मत्ती 23
पाठ
मन्दिर के आँगन में, अपने पकड़े जाने से कुछ ही दिन पहले, यीशु भीड़ और चेलों की ओर मुड़कर उन धर्मगुरुओं के बारे में बोलते हैं जो "मूसा की गद्दी पर बैठे हैं": उनकी शिक्षा मानो, पर उनका चालचलन मत अपनाओ, क्योंकि वे बोझ दूसरों के कंधों पर रखते हैं और स्वयं उँगली तक नहीं हिलाते। फिर सात बार वह भारी शब्द गिरता है, "तुम पर हाय", और हर बार किसी बाहरी शुद्धता के पीछे छिपी भीतरी सड़ांध उघड़ती है: चूना फिरी कब्रें, मच्छर छानना और ऊँट निगलना, नबियों की कब्रें संवारना और नबियों को मारना। अन्त में स्वर टूट जाता है और शिकायत विलाप बन जाती है: "हे यरूशलेम, हे यरूशलेम!" मुर्गी अपने बच्चों को बुलाती रही, बच्चे नहीं आए, और घर उजाड़ छोड़ा जाता है।
मर्म
यह अध्याय क्रोध का नहीं, अधिकार का दस्तावेज़ है। जो बोल रहे हैं वे कोई नाराज़ सुधारक नहीं, वे वही हैं जो कहते हैं "तुम्हारा एक ही स्वामी है, अर्थात् मसीह" और "मैं तुम्हारे पास भविष्यद्वक्ताओं… को भेजता हूँ"। पुराने नियम में नबियों को भेजनेवाले परमेश्वर थे; यहाँ यीशु स्वयं वह भेजनेवाले बनकर खड़े हैं। इसलिए "हाय" कोई नैतिक शिकायत नहीं, यह न्यायी का फैसला है जो कुछ ही दिनों में स्वयं न्याय सहने जा रहा है। और यहीं इसका मर्म खुलता है: धर्म का सबसे घातक रूप अधर्म नहीं, बल्कि वह धार्मिकता है जो दिखती तो साफ़ है पर भीतर से मरी हुई है। कटोरा बाहर से माँजने से भीतर साफ़ नहीं होता; भीतर से साफ़ होने पर बाहर अपने आप स्वच्छ होता है। यही अनुग्रह की तर्कशैली है, और यही क्रूस की दिशा।
सूत्र
यह अध्याय उद्धार की कहानी में एक मोड़ है, न कि एक विषयांतर। इस्राएल का इतिहास बार-बार भेजे गए नबियों और बार-बार ठुकराए गए वचन का इतिहास है, और यीशु उसे एक ही वाक्य में समेट देते हैं: "तू जो भविष्यद्वक्ताओं को मार डालता है"। पर ध्यान दीजिए कि वे इस शृंखला के बाहर खड़े होकर नहीं बोलते। वे कहते हैं "मैं तुम्हारे पास भविष्यद्वक्ताओं… को भेजता हूँ", और फिर स्वयं उसी सड़क पर चल पड़ते हैं जो हाबिल से जकर्याह तक धर्मियों के लहू से लाल है। जो लहू "तुम्हारे सिर पर" पड़ना था, वह कुछ दिनों बाद क्रूस पर उस पर पड़ेगा जो बोल रहे हैं। सात "हाय" का उत्तर सात दिन बाद एक खाली कब्र है। न्यायी ने दण्ड सुनाया, और फिर दण्ड अपने ऊपर ले लिया। यही पूरे शास्त्र का सूत्र है।
दर्पण
हममें से अधिकांश लोग फरीसी होने से नहीं डरते, क्योंकि हम मानते हैं कि हम पाखण्डी नहीं हैं। पर यह अध्याय पाखण्ड को इतना सूक्ष्म बना देता है कि बचना मुश्किल है: वह माता-पिता जो बच्चों से प्रार्थना की नियमितता माँगता है पर स्वयं वर्षों से कड़वाहट पाले है; वह समूह-अगुआ जो छोटी-छोटी बातों में शुद्धता जाँचता है और घर में अपनी पत्नी से रूखा बोलता है; वह कर्मचारी जो ईमानदारी का उपदेश देता है और हिसाब में चतुराई करता है। मच्छर छानना और ऊँट निगलना हमारा रोज़ का पेशा है। और असली सवाल यह नहीं कि लोग क्या देखते हैं, बल्कि यह कि कटोरा भीतर से कैसा है। आज ही, दस मिनट में: उस एक अपेक्षा को कागज़ पर लिखिए जो आप किसी अपने से माँगते हैं पर स्वयं नहीं निभाते, और उस व्यक्ति को संदेश भेजकर कहिए कि यह बोझ आज मैं आपके कंधे से उतार रहा हूँ।
अन्तर्पाठ
अध्याय का अन्तिम वाक्य भजन 118 से लिया गया है, वही पंक्ति जो कुछ ही दिन पहले यरूशलेम में प्रवेश करते समय भीड़ ने गाई थी। यीशु उसे लौटाते हैं, पर अब भविष्य के रूप में: "धन्य है वह, जो प्रभु के नाम से आता है"। जिस स्वागत-गीत को शहर ने ज़बान से गाया और दिल से ठुकराया, वही एक दिन सच्चे मन से गाया जाएगा। दूसरी गूँज और पुरानी है: पंखों के नीचे इकट्ठा करने वाली मुर्गी का चित्र व्यवस्थाविवरण और भजनों की उस भाषा से आता है जहाँ परमेश्वर अपने लोगों को उकाब के पंखों पर उठाते और अपनी छाया में छिपाते हैं। यीशु उस चित्र को अपने ऊपर लागू करते हैं, और यही इस पूरे अध्याय का सबसे चुपचाप कहा गया मसीह-दावा है।
प्रश्न
आयत 39 खुली रह जाती है और उसे ज़बरदस्ती बंद नहीं करना चाहिए। "जब तक तुम न कहोगे" का अर्थ क्या है? क्या यह वादा है कि एक दिन यरूशलेम अपने राजा को पहचानेगा, या यह शर्त है जो शायद कभी पूरी न हो? व्याकरण दोनों की गुंजाइश छोड़ता है। जो लोग यहाँ से इस्राएल के अंतिम उद्धार का निश्चित वादा निकालते हैं वे शायद कुछ ज़्यादा कह रहे हैं; जो इसे केवल दरवाज़ा बंद होने की घोषणा मानते हैं वे शायद कुछ कम। मुझे यह छोड़ देना ठीक लगता है, क्योंकि जो वाक्य "उजाड़" के तुरंत बाद आता है वह आशीष का वाक्य है। जिसने सात बार "हाय" कहा, उसने अपना अन्तिम शब्द "धन्य" पर समाप्त किया। इतना काफ़ी है; बाकी परमेश्वर की दया के अधिकार में है।
मुख्य पात्र
इस अध्याय में यीशु की जो छवि उभरती है वह असुविधाजनक है, और उसे नरम करना बेईमानी होगी। वे "साँपों, करैतों के बच्चों" कहते हैं, वे नरक का नाम लेते हैं, वे पूरी एक पीढ़ी पर लहू का हिसाब रखते हैं। यह वही यीशु हैं जो बच्चों को गोद में उठाते हैं। दोनों में विरोधाभास नहीं है: जो सचमुच प्रेम करता है, वही उन लोगों पर सबसे कड़ा होता है जो दूसरों के लिए स्वर्ग का द्वार बंद कर रहे हैं। और फिर आयत 37 में आवाज़ काँप जाती है। "कितनी ही बार मैंने चाहा"। यह न्यायी की थकी हुई माँ जैसी आवाज़ है। क्रोध और रुलाई यहाँ एक ही साँस में हैं, और यही परमेश्वर का सच्चा चेहरा है: वह जो दण्ड सुनाता है और उसी समय पंख फैलाए खड़ा रहता है।
चिंतन
आप दूसरों से जो सबसे छोटी बात माँगते हैं और जो सबसे बड़ी बात स्वयं अनदेखी करते हैं, उन दोनों के नाम क्या हैं?
यदि यीशु आज आपके कटोरे को भीतर से देखें, तो पहले किस चीज़ पर उनकी उँगली रुकेगी, और आप उसे किससे छिपा रहे हैं?
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Matthew 23 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Matthew 23 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
हे साँपो, हे करैतों के बच्चों! तुम नरक के दंड से कैसे बचोगे?" यीशु ने यह कहा नहीं, पूछा। जो सबसे कठोर शब्द लगते हैं, वे असल में एक सवाल हैं, और सवाल का मतलब है कि जवाब देने का मौका अब भी बाकी है। धर्मी दिखने की आदत इतनी गहरी हो जाती है कि चेतावनी भी हम दूसरों के लिए सुनते हैं। आज यह सवाल अपने लिए सुनो।
पिता, धन्यवाद कि मंदिर केवल पत्थरों का भवन नहीं था, क्योंकि आप उसमें बसे थे। आपकी उपस्थिति ही उसे पवित्र बनाती थी। धन्यवाद कि आज भी आप दूर नहीं, बल्कि हमारे बीच और हमारे भीतर वास करते हैं, और यही हमारे जीवन को पवित्र ठहराता है।
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