान्य नहीं, यह काम की प्रकृति है। आज एक काम कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिसने कभी आपसे परमेश्वर की बात कही थी और आपने उसे टाल दिया था, और उसे अभी एक छोटा संदेश भेजकर धन्यवाद कहिए।

मुख्य पात्र

इस पद के असली पात्र वे दास हैं, और वे चुप हैं। उनके पास कोई सेना नहीं, कोई अधिकार का प्रतीक नहीं, हाथ में केवल एक वाक्य: सब कुछ तैयार है, आइए। ध्यान दीजिए कि ये दूसरी बार भेजे गए दास हैं। उन्हें मालूम था कि पहली टोली को कैसा जवाब मिला था। फिर भी वे गए, क्योंकि राजा ने भेजा। यही सेवक होने का पूरा अर्थ है: संदेश आपका नहीं, इसलिए उसे वापस लेने का अधिकार भी आपका नहीं। उनकी आत्मिक तस्वीर में कोई वीरता की मुद्रा नहीं है, केवल आज्ञाकारिता है, और आज्ञाकारिता अक्सर बहादुरी जैसी नहीं दिखती, बस थकी हुई वफादारी जैसी दिखती है। परमेश्वर का राज्य ऐसे ही लोगों से आगे बढ़ता है: निहत्थे, भेजे हुए, और अक्सर बिना नाम के।

एक छोटा विवरण

"अनादर किया और मार डाला" में पहला शब्द जल्दी में पढ़ा जाता है, पर यूनानी में यह ὑβρίζω (हुब्रिज़ो) है, जिसका अर्थ है किसी को जानबूझकर सार्वजनिक रूप से लज्जित करना, उसकी गरिमा को मिट्टी में मिलाना। यह क्रोध में उठा हुआ हाथ नहीं, यह सोची-समझी बेइज्जती है। पहले उन्होंने दासों को अपमानित किया, फिर मारा। क्रम महत्वपूर्ण है। हत्या से पहले एक कदम होता है जिसमें दूसरे को इंसान से कम बना दिया जाता है, उस पर हँसा जाता है, उसका मज़ाक उड़ाया जाता है, उसे सड़क पर तमाशा बना दिया जाता है। और यही ठीक वही शब्द है जो मसीह के साथ हुआ: थूकना, काँटों का मुकुट, "यहूदियों का राजा" लिखा हुआ तख्ता। निमंत्रण को ठुकराना पहले उपहास बनता है, फिर हिंसा।

कठिन प्रश्न

राजा ने दूसरी बार दासों को क्यों भेजा, जब वह जानता था कि क्या हो सकता है? और परमेश्वर ने उन्हें बचाया क्यों नहीं? यह दृष्टान्त इसका उत्तर नहीं देता, और हमें भी उत्तर गढ़ने से बचना चाहिए। हम केवल इतना देख सकते हैं कि इस कहानी में परमेश्वर का प्रेम अपने संदेशवाहकों को खतरे से बाहर नहीं रखता; वह उन्हें खतरे के बीच से होकर भेजता है। यह सोचना आरामदायक होगा कि वफादारी सुरक्षा की गारंटी है, पर बाइबल कहीं ऐसा वादा नहीं करती। पद 7 में न्याय आता है, हाँ, पर दास पहले ही मर चुके हैं। न्याय देर से आता है, और मृतकों को वापस नहीं लाता। इस खाईं को केवल एक चीज़ पाटती है: वह राजा अपने पुत्र को भी उसी सड़क पर भेजता है, और पुत्र वापस नहीं भागता। परमेश्वर अपने सेवकों से वह नहीं माँगते जो उन्होंने स्वयं नहीं सहा।

चिंतन

आपके जीवन में वह कौन-सी आवाज़ है जिससे आप बचकर निकलते हैं, और आप क्यों मानते हैं कि यह बचना निरापद है?

जब आपकी वफादारी का इनाम अपमान बना, तब आपने किससे कहा, और क्या आप फिर भेजे जाने को तैयार हैं?

Matthew में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Matthew For Everyone, Part 1

N.T. Wright

Short, fresh readings that make Matthew feel newly written.

The Message of Matthew

Michael Green

The King and his kingdom, traced through the whole Gospel.

Matthew: An Introduction and Commentary

R.T. France

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Matthew

Michael Wilkins

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

The Message of the Sermon on the Mount

John Stott

Stott's classic on Matthew 5-7, the charter of the kingdom.

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Matthew 22:6 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 22:6 का क्या अर्थ है?
निमंत्रण दो बार भेजा जा चुका है, और दोनों बार ठुकराया गया है। कुछ लोगों ने बस कंधे उचकाए और चल दिए, एक अपने खेत की ओर, दूसरा अपने व्यापार की ओर। पर पद 6 में कहानी अचानक ठंडी उदासीनता से निकलकर खून तक पहुँच जाती है: "अन्य लोगों ने जो बच रहे थे उसके दासों को पकड़कर उनका अनादर किया और मार डाला।" ये वही दास हैं जो हाथ में केवल एक संदेश लेकर आए थे, कोई हथियार नहीं, कोई माँग नहीं, सिर्फ इतना कि भोज तैयार है, आ जाइए। और उन्हें पकड़ा गया, अपमानित किया गया, और मार डाला गया। एक विवाह के निमंत्रण का उत्तर हत्या से दिया गया।
मत्ती 22:6 किस विषय में है?
यह दृश्य मत्ती के पाठक के लिए नया नहीं था। ठीक इससे पहले, दाख की बारी के दृष्टान्त में, वही पैटर्न चल चुका है: मालिक दास भेजता है, किसान उन्हें पीटते और मार डालते हैं, और अंत में मालिक कहता है, अपने पुत्र को भेजूँगा। पद 6 उसी लंबी, लहूलुहान कतार का हिस्सा है, जो भविष्यद्वक्ताओं से होकर उस व्यक्ति तक पहुँचती है जो यह दृष्टान्त सुना रहा है। यीशु अपनी ही मृत्यु के बारे में बोल रहे हैं, यरूशलेम में, अपने पकड़े जाने से कुछ ही दिन पहले। और यहाँ एक बात चुभती है: कहानी में पुत्र दूल्हा है, पर बाइबल की असली कहानी में दूल्हा स्वयं मारा गया। भोज देनेवाला ही भोज की कीमत बन गया। निमंत्रण जिस लहू से लिखा गया, वह उसका अपना था।
मत्ती 22:6 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इस पद के असली पात्र वे दास हैं, और वे चुप हैं। उनके पास कोई सेना नहीं, कोई अधिकार का प्रतीक नहीं, हाथ में केवल एक वाक्य: सब कुछ तैयार है, आइए। ध्यान दीजिए कि ये दूसरी बार भेजे गए दास हैं। उन्हें मालूम था कि पहली टोली को कैसा जवाब मिला था। फिर भी वे गए, क्योंकि राजा ने भेजा। यही सेवक होने का पूरा अर्थ है: संदेश आपका नहीं, इसलिए उसे वापस लेने का अधिकार भी आपका नहीं। उनकी आत्मिक तस्वीर में कोई वीरता की मुद्रा नहीं है, केवल आज्ञाकारिता है, और आज्ञाकारिता अक्सर बहादुरी जैसी नहीं दिखती, बस थकी हुई वफादारी जैसी दिखती है। परमेश्वर का राज्य ऐसे ही लोगों से आगे बढ़ता है: निहत्थे, भेजे हुए, और अक्सर बिना नाम के।
मत्ती 22:6 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
राजा ने दूसरी बार दासों को क्यों भेजा, जब वह जानता था कि क्या हो सकता है? और परमेश्वर ने उन्हें बचाया क्यों नहीं? यह दृष्टान्त इसका उत्तर नहीं देता, और हमें भी उत्तर गढ़ने से बचना चाहिए। हम केवल इतना देख सकते हैं कि इस कहानी में परमेश्वर का प्रेम अपने संदेशवाहकों को खतरे से बाहर नहीं रखता; वह उन्हें खतरे के बीच से होकर भेजता है। यह सोचना आरामदायक होगा कि वफादारी सुरक्षा की गारंटी है, पर बाइबल कहीं ऐसा वादा नहीं करती। पद 7 में न्याय आता है, हाँ, पर दास पहले ही मर चुके हैं। न्याय देर से आता है, और मृतकों को वापस नहीं लाता। इस खाईं को केवल एक चीज़ पाटती है: वह राजा अपने पुत्र को भी उसी सड़क पर भेजता है, और पुत्र वापस नहीं भागता। परमेश्वर अपने सेवकों से वह नहीं माँगते जो उन्होंने स्वयं नहीं सहा।
मत्ती 22:6 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
जब आपकी वफादारी का इनाम अपमान बना, तब आपने किससे कहा, और क्या आप फिर भेजे जाने को तैयार हैं?
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Matthew 22 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 1

यीशु फिर उनसे दृष्टान्तों में कहने लगा।" ज़रा सोच, जो लोग अभी अभी उसे पकड़ने की ताक में थे, उन्हीं से वह "फिर" बात करता है। और इस बार कहानी किसी अदालत की नहीं, एक विवाह के भोज की है। ठुकराए जाने के बाद भी उसने बुलावा ही भेजा। तूने जितनी बार मुँह मोड़ा, क्या उसने उतनी ही बार बोलना बंद किया? नहीं। वह अब भी तुझसे कह रहा है।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 4

पिता, तूने सब कुछ पहले से तैयार कर रखा है, और फिर भी मैं बहाने बनाकर देर करता रहता हूँ। मेरे मन की झिझक हटा दे। तेरा बुलावा सुनकर आज ही उठूँ और तेरी मेज़ पर आकर बैठूँ, जहाँ तेरी उदारता मेरा इंतज़ार कर रही है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 10

जितने भले बुरे मिले, सब को इकट्ठा कर लाए; और विवाह का घर मेहमानों से भर गया।" ध्यान दे, दासों ने सड़क पर किसी का चरित्र नहीं जाँचा। जो निमंत्रित थे, वे न आए; जो सड़क पर पड़े थे, वे मेज़ पर बैठे। तू भी वहीं से उठाया गया है। तो फिर किसी को यह कहने का हक तुझे कहाँ से मिला कि वह इस घर के लायक नहीं?

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