बाइबल व्याख्या

भजन संहिता 24:1

बाइबल
यह वचन Jesus Christ’s Church द्वारा समर्पित है

पाठ

पहाड़ी पर चढ़ती हुई भीड़ की साँसें अभी थमी भी नहीं हैं कि गायक का पहला स्वर उठता है, और वह मंदिर की बात नहीं करता, यरूशलेम की भी नहीं। वह इतनी दूर तक हाथ फैलाता है कि सुननेवाले चौंक जाते हैं: "पृथ्वी और जो कुछ उसमें है यहोवा ही का है; जगत और उसमें निवास करनेवाले भी।" एक ही पंक्ति में पूरी दुनिया, उसकी मिट्टी, उसके समुद्र, उसकी फसलें, उसके नगर और उन नगरों में साँस लेता हर आदमी, परमेश्वर की संपत्ति घोषित कर दिए जाते हैं। यह प्रार्थना नहीं, यह दावा है। मानो कोई राजा अपने राज्य की सीमा पर खड़ा होकर कहे: यहाँ से वहाँ तक, सब मेरा।

मर्म

इस एक वाक्य में मालिकाना हक की भाषा है, और वह भाषा हमें असहज करने के लिए ही चुनी गई है। इस्राएल के पड़ोसी मानते थे कि हर देवता का अपना इलाका होता है, अपनी नदी, अपना पहाड़, अपनी सरहद। भजनकार उस पूरे नक्शे को फाड़ देता है। यहोवा का कोई इलाका नहीं, क्योंकि सब कुछ उनका इलाका है। और ध्यान दीजिए, सूची केवल चीज़ों पर नहीं रुकती: "उसमें निवास करनेवाले भी।" लोग भी। आप भी। यानी आपका शरीर, आपका समय, आपका पैसा, आपकी नौकरी की सुबहें, कुछ भी ऐसा नहीं जिस पर आप अकेले हस्ताक्षर कर सकें। बाइबल की सारी नैतिकता इसी नींव पर खड़ी है: हम मालिक नहीं, भंडारी हैं। और यही बात, अजीब तरह से, राहत भी देती है। जिसकी दुनिया है, उसी की ज़िम्मेदारी भी है।

सूत्र

यह दावा पूरी बाइबल में एक धागे की तरह चलता है, और वह धागा अंत में एक अजीब जगह जाकर बँधता है। जो सारी पृथ्वी के मालिक हैं, वे उसी पृथ्वी पर बिना घर के आते हैं। भजन 24 आगे पूछता है, "वह प्रतापी राजा कौन है?" और उत्तर देता है, "सेनाओं का यहोवा।" पर जब वह राजा सचमुच यरूशलेम के फाटकों से भीतर आए, तो वे गदहे पर बैठे थे, और नगर ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया। यही इस पद की सबसे तीखी बात है: मालिक अपनी ही संपत्ति में अजनबी बनकर खड़े हुए। और फिर भी उन्होंने ज़ब्ती से नहीं, क्रूस से अपना अधिकार वापस लिया। स्वामित्व की भाषा, अनुग्रह के रास्ते पूरी हुई।

दर्पण

अब इसे अपने बजट पर रखकर देखिए। आप महीने के अंत में जो हिसाब लगाते हैं, उसमें एक अनकही मान्यता छिपी रहती है: यह मेरा कमाया हुआ है, मैंने मेहनत की है, इसलिए फैसला भी मेरा। भजनकार उस मान्यता की जड़ काट देता है, बिना आपको दोषी ठहराए। वह कहता है, आप किरायेदार हैं, और किरायेदार होने में एक हल्कापन है जो मालिक होने में कभी नहीं मिलता। वही बात रिश्तों पर लागू होती है। आपके बच्चे आपकी संपत्ति नहीं। जीवनसाथी आपका अधिकार नहीं। "उसमें निवास करनेवाले भी" उनके हैं, आपके नहीं। जहाँ आप सबसे ज़्यादा कब्ज़ा जमाते हैं, वहीं सबसे ज़्यादा थकते हैं। आज एक काम कीजिए: अपने घर की कोई एक चीज़ चुनिए जिस पर आपको सबसे ज़्यादा गर्व है, उस पर हाथ रखिए और ज़ोर से कहिए, "यह आपका है, मैं इसका रखवाला हूँ।"

पृष्ठभूमि

यह भजन चलते-चलते गाया जाता था। तीर्थयात्रियों की कतारें यरूशलेम की चढ़ाई चढ़तीं, शायद संदूक को नगर में लाने के किसी उत्सव में, और फाटक के सामने पहुँचकर यह प्रश्नोत्तर गूँजता। भीतर से आवाज़ आती, बाहर से जवाब जाता। उस दुनिया में ज़मीन ही सब कुछ थी: पहचान, सुरक्षा, विरासत। साम्राज्य ज़मीन के लिए लड़ते थे, और जो जीतता वह कहता कि उसके देवता ने यह भूमि दी। इस्राएल छोटा था, दो बड़ी शक्तियों के बीच दबा हुआ, बार-बार लुटा हुआ। ऐसे लोगों के मुँह से यह पंक्ति निकलना राजनीतिक साहस था। जिनके पास मुट्ठी भर पहाड़ी ज़मीन थी, वे गा रहे थे कि पूरी पृथ्वी उनके परमेश्वर की है।

पहले सुननेवाले

सोचिए, कतार में खड़ा एक किसान है जिसकी फसल इस साल आधी रह गई, और उसके पीछे एक विधवा जिसका खेत कर्ज़ में चला गया। वे यह पंक्ति सुनते हैं और उनके कान में दो चीज़ें एक साथ पड़ती हैं। पहली, सांत्वना: जो ज़मीन छिन गई, वह वैसे भी कभी उनकी थी ही नहीं, वह यहोवा की है, और यहोवा उसे भूले नहीं। दूसरी, चेतावनी: जिस साहूकार ने खेत हड़पा, वह भी "उसमें निवास करनेवालों" में गिना जाता है, और उसका हिसाब बाकी है। हमारे कानों में यह पद अक्सर सृष्टि की सुंदरता पर एक कविता बनकर रह जाता है। उनके कानों में यह न्याय की घोषणा थी, और उम्मीद की भी।

मुख्य पात्र

इस पद में एक ही पात्र है, और वे बोलते नहीं; उनके बारे में बोला जाता है। यहोवा यहाँ किसी सिंहासन पर दूर बैठे सम्राट नहीं हैं जो अपनी जागीर गिन रहे हों। अगला पद बताता है कि उन्होंने नींव रखी, स्थिर किया; यह मालिक अपने हाथों से बनानेवाला मालिक है। और जो बनाता है, वह छोड़ता नहीं। इसीलिए इस दावे में धमकी से ज़्यादा देखभाल की गूँज है। एक ऐसा परमेश्वर जो समुद्रों के ऊपर धरती टिका सकते हैं, वह आपके बिखरे हुए सप्ताह को भी थाम सकते हैं। उनका स्वामित्व कब्ज़ा नहीं, लगाव है। वे उस तरह मालिक हैं जिस तरह एक माली अपने बगीचे का मालिक होता है: अधिकार के साथ, पर झुककर, मिट्टी में हाथ डालकर।

मनन

आपके जीवन का कौन-सा हिस्सा ऐसा है जिसे आप चुपचाप "मेरा अपना मामला" कहकर परमेश्वर के दायरे से बाहर रखते हैं, और उसे भीतर लाने में सबसे ज़्यादा डर किस बात का है?

अगर आपके आसपास रहनेवाले लोग भी उन्हीं के हैं, तो कल दफ़्तर या घर में किस एक व्यक्ति के साथ आपका व्यवहार इस सच्चाई के कारण बदलना चाहिए?

Psalms में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Songs of Jesus

Timothy Keller

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Psalms 1-72

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Psalms 73-150

Derek Kidner

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Reflections on the Psalms

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Psalms Volume 1

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Psalms 24:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

भजन संहिता 24:1 का क्या अर्थ है?
पहाड़ी पर चढ़ती हुई भीड़ की साँसें अभी थमी भी नहीं हैं कि गायक का पहला स्वर उठता है, और वह मंदिर की बात नहीं करता, यरूशलेम की भी नहीं। वह इतनी दूर तक हाथ फैलाता है कि सुननेवाले चौंक जाते हैं: "पृथ्वी और जो कुछ उसमें है यहोवा ही का है; जगत और उसमें निवास करनेवाले भी।" एक ही पंक्ति में पूरी दुनिया, उसकी मिट्टी, उसके समुद्र, उसकी फसलें, उसके नगर और उन नगरों में साँस लेता हर आदमी, परमेश्वर की संपत्ति घोषित कर दिए जाते हैं। यह प्रार्थना नहीं, यह दावा है। मानो कोई राजा अपने राज्य की सीमा पर खड़ा होकर कहे: यहाँ से वहाँ तक, सब मेरा।
भजन संहिता 24:1 किस विषय में है?
यह दावा पूरी बाइबल में एक धागे की तरह चलता है, और वह धागा अंत में एक अजीब जगह जाकर बँधता है। जो सारी पृथ्वी के मालिक हैं, वे उसी पृथ्वी पर बिना घर के आते हैं। भजन 24 आगे पूछता है, "वह प्रतापी राजा कौन है?" और उत्तर देता है, "सेनाओं का यहोवा।" पर जब वह राजा सचमुच यरूशलेम के फाटकों से भीतर आए, तो वे गदहे पर बैठे थे, और नगर ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया। यही इस पद की सबसे तीखी बात है: मालिक अपनी ही संपत्ति में अजनबी बनकर खड़े हुए। और फिर भी उन्होंने ज़ब्ती से नहीं, क्रूस से अपना अधिकार वापस लिया। स्वामित्व की भाषा, अनुग्रह के रास्ते पूरी हुई।
भजन संहिता 24:1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यह भजन चलते-चलते गाया जाता था। तीर्थयात्रियों की कतारें यरूशलेम की चढ़ाई चढ़तीं, शायद संदूक को नगर में लाने के किसी उत्सव में, और फाटक के सामने पहुँचकर यह प्रश्नोत्तर गूँजता। भीतर से आवाज़ आती, बाहर से जवाब जाता। उस दुनिया में ज़मीन ही सब कुछ थी: पहचान, सुरक्षा, विरासत। साम्राज्य ज़मीन के लिए लड़ते थे, और जो जीतता वह कहता कि उसके देवता ने यह भूमि दी। इस्राएल छोटा था, दो बड़ी शक्तियों के बीच दबा हुआ, बार-बार लुटा हुआ। ऐसे लोगों के मुँह से यह पंक्ति निकलना राजनीतिक साहस था। जिनके पास मुट्ठी भर पहाड़ी ज़मीन थी, वे गा रहे थे कि पूरी पृथ्वी उनके परमेश्वर की है।
भजन संहिता 24:1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इस पद में एक ही पात्र है, और वे बोलते नहीं; उनके बारे में बोला जाता है। यहोवा यहाँ किसी सिंहासन पर दूर बैठे सम्राट नहीं हैं जो अपनी जागीर गिन रहे हों। अगला पद बताता है कि उन्होंने नींव रखी, स्थिर किया; यह मालिक अपने हाथों से बनानेवाला मालिक है। और जो बनाता है, वह छोड़ता नहीं। इसीलिए इस दावे में धमकी से ज़्यादा देखभाल की गूँज है। एक ऐसा परमेश्वर जो समुद्रों के ऊपर धरती टिका सकते हैं, वह आपके बिखरे हुए सप्ताह को भी थाम सकते हैं। उनका स्वामित्व कब्ज़ा नहीं, लगाव है। वे उस तरह मालिक हैं जिस तरह एक माली अपने बगीचे का मालिक होता है: अधिकार के साथ, पर झुककर, मिट्टी में हाथ डालकर।
भजन संहिता 24:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
अगर आपके आसपास रहनेवाले लोग भी उन्हीं के हैं, तो कल दफ़्तर या घर में किस एक व्यक्ति के साथ आपका व्यवहार इस सच्चाई के कारण बदलना चाहिए?

Psalms 24 में आपको क्या स्पर्श करता है?

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