बाइबल व्याख्या

मत्ती 7:3

बाइबल

मूल पाठ

यीशु एक ऐसा दृश्य खींचते हैं जो हँसी और शर्म दोनों जगाता है: एक आदमी दूसरे की आँख में धँसे बारीक तिनके को ताक रहा है, जबकि उसकी अपनी आँख में पूरा लट्ठा अटका पड़ा है। "तू क्यों अपने भाई की आँख के तिनके को देखता है, और अपनी आँख का लट्ठा तुझे नहीं सूझता?" सवाल का रूप ही चुभता है, क्योंकि यीशु समझाते नहीं, पूछते हैं, और पूछना हमें कठघरे में खड़ा कर देता है। बात किसी अजनबी की नहीं, "अपने भाई" की है, यानी उसी की जो विश्वास के परिवार में साथ बैठता है। और गौर कीजिए: तिनका सचमुच है, यीशु उसे नकारते नहीं। समस्या तिनके का होना नहीं, बल्कि यह है कि देखनेवाले की अपनी नज़र लकड़ी के बोझ से अंधी हो चुकी है।

केंद्रीय सत्य

यह वचन आलोचना पर रोक नहीं लगाता, वह अंधापन पर रोक लगाता है। पद 5 में यीशु उसी व्यक्ति को "हे कपटी" कहकर पुकारते हैं और फिर, चौंकाने वाली बात, तिनका निकालने की अनुमति वापस दे देते हैं: "पहले अपनी आँख में से लट्ठा निकाल ले, तब तू अपने भाई की आँख का तिनका भली भाँति देखकर निकाल सकेगा।" यानी भाई की सुधार करना मना नहीं; बिना आत्म-परीक्षा के करना मना है। इसके पीछे परमेश्वर के राज्य का एक बुनियादी नियम है, जो पद 2 में साफ खड़ा है: जिस नाप से हम नापते हैं, उसी से हमें नापा जाएगा। जो व्यक्ति अनुग्रह से जीता है, वह दूसरों को न्याय की तराजू पर नहीं तौल सकता। कृपा पाया हुआ इंसान पहले अपनी आँख साफ करता है, और तभी उसका हाथ भाई की आँख के इतने पास आने के लायक बनता है।

साझा सूत्र

बाइबल की कहानी में आरोप लगाने वाली नज़र बहुत पुरानी है। अदन में पहला मनुष्य दोष अपनी पत्नी पर डालता है, और तब से यह हमारी सबसे स्वाभाविक प्रतिक्रिया बनी हुई है: अपनी शर्म ढकने के लिए दूसरे की ओर उँगली उठाना। पहाड़ी उपदेश में यीशु इस पुरानी आदत को जड़ से खोदते हैं, और कुछ ही पदों बाद वे इसका सकारात्मक रूप रख देते हैं: "जो कुछ तुम चाहते हो, कि मनुष्य तुम्हारे साथ करें, तुम भी उनके साथ वैसा ही करो; क्योंकि व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा यही है।" यानी लट्ठा निकालने की बात कोई नैतिक टिप्पणी नहीं, पूरे पुराने नियम का निचोड़ है। और यह सूत्र मसीह पर जाकर टिकता है: वही एक हैं जिनकी आँख में कोई लट्ठा नहीं था, जो पूरे अधिकार से दोष लगा सकते थे, और जिन्होंने इसके बजाय दोष अपने ऊपर ले लिया। हमारी नज़र साफ इसलिए हो सकती है क्योंकि उन्होंने हमें पहले देखा और फिर भी ठुकराया नहीं।

आईना

यह वचन उस जगह चुभता है जहाँ हम सबसे ज़्यादा सही महसूस करते हैं। कलीसिया के व्हाट्सएप ग्रुप में किसी के फैसले पर आपकी टिप्पणी, बहू या सास के बारे में वह वाक्य जो आप पिछले तीन साल से दोहरा रहे हैं, दफ्तर में उस सहकर्मी की सुस्ती जिस पर आपकी नज़र मशीन की तरह टिकी रहती है, बच्चे की वह आदत जिस पर आप रोज़ भड़कते हैं और जो दरअसल आपसे ही आई है। तिनका असली है, यीशु इससे इनकार नहीं करते। पर जिस तेज़ी से आपकी आँख उसे ढूँढ़ लेती है, वह तेज़ी खुद एक लक्षण है। जो आदमी भीतर से असुरक्षित है, वह दूसरों की गलतियों पर ही सबसे ज़्यादा जीता है।

आज यह कीजिए: जिस एक व्यक्ति की कमी आप मन में बार-बार दोहराते हैं, उसका नाम कागज़ पर लिखिए, उसके ठीक नीचे उसी क्षेत्र में अपनी एक कमी लिखिए, और वह कागज़ हाथ में लेकर परमेश्वर से कहिए कि पहले उनकी नहीं, आपकी आँख साफ की जाए।

अंतर्पाठ

नातान और दाऊद की भेंट (2 शमूएल 12) इस वचन का सबसे तीखा चित्र है। नातान एक अमीर आदमी की कहानी सुनाता है जिसने गरीब की इकलौती भेड़ छीन ली, और दाऊद गुस्से से भड़क उठता है, मृत्युदंड की माँग करता है। उसकी नैतिक समझ बिल्कुल ठीक काम कर रही है, बस अपने ऊपर लागू नहीं होती। नातान का एक वाक्य, "वह मनुष्य तू ही है", वही काम करता है जो यीशु का यह सवाल करता है: आँख को अपनी ओर मोड़ देना। पौलुस रोमियों के दूसरे अध्याय की शुरुआत में यही तर्क खोलते हैं, कि जो दूसरे पर दोष लगाता है वह अपने ही ऊपर दंड की घोषणा कर देता है। पर तनाव भी देखिए: उसी पौलुस ने कलीसिया में खुलकर सुधार किया, और यीशु खुद पद 15 में चेताते हैं, "झूठे भविष्यद्वक्ताओं से सावधान रहो।" परखना मना नहीं है; अंधा होकर परखना मना है।

कठिन सवाल

अगर हर आदमी की आँख में कोई न कोई लट्ठा है, तो सुधार कभी शुरू कैसे होगा? व्यावहारिक रूप से यह खतरनाक सवाल है, क्योंकि "पहले अपनी आँख देखो" ऐसा वाक्य है जिससे शोषण करने वाले अक्सर बच निकलते हैं, और पीड़ित चुप करा दिए जाते हैं। ध्यान दीजिए, यीशु "कभी मत निकालो" नहीं कहते, वे "पहले" कहते हैं, और अंत में साफ देखकर निकालने की बात करते हैं। पर ईमानदारी यह है कि हमें कभी पूरा भरोसा नहीं होगा कि हमारी आँख अब बिल्कुल साफ है, क्योंकि लट्ठे की खासियत ही यह है कि वह खुद को छिपा लेता है। इसलिए यह वचन हमें आत्म-परीक्षा पूरी होने का कोई प्रमाणपत्र नहीं देता; यह हमें डरते-काँपते, दूसरों की मदद से, और प्रार्थना के साथ भाई के पास जाने को कहता है। यह असुविधा बनी रहती है, और शायद उसे बने रहना भी चाहिए।

संदर्भ

यह दृश्य गलील की पहाड़ी पर है, पहाड़ी उपदेश के आखिरी हिस्से में, जहाँ भीड़ ज़मीन पर बैठी है और यीशु शास्त्रियों की तरह नहीं, "अधिकारी के समान" सिखा रहे हैं। सुननेवाले छोटे गाँवों के लोग हैं, जहाँ सब एक-दूसरे को जानते हैं और प्रतिष्ठा ही असली पूँजी है। ऐसी संस्कृति में दूसरे की बेइज़्ज़ती करके अपनी इज़्ज़त बढ़ाना रोज़मर्रा का खेल था, और धार्मिक गुटों के बीच यह खेल सबसे तेज़ चलता था। चित्र भी घरेलू है: तिनका और लट्ठा दोनों लकड़ी हैं, बढ़ई की दुनिया से उठाए गए, उसी यीशु के मुँह से जो बढ़ई के घर पले थे। और यही उपदेश थोड़ी देर बाद एक घर पर खत्म होता है जो चट्टान पर बना है। नज़र का सुधार कोई अलग नैतिक नियम नहीं, उसी नींव का हिस्सा है।

चिंतन

जिस व्यक्ति की कमी आप सबसे साफ देखते हैं, क्या उसकी वह कमी किसी रूप में आपके भीतर भी है, बस अलग कपड़ों में?

पिछली बार जब किसी ने आपकी गलती की ओर इशारा किया, तो आपने बचाव किया या सुना, और उस प्रतिक्रिया से आपकी आँख के बारे में क्या पता चलता है?

Matthew में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Matthew For Everyone, Part 1

N.T. Wright

Short, fresh readings that make Matthew feel newly written.

The Message of Matthew

Michael Green

The King and his kingdom, traced through the whole Gospel.

Matthew: An Introduction and Commentary

R.T. France

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Matthew

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Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

The Message of the Sermon on the Mount

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Matthew 7:3 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 7:3 का क्या अर्थ है?
यीशु एक ऐसा दृश्य खींचते हैं जो हँसी और शर्म दोनों जगाता है: एक आदमी दूसरे की आँख में धँसे बारीक तिनके को ताक रहा है, जबकि उसकी अपनी आँख में पूरा लट्ठा अटका पड़ा है। "तू क्यों अपने भाई की आँख के तिनके को देखता है, और अपनी आँख का लट्ठा तुझे नहीं सूझता?" सवाल का रूप ही चुभता है, क्योंकि यीशु समझाते नहीं, पूछते हैं, और पूछना हमें कठघरे में खड़ा कर देता है। बात किसी अजनबी की नहीं, "अपने भाई" की है, यानी उसी की जो विश्वास के परिवार में साथ बैठता है। और गौर कीजिए: तिनका सचमुच है, यीशु उसे नकारते नहीं। समस्या तिनके का होना नहीं, बल्कि यह है कि देखनेवाले की अपनी नज़र लकड़ी के बोझ से अंधी हो चुकी है।
मत्ती 7:3 किस विषय में है?
बाइबल की कहानी में आरोप लगाने वाली नज़र बहुत पुरानी है। अदन में पहला मनुष्य दोष अपनी पत्नी पर डालता है, और तब से यह हमारी सबसे स्वाभाविक प्रतिक्रिया बनी हुई है: अपनी शर्म ढकने के लिए दूसरे की ओर उँगली उठाना। पहाड़ी उपदेश में यीशु इस पुरानी आदत को जड़ से खोदते हैं, और कुछ ही पदों बाद वे इसका सकारात्मक रूप रख देते हैं: "जो कुछ तुम चाहते हो, कि मनुष्य तुम्हारे साथ करें, तुम भी उनके साथ वैसा ही करो; क्योंकि व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा यही है।" यानी लट्ठा निकालने की बात कोई नैतिक टिप्पणी नहीं, पूरे पुराने नियम का निचोड़ है। और यह सूत्र मसीह पर जाकर टिकता है: वही एक हैं जिनकी आँख में कोई लट्ठा नहीं था, जो पूरे अधिकार से दोष लगा सकते थे, और जिन्होंने इसके बजाय दोष अपने ऊपर ले लिया। हमारी नज़र साफ इसलिए हो सकती है क्योंकि उन्होंने हमें पहले देखा और फिर भी ठुकराया नहीं।
मत्ती 7:3 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज यह कीजिए: जिस एक व्यक्ति की कमी आप मन में बार-बार दोहराते हैं, उसका नाम कागज़ पर लिखिए, उसके ठीक नीचे उसी क्षेत्र में अपनी एक कमी लिखिए, और वह कागज़ हाथ में लेकर परमेश्वर से कहिए कि पहले उनकी नहीं, आपकी आँख साफ की जाए।
मत्ती 7:3 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
अगर हर आदमी की आँख में कोई न कोई लट्ठा है, तो सुधार कभी शुरू कैसे होगा? व्यावहारिक रूप से यह खतरनाक सवाल है, क्योंकि "पहले अपनी आँख देखो" ऐसा वाक्य है जिससे शोषण करने वाले अक्सर बच निकलते हैं, और पीड़ित चुप करा दिए जाते हैं। ध्यान दीजिए, यीशु "कभी मत निकालो" नहीं कहते, वे "पहले" कहते हैं, और अंत में साफ देखकर निकालने की बात करते हैं। पर ईमानदारी यह है कि हमें कभी पूरा भरोसा नहीं होगा कि हमारी आँख अब बिल्कुल साफ है, क्योंकि लट्ठे की खासियत ही यह है कि वह खुद को छिपा लेता है। इसलिए यह वचन हमें आत्म-परीक्षा पूरी होने का कोई प्रमाणपत्र नहीं देता; यह हमें डरते-काँपते, दूसरों की मदद से, और प्रार्थना के साथ भाई के पास जाने को कहता है। यह असुविधा बनी रहती है, और शायद उसे बने रहना भी चाहिए।
मत्ती 7:3 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
जिस व्यक्ति की कमी आप सबसे साफ देखते हैं, क्या उसकी वह कमी किसी रूप में आपके भीतर भी है, बस अलग कपड़ों में?
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Matthew 7 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 11

यीशु ने प्रार्थना सिखाते हुए हमें "बुरे" कहा, और उसी साँस में याद दिलाया कि बुरे होकर भी तुम अपने बच्चे को पत्थर नहीं, रोटी देते हो। "तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने माँगनेवालों को अच्छी वस्तुएँ क्यों न देगा?" सोच, तेरा अधूरा, थका हुआ प्रेम भी बच्चे को भूखा नहीं रहने देता। फिर पिता का प्रेम तुझे कैसे भूल सकता है? आज माँगने से मत डर।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 4

या तू अपने भाई से कैसे कह सकता है कि ला मैं तेरी आँख से तिनका निकाल दूँ और देख तेरी ही आँख में लट्ठा है?" ज़रा सोच, आँख में लट्ठा लिए कोई दूसरे की आँख के पास जाए तो वह मदद नहीं, चोट पहुँचाएगा। जिसे तू सुधारना चाहता है, कहीं तू उसे घायल तो नहीं कर रहा? पहले अपनी आँख साफ़ कर, फिर तेरा हाथ कोमल हो जाएगा।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 3

पिता, धन्यवाद कि आप मुझे मेरी अपनी आँख का लट्ठा दिखाते हैं, न कि केवल भाई की आँख का तिनका। आपकी यह खरी बात मुझे शर्मिंदा नहीं, स्वतंत्र करती है। धन्यवाद कि आप मुझे दूसरों को आँकने से हटाकर अपनी दया के सामने झुकना सिखाते हैं।

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