बाइबल व्याख्या

मत्ती 3:7

बाइबल
यह वचन Christian Rivival Church of Sikkim द्वारा समर्पित है

पाठ

यरदन के किनारे भीड़ है, पानी में उतरते लोग, अपने पापों को खुलकर मानते हुए। और तभी यूहन्ना की नज़र उन चेहरों पर पड़ती है जिन्हें सब पहचानते हैं: फरीसी और सदूकी, धर्म के जानकार और मन्दिर के अधिकारी। वे भी बपतिस्मा के लिए आ रहे हैं। पर उनका स्वागत नहीं होता। यूहन्ना उन्हें पुकारता है, "हे साँप के बच्चों," और फिर एक ऐसा प्रश्न पूछता है जो तारीफ़ नहीं, बल्कि चुभन है: "तुम्हें किसने चेतावनी दी कि आनेवाले क्रोध से भागो?" एक आदमी जो मरुभूमि में परमेश्वर का मार्ग तैयार कर रहा है, आते हुए धार्मिक लोगों को रोककर पूछता है कि तुम आख़िर आए क्यों हो।

मूल बात

यह वचन हमें वहाँ ले जाता है जहाँ हम रुकना नहीं चाहते: परमेश्वर की ओर क़दम बढ़ाना और परमेश्वर की ओर मन फिराना, ये दोनों एक ही बात नहीं हैं। फरीसी और सदूकी सही दिशा में चल रहे थे, सही नदी के किनारे खड़े थे, सही भविष्यद्वक्ता के सामने थे। फिर भी यूहन्ना उनके भीतर कुछ और देखता है, कुछ ऐसा जो पानी से धुलने वाला नहीं। "साँप के बच्चों" कोई गाली भर नहीं; यह वंश की भाषा है, यह कहना कि तुम किसकी सन्तान हो, यह तुम्हारे फल से दिखेगा, तुम्हारे पिता के नाम से नहीं। और "आनेवाला क्रोध" हमें याद दिलाता है कि स्वर्ग का राज्य निकट आना केवल सुखद समाचार नहीं है। जहाँ परमेश्वर पास आते हैं, वहाँ सब कुछ उजागर होता है। प्रश्न यह नहीं कि तुम भाग रहे हो या नहीं, बल्कि यह कि तुम्हें भागने की ज़रूरत किसने महसूस कराई, और क्या वह आवाज़ परमेश्वर की थी या सिर्फ़ भीड़ का दबाव।

जोड़ने वाला धागा

यूहन्ना का "साँप के बच्चों" उस पुराने दृश्य की गूँज है जहाँ सब कुछ बिगड़ा था: बाग़ में एक साँप, एक सवाल, और मनुष्य का परमेश्वर से मुँह मोड़ना। यूहन्ना कह रहा है कि यह वंश अब भी चल रहा है, धर्म के कपड़ों में भी। पर ठीक यहीं, इसी नदी के किनारे, कुछ नया होने वाला है। चौदह वचन बाद वही पानी, वही यूहन्ना, और उसमें उतरता हुआ एक और व्यक्ति, जो पाप मानने नहीं आया बल्कि "सब धार्मिकता को पूरा करना" कहकर आया। वह "आनेवाला क्रोध" उसे छू नहीं सकता था, फिर भी वह उसी पंक्ति में खड़ा हुआ जहाँ पापी खड़े थे। क्रोध से भागने का रास्ता आख़िरकार एक दरवाज़ा नहीं, एक व्यक्ति निकला।

दर्पण

ईमानदारी से पूछिए: आप आज सुबह बाइबल क्यों खोलते हैं? रविवार को क्यों जाते हैं? कभी-कभी इसलिए कि दिल तरस रहा है। और कभी इसलिए कि न जाने पर घर में सवाल उठेंगे, कि समूह आपसे उम्मीद रखता है, कि एक अनाम-सा डर है कि अगर चूक गए तो कुछ गड़बड़ हो जाएगी। यूहन्ना का प्रश्न उस दूसरी परत को छूता है। वह यह नहीं कहता कि मत आओ; वह पूछता है कि तुम्हें किसने भेजा। डर अपने आप में बुरा नहीं, पर डर जो सिर्फ़ सज़ा से बचना चाहता है और जीवन बदलना नहीं चाहता, वह पानी तक तो ले आता है, पर भीतर तक नहीं उतरता। आज, दिन ढलने से पहले, एक काग़ज़ पर यह वाक्य पूरा करके लिखिए: "मैं सचमुच परमेश्वर के पास इसलिए आता हूँ क्योंकि…" और जो निकले, उसे बिना सुधारे ज़ोर से पढ़िए।

मुख्य पात्र

यूहन्ना के पास खोने को कुछ नहीं था, और शायद इसीलिए वह इतनी सच्चाई से बोल सका। ऊँट के रोम का वस्त्र, चमड़े का कमरबन्द, टिड्डियाँ और वनमधु: यह आदमी किसी व्यवस्था का हिस्सा नहीं था, किसी वेतन पर निर्भर नहीं था, किसी की कृपादृष्टि नहीं चाहता था। भीड़ उसके पास आई, पर उसने भीड़ को खुश करने की कोशिश नहीं की। जब सबसे प्रभावशाली लोग उसके पास आए, तो यही वह क्षण था जब वह अपनी सेवकाई को बड़ा बना सकता था। उसने उल्टा किया। और फिर भी उसकी कठोरता घृणा से नहीं, जल्दबाज़ी से निकलती है: कुल्हाड़ा जड़ पर रखा है, समय कम है। जो सचमुच मानता है कि राज्य निकट है, वह शिष्टाचार में समय नहीं गँवाता।

पृष्ठभूमि

यह लगभग ईस्वी सन् 28 का समय है, यरदन नदी का निचला इलाक़ा, यरूशलेम से उतरकर कुछ घंटों की दूरी पर, वीरान और तपता हुआ। फरीसी और सदूकी आपस में शायद ही सहमत होते थे; एक पक्ष व्यवस्था की सूक्ष्म पालना में जीता था, दूसरा मन्दिर, पुरोहिताई और रोमी सत्ता के साथ समझौते में। पर दोनों के पास वह चीज़ थी जो आम आदमी के पास नहीं थी: पद, वंश, और यह भरोसा कि "हमारा पिता अब्राहम है।" उनका जंगल में आना अपने आप में अजीब है। शायद जाँच करने, शायद सचमुच कुछ ढूँढ़ने। पाठ हमें नहीं बताता, और यह चुप्पी महत्वपूर्ण है। यूहन्ना उनके इरादे का फ़ैसला नहीं सुनाता, वह उनसे सवाल पूछता है।

अन्य वचनों की गूँज

बहुत बाद में, यरूशलेम के मन्दिर में, यीशु इन्हीं समूहों को लगभग यही शब्द कहेंगे, साँपों की सन्तान। यह संयोग नहीं है; यूहन्ना की आवाज़ और मसीह की आवाज़ एक ही दिशा से आती हैं, और इससे पता चलता है कि यह कठोरता किसी मरुभूमि के सनकी की नहीं, स्वयं परमेश्वर की चिंता है। दूसरी ओर, यशायाह की वह पुकार जो वचन 3 में उद्धृत है, "प्रभु का मार्ग तैयार करो, उसकी सड़कें सीधी करो," याद दिलाती है कि यह सारी चेतावनी किसी अंत के लिए नहीं, आगमन के लिए है। टेढ़ी सड़कें सीधी इसलिए की जाती हैं कि कोई आ रहा है।

चिंतन

आपके भीतर कौन-सी आवाज़ आपको परमेश्वर की ओर धकेलती है: डर, आदत, अपेक्षा, या प्यास? और क्या आप उस आवाज़ को नाम देने से बचते रहे हैं?

अगर यूहन्ना आज आपको आते देखता, तो वह आपसे कौन-सा प्रश्न पूछता, और आप उसका कौन-सा उत्तर टालना चाहेंगे?

Matthew में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Matthew For Everyone, Part 1

N.T. Wright

Short, fresh readings that make Matthew feel newly written.

The Message of Matthew

Michael Green

The King and his kingdom, traced through the whole Gospel.

Matthew: An Introduction and Commentary

R.T. France

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Matthew

Michael Wilkins

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

The Message of the Sermon on the Mount

John Stott

Stott's classic on Matthew 5-7, the charter of the kingdom.

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Matthew 3:7 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 3:7 का क्या अर्थ है?
यरदन के किनारे भीड़ है, पानी में उतरते लोग, अपने पापों को खुलकर मानते हुए। और तभी यूहन्ना की नज़र उन चेहरों पर पड़ती है जिन्हें सब पहचानते हैं: फरीसी और सदूकी, धर्म के जानकार और मन्दिर के अधिकारी। वे भी बपतिस्मा के लिए आ रहे हैं। पर उनका स्वागत नहीं होता। यूहन्ना उन्हें पुकारता है, "हे साँप के बच्चों," और फिर एक ऐसा प्रश्न पूछता है जो तारीफ़ नहीं, बल्कि चुभन है: "तुम्हें किसने चेतावनी दी कि आनेवाले क्र
मत्ती 3:7 किस विषय में है?
यूहन्ना का "साँप के बच्चों" उस पुराने दृश्य की गूँज है जहाँ सब कुछ बिगड़ा था: बाग़ में एक साँप, एक सवाल, और मनुष्य का परमेश्वर से मुँह मोड़ना। यूहन्ना कह रहा है कि यह वंश अब भी चल रहा है, धर्म के कपड़ों में भी। पर ठीक यहीं, इसी नदी के किनारे, कुछ नया होने वाला है। चौदह वचन बाद वही पानी, वही यूहन्ना, और उसमें उतरता हुआ एक और व्यक्ति, जो पाप मानने नहीं आया बल्कि "सब धार्मिकता को पूरा करना" कहकर आया। वह "आनेवाला क्रोध" उसे छू नहीं सकता था, फिर भी वह उसी पंक्ति में खड़ा हुआ जहाँ पापी खड़े थे। क्रोध से भागने का रास्ता आख़िरकार एक दरवाज़ा नहीं, एक व्यक्ति निकला।
मत्ती 3:7 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यूहन्ना के पास खोने को कुछ नहीं था, और शायद इसीलिए वह इतनी सच्चाई से बोल सका। ऊँट के रोम का वस्त्र, चमड़े का कमरबन्द, टिड्डियाँ और वनमधु: यह आदमी किसी व्यवस्था का हिस्सा नहीं था, किसी वेतन पर निर्भर नहीं था, किसी की कृपादृष्टि नहीं चाहता था। भीड़ उसके पास आई, पर उसने भीड़ को खुश करने की कोशिश नहीं की। जब सबसे प्रभावशाली लोग उसके पास आए, तो यही वह क्षण था जब वह अपनी सेवकाई को बड़ा बना सकता था। उसने उल्टा किया। और फिर भी उसकी कठोरता घृणा से नहीं, जल्दबाज़ी से निकलती है: कुल्हाड़ा जड़ पर रखा है, समय कम है। जो सचमुच मानता है कि राज्य निकट है, वह शिष्टाचार में समय नहीं गँवाता।
मत्ती 3:7 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
बहुत बाद में, यरूशलेम के मन्दिर में, यीशु इन्हीं समूहों को लगभग यही शब्द कहेंगे, साँपों की सन्तान। यह संयोग नहीं है; यूहन्ना की आवाज़ और मसीह की आवाज़ एक ही दिशा से आती हैं, और इससे पता चलता है कि यह कठोरता किसी मरुभूमि के सनकी की नहीं, स्वयं परमेश्वर की चिंता है। दूसरी ओर, यशायाह की वह पुकार जो वचन 3 में उद्धृत है, "प्रभु का मार्ग तैयार करो, उसकी सड़कें सीधी करो," याद दिलाती है कि यह सारी चेतावनी किसी अंत के लिए नहीं, आगमन के लिए है। टेढ़ी सड़कें सीधी इसलिए की जाती हैं कि कोई आ रहा है।
मत्ती 3:7 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
अगर यूहन्ना आज आपको आते देखता, तो वह आपसे कौन-सा प्रश्न पूछता, और आप उसका कौन-सा उत्तर टालना चाहेंगे?
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Matthew 3 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 7

यूहन्ना उन्हें लौटाता नहीं, पर पूछता है, "हे साँप के बच्चों, तुम्हें किसने चेतावनी दी कि आनेवाले प्रकोप से भागो?" वे सही जगह आए थे, पर शायद गलत कारण से। सज़ा से बचने की चाह और परमेश्वर की ओर मुड़ने की चाह, दोनों एक जैसी दिखती हैं। आज तू जिस प्रार्थना में खड़ा है, उसमें डर बोल रहा है या प्रेम?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 12

यूहन्ना कहता है, "उसका सूप उसके हाथ में है।" सूप गेहूँ को नष्ट करने नहीं, उसे भूसी से अलग करने के लिए उठाया जाता है। ध्यान दे, वही हाथ जो भूसी को जलाता है, गेहूँ को खत्ते में सम्भालकर रखता है। आज जो तेज़ हवा तेरे जीवन पर चल रही है, शायद वह तुझे उड़ाने नहीं, तुझमें से भूसी हटाने आई है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 6

लोग यरूशलेम से चलकर जंगल तक आए, और वहाँ पानी में खड़े होकर "अपने अपने पापों को मानकर" बपतिस्मा लिया। किसी ने बहाना नहीं बनाया। हर एक ने अपना नाम, अपना बोझ खुद कहा। सोचो, तुम्हारे मन में जो बात सालों से छिपी है, क्या तुमने कभी उसे शब्द दिए हैं? जो पाप कहा नहीं जाता, वह धोया भी नहीं जाता।

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