भजन संहिता 145
पाठ
यह भजन एक राजा का गीत है जो किसी और राजा के सामने झुकता है: "हे मेरे परमेश्वर, हे राजा, मैं तुझे सराहूँगा।" दाऊद परमेश्वर की महानता की घोषणा करता है, जो "अगम" है, और फिर आश्चर्य की बात कहता है: यह अथाह महान परमेश्वर "अनुग्रहकारी और दयालु" है, जो गिरनेवालों को सम्भालता है और हर प्राणी को समय पर भोजन देता है। भजन पीढ़ी से पीढ़ी तक चलनेवाली स्तुति से शुरू होकर इस प्रार्थना पर समाप्त होता है कि "सारे प्राणी उसके पवित्र नाम को सदा सर्वदा धन्य कहते रहें।"
मूल बात
इस भजन का धर्मशास्त्रीय केंद्र वचन 3 और वचन 14 के बीच का तनाव है। वचन 3 कहता है कि परमेश्वर की बड़ाई अगम है, यानी उसकी थाह नहीं ली जा सकती। ऐसे परमेश्वर से हम दूरी, भय, शायद उदासीनता की अपेक्षा करेंगे। लेकिन वचन 14 उसी परमेश्वर को झुके हुए लोगों के पास घुटनों के बल बैठा हुआ दिखाता है। बाइबल की गवाही में यही परमेश्वर की विशिष्टता है: उसकी महानता और उसकी करुणा एक-दूसरे के विरुद्ध नहीं, बल्कि एक ही सच्चाई के दो पहलू हैं। मूर्तियाँ बड़ी होने के लिए दूर रहती हैं; परमेश्वर बड़ा है, इसलिए वह झुक सकता है बिना छोटा हुए। वचन 17 इसे एक साथ बाँध देता है: वह अपने सब कामों में धर्मी और करुणामय, दोनों है।
मुख्य सूत्र
वचन 11 से 13 तक "राज्य" शब्द चार बार आता है। दाऊद, जो स्वयं सिंहासन पर बैठा है, स्वीकार करता है कि उसका सिंहासन एक बड़े सिंहासन की छाया है: "तेरा राज्य युग-युग का।" यहीं से एक रेखा सीधे यीशु मसीह तक जाती है। जब वे यह सिखाने आए कि "परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है," तो वे किसी नई कल्पना की घोषणा नहीं कर रहे थे, बल्कि इस भजन के वादे को शरीर दे रहे थे। और ध्यान दें कि इस राज्य का स्वरूप कैसा है: शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि गिरे हुओं को सम्भालना और भूखों को खिलाना। मसीह ने अपने राज्य को ठीक इसी तरह चलाया, रोटी तोड़ते हुए और टूटे लोगों को छूते हुए। वचन 19 का "उद्धार करता है" क्रूस पर अपनी पूर्णता पाता है।
दर्पण
हम परमेश्वर की महानता पर विश्वास करते हैं जब तक चीजें हमारे नियंत्रण में हैं, और उसकी करुणा पर जब हम टूट जाते हैं; पर दोनों को एक साथ थामना कठिन है। वचन 15 कहता है, "सभी की आँखें तेरी ओर लगी रहती हैं," और यही हमारी असली समस्या है: हमारी आँखें वेतन-पर्ची पर, जाँच रिपोर्ट पर, बच्चे के फोन पर लगी रहती हैं। हम प्रबंध करते हैं, क्योंकि हमें डर है कि मुट्ठी नहीं खुलेगी। और जब हम "झुके हुए" होते हैं, तो हमें लगता है कि यह हमारे विश्वास की हार है, जबकि भजन कहता है कि वही परमेश्वर के हाथ की जगह है। आज कुछ ठोस कीजिए: अपनी अगली भोजन-थाली के सामने बैठकर, ऊँची आवाज़ में वचन 16 पढ़िए और नाम लेकर उस एक चीज़ के लिए धन्यवाद दीजिए जो इस सप्ताह आपको दी गई है, जिसे आप कमा नहीं सकते थे।
अन्तर्पाठ
वचन 8 कोई नई बात नहीं कहता, वह उद्धरण है। निर्गमन 34:6 में, सोने के बछड़े के पाप के ठीक बाद, परमेश्वर स्वयं अपना परिचय मूसा को इन्हीं शब्दों में देता है: अनुग्रहकारी, दयालु, विलम्ब से क्रोध करनेवाला। दाऊद उस आत्म-परिचय को उठाकर स्तुति बना देता है, यानी इस्राएल की सबसे गहरी विश्वास-घोषणा उसकी सबसे बड़ी ख़ुशी भी है। दूसरी ओर, इस भजन का वचन 17 प्रकाशितवाक्य 15:3 में फिर गूँजता है, जहाँ स्वर्ग में बचाए गए लोग "मेम्ने का गीत" गाते हैं और परमेश्वर के कामों को धर्मी कहते हैं। जो दाऊद यरूशलेम में गा रहा था, वह अन्त में सारी सृष्टि गाएगी, और तब वचन 21 की प्रार्थना पूरी हो जाएगी।
एक बारीकी
वचन 16 का चित्र जल्दी में पढ़ने पर खो जाता है: "तू अपनी मुट्ठी खोलकर।" मुट्ठी मनुष्य के लिए हमेशा दो चीज़ों का चिह्न रही है, प्रहार या पकड़। बंद मुट्ठी का अर्थ है: यह मेरा है, मैं नहीं छोड़ूँगा। और परमेश्वर के विषय में भजनकार कहता है कि उसकी मुट्ठी खुलती है। वही हाथ जो संसार को थामे हुए है, वही हाथ ढीला होकर देता है। और गौर करें कि किसे देता है: "सब प्राणियों को," भक्तों को ही नहीं। वचन 9 इसे खुलकर कहता है, "उसकी दया उसकी सारी सृष्टि पर है।" आपके खेत में बारिश आपकी धर्मपरायणता का वेतन नहीं, खुली मुट्ठी का दान है। अनुग्रह का सबसे सामान्य रूप रोज़ की रोटी है।
पृष्ठभूमि
यह भजन दाऊद के नाम से जुड़ा है और भजन संहिता में उसका अन्तिम भजन है; इसके बाद पाँच "हल्लिलूय्याह" भजन आते हैं जो पूरी पुस्तक को स्तुति में समाप्त करते हैं। मूल इब्रानी में यह एक वर्णमाला-क्रम का भजन है, हर वचन अगले अक्षर से शुरू होता है, जैसे कहना चाहता हो: परमेश्वर की स्तुति के लिए भाषा के सब अक्षर चाहिए, और फिर भी कम पड़ेंगे। जिस संसार में यह गाया गया, वहाँ राजा अपनी स्तुति के शिलालेख खुदवाते थे और अपने पराक्रम के काम गिनवाते थे। दाऊद वही शब्दावली उठाता है, "पराक्रम," "प्रताप," "राज्य," और उसे अपने सिर से उतारकर यहोवा के चरणों में रख देता है। यही इस भजन का राजनीतिक साहस है।
मनन के प्रश्न
आपके जीवन में इस समय कौन-सी जगह है जहाँ आप "झुके हुए" हैं, और वचन 14 को सच मानने का अर्थ वहाँ ठोस रूप से क्या होगा?
वचन 4 कहता है कि स्तुति पीढ़ी-पीढ़ी चलती है। आपके बाद आनेवाले लोग आपसे परमेश्वर के किन कामों की चर्चा सुन रहे हैं?
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