बाइबल व्याख्या

नहेम्याह 9:32

बाइबल

पाठ

प्रार्थना अचानक मुड़ जाती है। इतिहास की लंबी गिनती के बाद, मिस्र, सीनै, जंगल, कनान, नबी, निर्वासन, लेवीय अचानक वर्तमान में आ खड़े होते हैं: "अब तो हे हमारे परमेश्वर!" और फिर वे परमेश्वर को नामों से पुकारते हैं जैसे कोई काँपते हाथों से किसी का चेहरा छूता है: महान, पराक्रमी, भययोग्य, वाचा पालनेवाला, करुणा करनेवाला। इसके बाद ही वह निवेदन आता है, और वह निवेदन आश्चर्यजनक रूप से संयत है। वे छुटकारा नहीं माँगते, बदला नहीं माँगते, व्याख्या भी नहीं माँगते। वे केवल इतना कहते हैं कि अश्शूर के राजाओं के दिनों से लेकर आज तक जो कष्ट उन पर, उनके राजाओं, हाकिमों, याजकों, नबियों और पुरखाओं पर बीता है, "वह तेरी दृष्टि में थोड़ा न ठहरे।"

मर्म

ध्यान दीजिए कि वे क्या नहीं कहते। वे यह नहीं कहते कि यह कष्ट अन्यायपूर्ण था; अगला ही पद स्वीकार करता है कि परमेश्वर धर्मी हैं और दोष उनका अपना है। फिर भी वे उस पीड़ा को छोटा नहीं पड़ने देना चाहते। यहीं इस पद का रहस्य है: क्या कोई अपने ही कर्मों का फल भोगते हुए भी परमेश्वर से कह सकता है, इसे अनदेखा मत कीजिए? यह प्रार्थना कहती है, हाँ। क्योंकि जिन परमेश्वर को वे पुकार रहे हैं, वे केवल भययोग्य नहीं, वाचा पालनेवाले भी हैं, और वाचा का अर्थ है कि उनकी प्रजा की पीड़ा उनके अपने हृदय से जुड़ी हुई है। दोष स्वीकारना और दर्द दिखाना यहाँ एक-दूसरे को रद्द नहीं करते। वे एक ही साँस में रहते हैं, और शायद सच्ची प्रार्थना वहीं से जन्म लेती है।

सूत्र

इस अध्याय में एक शब्द बार-बार लौटता है जिसे हम आसानी से पार कर जाते हैं: देखना। पद 9 कहता है, "तूने मिस्र में हमारे पुरखाओं के दुःख पर दृष्टि की।" जो परमेश्वर मिस्र में देख सके, वही अब फिर से देखें, यही इस प्रार्थना का पूरा जोर है। बाइबल की कहानी इसी सूत्र पर टिकी है: परमेश्वर दूर से नहीं देखते, वे देखकर उतर आते हैं। और यह सूत्र वहाँ अपनी चरम सीमा पर पहुँचता है जहाँ परमेश्वर स्वयं उस कष्ट के भीतर खड़े हो जाते हैं जो उनका अपना नहीं था। क्रूस पर दोष और दर्द, जो इस प्रार्थना में एक साँस में रहते हैं, एक ही देह में मिल जाते हैं। यह अलंकार नहीं है; यह उसी देखने का अंतिम रूप है।

दर्पण

हममें से बहुतों के पास ऐसा दुःख है जिसकी जड़ हम स्वयं हैं। वह विवाह जो वर्षों की लापरवाही से ठंडा पड़ गया। वह कर्ज जो किसी और ने नहीं, हमारी अपनी जल्दबाजी ने खड़ा किया। वह शरीर जिसे हमने काम के नाम पर पीसा और अब वह जवाब देने लगा है। वह बेटा या बेटी जो दूर चला गया, और हम जानते हैं क्यों। ऐसे दुःख के साथ हम प्रार्थना में जाने से कतराते हैं, मानो शिकायत करने का हक खो चुके हों। यह पद उस झूठ को तोड़ता है। आज, दस मिनट में: एक वाक्य में वह पीड़ा लिखिए जिसके लिए आप स्वयं जिम्मेदार हैं, और उसे ऊँचे स्वर में परमेश्वर के सामने पढ़कर जोड़िए, "यह तेरी दृष्टि में थोड़ा न ठहरे।"

पहले श्रोता

जो लोग यह सुन रहे थे, वे फारस के अधीन रहनेवाले करदाता थे। वे अपने ही देश में दास थे, जैसा वे खुद पद 36 में कहते हैं। "अश्शूर के राजाओं के दिनों से ले आज के दिन तक" का अर्थ उनके लिए नक्शे पर एक रेखा नहीं, बल्कि लगभग तीन सौ वर्षों की एक अखंड अधीनता थी: अश्शूर, बाबेल, फारस, एक के बाद एक मालिक। और वे यह सब खुले में, लेवियों की सीढ़ी के नीचे खड़े होकर, एक साम्राज्य के राज्यपाल के शासन में कह रहे हैं। उनके कानों में "भययोग्य परमेश्वर" कोई धार्मिक मुहावरा नहीं था; वह उस एकमात्र राजा का नाम था जिससे उनके राजा भी डरते थे।

अंतर्पाठ

निर्गमन की शुरुआत में परमेश्वर इस्राएल की कराह सुनते हैं, देखते हैं, और अपनी वाचा को स्मरण करते हैं। यह प्रार्थना उसी क्रम को उलटकर परमेश्वर के सामने रख देती है: आपने तब देखा था, अब फिर देखिए। दूसरी गूँज बहुत आगे सुनाई देती है, प्रकाशितवाक्य में, जहाँ मारे गए विश्वासी वेदी के नीचे से पूछते हैं कि कब तक। दोनों जगह कोई व्याख्या नहीं माँगी जाती, केवल यह कि दुःख गिना जाए। बाइबल प्रार्थना को सुंदर बनाने की जल्दी में नहीं है। वह उसे सच्चा बनाने में रुचि रखती है, और सच्चाई का अर्थ कभी-कभी यही होता है कि आप परमेश्वर से उनका अपना स्वभाव याद करने को कहें।

संदर्भ

यह लगभग 445 ईसा पूर्व का यरूशलेम है। शहरपनाह अभी-अभी बनकर खड़ी हुई है, व्यवस्था की पुस्तक सार्वजनिक रूप से पढ़ी जा चुकी है, झोपड़ियों का पर्व मनाया जा चुका है। और अब, सातवें महीने के चौबीसवें दिन, वही भीड़ टाट पहनकर और सिर पर धूल डालकर लौटती है। आधा दिन पढ़ना, आधा दिन पाप मानना। उत्सव के बाद यह उदासी अजीब लगती है, पर यही क्रम है: पहले सुनना, फिर देखना कि हम कौन हैं। पद 32 इस पूरे दिन की धुरी है, वह क्षण जहाँ इतिहास की स्मृति वर्तमान की फरियाद बनती है, और उसके छह पद बाद वे वाचा लिखकर उस पर छाप लगा देते हैं।

चिंतन

आपके जीवन का कौन-सा दुःख ऐसा है जिसे आप प्रार्थना में इसलिए नहीं लाते क्योंकि वह आपकी अपनी गलती से आया है?

"वह तेरी दृष्टि में थोड़ा न ठहरे" माँगना और "तू तो धर्मी है" मानना, ये दोनों एक साथ कैसे रह सकते हैं, और आपकी प्रार्थना में इनमें से कौन-सा हिस्सा गायब है?

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Nehemiah 9:32 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

नहेम्याह 9:32 का क्या अर्थ है?
प्रार्थना अचानक मुड़ जाती है। इतिहास की लंबी गिनती के बाद, मिस्र, सीनै, जंगल, कनान, नबी, निर्वासन, लेवीय अचानक वर्तमान में आ खड़े होते हैं: "अब तो हे हमारे परमेश्वर!" और फिर वे परमेश्वर को नामों से पुकारते हैं जैसे कोई काँपते हाथों से किसी का चेहरा छूता है: महान, पराक्रमी, भययोग्य, वाचा पालनेवाला, करुणा करनेवाला। इसके बाद ही वह निवेदन आता है, और वह निवेदन आश्चर्यजनक रूप से संयत है। वे छुटकारा नहीं माँगते, बदला नहीं माँगते, व्याख्या भी नहीं माँगते। वे केवल इतना कहते हैं कि अश्शूर के राजाओं के दिनों से लेकर आज तक जो कष्ट उन पर, उनके राजाओं, हाकिमों, याजकों, नबियों और पुरखाओं पर बीता है, "वह तेरी दृष्टि में थोड़ा न ठहरे।"
नहेम्याह 9:32 किस विषय में है?
इस अध्याय में एक शब्द बार-बार लौटता है जिसे हम आसानी से पार कर जाते हैं: देखना। पद 9 कहता है, "तूने मिस्र में हमारे पुरखाओं के दुःख पर दृष्टि की।" जो परमेश्वर मिस्र में देख सके, वही अब फिर से देखें, यही इस प्रार्थना का पूरा जोर है। बाइबल की कहानी इसी सूत्र पर टिकी है: परमेश्वर दूर से नहीं देखते, वे देखकर उतर आते हैं। और यह सूत्र वहाँ अपनी चरम सीमा पर पहुँचता है जहाँ परमेश्वर स्वयं उस कष्ट के भीतर खड़े हो जाते हैं जो उनका अपना नहीं था। क्रूस पर दोष और दर्द, जो इस प्रार्थना में एक साँस में रहते हैं, एक ही देह में मिल जाते हैं। यह अलंकार नहीं है; यह उसी देखने का अंतिम रूप है।
नहेम्याह 9:32 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
जो लोग यह सुन रहे थे, वे फारस के अधीन रहनेवाले करदाता थे। वे अपने ही देश में दास थे, जैसा वे खुद पद 36 में कहते हैं। "अश्शूर के राजाओं के दिनों से ले आज के दिन तक" का अर्थ उनके लिए नक्शे पर एक रेखा नहीं, बल्कि लगभग तीन सौ वर्षों की एक अखंड अधीनता थी: अश्शूर, बाबेल, फारस, एक के बाद एक मालिक। और वे यह सब खुले में, लेवियों की सीढ़ी के नीचे खड़े होकर, एक साम्राज्य के राज्यपाल के शासन में कह रहे हैं। उनके कानों में "भययोग्य परमेश्वर" कोई धार्मिक मुहावरा नहीं था; वह उस एकमात्र राजा का नाम था जिससे उनके राजा भी डरते थे।
नहेम्याह 9:32 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यह लगभग 445 ईसा पूर्व का यरूशलेम है। शहरपनाह अभी-अभी बनकर खड़ी हुई है, व्यवस्था की पुस्तक सार्वजनिक रूप से पढ़ी जा चुकी है, झोपड़ियों का पर्व मनाया जा चुका है। और अब, सातवें महीने के चौबीसवें दिन, वही भीड़ टाट पहनकर और सिर पर धूल डालकर लौटती है। आधा दिन पढ़ना, आधा दिन पाप मानना। उत्सव के बाद यह उदासी अजीब लगती है, पर यही क्रम है: पहले सुनना, फिर देखना कि हम कौन हैं। पद 32 इस पूरे दिन की धुरी है, वह क्षण जहाँ इतिहास की स्मृति वर्तमान की फरियाद बनती है, और उसके छह पद बाद वे वाचा लिखकर उस पर छाप लगा देते हैं।
नहेम्याह 9:32 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
"वह तेरी दृष्टि में थोड़ा न ठहरे" माँगना और "तू तो धर्मी है" मानना, ये दोनों एक साथ कैसे रह सकते हैं, और आपकी प्रार्थना में इनमें से कौन-सा हिस्सा गायब है?
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Nehemiah 9 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 10

पिता, जिस तरह तूने अहंकारी शासकों के सामने अपनी सामर्थ्य दिखाई और अपने लोगों को छुड़ाया, वही नाम आज भी बड़ा है। जब मेरे सामने की ताकतें मुझसे बड़ी लगती हैं, मुझे याद दिला कि तू आज भी वही है। मेरा भरोसा डगमगाए तो थाम लेना।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 17

हे पिता, मैं कितनी बार भूल जाता हूँ कि आपने मेरे लिए क्या क्या किया है। फिर भी आप मुझे छोड़ते नहीं। आप क्षमा करने वाले हैं, धीरजवन्त और करुणा से भरे। मेरे हठ को नरम कीजिए और मुझे फिर से अपने पास लौटा लीजिए।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 18

पिता, मैं जानता हूँ कि मेरा मन कितनी जल्दी दूसरी चीज़ों को तेरी जगह बिठा देता है। जो तूने मेरे लिए किया, उसे भूलकर मैं अपने हाथों के बनाए सहारों पर भरोसा करने लगता हूँ। फिर भी तू मुझे छोड़ता नहीं। मुझे माफ़ कर और अपने पास खींच ले।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 21

चालीस साल जंगल में, और लिखा है, "उनको कुछ घटी न हुई; न तो उनके वस्त्र पुराने हुए और न उनके पाँव सूजे।" गौर कर, परमेश्वर ने सिर्फ़ मन्ना नहीं दिया, उसने कपड़ों और पाँवों का भी ध्यान रखा। तेरी छोटी-छोटी थकान भी उसकी नज़र से छूटी नहीं है। जंगल का रास्ता लंबा हो सकता है, पर वहाँ भी वही पालता है।

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