भजन संहिता 38:6
यह पाठ
दाऊद अपने बारे में कहता है कि वह टूट चुका है और झुक गया है, जैसे कोई भारी बोझ के नीचे कमर से दोहरा हो गया हो। और यह कोई क्षण भर की उदासी नहीं: "दिन भर मैं शोक का पहरावा पहने हुए चलता फिरता हूँ।" शोक उसका ओढ़ना बन गया है, वह कपड़ा जो सुबह उठते ही पहना जाता है और रात तक उतरता नहीं। पिछले पद में उसने अपने घावों की दुर्गन्ध का ज़िक्र किया, अगले में कमर की जलन का। बीच में यह पद खड़ा है, जहाँ भीतर की पीड़ा बाहर दिखने लगती है: चाल में, कंधों में, चेहरे पर। यह आदमी अपना दुख छिपा नहीं पा रहा, और वह छिपाने की कोशिश भी छोड़ चुका है।
मूल बात
यह पद हमें एक ऐसी बात सिखाता है जिससे धर्मी लोग अक्सर बचना चाहते हैं: पाप का असर सिर्फ़ आत्मा तक सीमित नहीं रहता, वह शरीर में उतर आता है, चाल में, नींद में, रिश्तों में। दाऊद अपने अपराध और अपनी देह को अलग-अलग खानों में नहीं रखता। परमेश्वर ने हमें विभाजित प्राणी नहीं बनाया, इसलिए जो हम भीतर ढोते हैं वह देर-सबेर बाहर दिखता है। पर इससे भी गहरी बात यह है कि दाऊद इस झुकी हुई हालत को छिपाकर परमेश्वर के सामने नहीं आता, बल्कि इसी हालत में आता है। यहाँ अनुग्रह का द्वार खुलता है, क्योंकि परमेश्वर उस व्यक्ति को नहीं ठुकराते जो सीधा खड़ा होने का नाटक छोड़ देता है। सच्चाई, न कि सुधरी हुई छवि, प्रार्थना की पहली शर्त है।
साझा धागा
इस्राएल की प्रार्थना-पुस्तक में यह झुका हुआ आदमी अकेला नहीं रह जाता। यशायाह जिस दुखी सेवक का चित्र खींचता है, वह भी बोझ के नीचे दबा है, पर अपने पाप के नीचे नहीं, हमारे पाप के नीचे। यही वह धागा है जो भजन 38 को क्रूस तक ले जाता है। यीशु मसीह ने गतसमनी में अपने मन की उदासी को छिपाया नहीं, और गुलगुता के रास्ते पर वे सचमुच लकड़ी के नीचे झुके। दाऊद का शोक का पहरावा उन्होंने उधार लिया, ताकि हम उसे उतार सकें। इसलिए यह पद ईसाई पाठक के लिए निराशा का नहीं, पहचान का पद है: जिस मुद्रा में हम परमेश्वर के सामने खड़े होने से शर्माते हैं, उसी मुद्रा में हमारा उद्धारकर्ता पहले खड़ा हो चुका है।
दर्पण
हम में से ज़्यादातर लोग दाऊद की तरह नहीं, बल्कि उसके ठीक उलट जीते हैं। हम दफ़्तर में थकान छिपाते हैं क्योंकि कमज़ोर दिखना महँगा पड़ता है। हम घर पर चिड़चिड़ाहट को "बस थोड़ा सिरदर्द है" कहकर टाल देते हैं, जबकि असली वजह वह फ़ैसला है जो हमने छह महीने पहले लिया और जिसका हिसाब हमने अब तक किसी को नहीं दिया। हम रविवार को कलीसिया में सीधा तनकर खड़े होते हैं और गाते हैं, और भीतर कंधे झुके हुए होते हैं। यह पद उस दोहरेपन पर उँगली रखता है। दाऊद का साहस यह नहीं कि वह दुखी है; साहस यह है कि वह इसे दिन भर ओढ़े रहता है और नाटक नहीं करता।
आज किसी एक ऐसे व्यक्ति से, जिसके सामने आप हमेशा "सब ठीक है" कहते आए हैं, फ़ोन पर या आमने-सामने यह वाक्य कहिए: "सच कहूँ तो ठीक नहीं है, और मैं यह किसी से कह नहीं पा रहा था।" बस इतना; समाधान माँगने की ज़रूरत नहीं।
एक बारीकी
"झुक गया हूँ" शब्द पर ठहरिए। इब्रानी में जिस क्रिया से यह बनता है, वह शोक में दोहरे हो जाने की मुद्रा बताती है, पर यही मुद्रा आराधना की भी है: घुटनों का मुड़ना, सिर का नीचे आना। भाषा यहाँ दो चीज़ों को एक ही देह-भंगिमा में मिला देती है। जो आदमी पाप के बोझ से झुका है, वह बाहर से ठीक वैसा दिखता है जैसे कोई परमेश्वर के सामने दण्डवत कर रहा हो। और शायद यह संयोग नहीं। टूटना और आराधना करना एक-दूसरे के इतने पास हैं कि अक्सर हमें पता ही नहीं चलता कि हम कब एक से दूसरे में चले गए। दाऊद झुकने की शिकायत करते-करते उसी झुकी हालत में प्रार्थना कर रहा है।
अन्य शास्त्रवचन
भजन 32 में दाऊद वही अनुभव दूसरी ओर से बताता है: जब तक उसने चुप रहकर पाप दबाए रखा, उसकी हड्डियाँ घुलती रहीं; स्वीकार करते ही बोझ उतरा। भजन 38 उस चुप्पी के भीतर से लिखा गया प्रतीत होता है, और इसीलिए यह इतना बेचैन है। दूसरी ओर लूका 18 में वह चुंगी लेनेवाला याद आता है जो मन्दिर में आँखें ऊपर नहीं उठा सका और छाती पीटता रहा। यीशु कहते हैं कि वही धर्मी ठहरकर घर गया, न कि वह जो सीधा तनकर खड़ा था। दोनों दृश्यों में एक ही सच्चाई है: परमेश्वर के सामने झुकी पीठ कोई शर्म की बात नहीं, वह प्रवेश-द्वार है।
पहले सुननेवाले
जिन इस्राएलियों ने यह भजन मन्दिर में सुना, उनके लिए बीमारी और पाप का जोड़ना स्वाभाविक था, और उसका सामाजिक मूल्य भारी था। शरीर पर दिखते घाव का मतलब था अशुद्धता, और अशुद्धता का मतलब था समुदाय से दूरी; इसी भजन में आगे दाऊद कहता है कि उसके मित्र और कुटुम्बी दूर जा खड़े हुए। ऐसे समाज में यह गीत सार्वजनिक रूप से गाना अपने आप में जोखिम था। एक आदमी भीड़ के सामने मान रहा है कि उसकी हालत के पीछे उसका अपना अधर्म है। हमारे कानों में यह ईमानदारी लगती है; उनके कानों में यह इज़्ज़त का खुला त्याग था, और तब भी उसे परमेश्वर के घर में गाने की जगह मिली।
चिंतन
आपके कंधों पर इस समय जो बोझ है, उसे आपने आख़िरी बार किसके सामने खोलकर रखा था, और आपने उसे छिपाए रखने की क्या कीमत चुकाई है?
यदि झुकना ही आराधना की मुद्रा है, तो आपकी वर्तमान कमज़ोरी परमेश्वर से दूरी है या उनके सामने खड़े होने का सबसे सच्चा तरीका?
Psalms में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
A year of daily devotions through every psalm, ideal alongside your reading.
The second half of the psalter with the same loved precision.
Lewis thinking out loud about praise, cursing psalms and joy.
Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
Psalms 38:6 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
भजन संहिता 38:6 का क्या अर्थ है?
भजन संहिता 38:6 किस विषय में है?
भजन संहिता 38:6 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
भजन संहिता 38:6 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
भजन संहिता 38:6 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Psalms 38 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मुझे अकेला न छोड़िए। जब मेरी गलतियाँ मुझे घेर लेती हैं और लोग दूर हट जाते हैं, तब भी आप मेरे पास बने रहिए। मैं आपसे दूर होना नहीं चाहता। मुझे थामे रखिए, क्योंकि आपके सिवा मेरा कोई सहारा नहीं।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें