बाइबल व्याख्या

मत्ती 5:27

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पाठ

यीशु दस आज्ञाओं में से सातवीं आज्ञा उठाते हैं और उसे सुनने वालों के कानों के सामने रख देते हैं: “तुम सुन चुके हो कि कहा गया था, ‘व्यभिचार न करना।’” यह कोई नई शिक्षा नहीं है; यह वही वाक्य है जो सीनै पर्वत पर गरजा था और जो हर सभा-घर में बार-बार पढ़ा जाता था। पर ध्यान दीजिए कि वे कहते हैं “तुम सुन चुके हो”, न कि “तुमने पढ़ा है”। यह एक जानी-पहचानी, घिसी-पिटी, सुरक्षित लगने वाली आज्ञा है, जिसे लोग सुनते-सुनते इतने अभ्यस्त हो चुके थे कि उसकी धार महसूस ही नहीं होती थी। और ठीक इसी परिचित नींव पर यीशु अगले ही वाक्य में अपनी कुदाल चलाने वाले हैं।

मूल मर्म

व्यभिचार की मनाही केवल यौन नैतिकता का नियम नहीं है; यह वाचा के परमेश्वर का हस्ताक्षर है। विवाह सृष्टि की उस संरचना का हिस्सा है जिसमें दो व्यक्ति एक देह होते हैं, और पूरे पुराने नियम में परमेश्वर इसी छवि से अपने और इस्राएल के रिश्ते को बयान करते हैं। इसलिए जब इस्राएल मूर्तियों के पीछे जाता है, भविष्यद्वक्ता उसे “व्यभिचारिणी” कहते हैं। यानी यह आज्ञा एक साथ दो स्तरों पर बोलती है: पति-पत्नी की निष्ठा, और परमेश्वर के प्रति हृदय की निष्ठा। और यह याद रखिए कि यह आज्ञा मिस्र से छुड़ाए जाने के बाद दी गई, पहले नहीं। पहले अनुग्रह, फिर आज्ञा। पवित्रता उद्धार की कीमत नहीं, उसका फल है। जो परमेश्वर विश्वासयोग्य हैं, वे विश्वासयोग्य लोग चाहते हैं।

सूत्र-धारा

यह आज्ञा उस बड़ी कहानी में खड़ी है जिसमें परमेश्वर अपने लिए एक दुल्हन बना रहे हैं। अदन में एक विवाह से शुरुआत होती है, सीनै पर एक वाचा बाँधी जाती है जो विवाह की भाषा में लिखी है, भविष्यद्वक्ता बार-बार उस टूटी निष्ठा पर रोते हैं, और अंत में यीशु स्वयं दूल्हा बनकर आते हैं। इसलिए जब वे “व्यभिचार न करना” उठाते हैं, तो वे किसी बाहरी नियम की मरम्मत नहीं कर रहे; वे उस रिश्ते की रक्षा कर रहे हैं जिसका प्रतिबिंब हर विवाह है। और वे इसे उसी अधिकार से करते हैं जिसकी घोषणा उन्होंने अभी की थी: वे व्यवस्था को मिटाने नहीं, “पूरा करने आया हूँ।” पूरा करना यानी उस आज्ञा के भीतर छिपे हृदय को खोदकर बाहर निकालना, और फिर स्वयं वह विश्वासयोग्यता जीना जो इस्राएल कभी न जी सका।

दर्पण

हम में से अधिकांश लोग इस आज्ञा को सुनकर चैन की साँस लेते हैं। मैंने तो कभी किसी के जीवनसाथी के साथ कुछ नहीं किया। पर यीशु का अगला वाक्य ठीक उसी चैन को छीनता है, और वह आपके फोन की स्क्रीन तक, दफ्तर की उस हँसी-मज़ाक वाली बातचीत तक, और उस कल्पना तक पहुँचता है जिसे आप “हानिरहित” कहते हैं क्योंकि उससे किसी को पता नहीं चलता। परमेश्वर की चिंता केवल आपके कर्मों से नहीं, आपकी निष्ठा से है, और निष्ठा भीतर टूटती है, बिस्तर में नहीं। यह डर पैदा करने के लिए नहीं कहा गया; यह इसलिए कहा गया कि अनुग्रह वहीं तक पहुँचे जहाँ असली घाव है।

आज ही एक काम कीजिए: अपने फोन में वह एक ऐप या खाता खोलिए जिसे आप जानते हैं कि आप किन आँखों से देखते हैं, और उसे अभी हटा दीजिए या ब्लॉक कर दीजिए, बिना किसी को बताए।

श्रोताओं की तस्वीर

पहाड़ पर बैठे वे लोग शास्त्रियों की शिक्षा में पले-बढ़े थे, जहाँ व्यभिचार की कानूनी परिभाषा बहुत सटीक थी: विवाहित स्त्री के साथ किया गया कृत्य, दो गवाह, अदालत, दंड। यानी यह पाप नापा जा सकता था, और जो नापा जा सकता है, उससे बचा भी जा सकता है। एक धर्मनिष्ठ यहूदी पुरुष सचमुच यह मान सकता था कि उसने यह आज्ञा जीवन भर पूरी तरह निभाई है। यीशु जब कहते हैं “तुम सुन चुके हो”, तो वे उसी सुरक्षित हिसाब-किताब की ओर इशारा कर रहे हैं। और उनके श्रोता समझ गए होंगे कि वे यहाँ मूसा के विरुद्ध नहीं बोल रहे, बल्कि उस व्याख्या-परंपरा के विरुद्ध जो आज्ञा को इतना छोटा कर देती है कि इंसान उसे पूरा करने का दावा कर सके।

अंतर्पाठ

इसी उपदेश में यीशु कह चुके हैं, “धन्य हैं वे, जिनके मन शुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे।” यह वाक्य पद 27 की कुंजी है: सातवीं आज्ञा का लक्ष्य साफ रिकॉर्ड नहीं, साफ मन है, और उसका इनाम कोई पदक नहीं बल्कि परमेश्वर का दर्शन है। दूसरी ओर, पद 20 की चेतावनी खड़ी है कि जब तक तुम्हारी धार्मिकता “शास्त्रियों और फरीसियों की धार्मिकता से बढ़कर” न हो, राज्य में प्रवेश नहीं। ये दोनों वाक्य मिलकर बताते हैं कि यीशु आज्ञा को कठोर नहीं, गहरा कर रहे हैं, और वह गहराई ऐसी है कि उसे केवल नया हृदय ही निभा सकता है, कोशिश नहीं।

एक बारीकी

“तुम सुन चुके हो” पर रुकिए। यूनानी में यह क्रिया उस बात के लिए है जो सुनी गई और खत्म हो गई, कान से गुज़री हुई बात। यीशु यह नहीं कहते कि तुमने गलत सुना; वे कहते हैं कि तुमने केवल सुना है। और सुनी हुई बात आदत बन जाती है, आदत बनकर वह बहरा कर देती है। यही सभा-घर की सबसे बड़ी बीमारी थी और यही हमारी है: पवित्रशास्त्र का इतना परिचित हो जाना कि वह अब चुभे नहीं। इसलिए अगले ही वाक्य में वे “परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ” कहकर पुराने शब्दों को फिर से जीवित कर देते हैं, ताकि जो कान बंद हो चुके थे, वे दोबारा खुलें।

मनन

कौन सी आज्ञा या बाइबिल का कौन सा वचन आपके लिए इतना परिचित हो गया है कि उसकी धार अब आप महसूस नहीं करते?

यदि पवित्रता अनुग्रह का फल है, कीमत नहीं, तो यह आपके अपने संघर्ष को देखने का तरीका कैसे बदलता है?

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Matthew 5:27 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 5:27 का क्या अर्थ है?
यीशु दस आज्ञाओं में से सातवीं आज्ञा उठाते हैं और उसे सुनने वालों के कानों के सामने रख देते हैं: “तुम सुन चुके हो कि कहा गया था, ‘व्यभिचार न करना।’” यह कोई नई शिक्षा नहीं है; यह वही वाक्य है जो सीनै पर्वत पर गरजा था और जो हर सभा-घर में बार-बार पढ़ा जाता था। पर ध्यान दीजिए कि वे कहते हैं “तुम सुन चुके हो”, न कि “तुमने पढ़ा है”। यह एक जानी-पहचानी, घिसी-पिटी, सुरक्षित लगने वाली आज्ञा है, जिसे लोग सुनते-सुनते इतने अभ्यस्त हो चुके थे कि उसकी धार महसूस ही नहीं होती थी। और ठीक इसी परिचित नींव पर यीशु अगले ही वाक्य में अपनी कुदाल चलाने वाले हैं।
मत्ती 5:27 किस विषय में है?
यह आज्ञा उस बड़ी कहानी में खड़ी है जिसमें परमेश्वर अपने लिए एक दुल्हन बना रहे हैं। अदन में एक विवाह से शुरुआत होती है, सीनै पर एक वाचा बाँधी जाती है जो विवाह की भाषा में लिखी है, भविष्यद्वक्ता बार-बार उस टूटी निष्ठा पर रोते हैं, और अंत में यीशु स्वयं दूल्हा बनकर आते हैं। इसलिए जब वे “व्यभिचार न करना” उठाते हैं, तो वे किसी बाहरी नियम की मरम्मत नहीं कर रहे; वे उस रिश्ते की रक्षा कर रहे हैं जिसका प्रतिबिंब हर विवाह है। और वे इसे उसी अधिकार से करते हैं जिसकी घोषणा उन्होंने अभी की थी: वे व्यवस्था को मिटाने नहीं, “पूरा करने आया हूँ।” पूरा करना यानी उस आज्ञा के भीतर छिपे हृदय को खोदकर बाहर निकालना, और फिर स्वयं वह विश्वासयोग्यता जीना जो इस्राएल कभी न जी सका।
मत्ती 5:27 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज ही एक काम कीजिए: अपने फोन में वह एक ऐप या खाता खोलिए जिसे आप जानते हैं कि आप किन आँखों से देखते हैं, और उसे अभी हटा दीजिए या ब्लॉक कर दीजिए, बिना किसी को बताए।
मत्ती 5:27 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इसी उपदेश में यीशु कह चुके हैं, “धन्य हैं वे, जिनके मन शुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे।” यह वाक्य पद 27 की कुंजी है: सातवीं आज्ञा का लक्ष्य साफ रिकॉर्ड नहीं, साफ मन है, और उसका इनाम कोई पदक नहीं बल्कि परमेश्वर का दर्शन है। दूसरी ओर, पद 20 की चेतावनी खड़ी है कि जब तक तुम्हारी धार्मिकता “शास्त्रियों और फरीसियों की धार्मिकता से बढ़कर” न हो, राज्य में प्रवेश नहीं। ये दोनों वाक्य मिलकर बताते हैं कि यीशु आज्ञा को कठोर नहीं, गहरा कर रहे हैं, और वह गहराई ऐसी है कि उसे केवल नया हृदय ही निभा सकता है, कोशिश नहीं।
मत्ती 5:27 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
कौन सी आज्ञा या बाइबिल का कौन सा वचन आपके लिए इतना परिचित हो गया है कि उसकी धार अब आप महसूस नहीं करते?
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Matthew 5 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय

What strikes me most about the Sermon on the Mount is not the content but the listeners. No rabbis, no scribes, just fishermen and beggars and the sick. Jesus gave his deepest teaching to people nobody took seriously. That comforts me whenever I feel too small for the Kingdom again.

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 39

यीशु कहते हैं, "जो कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे, उसकी ओर दूसरा भी फेर दे।" दाहिने गाल पर थप्पड़ उल्टे हाथ से पड़ता है, उसमें चोट कम और अपमान ज़्यादा होता है। यीशु तुझसे कह रहे हैं कि अपमान करनेवाला यह तय न करे कि तू कौन बनेगा। बदला लौटाना आसान है, पर उस पल में शांत खड़े रहना असली ताक़त है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 18

जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएँ, तब तक व्यवस्था से एक मात्रा या एक बिन्दु भी बिना पूरा हुए न टलेगा।" सोचो, यीशु सबसे छोटी बिन्दु की भी चिंता करते हैं। जो परमेश्वर एक मात्रा को नहीं भूलता, क्या वह तेरी उस छोटी सी प्रार्थना को भूल जाएगा, जो तूने आँसुओं में फुसफुसाई थी? उसका वचन टलता नहीं, और न उसका प्रेम।

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