नहेम्याह 4:17
पाठ
नहेम्याह अपने वर्णन में एक ऐसा चित्र खींचते हैं जो पढ़ते ही आँखों के सामने ठहर जाता है: "शहरपनाह को बनानेवाले और बोझ के ढोनेवाले दोनों भार उठाते थे, अर्थात् एक हाथ से काम करते थे और दूसरे हाथ से हथियार पकड़े रहते थे।" जो लोग मिट्टी और जले हुए पत्थर ढो रहे थे, और जो चिनाई कर रहे थे, वे अब दोहरा बोझ उठा रहे हैं। एक हाथ निर्माण के लिए, दूसरा हाथ बचाव के लिए। यह कोई युद्ध का दृश्य नहीं है और न ही केवल मज़दूरी का; यह दोनों एक साथ है, एक ही शरीर में, एक ही दिन में, एक ही दीवार पर। पिछले पद में नहेम्याह ने आधे सेवकों को हथियारबंद रखा था; यहाँ हथियार हर मज़दूर के हाथ तक पहुँच जाता है।
मूल बात
यह पद परमेश्वर के लोगों की एक स्थायी सच्चाई को उजागर करता है: उद्धार का काम कभी निर्विरोध आगे नहीं बढ़ता। यरूशलेम की शहरपनाह केवल सुरक्षा की दीवार नहीं थी, वह वाचा की निशानी थी, इस बात का दृश्य प्रमाण कि परमेश्वर ने बँधुआई के बाद अपने लोगों को छोड़ नहीं दिया। इसीलिए सम्बल्लत और तोबियाह की खीज इतनी तीखी है; वे केवल एक राजनीतिक चौकी का विरोध नहीं कर रहे, वे उस दावे का विरोध कर रहे हैं कि इस टूटे हुए, "निर्बल" समुदाय पर परमेश्वर की कृपा अब भी टिकी है। और ध्यान दीजिए कि परमेश्वर चमत्कार से दीवार खड़ी नहीं करते। वे लोगों के थके हुए हाथों से काम करते हैं। अनुग्रह यहाँ मेहनत को रद्द नहीं करता, बल्कि उसे संभव और सार्थक बनाता है, जबकि निर्णायक लड़ाई परमेश्वर स्वयं लड़ते हैं, जैसा नहेम्याह आगे कहते हैं: "हमारा परमेश्वर हमारी ओर से लड़ेगा।"
सूत्र
एक हाथ से बनाना और दूसरे हाथ से हथियार थामना, यह केवल नहेम्याह के दिनों की मजबूरी नहीं, बल्कि परमेश्वर के लोगों की पूरी कहानी का ढाँचा है। अदन के बाद से ही परमेश्वर का निवास-स्थान बनाने का काम विरोध के बीच होता आया है: तम्बू जंगल में बना, मन्दिर शत्रुओं से घिरे देश में, और अब यह दीवार उपहास और तलवार की छाया में। यही पैटर्न नये नियम तक चलता है, जहाँ मसीह अपनी कलीसिया को बनाते हैं और साफ़ कहते हैं कि विरोध की शक्तियाँ उस पर टिक नहीं पाएँगी। पौलुस भी विश्वासियों को परमेश्वर के सहकर्मी कहते हैं, जो मसीह की नींव पर निर्माण करते हैं। बँधुआई से लौटे मज़दूरों के छालेवाले हाथ इसलिए महत्वपूर्ण हैं: वे उस लम्बे निर्माण-कार्य की एक कड़ी हैं जिसका अन्तिम रूप वह नगर है जिसकी शहरपनाह को कोई गीदड़ नहीं गिरा सकता।
दर्पण
हमारा मन एक हाथ वाला जीवन चाहता है। कुछ लोग केवल बनाना चाहते हैं: घर, करियर, सेवकाई, बच्चों की परवरिश, और यह मान लेते हैं कि नेकनीयती अपने आप सुरक्षित रहती है, फिर एक दिन अचानक कोई बात, कोई आदत, कोई ताना उस अधबनी दीवार को गिरा देती है। दूसरे लोग केवल हथियार थामे रहते हैं: हर बातचीत बहस, हर मतभेद युद्ध, और सालों बाद पता चलता है कि उन्होंने बचाव तो किया पर बनाया कुछ नहीं। नहेम्याह का चित्र दोनों को असहज करता है। और वह थकान को छिपाता भी नहीं; इसी अध्याय में लोग कहते हैं कि "ढोनेवालों का बल घट गया"। दोहरा बोझ सचमुच दोहरा है, वह हल्का नहीं होता, केवल सार्थक हो जाता है।
आज, दिन ढलने से पहले, कागज़ पर वह एक नाम या स्थिति लिखिए जिसका विरोध आपको थका रहा है, और उसके नीचे ज़ोर से यह वाक्य पढ़िए: "हमारा परमेश्वर हमारी ओर से लड़ेगा।"
अन्तर्पाठ
पौलुस जब इफिसियों को परमेश्वर के हथियार धारण करने को कहते हैं, तो वे नहेम्याह की इस तस्वीर को आत्मिक स्तर पर खोलते हैं: कमर बाँधना, ढाल, तलवार, और साथ में प्रार्थना में जागते रहना। अन्तर यह है कि वहाँ शत्रु मनुष्य नहीं, बल्कि वे शक्तियाँ हैं जो मनुष्यों के पीछे काम करती हैं। दूसरी ओर इसी अध्याय की पद 4 और 5 की प्रार्थना, जिसमें नहेम्याह माँगते हैं कि परमेश्वर उनका पाप न ढाँपें, हमें झटका देती है, क्योंकि यीशु मसीह क्रूस पर अपने शत्रुओं के लिए क्षमा माँगते हैं। ये दोनों स्वर बाइबल में साथ खड़े हैं: एक न्याय की पुकार, दूसरा अनुग्रह की। नहेम्याह उस पुकार को अपने हाथ में नहीं, परमेश्वर के हाथ में रखते हैं, और यही उसे प्रतिशोध से अलग करता है।
प्रश्न
पद 15 कहता है कि "परमेश्वर ने उनकी युक्ति निष्फल की", और पद 20 कहता है कि परमेश्वर स्वयं लड़ेंगे। तो फिर हथियार क्यों? यदि परमेश्वर लड़ते हैं, तो तलवार अविश्वास का चिन्ह नहीं है? यह प्रश्न आसान जवाब से नहीं टलता। नहेम्याह न तो हथियार को परमेश्वर का विकल्प बनाते हैं, न प्रार्थना को सावधानी का। पद 9 में वे दोनों एक साँस में रखते हैं: प्रार्थना और पहरुए। शास्त्र यहाँ हमें एक गणित नहीं देता जिससे हम तय करें कि कहाँ हमारी ज़िम्मेदारी ख़त्म होती है और परमेश्वर का काम शुरू। वह हमें एक तनाव में जीना सिखाता है, जहाँ भरोसा आलस्य नहीं बनता और मेहनत घमंड नहीं। कब कौन सा हाथ भारी होगा, यह पहले से लिखा हुआ नहीं मिलता।
पहले सुननेवाले
कल्पना कीजिए उन लोगों की जिन्होंने यह वर्णन पहली बार सुना। वे फ़ारसी साम्राज्य के एक छोटे, गरीब प्रान्त में रहते थे। उनके दादा-परदादा ने 586 ईसा पूर्व में नगर जलते देखा था, और तोबियाह का यह ताना कि गीदड़ भी यह दीवार गिरा देगा, उनके अपने डर को शब्द देता था। पड़ोसी हाकिमों के लिए यरूशलेम की मज़बूती का मतलब उनके व्यापार और अधिकार में कटौती थी, इसलिए विरोध केवल धार्मिक नहीं, आर्थिक भी था। जब उन्होंने सुना कि मज़दूर एक हाथ से काम और दूसरे से हथियार थामे रहे, तो उन्होंने वीरगाथा नहीं सुनी; उन्होंने अपनी दुखती पीठ और रात को कपड़े न उतारने की थकान पहचानी, और उसी के भीतर यह गवाही, कि परमेश्वर ने उन "निर्बल यहूदियों" को नहीं छोड़ा।
चिंतन
आपके जीवन में इस समय कौन सा हाथ खाली पड़ा है: निर्माण का या बचाव का, और उसका दाम कौन चुका रहा है?
नहेम्याह की न्याय की पुकार और मसीह की क्षमा की प्रार्थना, इन दोनों में से आप अपने विरोधियों के बारे में सचमुच कौन सी प्रार्थना करते हैं, और क्यों?
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Nehemiah 4:17 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Nehemiah 4 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, चारों ओर से डराने वाली खबरें आती हैं और मन बार बार घबरा जाता है। मुझे इन आवाज़ों के बीच तेरी आवाज़ सुनना सिखा। जो काम तूने मेरे हाथ में दिया है, उसे डर के कारण छोड़ न दूँ। तू मेरे साथ है, यही मेरा भरोसा बने।
पिता, जब चारों ओर से डर घेरता है, तो सबसे पहले मैं तेरी ओर मुड़ना चाहता हूँ। तू मुझे प्रार्थना करना भी सिखा और जागते रहना भी, ताकि मैं न तो लापरवाह बनूँ और न ही अपनी ताकत पर भरोसा करूँ। दिन हो या रात, तू ही मेरी सुरक्षा है।
पिता, मेरे हाथ काम में लगे हैं और मन डर से भरा है। मुझे वह भरोसा दे कि मैं बनाता भी रहूँ और सतर्क भी रहूँ। जो दीवार तूने मुझे सौंपी है, उसे विरोध के बीच भी खड़ा करने की ताकत दे। तेरा साथ ही मेरी सुरक्षा है।
पिता, धन्यवाद कि आप महान और भययोग्य हैं, और आपको स्मरण करते ही मेरा डर छोटा पड़ जाता है। धन्यवाद कि आपने मुझे लड़ने योग्य कुछ दिया है: मेरे भाई, मेरे बच्चे, मेरा घर। आपकी सामर्थ्य से मैं उनके लिये खड़ा रह सकता हूँ।
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