भजन संहिता 141
पाठ
दाऊद की यह प्रार्थना जल्दबाज़ी से शुरू होती है: "हे यहोवा, मैंने तुझे पुकारा है; मेरे लिये फुर्ती कर!" वह चाहता है कि उसकी प्रार्थना और उसके फैलाए हुए हाथ संध्या के बलिदान की तरह परमेश्वर के सामने चढ़ें, मानो मन्दिर की वेदी अब उसका अपना शरीर बन गई हो। फिर वह जो माँगता है, वह चौंकाने वाला है: सुरक्षा नहीं, बल्कि पहरा, और वह भी अपने ही मुँह पर। वह प्रार्थना करता है कि उसका मन बुराई की ओर न मुड़े, कि वह दुष्टों की स्वादिष्ट थाली में हाथ न डाले, और कि धर्मी की मार उसे तेल जैसी लगे। अन्त में वह घिरा हुआ आदमी है: हड्डियाँ बिखरी हैं, फंदे बिछे हैं, और उसकी आँखें केवल एक ही दिशा में टिकी हैं।
मर्म
इस भजन का धार्मिक केन्द्र वहाँ है जहाँ हम सबसे कम देखते हैं। दाऊद के चारों ओर शत्रु हैं, जाल हैं, और मृत्यु की गन्ध है, फिर भी उसकी सबसे तीखी प्रार्थना शत्रुओं के विरुद्ध नहीं, अपने विरुद्ध है। वह जानता है कि उसे सबसे बड़ा ख़तरा उन लोगों से नहीं जो उसे मारना चाहते हैं, बल्कि उस क्षण से है जब वह उनके जैसा बनने का निर्णय ले लेगा। दबाव में आदमी टूटता नहीं, वह बदल जाता है; और यही असली हार है। इसलिए वह परमेश्वर से माँगता है कि वे उसके होठों पर पहरेदार बिठाएँ और उसके मन का रुख़ पकड़ें, क्योंकि पवित्रता कोई भीतरी संकल्प नहीं, बल्कि अनुग्रह का काम है। परमेश्वर यहाँ केवल बचानेवाले नहीं, भीतर से गढ़नेवाले हैं। और उपासना अब वेदी पर नहीं, बल्कि उस जीवन में चढ़ती है जो लालच की मेज़ से उठकर चला जाता है।
सूत्र
दाऊद जो माँगता है, वह चाहकर भी पूरा नहीं कर पाता। यही पुराने नियम का ईमानदार तनाव है: नियम बताता है कि होंठ और मन कैसे होने चाहिए, पर पहरेदार बाहर से नहीं आता। इसलिए यह भजन आगे की ओर झुका हुआ है। एक दिन एक ऐसा व्यक्ति आया जिसके मुँह पर सचमुच पहरा था, जिसने जंगल में शैतान की परोसी हुई थाली को छू तक नहीं, और जिसका फैलाया हुआ हाथ सचमुच संध्या का बलिदान बन गया, क्रूस पर, दिन ढलते समय। यीशु मसीह ने वह प्रार्थना जी ली जो दाऊद केवल कर सका। और पवित्र आत्मा अब भीतर से वही पहरा बिठाते हैं। अनुग्रह का अर्थ यही है: परमेश्वर वह देते हैं जिसकी माँग वे करते हैं।
दर्पण
पद 4 की "स्वादिष्ट भोजनवस्तुएँ" आपके जीवन में शायद यों दिखती हैं: वह ठेका जो थोड़े से समझौते पर मिलेगा, वह पदोन्नति जिसके लिए किसी सहकर्मी को नीचा दिखाना काफ़ी है, वह मित्रता जो आपको खोलती नहीं, धीरे-धीरे ढालती है। दाऊद यह नहीं कहता कि वह मेज़ पर बैठकर संयम बरतेगा; वह कहता है, मुझे वहाँ खाने ही मत दीजिए। और पद 5 और भी चुभता है। पिछली बार जब आपकी पत्नी, आपके बुज़ुर्ग या आपके मित्र ने आपको टोका था, क्या वह आपको तेल लगा या अपमान? हम आलोचना को हराने की कोशिश में इतनी ऊर्जा लगाते हैं कि सुधरने का समय ही नहीं बचता।
आज शाम, सोने से पहले, उस एक व्यक्ति को एक छोटा संदेश भेजिए जिसने पिछले महीनों में आपको कुछ कड़वा पर सच्चा कहा था, और लिखिए: "आपने जो कहा, वह सही था। धन्यवाद।"
अंतर्पाठ
प्रकाशितवाक्य 5:8 में स्वर्ग के धूपदान "पवित्र लोगों की प्रार्थनाएँ" हैं। दाऊद जिस बात की केवल आशा करता था, कि उसकी प्रार्थना "सुगन्ध धूप" ठहरे, वहाँ वह पूरी हो चुकी है: आपकी कुड़कुड़ाती, टूटी-फूटी प्रार्थना सचमुच परमेश्वर के सिंहासन तक सुगन्ध बनकर पहुँचती है। और याकूब 1:26 इसी भजन को व्यावहारिक बना देता है: जो अपनी जीभ पर लगाम नहीं लगाता, उसकी भक्ति व्यर्थ है। दोनों मिलकर एक ही बात कहते हैं जिसे हम अलग रखना चाहते हैं। उपासना और वाणी एक ही तार पर बँधी हैं। जो मुँह रविवार को गाता है और सोमवार को चरित्र-हनन करता है, वह दो वेदियों पर बलि चढ़ा रहा है।
मुख्य पात्र
दाऊद यहाँ शिकार किया जा रहा आदमी है, पर आत्म-दया में डूबा हुआ नहीं। उसकी हड्डियाँ "अधोलोक के मुँह पर छितराई" हैं, यानी वह मृत्यु की कगार पर जी रहा है, फिर भी उसका पहला अनुरोध सुरक्षा नहीं, पवित्रता है। यह असाधारण आत्म-ज्ञान है। वह जानता है कि उत्पीड़ित व्यक्ति सबसे आसानी से कड़वा होता है, कि पीड़ा अपने साथ बहाना लेकर आती है: "मेरे साथ जो हुआ, उसके बाद मुझे यह कहने का हक़ है।" दाऊद वह हक़ छोड़ देता है। और वह ताड़ना को स्वीकारता है, बिना यह कहे कि पहले मेरे शत्रुओं को देखिए। यही परिपक्वता है: दबाव में अपने ही हृदय पर सन्देह करना और परमेश्वर पर नहीं।
विवरण
"मेरे होठों के द्वार की रखवाली कर।" यह घर का दरवाज़ा नहीं, नगर का फाटक है। प्राचीन नगर की सारी सुरक्षा उसी एक जगह टिकी थी; दीवारें कितनी भी मोटी हों, फाटक खुला तो नगर गया। और फाटक पर पहरेदार दिन-रात खड़ा रहता था, यह जाँचता हुआ कि कौन भीतर आ रहा है और कौन बाहर जा रहा है। दाऊद अपने होंठों को उसी दर्जे का मोर्चा मानता है। एक वाक्य बाहर निकलता है और एक विवाह में दरार पड़ जाती है; एक टिप्पणी और एक युवा कर्मचारी वर्षों तक अपने को कमतर मानता है। इसलिए वह पहरेदार अपने संकल्प से नहीं, परमेश्वर से माँगता है। फाटक की चौकीदारी थके हुए आदमी के भरोसे नहीं छोड़ी जाती।
चिंतन
पिछले सप्ताह आपके होठों के फाटक से जो बाहर गया, उसमें से किस एक वाक्य को आप वापस बुला लेना चाहेंगे, और वह किस दबाव में से निकला था?
आपके सामने इस समय कौन-सी "स्वादिष्ट थाली" रखी है, जिससे आप दूर रहने के बजाय संयम बरतने का भरोसा कर रहे हैं?
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