नीतिवचन 10:12
पाठ
एक ही सांस में दो शक्तियाँ आमने-सामने रखी गई हैं: "बैर से तो झगड़े उत्पन्न होते हैं, परन्तु प्रेम से सब अपराध ढँप जाते हैं।" बैर बाँझ नहीं है, वह जनता है; उसकी सन्तान का नाम झगड़ा है। और प्रेम मिटाता नहीं, इनकार नहीं करता, बल्कि ढँकता है। दोनों आधे वाक्य किसी भावना का वर्णन नहीं कर रहे, वे बता रहे हैं कि मनुष्य के भीतर की दिशा बाहर क्या पैदा करती है। यह नीतिवचन नैतिक सलाह से पहले एक निदान है।
मर्म
"ढँकना" के लिए इब्रानी में जो शब्द है, कासाह, वही शब्द पुराने नियम में पाप के ढँके जाने के लिए बार-बार आता है। और यहीं यह छोटा नीतिवचन अचानक गहरा हो जाता है। ढँकना झूठ नहीं है, क्योंकि जो ढँका जाता है वह वास्तव में अपराध है, कोई गलतफहमी नहीं। प्रेम अपराध को अपराध कहता है और फिर उसे उजागर करने के बजाय अपने ऊपर उठा लेता है। यही परमेश्वर का ढंग है। वे पाप को कम नहीं आँकते; वे उसे ढँकते हैं, अपनी कीमत पर। इसलिए यह पद मनुष्य के व्यवहार का नियम बताने से पहले परमेश्वर के चरित्र की झलक देता है: बैर विभाजन करता है, प्रेम मोल चुकाकर जोड़ता है।
मूल सूत्र
पूरे बाइबल में "ढँकना" वाचा और प्रायश्चित की भाषा है। मिलापवाले तम्बू में सन्दूक का ढकना, बलि का लहू, याजक का हाथ, सब इसी क्रिया के इर्द-गिर्द घूमते हैं। भजन 32:1 उसी शब्द से आरम्भ होता है: जिसका पाप ढँप गया, वह धन्य है। और नया नियम इस नीतिवचन को सीधे उठाकर मसीह की देह पर लागू करता है, जब पतरस लिखता है कि प्रेम अनेक पापों को ढाँप देता है। क्रूस पर बैर और प्रेम एक ही जगह मिलते हैं: मनुष्य का बैर झगड़ा उत्पन्न करता है और परमेश्वर का प्रेम उसी झगड़े के बीच खड़ा होकर अपराध ढँक देता है। सुलैमान का यह छोटा वाक्य उस बड़े नाटक का सार है।
दर्पण
ईमानदारी से पूछिए: आपके भीतर किसी का कोई अपराध किस रूप में रखा है? हम उसे बैर नहीं कहते, हम कहते हैं "मुझे याद है", "मैं सतर्क हूँ", "मैंने माफ किया पर भूला नहीं"। और वह याद ठीक उसी क्षण झगड़े को जन्म देती है जब कोई नया शब्द उसे छूता है। परिवार में यह उस वाक्य के रूप में आता है जो पन्द्रह साल पुराने घाव को दोहराता है। दफ्तर में उस ईमेल के रूप में जिसमें किसी और को भी प्रति में रखा जाता है। मंडली में उस "चिन्ता" के रूप में जो दूसरों के सामने प्रार्थना के भेस में कही जाती है। ढँकना कायरता नहीं है; ढँकने के लिए वह सामर्थ्य चाहिए जो केवल क्षमा पाए हुए व्यक्ति के पास होती है।
पहले सुननेवाले
ये नीतिवचन उन युवाओं के लिए लिखे गए जो छोटे कस्बों और गाँवों में पले-बढ़े थे, जहाँ सम्मान और लज्जा जीवन की मुद्रा थी। वहाँ किसी का अपराध जान लेना शक्ति थी, और उसे फैला देना उस शक्ति को भुनाना। नगर के फाटक पर बैठे बुजुर्ग मुकदमे सुनते थे, और एक पुराना झगड़ा पीढ़ियों तक खून बहा सकता था। इसलिए "प्रेम से सब अपराध ढँप जाते हैं" उनके कानों में भावुक बात नहीं थी, बल्कि किसी परिवार, कुल या गाँव के जीवित रहने का प्रश्न था। पद 18 इसे और तीखा करता है: जो बैर को छिपा रखता है, वह झूठ बोलता है। छिपाना और ढँकना अलग हैं। पहला भीतर आग पालता है, दूसरा दूसरे को जीवन देता है।
कठिन प्रश्न
पर हर अपराध ढँकने योग्य नहीं होता। जब कोई पति अपनी पत्नी को मारता है, जब कोई सेवक बच्चों का शोषण करता है, तब "प्रेम से सब अपराध ढँप जाते हैं" कहकर चुप्पी माँगना इस पद का सबसे क्रूर दुरुपयोग है। ध्यान दें, नीतिवचन की यह पुस्तक धर्मी के मुँह को जीवन का सोता कहती है और साथ ही डाँट को जीवन के मार्ग का हिस्सा। जो ढँका जाता है, वह अपराध है जो मेरे विरुद्ध किया गया; मैं अपना अधिकार त्याग सकता हूँ, दूसरे की सुरक्षा नहीं। और फिर भी एक तनाव बचा रहता है, जिसे यह पद सुलझाता नहीं: कब चुप रहना प्रेम है और कब बोलना। नीतिवचन बुद्धि माँगते हैं, नियम-पुस्तिका नहीं देते। यह असुविधा जानबूझकर छोड़ी गई है।
पृष्ठभूमि
अध्याय 10 से सुलैमान के छोटे, दो-पंक्ति वाले नीतिवचनों का संग्रह शुरू होता है, जो शायद राजदरबार में भावी अधिकारियों और नगर के जिम्मेदार लोगों की शिक्षा के लिए संकलित हुआ। चारों ओर के अध्याय जीभ के विषय से भरे हैं: पद 11 में धर्मी का मुँह जीवन का सोता, पद 19 में बहुत बातों के साथ आता अपराध, पद 31 में मुँह से टपकती बुद्धि। हमारा पद इसी शृंखला की कड़ी है, इसलिए यहाँ "प्रेम" कोई अमूर्त भावना नहीं, बल्कि बोलने और चुप रहने का ठोस निर्णय है। एक समाज जहाँ कोई गुप्त जीवन सम्भव नहीं था, जहाँ आपका पड़ोसी आपकी सारी कमजोरियाँ जानता था, वहाँ यही तय करता था कि गाँव जीवन का सोता बनेगा या झगड़ों का अखाड़ा।
चिंतन
किस व्यक्ति का अपराध आप अब तक "याद" के नाम पर सुरक्षित रखे हुए हैं, और उसे ढँकने में आपको वास्तव में क्या खोना पड़ेगा?
आपके शब्द इस सप्ताह किसके लिए जीवन का सोता बने, और किसके लिए झगड़े का बीज?
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Proverbs 10:12 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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धर्मी के वचन बहुतों का पालन-पोषण करते हैं।" शब्दों को यहाँ भोजन कहा गया है। सोचो, तुम्हारे बोले हुए वाक्य किसी की थाली बन सकते हैं। और दुखद बात यह है कि मूर्ख अपनी बुद्धिहीनता से खुद को भी नहीं बचा पाता, जबकि धर्मी बहुतों का पेट भरता है। आज तुम्हारे मुँह से जो निकला, उससे कोई तृप्त हुआ या और भूखा रह गया?
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