बाइबल व्याख्या

मत्ती 24:31

बाइबल

पाठ

तीसवें पद में पृथ्वी के कुल छाती पीट रहे हैं, और ठीक उसी क्षण में यह वाक्य आता है: "और वह तुरही के बड़े शब्द के साथ, अपने स्वर्गदूतों को भेजेगा, और वे आकाश के इस छोर से उस छोर तक, चारों दिशा से उसके चुने हुओं को इकट्ठा करेंगे।" एक ही साँस में शोक और संग्रह। मनुष्य का पुत्र बादलों पर आता है, तुरही बजती है, और स्वर्गदूत भेजे जाते हैं, न्याय की तलवार लेकर नहीं, बल्कि बटोरने के काम पर। बिखरे हुए लोगों को, जो जगह-जगह डर में, क्लेश में, अकेलेपन में छिपे बैठे थे, नाम लेकर ढूँढ़ा जाता है। यह पूरे अध्याय का एकमात्र पद है जहाँ यीशु अपने लोगों के लिए अंतिम गति का वर्णन करते हैं: घर लाया जाना।

मर्म

ध्यान दीजिए कि इस पद में चुने हुए लोग कुछ नहीं करते। वे दौड़ते नहीं, चढ़ते नहीं, अपने आप को इकट्ठा नहीं करते। उन्हें इकट्ठा किया जाता है। पूरे अध्याय में चेलों को भागना पड़ता है, धीरज धरना पड़ता है, बहकावे से बचना पड़ता है, और अचानक सारी क्रिया परमेश्वर के हाथ में चली जाती है। यही अनुग्रह का व्याकरण है: अंत में उद्धार हमारी पकड़ नहीं, हम पर पड़ी हुई पकड़ है। और यह भी देखिए कि यीशु स्वर्गदूतों को "अपने" कहते हैं और चुने हुओं को भी "उसके"। जो अधिकार पुराने नियम में केवल परमेश्वर का था, वह यहाँ बिना किसी सफाई के मनुष्य के पुत्र के हाथ में है। जिसे कुछ ही दिनों बाद क्रूस पर टाँगा जाएगा, वही ब्रह्मांड के चारों कोनों से अपने लोगों को नाम लेकर बुलाता है।

सूत्र

यह चित्र यीशु ने खुद नहीं गढ़ा; वे इस्राएल की सबसे पुरानी आशा उठा रहे हैं। व्यवस्थाविवरण में मूसा बिखरे हुए लोगों से वादा करता है कि यदि वे आकाश के छोर तक भी धकेल दिए जाएँ, तो भी परमेश्वर वहाँ से उन्हें बटोर लाएँगे। निर्वासन, तितर-बितर होना, खोया हुआ होना, यह बाइबल में केवल भूगोल नहीं, यह टूटी हुई सृष्टि का हाल है। और जिस दिन परमेश्वर अपने लोगों को इकट्ठा करते हैं, उस दिन इतिहास का घाव भरता है। यीशु इस वादे को अपने नाम से जोड़ लेते हैं। वे केवल इकट्ठा करनेवाले नहीं, वे पहले स्वयं बाहर निकाले गए, नगर के बाहर, अकेले, छोड़े हुए। जो सबसे दूर तक बिखरा गया, वही अब चारों दिशा से बटोरता है। बिखराव को उन्होंने अपने शरीर में झेला ताकि बटोरने का अधिकार उनका हो।

दर्पण

अब सीधा सवाल: आप किस चीज़ से डरते हैं, छूट जाने से या भुला दिए जाने से? अधिकतर लोग जिन्हें मैं जानता हूँ, अंत के दिनों से उतना नहीं डरते जितना इस चुपचाप शक से कि वे किसी की गिनती में नहीं हैं। दफ़्तर में जहाँ आपका काम कोई नहीं देखता। घर में जहाँ बीमार माता-पिता की सेवा में महीने बीत जाते हैं और कोई पूछता तक नहीं। कलीसिया में जहाँ आप बैठते हैं और लगता है, यदि मैं कल न आऊँ तो किसी को फ़र्क नहीं पड़ेगा। यह पद उस डर पर सीधा हाथ रखता है। स्वर्गदूत भीड़ नहीं गिनते, वे "उसके चुने हुओं को" ढूँढ़ते हैं। और यही पद आपके एक गर्व को भी तोड़ता है: कि आप अपने आप को बचाए रखेंगे, अपनी समझदारी से, अपने अनुशासन से। नहीं। आपको लाया जाएगा। आज ही, दस मिनट में: उस एक व्यक्ति का नाम सोचिए जो कलीसिया से बिखर गया है और अब नहीं आता, और उसे अभी एक संदेश भेजिए, बिना उपदेश के, केवल यह पूछते हुए कि वह कैसा है।

बारीकी

"तुरही के बड़े शब्द के साथ" पर रुकिए। इस्राएल में तुरही तीन काम करती थी: सेना को बुलाना, मंडली को इकट्ठा करना, और जुबली के वर्ष में दासों की छुट्टी की घोषणा करना। सातवें वर्षों के बाद वह सींग बजता था और कर्ज़ मिट जाते थे, खेत लौटा दिए जाते थे, बंधुआ लोग अपने घर चले जाते थे। यीशु उसी आवाज़ को इतिहास के अंत में रखते हैं। यानी अंतिम दिन का मूल स्वर घोषणा है, दंडादेश नहीं: छुट्टी हो गई, कर्ज़ चुक गया, घर लौट आओ। और यह "बड़ा शब्द" है, दबी हुई फुसफुसाहट नहीं। जिस विश्वास को आप आज मुश्किल से बचाए रखते हैं, वह उस दिन आकाश भर में गूँजेगा।

अन्तर्पाठ

पौलुस थिस्सलुनीकियों को लिखते हुए ठीक यही तीन तत्व दोहराता है, प्रभु का उतरना, परमेश्वर की तुरही, और विश्वासियों का इकट्ठा किया जाना, और वह इसे शोक करनेवालों की सांत्वना के लिए लिखता है, भविष्यवाणी की पहेली सुलझाने के लिए नहीं। इससे पता चलता है कि आरंभिक कलीसिया ने इस पद को कैसे पढ़ा: कब्रिस्तान के किनारे। दूसरी ओर इसी अध्याय का यह वाक्य याद रखिए, "और अधर्म के बढ़ने से बहुतों का प्रेम ठंडा हो जाएगा।" ठंडा प्रेम और बटोरनेवाला प्रभु आमने-सामने खड़े हैं। जब चारों ओर लोग एक दूसरे से हाथ खींच रहे होंगे, तब वे हाथ बढ़ा रहे होंगे।

प्रश्न

पर एक काँटा रह जाता है: यदि "चुने हुए" इकट्ठे किए जाते हैं, तो बाकी? पद तीस के वे कुल जो छाती पीटते हैं, उनका क्या? यीशु यहाँ जवाब नहीं देते, और मैं उनसे ज़्यादा जानने का दिखावा नहीं करूँगा। पर दो बातें टेढ़ी होकर भी सच हैं। पहली, बाइबल में चुनाव कभी दूसरों को बाहर रखने का बहाना नहीं, हमेशा दूसरों तक पहुँचने का बुलावा है; इसीलिए पद चौदह कहता है कि पहले सुसमाचार सब जातियों तक जाएगा। दूसरी, छाती पीटना पश्चाताप का भी चिन्ह है, केवल निराशा का नहीं। यह मुझे पूरी शांति नहीं देता। पर इतना काफ़ी है कि न्याय उसके हाथ में है जिसके हाथों में कीलों के निशान हैं।

चिंतन

आप अपने विश्वास को किस हद तक अपनी पकड़ मानते हैं, और इस पद को पढ़कर उस पकड़ के बारे में क्या बदलना चाहिए?

यदि तुरही की आवाज़ जुबली की घोषणा है, तो आपके जीवन का कौन-सा कर्ज़, कौन-सी शर्म, आप अब भी ढो रहे हैं जिसे वह आवाज़ पहले ही मिटा चुकी है?

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Matthew For Everyone, Part 1

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The Message of Matthew

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The King and his kingdom, traced through the whole Gospel.

Matthew: An Introduction and Commentary

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A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Matthew

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The Message of the Sermon on the Mount

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Matthew 24:31 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 24:31 का क्या अर्थ है?
तीसवें पद में पृथ्वी के कुल छाती पीट रहे हैं, और ठीक उसी क्षण में यह वाक्य आता है: "और वह तुरही के बड़े शब्द के साथ, अपने स्वर्गदूतों को भेजेगा, और वे आकाश के इस छोर से उस छोर तक, चारों दिशा से उसके चुने हुओं को इकट्ठा करेंगे।" एक ही साँस में शोक और संग्रह। मनुष्य का पुत्र बादलों पर आता है, तुरही बजती है, और स्वर्गदूत भेजे जाते हैं, न्याय की तलवार लेकर नहीं, बल्कि बटोरने के काम पर। बिखरे हुए लोगों को, जो जगह-जगह डर में, क्लेश में, अकेलेपन में छिपे बैठे थे, नाम लेकर ढूँढ़ा जाता है। यह पूरे अध्याय का एकमात्र पद है जहाँ यीशु अपने लोगों के लिए अंतिम गति का वर्णन करते हैं: घर लाया जाना।
मत्ती 24:31 किस विषय में है?
यह चित्र यीशु ने खुद नहीं गढ़ा; वे इस्राएल की सबसे पुरानी आशा उठा रहे हैं। व्यवस्थाविवरण में मूसा बिखरे हुए लोगों से वादा करता है कि यदि वे आकाश के छोर तक भी धकेल दिए जाएँ, तो भी परमेश्वर वहाँ से उन्हें बटोर लाएँगे। निर्वासन, तितर-बितर होना, खोया हुआ होना, यह बाइबल में केवल भूगोल नहीं, यह टूटी हुई सृष्टि का हाल है। और जिस दिन परमेश्वर अपने लोगों को इकट्ठा करते हैं, उस दिन इतिहास का घाव भरता है। यीशु इस वादे को अपने नाम से जोड़ लेते हैं। वे केवल इकट्ठा करनेवाले नहीं, वे पहले स्वयं बाहर निकाले गए, नगर के बाहर, अकेले, छोड़े हुए। जो सबसे दूर तक बिखरा गया, वही अब चारों दिशा से बटोरता है। बिखराव को उन्होंने अपने शरीर में झेला ताकि बटोरने का अधिकार उनका हो।
मत्ती 24:31 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
"तुरही के बड़े शब्द के साथ" पर रुकिए। इस्राएल में तुरही तीन काम करती थी: सेना को बुलाना, मंडली को इकट्ठा करना, और जुबली के वर्ष में दासों की छुट्टी की घोषणा करना। सातवें वर्षों के बाद वह सींग बजता था और कर्ज़ मिट जाते थे, खेत लौटा दिए जाते थे, बंधुआ लोग अपने घर चले जाते थे। यीशु उसी आवाज़ को इतिहास के अंत में रखते हैं। यानी अंतिम दिन का मूल स्वर घोषणा है, दंडादेश नहीं: छुट्टी हो गई, कर्ज़ चुक गया, घर लौट आओ। और यह "बड़ा शब्द" है, दबी हुई फुसफुसाहट नहीं। जिस विश्वास को आप आज मुश्किल से बचाए रखते हैं, वह उस दिन आकाश भर में गूँजेगा।
मत्ती 24:31 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पर एक काँटा रह जाता है: यदि "चुने हुए" इकट्ठे किए जाते हैं, तो बाकी? पद तीस के वे कुल जो छाती पीटते हैं, उनका क्या? यीशु यहाँ जवाब नहीं देते, और मैं उनसे ज़्यादा जानने का दिखावा नहीं करूँगा। पर दो बातें टेढ़ी होकर भी सच हैं। पहली, बाइबल में चुनाव कभी दूसरों को बाहर रखने का बहाना नहीं, हमेशा दूसरों तक पहुँचने का बुलावा है; इसीलिए पद चौदह कहता है कि पहले सुसमाचार सब जातियों तक जाएगा। दूसरी, छाती पीटना पश्चाताप का भी चिन्ह है, केवल निराशा का नहीं। यह मुझे पूरी शांति नहीं देता। पर इतना काफ़ी है कि न्याय उसके हाथ में है जिसके हाथों में कीलों के निशान हैं।
मत्ती 24:31 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यदि तुरही की आवाज़ जुबली की घोषणा है, तो आपके जीवन का कौन-सा कर्ज़, कौन-सी शर्म, आप अब भी ढो रहे हैं जिसे वह आवाज़ पहले ही मिटा चुकी है?
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Matthew 24 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 26

पिता, कितनी आवाज़ें कहती हैं कि तू यहाँ है, वहाँ है। मेरा मन भटक जाता है और हर नई बात के पीछे दौड़ने लगता है। मुझे ठहरना सिखा, तेरे वचन में जड़ पकड़ना सिखा। जब तू आएगा, किसी को बताना नहीं पड़ेगा। तब तक मुझे शांत और जागता हुआ रख।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 48

पिता, कभी कभी लगता है कि तेरा आना बहुत दूर है, और मन ढीला पड़ने लगता है। मुझे उस सोच से बचा जो कहती है, अभी तो समय है। मेरे दिल को जगाए रख, ताकि जिस दिन तू आए, मैं वही करता मिलूँ जो तूने मुझे सौंपा है।

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