बाइबल व्याख्या

मत्ती 5

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

पहाड़ पर बैठकर यीशु ने अपने चेलों को एक नई तरह की धन्यता सिखाई: दीन, शोक करनेवाले, नम्र, धार्मिकता के भूखे, दयावन्त, शुद्ध मन के, मेल करवानेवाले, सताए जानेवाले, ये सब धन्य हैं। फिर वे कहते हैं कि उनके चेले पृथ्वी के नमक और जगत की ज्योति हैं, और वे व्यवस्था को लोप करने नहीं, पूरा करने आए हैं। इसके बाद हत्या, व्यभिचार, तलाक, शपथ, बदला और शत्रु-प्रेम पर वे व्यवस्था की गहराई को उघाड़ते हैं, बाहरी पालन से भीतर के हृदय तक।

मर्म

यह उपदेश आज्ञाओं की एक नई सूची नहीं है। यह एक नए राज्य का दरवाजा है, जहाँ मूल्यों की सारी व्यवस्था उलट दी गई है। जिसे संसार दुर्भाग्य कहता है, यीशु उसे धन्यता कहते हैं। दीनता, शोक, नम्रता, ये कमजोरी के लक्षण नहीं, स्वर्ग के राज्य के नागरिकों की पहचान हैं। और जब वे व्यवस्था की बात करते हैं, तो वे उसे कठोर नहीं, गहरा करते हैं: हत्या क्रोध में शुरू होती है, व्यभिचार दृष्टि में। परमेश्वर बाहरी आचरण से संतुष्ट नहीं होते, वे हृदय के भीतर उतरना चाहते हैं। यह डरावना है, और साथ ही मुक्तिदायक, क्योंकि कोई भी अपनी धार्मिकता के बल पर यहाँ खड़ा नहीं हो सकता।

सूत्र

पहाड़ पर यीशु का बैठना बेध्यानी से नहीं पढ़ा जा सकता। मूसा भी पहाड़ पर चढ़े थे, व्यवस्था लेकर उतरे थे। यहाँ एक और आते हैं, पर वे व्यवस्था लेने नहीं, उसे पूरा करने आए हैं। "मैं तुम से यह कहता हूँ", यह वाक्य छह बार लौटता है, और हर बार यीशु स्वयं को व्यवस्था के अधिकार के समकक्ष रखते हैं। यह साहस अभूतपूर्व है, क्योंकि केवल वही ऐसा कर सकते हैं जो व्यवस्था के पीछे के परमेश्वर हैं। जो सिद्धता की माँग वे रखते हैं, वही सिद्धता वे बाद में क्रूस पर हमारे लिए पूरी करेंगे। धन्यताएँ इसलिए एक भारी बोझ नहीं, अनुग्रह का प्रतिज्ञापत्र हैं।

दर्पण

यह पाठ हमें वहाँ छूता है जहाँ हम सबसे ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। मैंने किसी को नहीं मारा, पर आज सुबह ट्रैफिक में जो गाली मन में उठी? मैंने विश्वासघात नहीं किया, पर फोन पर वह दूसरी झलक? दफ्तर में उस सहकर्मी से मेरी जो चुप्पी है, क्या मैं भेंट चढ़ाने से पहले उससे मिलकर बात करूँगा, या मंदिर की धूप में अपनी नाराज़गी को भी पवित्र कर लूँगा? यीशु शास्त्रियों की धार्मिकता से बढ़कर की माँग करते हैं, और यह हमें बेचैन करता है, क्योंकि हमारी अधिकांश भक्ति ठीक उसी शास्त्री-स्तर पर टिकी है: नियम पालन, दिखावा, हिसाब-किताब। हृदय की गहराई तक जाने का साहस हम में कहाँ है?

प्रधान पात्र

इस पाठ के केंद्र में यीशु स्वयं हैं, एक ऐसा शिक्षक जो पहाड़ पर बैठते हैं, राजा की तरह, और भीड़ को नहीं, अपने चेलों को उपदेश देते हैं। उनकी आवाज़ में न शास्त्रियों की उधार ली गई सत्ता है, न भविष्यद्वक्ताओं की "यहोवा यों कहता है" वाली विनम्र दूरी। वे कहते हैं, "मैं तुम से कहता हूँ", और इस "मैं" में सारी व्यवस्था का सार समाया है। पर ध्यान दीजिए, जो सिद्धता वे माँगते हैं, उसे वे स्वयं दीनता, नम्रता, दया, शुद्ध मन में जीते हैं। धन्यताओं का चित्र अंततः उन्हीं का स्व-चित्र है। जो सिखाते हैं, वही हैं। यह उन्हें केवल गुरु नहीं, हमारा जीवन बनाता है।

प्रश्न

आयत 48 पर पहुँचकर हम रुकते हैं: "तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है।" यह असंभव है। कौन दाहिनी आँख निकालकर, दाहिना हाथ काटकर सिद्ध हो सकता है? क्या यीशु हमें एक ऐसी ऊँचाई की ओर धकेल रहे हैं जहाँ हम केवल गिर सकते हैं? शायद हाँ। शायद इस पाठ का पहला काम हमें तोड़ना है, हमारी आत्म-धार्मिकता की रीढ़ को। और जब हम टूटकर "मन के दीन" बनते हैं, तब पहली धन्यता खुलती है: "स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।" उपदेश एक वृत्त में बंद होता है। सिद्धता की माँग हमें उसी दीनता तक ले आती है जहाँ से यीशु ने शुरू किया था। मर्म यहीं है, पर उत्तर सहज नहीं।

विवरण

आयत 45 में एक शांत, लगभग अनदेखी छोड़ी गई पंक्ति है: "वह भलों और बुरों दोनों पर अपना सूर्य उदय करता है, और धर्मी और अधर्मी पर मेंह बरसाता है।" शत्रु-प्रेम की आज्ञा के बीच यीशु परमेश्वर के चरित्र की ओर एक खिड़की खोलते हैं। सूर्य और वर्षा, ये उनके सबसे बड़े, सबसे उदार वरदान हैं, और वे इन्हें छाँटकर नहीं देते। जो व्यक्ति कल आपकी निंदा करके सोया, आज सुबह उसी सूर्य में जागा जिसमें आप जागे। यह न्याय नहीं लगता, पर यही परमेश्वर का हृदय है। और शत्रु से प्रेम करने का हमारा आधार यही है: हम पहले से ही एक ऐसे पिता की सन्तान हैं जो अपने शत्रुओं पर मेंह बरसाते हैं। हम कुछ नया नहीं करते, हम केवल घर की रीति नि

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Matthew 5 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 5 का क्या अर्थ है?
पहाड़ पर बैठकर यीशु ने अपने चेलों को एक नई तरह की धन्यता सिखाई: दीन, शोक करनेवाले, नम्र, धार्मिकता के भूखे, दयावन्त, शुद्ध मन के, मेल करवानेवाले, सताए जानेवाले, ये सब धन्य हैं। फिर वे कहते हैं कि उनके चेले पृथ्वी के नमक और जगत की ज्योति हैं, और वे व्यवस्था को लोप करने नहीं, पूरा करने आए हैं। इसके बाद हत्या, व्यभिचार, तलाक, शपथ, बदला और शत्रु-प्रेम पर वे व्यवस्था की गहराई को उघाड़ते हैं, बाहरी पालन से भीतर के हृदय तक।
मत्ती 5 किस विषय में है?
यह उपदेश आज्ञाओं की एक नई सूची नहीं है। यह एक नए राज्य का दरवाजा है, जहाँ मूल्यों की सारी व्यवस्था उलट दी गई है। जिसे संसार दुर्भाग्य कहता है, यीशु उसे धन्यता कहते हैं। दीनता, शोक, नम्रता, ये कमजोरी के लक्षण नहीं, स्वर्ग के राज्य के नागरिकों की पहचान हैं। और जब वे व्यवस्था की बात करते हैं, तो वे उसे कठोर नहीं, गहरा करते हैं: हत्या क्रोध में शुरू होती है, व्यभिचार दृष्टि में। परमेश्वर बाहरी आचरण से संतुष्ट नहीं होते, वे हृदय के भीतर उतरना चाहते हैं। यह डरावना है, और साथ ही मुक्तिदायक, क्योंकि कोई भी अपनी धार्मिकता के बल पर यहाँ खड़ा नहीं हो सकता।
मत्ती 5 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पहाड़ पर यीशु का बैठना बेध्यानी से नहीं पढ़ा जा सकता। मूसा भी पहाड़ पर चढ़े थे, व्यवस्था लेकर उतरे थे। यहाँ एक और आते हैं, पर वे व्यवस्था लेने नहीं, उसे पूरा करने आए हैं। "मैं तुम से यह कहता हूँ", यह वाक्य छह बार लौटता है, और हर बार यीशु स्वयं को व्यवस्था के अधिकार के समकक्ष रखते हैं। यह साहस अभूतपूर्व है, क्योंकि केवल वही ऐसा कर सकते हैं जो व्यवस्था के पीछे के परमेश्वर हैं। जो सिद्धता की माँग वे रखते हैं, वही सिद्धता वे बाद में क्रूस पर हमारे लिए पूरी करेंगे। धन्यताएँ इसलिए एक भारी बोझ नहीं, अनुग्रह का प्रतिज्ञापत्र हैं।
मत्ती 5 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यह पाठ हमें वहाँ छूता है जहाँ हम सबसे ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। मैंने किसी को नहीं मारा, पर आज सुबह ट्रैफिक में जो गाली मन में उठी? मैंने विश्वासघात नहीं किया, पर फोन पर वह दूसरी झलक? दफ्तर में उस सहकर्मी से मेरी जो चुप्पी है, क्या मैं भेंट चढ़ाने से पहले उससे मिलकर बात करूँगा, या मंदिर की धूप में अपनी नाराज़गी को भी पवित्र कर लूँगा?
मत्ती 5 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
इस पाठ के केंद्र में यीशु स्वयं हैं, एक ऐसा शिक्षक जो पहाड़ पर बैठते हैं, राजा की तरह, और भीड़ को नहीं, अपने चेलों को उपदेश देते हैं। उनकी आवाज़ में न शास्त्रियों की उधार ली गई सत्ता है, न भविष्यद्वक्ताओं की "यहोवा यों कहता है" वाली विनम्र दूरी। वे कहते हैं, "मैं तुम से कहता हूँ", और इस "मैं" में सारी व्यवस्था का सार समाया है। पर ध्यान दीजिए, जो सिद्धता वे माँगते हैं, उसे वे स्वयं दीनता, नम्रता, दया, शुद्ध मन में जीते हैं। धन्यताओं का चित्र अंततः उन्हीं का स्व-चित्र है। जो सिखाते हैं, वही हैं। यह उन्हें केवल गुरु नहीं, हमारा जीवन बनाता है।
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Matthew 5 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय

What strikes me most about the Sermon on the Mount is not the content but the listeners. No rabbis, no scribes, just fishermen and beggars and the sick. Jesus gave his deepest teaching to people nobody took seriously. That comforts me whenever I feel too small for the Kingdom again.

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 39

यीशु कहते हैं, "जो कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे, उसकी ओर दूसरा भी फेर दे।" दाहिने गाल पर थप्पड़ उल्टे हाथ से पड़ता है, उसमें चोट कम और अपमान ज़्यादा होता है। यीशु तुझसे कह रहे हैं कि अपमान करनेवाला यह तय न करे कि तू कौन बनेगा। बदला लौटाना आसान है, पर उस पल में शांत खड़े रहना असली ताक़त है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 18

जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएँ, तब तक व्यवस्था से एक मात्रा या एक बिन्दु भी बिना पूरा हुए न टलेगा।" सोचो, यीशु सबसे छोटी बिन्दु की भी चिंता करते हैं। जो परमेश्वर एक मात्रा को नहीं भूलता, क्या वह तेरी उस छोटी सी प्रार्थना को भूल जाएगा, जो तूने आँसुओं में फुसफुसाई थी? उसका वचन टलता नहीं, और न उसका प्रेम।

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