मत्ती 3:15
पाठ
यूहन्ना पीछे हटना चाहता है। वह जानता है कि यरदन के पानी में जो उतरने आया है, वह उससे कहीं बड़ा है, और उसका विरोध सम्मान से भरा है: तू मेरे पास आया है? यीशु उसे रोकते नहीं, समझाते नहीं, केवल एक वाक्य में उत्तर देते हैं: "अब तो ऐसा ही होने दे, क्योंकि हमें इसी रीति से सब धार्मिकता को पूरा करना उचित है।" और फिर वह छोटा-सा वाक्य आता है जिस पर हम अक्सर फिसल जाते हैं, "तब उसने उसकी बात मान ली।" कोई बहस नहीं, कोई स्पष्टीकरण नहीं। यूहन्ना झुकता है, और पानी अपना काम करता है। यह पूरा दृश्य मिलाकर तीन वाक्यों का है, पर इसमें कुछ ऐसा घटता है जिसे मत्ती समझाने की कोशिश तक नहीं करता।
मूल बात
"हमें" शब्द पर ठहरिए। यीशु अकेले नहीं कहते "मुझे यह करना है", वे यूहन्ना को अपने साथ जोड़ लेते हैं। धार्मिकता को पूरा करना यहाँ किसी नियम के पालन जैसा नहीं लगता, बल्कि किसी ऐसी चीज़ में शामिल हो जाने जैसा, जो परमेश्वर कर रहे हैं और जिसका पूरा आकार अभी दिखाई नहीं देता। और यही इस पद की चुभन है: जो निष्पाप है, वह पापियों की कतार में खड़ा होता है। वह पश्चाताप का बपतिस्मा लेता है, बिना किसी पाप के। यह कोई नाटक नहीं, कोई प्रतीकात्मक औपचारिकता नहीं। यहाँ परमेश्वर की धार्मिकता अपने लोगों से ऊपर खड़े रहकर नहीं, बल्कि उनके बीच उतरकर पूरी होती है। बचाने का तरीका दूरी नहीं, पहचान है, हमारे साथ खड़े हो जाना। और यह हमारी उस कल्पना को तोड़ देता है कि पवित्रता का अर्थ अलग रहना है।
सूत्र
यरदन नदी इस्राएल की स्मृति में केवल एक नदी नहीं है। वहीं से वे पहली बार प्रतिज्ञा के देश में घुसे थे, जंगल के चालीस वर्षों के बाद, पानी के बीच से। मत्ती जानबूझकर वही क्रम रखते हैं: यीशु पानी से निकलते हैं, और तुरंत आत्मा उन्हें जंगल में ले जाते हैं, चालीस दिन के लिए। जो कुछ इस्राएल ने असफल होकर जिया, वही यीशु फिर से जीते हैं, इस बार अंत तक सही रहकर। और यशायाह ने जिस सेवक की बात की थी, जो "अपराधियों के संग गिना गया", उसकी पहली झलक यहीं मिलती है, पश्चाताप करनेवालों की उसी पंक्ति में, उसी कीचड़ भरे किनारे पर। क्रूस पर जो पूरा होगा, उसकी नींव यहाँ पानी में रखी जाती है: वे हमारी जगह लेते हैं, इससे पहले कि कोई समझ पाए।
दर्पण
हममें कुछ है जो पंक्ति में खड़ा होना पसंद नहीं करता। दफ्तर में हम चाहते हैं कि लोग जानें कि हम बाकी टीम जैसे नहीं हैं। कलीसिया में हम उस समूह में बैठना नहीं चाहते जिसे सहायता चाहिए, हम सहायता देनेवाले बने रहना चाहते हैं। घर में हम माफी माँगने से पहले चाहते हैं कि सामनेवाला पहले झुके। यह पद उस पूरे ढाँचे को उलट देता है, क्योंकि यहाँ जिसे किसी चीज़ की आवश्यकता नहीं थी, वह सबसे पहले पानी में उतरता है। और यूहन्ना, जो सही था अपने संकोच में, अंत में वही करता है जो सबसे कठिन है: बिना समझे मान लेता है।
आज ज़ोर से, अकेले में, परमेश्वर से यूहन्ना के शब्द कहिए, पर अपने जीवन का एक ठोस क्षेत्र नाम लेकर: "मुझे आपके हाथ से इसकी आवश्यकता है।" एक वाक्य, नाम सहित।
बारीकी
"अब तो ऐसा ही होने दे।" उस छोटे से "अब" पर ठहरिए। यीशु यह नहीं कहते कि यूहन्ना गलत है। वे यह भी नहीं कहते कि हमेशा ऐसा ही रहेगा। वे कहते हैं: इस घड़ी के लिए, फिलहाल, ऐसा ही होने दे। इसमें एक स्वीकृति छिपी है कि यूहन्ना की झिझक निराधार नहीं थी, केवल असमय थी। परमेश्वर के कामों में एक ऐसा क्रम होता है जो बीच में खड़े व्यक्ति को उल्टा लगता है, और जिसका अर्थ बाद में खुलता है। यह शब्द हमें कुछ सिखाता है कि आज्ञाकारिता अक्सर पूरी समझ से पहले आती है, और समझ आज्ञाकारिता के पीछे-पीछे चलकर आती है, कभी-कभी वर्षों बाद।
पहले सुननेवाले
मत्ती जिनके लिए लिख रहे थे, वे यहूदी पृष्ठभूमि के विश्वासी थे, और उनके लिए यह दृश्य असहज था। शिष्य गुरु से बपतिस्मा लेता है, उल्टा नहीं। यूहन्ना की जूती उठाने की बात कोई विनम्र अलंकार नहीं थी, वह दासों का काम था, और शिष्य से भी वह अपेक्षित नहीं था। तो फिर बड़ा छोटे के हाथों पानी में क्यों उतरा? यूहन्ना के अनुयायी उस समय भी मौजूद थे, और यह सवाल हवा में था। मत्ती उसे दबाते नहीं, वे उसे दर्ज करते हैं, और यीशु का उत्तर भी ऐसा है जो सवाल को पूरी तरह बंद नहीं करता। पहले पाठकों ने यहाँ सीखा कि उनका मसीहा सम्मान की सीढ़ी से नहीं, उसके नीचे से आता है।
मुख्य पात्र
मत्ती के पूरे सुसमाचार में यीशु के मुँह से निकले पहले शब्द यही हैं। कोई घोषणा नहीं, कोई परिचय नहीं, कोई दावा नहीं कि मैं कौन हूँ। पहला वाक्य दूसरे को शांत करने के लिए है, और उसमें "हमें" शब्द है। जो अपनी पहचान सबसे पहले साझेदारी में बताए, वह किस तरह का राजा होगा? यहाँ कोई तनाव नहीं दिखता, कोई आत्म-प्रमाणन नहीं। वे यूहन्ना की आपत्ति से आहत नहीं होते, न उसे डाँटते हैं। एक दृढ़ शांति है, जैसे कोई जानता हो कि रास्ता कहाँ जाता है और इसलिए पहला कदम बिना हड़बड़ी के रख सके। और इसके ठीक बाद स्वर्ग से जो सुनाई देता है, वह उनकी उपलब्धि पर नहीं, उनके होने पर प्रसन्नता है।
चिंतन
आपके जीवन का कौन-सा हिस्सा अभी "अब तो ऐसा ही होने दे" की स्थिति में है, जहाँ समझ अभी नहीं आई पर कदम उठाना है?
यूहन्ना ने बिना उत्तर पाए मान लिया। आप किस बात पर अड़े हैं जब तक परमेश्वर आपको कारण न बताएँ?
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Matthew 3:15 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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मत्ती 3:15 का क्या अर्थ है?
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Matthew 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यूहन्ना उन्हें लौटाता नहीं, पर पूछता है, "हे साँप के बच्चों, तुम्हें किसने चेतावनी दी कि आनेवाले प्रकोप से भागो?" वे सही जगह आए थे, पर शायद गलत कारण से। सज़ा से बचने की चाह और परमेश्वर की ओर मुड़ने की चाह, दोनों एक जैसी दिखती हैं। आज तू जिस प्रार्थना में खड़ा है, उसमें डर बोल रहा है या प्रेम?
यूहन्ना कहता है, "उसका सूप उसके हाथ में है।" सूप गेहूँ को नष्ट करने नहीं, उसे भूसी से अलग करने के लिए उठाया जाता है। ध्यान दे, वही हाथ जो भूसी को जलाता है, गेहूँ को खत्ते में सम्भालकर रखता है। आज जो तेज़ हवा तेरे जीवन पर चल रही है, शायद वह तुझे उड़ाने नहीं, तुझमें से भूसी हटाने आई है।
लोग यरूशलेम से चलकर जंगल तक आए, और वहाँ पानी में खड़े होकर "अपने अपने पापों को मानकर" बपतिस्मा लिया। किसी ने बहाना नहीं बनाया। हर एक ने अपना नाम, अपना बोझ खुद कहा। सोचो, तुम्हारे मन में जो बात सालों से छिपी है, क्या तुमने कभी उसे शब्द दिए हैं? जो पाप कहा नहीं जाता, वह धोया भी नहीं जाता।
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