भजन संहिता 45:7
पाठ
राजा के विषय में गाया जा रहा यह गीत यहाँ एक ऐसी बात कहता है जो केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि चरित्र का लेखा-जोखा है: यह राजा धार्मिकता से प्रेम करता है और दुष्टता से घृणा, और ठीक इसी कारण परमेश्वर ने उसे उसके साथियों से बढ़कर "हर्ष के तेल" से अभिषिक्त किया है। एक ही वाक्य में दो विपरीत झुकाव रखे गए हैं, प्रीति और बैर, और फिर उनका परिणाम: तेल, सुगंध, आनंद, ऊँचाई। और ध्यान दीजिए कि कवि परमेश्वर का नाम दो बार दोहराता है, मानो साँस लेकर फिर कहता हो, "हाँ, तेरे परमेश्वर ने," जैसे यह बात इतनी बड़ी हो कि एक बार कहने से पूरी न हो।
मर्म
यहाँ पवित्रता को किसी नियम-पालन की तरह नहीं, बल्कि प्रेम और घृणा की तरह वर्णित किया गया है। धार्मिकता कोई ठंडा कर्तव्य नहीं, वह किसी चीज़ का दीवाना होना है; और दुष्टता से बैर रखना उदासीनता नहीं, वह एक जलती हुई असहमति है। परमेश्वर के राज्य में शासन इसी हृदय से निकलता है, न कि केवल शक्ति या वंश से। और फिर वह विचित्र क्रम आता है: पहले चरित्र, फिर अभिषेक। तेल इनाम नहीं है, वह पहचान है। जो व्यक्ति सही से प्रेम करता है, उसे परमेश्वर आनंद से भर देते हैं, और यह आनंद उसके "साथियों से अधिक" है, यानी तुलना की जा सकने वाली किसी भी सीमा से बाहर। यहाँ हमें रुककर पूछना चाहिए: क्या हमने कभी पवित्रता और आनंद को एक ही साँस में सोचा है, या हमने चुपचाप मान लिया है कि वे दो अलग रास्ते हैं?
सामान्य सूत्र
इब्रानियों की पत्री का लेखक इस पद को सीधे यीशु मसीह पर लागू करता है, और वह ऐसा किसी काव्यात्मक स्वतंत्रता के कारण नहीं करता। उसने देखा कि यह वाक्य किसी भी वास्तविक राजा से बड़ा है। इस्राएल के सिंहासन पर बैठे लोगों में कौन कह सकता था कि उसने सचमुच "धार्मिकता से प्रीति और दुष्टता से बैर" रखा? दाऊद ने नहीं, सुलैमान ने नहीं। गीत उम्मीद से भरा है, पर इतिहास उसे लगातार झुठलाता रहा। इसलिए यह पद एक खाली सिंहासन की तरह पीढ़ियों तक खड़ा रहा, जब तक वह न आया जिसने नासरत की सभा में कहा कि आत्मा ने उसे अभिषिक्त किया है। मुक्ति की कहानी में यह पद एक अधूरा वाक्य है, और मसीह उसका अंत नहीं, बल्कि उसका पूरा होना है।
दर्पण
यह पद हमारे भीतर की उस सुविधाजनक तटस्थता को उजागर करता है जिसे हम परिपक्वता कहकर छिपाते हैं। दफ़्तर में जब किसी सहकर्मी के साथ अन्याय होता है और हम चुप रह जाते हैं क्योंकि बोलना महँगा पड़ेगा; घर में जब कोई कड़वी आदत धीरे-धीरे जड़ पकड़ती है और हम उसे "स्वभाव" कहकर सह लेते हैं; पैसे के मामलों में जब हम जानते हैं कि यह पूरी तरह ईमानदार नहीं, पर सब ऐसा ही करते हैं। यह पद कहता है कि राजा का हृदय ठंडा नहीं था। उसमें प्रीति थी और बैर था, दोनों जीवित। और उसी हृदय पर तेल उंडेला गया। आज दस मिनट निकालिए, कागज़ पर वह एक अन्याय लिखिए जिसने पिछले हफ़्ते आपको सचमुच भीतर से हिलाया था, और उसे परमेश्वर के सामने ऊँची आवाज़ में पढ़कर पूछिए कि आप उसके बारे में इस हफ़्ते क्या एक कदम उठा सकते हैं।
मुख्य पात्र
गौर कीजिए कि यह अभिषिक्त राजा स्वयं किसी के अधीन है। कवि कहता है "तेरे परमेश्वर ने," और यही छोटा सा शब्द पूरे गीत को संभाले रखता है। जिसे पद 6 में "हे परमेश्वर" कहकर पुकारा गया, वही पद 7 में किसी और के हाथों अभिषिक्त होता है। यह विरोधाभास सुलझाया नहीं गया, केवल गाया गया। और इस राजा का भीतरी परिदृश्य ठंडा नहीं है: वह प्रेम करता है, वह घृणा करता है, और अंत में वह आनंदित होता है। इब्रानी शब्द "ससोन", जिसका अर्थ है उल्लास, वही आनंद जो विवाह और उत्सव में फूटता है, यहाँ तेल बन जाता है। पवित्रता यहाँ किसी सूखे संत की नहीं, बल्कि एक सुगंधित, हँसते हुए राजा की तस्वीर है।
प्रसंग
यह गीत किसी राजकीय विवाह के अवसर पर गाया गया था। दरबार का कवि, जिसकी जीभ "निपुण लेखक की लेखनी" बनी है, राजा और उसकी दुल्हन के लिए गा रहा है। प्राचीन पूर्व में राजाओं की प्रशंसा में अतिशयोक्ति सामान्य थी; उन्हें देवताओं की संतान तक कहा जाता था। पर यहाँ प्रशंसा का आधार बदल जाता है। तलवार और तीरों की बात होती है, हाँ, पर पद 4 में वे "सत्यता, नम्रता और धार्मिकता के निमित्त" बाँधे जाते हैं। सत्ता को नैतिक कसौटी पर तौला जा रहा है, और वह भी उसी दरबार में जो उसी सत्ता से रोटी पाता है। यह साहस है। उत्सव के तेल की सुगंध पद 8 में मुर्र और अगर के साथ मिलती है, पर उसका असली स्रोत हृदय है।
प्रश्न
अगर आनंद का तेल इसलिए उंडेला गया "इस कारण" कि राजा ने धार्मिकता से प्रेम किया, तो क्या यह आनंद कमाया हुआ है? और अगर हाँ, तो अनुग्रह कहाँ गया? पद इस प्रश्न को खुला छोड़ देता है, और शायद जान-बूझकर। हम जल्दी से कह सकते हैं कि यह केवल मसीह पर लागू होता है, जिसने सचमुच कमाया, और हमें मुफ़्त मिलता है। यह सच है, पर बहुत साफ़-सुथरा भी। क्योंकि गीत यह भी कहता है कि उसका अभिषेक "साथियों से अधिक" है, यानी साथी भी अभिषिक्त हैं, कम मात्रा में सही। हम उस तेल से बाहर नहीं हैं। शायद उत्तर यह है कि परमेश्वर उस हृदय को आनंद देते हैं जो सही चीज़ से प्रेम करना सीख रहा है, और यह सीखना भी उन्हीं का दिया हुआ है। पर मैं इसे पूरी तरह सुलझा नहीं सकता, और शायद गाते समय किसी ने सुलझाया भी नहीं था।
चिंतन
पिछली बार कब आपने किसी अच्छाई से इतना प्रेम किया कि वह आपको कुछ महँगी पड़ी, और उस क्षण में आनंद था या केवल बोझ?
अगर परमेश्वर आपके हृदय के प्रेम और बैर की सूची पढ़ें, तो वे किस बात पर सबसे लंबा ठहरेंगे?
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