भजन संहिता 37
पाठ
"वे घास के समान झट कट जाएँगे, और हरी घास के समान मुर्झा जाएँगे।" यह कोई काव्यात्मक सजावट नहीं है। जो लोग यह भजन पहली बार सुन रहे थे, वे अप्रैल की हरियाली और जून की भूरी, कुरकुरी ढलानों के बीच का फ़र्क अपनी आँखों से हर साल देखते थे। उसी छवि से भजन शुरू होता है और उसी पर लौटता है।
पूरा भजन एक बूढ़े आदमी की सलाह है, जो किसी जलते हुए, कुढ़ते हुए नौजवान से कह रहा है: दुष्टों की सफलता देखकर मत जल। यहोवा पर भरोसा रख, भला कर, देश में बसा रह, चुपचाप प्रतीक्षा कर। बार-बार एक ही वादा लौटता है, कि नम्र लोग पृथ्वी के अधिकारी होंगे, और दुष्ट का स्थान खोजने पर भी न मिलेगा। बीच-बीच में वह अपने अनुभव की गवाही देता है: "मैं लड़कपन से लेकर बुढ़ापे तक देखता आया हूँ।"
मूल बात
यहाँ असली सवाल ज़मीन का है, और वह शब्द संयोग से नहीं आता। इस भजन में कम से कम पाँच बार कहा गया है कि कोई "पृथ्वी के अधिकारी होंगे"। इस्राएल के कानों में यह अमूर्त नहीं था: यह खेत था, अंगूर की बारी थी, पुरखों की विरासत, जिसे ताक़तवर पड़ोसी, भ्रष्ट न्यायी या कर्ज़ का जाल छीन लेता था। भजन 37 उसी चोरी के बीच खड़ा होकर कहता है कि अंतिम बँटवारा परमेश्वर करेंगे, कब्ज़ा करने वाले नहीं।
और यहीं इसका धर्मशास्त्रीय हृदय है। परमेश्वर केवल अच्छे लोगों को भीतरी शांति नहीं देते; वे न्याय से प्रीति रखते हैं और इतिहास में हिसाब बराबर करते हैं। इसीलिए विश्वासी को क्रोध छोड़ने को कहा जाता है, लापरवाही से नहीं, बल्कि इसलिए कि बदला लेने का काम किसी और के हाथ में है। भरोसा यहाँ निष्क्रियता नहीं, हथियार डाल देना है।
बड़ी कहानी का सूत्र
ज़मीन का यह वादा अब्राहम तक पीछे जाता है और निर्वासन तक आगे। जिस किसान ने अपना खेत किसी धनी पड़ोसी के हाथों खोया था, उसके लिए "पृथ्वी के अधिकारी होंगे" का मतलब था: एक दिन सीमा-पत्थर वापस अपनी जगह पर रखे जाएँगे। फिर यीशु मसीह ने पहाड़ पर बैठकर ठीक यही पंक्ति उठा ली, "नम्र लोग पृथ्वी के अधिकारी होंगे", और उसे संकरा नहीं, चौड़ा किया। अब बात किसी एक घाटी की नहीं, नई सृष्टि की है। और ध्यान दीजिए कि पद 32 और 33 में जो चित्र है, कि दुष्ट धर्मी की ताक में रहता है और उसके मार डालने का यत्न करता है, पर "यहोवा उसको उसके हाथ में न छोड़ेगा", वह मसीह की कहानी में अक्षरशः घटा। वे मारे गए, और फिर भी उनके हाथ में नहीं छोड़े गए।
दर्पण
कुढ़ना कोई बड़ा पाप नहीं लगता, इसीलिए वह इतने आराम से भीतर बस जाता है। वह सहकर्मी जो चापलूसी से आगे बढ़ गया, वह रिश्तेदार जिसने बँटवारे में चालाकी की, वह आदमी जिसने उधार लिया और लौटाया नहीं, ठीक जैसा पद 21 कहता है। आप ईमानदारी से जीते रहे और किराया मुश्किल से निकलता है, और वह ठाठ से जी रहा है। भजन आपकी नाराज़गी को झूठा नहीं कहता; वह कहता है कि यह आग आपको ही जलाएगी, "मत कुढ़, उससे बुराई ही निकलेगी।" आपका काम भला करना और टिके रहना है, हिसाब बराबर करना नहीं।
आज यह कीजिए: जिस व्यक्ति से आप जलते हैं, उसका नाम एक बार ज़ोर से कहिए, फिर पाँच मिनट घड़ी लगाकर परमेश्वर के सामने बिलकुल चुप बैठिए, बिना कुछ माँगे। पद 7 यही सिखाता है।
मुख्य पात्र
इस भजन के परमेश्वर हँसते हैं। "प्रभु उस पर हँसेगा, क्योंकि वह देखता है कि उसका दिन आनेवाला है।" यह क्रूर ठहाका नहीं, उस व्यक्ति की हँसी है जो पूरी समय-रेखा एक साथ देख रहा है, जबकि हम केवल आज का पन्ना देखते हैं। वही परमेश्वर न्याय से प्रीति रखते हैं, यानी न्याय उनका नियम भर नहीं, उनका स्वभाव और सुख है। और वही परमेश्वर झुककर किसी का हाथ थामे रहते हैं: "चाहे वह गिरे तो भी पड़ा न रह जाएगा।" गिरना यहाँ मना नहीं किया गया, केवल पड़े रह जाना। ऊपर से हँसते हुए और नीचे झुककर हाथ पकड़ते हुए, यह एक ही परमेश्वर हैं।
शास्त्र की गूँज
भजन 73 इसी सवाल को उलटी तरफ़ से पकड़ता है। आसाप कुढ़े, फिसलते-फिसलते बचे, और उनका मन तब शांत हुआ जब वे मन्दिर में गए और दुष्टों का अंत समझा। भजन 37 धीरज सिखाता है, भजन 73 बताता है कि उस धीरज तक पहुँचने में कितनी ठोकर लगती है।
दूसरी ओर अय्यूब की किताब पद 25 पर साफ़ दबाव डालती है, "न तो कभी धर्मी को त्यागा हुआ… देखा है।" अय्यूब धर्मी थे और राख पर बैठे थे। इसे छिपाना बेईमानी होगी। पद 25 सिद्धांत नहीं, एक बूढ़े गवाह का अनुभव है, और बाइबल स्वयं उस अनुभव के अपवाद दर्ज करती है।
एक बारीक बात
पद 35 और 36 पर ठहरिए। बूढ़ा आदमी किसी शक्तिशाली व्यक्ति को "हरा पेड़ अपने निज भूमि में फैलता" हुआ याद करता है, यानी अपनी ही मिट्टी में जमा हुआ, प्रत्यारोपित नहीं, बिलकुल सुरक्षित। गाँव का हर आदमी ऐसा एक घर जानता था: ऊँची दीवार, भरा हुआ अनाज-घर, डर से झुकते लोग। फिर वाक्य बदलता है, "जब कोई उधर से गया तो देखा कि वह वहाँ है ही नहीं; और मैंने भी उसे ढूँढ़ा, परन्तु कहीं न पाया।" यह दूर से किया गया धर्मशास्त्र नहीं है। आदमी उसी रास्ते से गुज़रा, खड़ा हुआ, खोजा। खाली जगह उसने अपनी आँखों से देखी। सत्ता के स्थायी दिखने और सचमुच स्थायी होने के बीच का फ़र्क उसने चलते-चलते सीखा।
चिंतन के प्रश्न
जिस व्यक्ति की सफलता आपको भीतर से खाती है, उसके बारे में आप किन शब्दों में सोचते हैं, और क्या वे शब्द आपको भला करने से रोक रहे हैं?
पद 25 और अय्यूब के बीच का तनाव आप कैसे झेलते हैं, जब आपने स्वयं किसी धर्मी को टूटते देखा है?
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Psalms 37 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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भजन संहिता 37 का क्या अर्थ है?
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भजन संहिता 37 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
भजन संहिता 37 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Psalms 37 में आपको क्या स्पर्श करता है?
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