भजन संहिता 46
पाठ
पहाड़ समुद्र में गिर रहे हैं, पानी गरज रहा है, धरती अपनी जगह से हिल रही है, और इसी शोर के बीच कोई गाता है: "परमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है, संकट में अति सहज से मिलनेवाला सहायक।" भजन तीन हिस्सों में चलता है। पहले प्रकृति टूटती है, फिर राष्ट्र क्रोध से काँपते हैं और राज्य डगमगाते हैं, और अंत में परमेश्वर स्वयं बोलते हैं और युद्ध बंद हो जाता है, धनुष टूट जाते हैं, रथ आग में झोंक दिए जाते हैं। बीच में एक अजीब शांत चित्र है: एक नदी, जिसकी नहरें परमेश्वर के नगर को आनंद से भरती हैं। उफनते समुद्र के सामने एक धीमी बहती धारा। और दो बार, जैसे किसी ढोल की थाप की तरह, वही पंक्ति लौटती है: "सेनाओं का यहोवा हमारे संग है; याकूब का परमेश्वर हमारा ऊँचा गढ़ है।"
मूल मर्म
यह भजन सुरक्षा का वादा नहीं करता, वह उपस्थिति का वादा करता है। ध्यान दीजिए, पहाड़ फिर भी गिरते हैं। समुद्र फिर भी गरजता है। भजनकार यह नहीं कहता कि विश्वासी के साथ बुरा नहीं होगा; वह कहता है कि जब सब कुछ हिल जाए तब भी एक चीज़ नहीं हिलेगी, "वह कभी टलने का नहीं।" प्राचीन निकट पूर्व में समुद्र अराजकता का प्रतीक था, वह शक्ति जो सृष्टि को निगल जाना चाहती है। और इस भजन में वही अराजकता एक शब्द से पिघल जाती है: "वह बोल उठा, और पृथ्वी पिघल गई।" यहाँ परमेश्वर की महानता केवल ताकत नहीं, बल्कि निकटता है। इसीलिए आदेश आता है, "चुप हो जाओ, और जान लो कि मैं ही परमेश्वर हूँ।" यह ध्यान-साधना का निमंत्रण नहीं, बल्कि हथियार डालने का हुक्म है। शोर मचाना छोड़ो; लड़ना बंद करो; जान लो कि युद्ध किसका है।
जोड़ने वाला सूत्र
यरूशलेम में कोई नदी नहीं थी। यह भजन गाने वाले लोग एक ऐसे नगर में खड़े थे जिसके पास सिर्फ़ गीहोन का एक पतला सोता था, और चारों ओर वे साम्राज्य जो बड़ी नदियों के किनारे बसे थे, मिस्र नील पर, अश्शूर दजला पर। तो यह "एक नदी" है क्या? यह वह भविष्य है जिसकी ओर पूरी बाइबल बहती है: परमेश्वर की उपस्थिति अपने लोगों के बीच, जीवन देती हुई, शांत, अटल। "परमेश्वर उस नगर के बीच में है" वह वाक्य है जो सदियों बाद एक चरनी में मांस और हड्डी बनकर उतरा, इम्मानुएल, परमेश्वर हमारे संग। और जो व्यक्ति गलील की झील पर खड़े होकर लहरों को डाँटता है, वह ठीक वही कर रहा है जो यह भजन परमेश्वर के बारे में गाता है। गरजता समुद्र एक शब्द सुनता है और चुप हो जाता है।
दर्पण
हम में से ज़्यादातर लोग पहाड़ों के समुद्र में गिरने से नहीं डरते। हम बायोप्सी की रिपोर्ट से डरते हैं, उस ईमेल से जिसमें "पुनर्गठन" शब्द है, उस बच्चे से जो अब फोन नहीं उठाता, उस खाते से जिसमें महीने के अंत तक कुछ नहीं बचेगा। और हमारी सहज प्रतिक्रिया शोर है: और मेहनत, और योजना, और तर्क, और रात दो बजे तक चलता हुआ दिमाग। "चुप हो जाओ" हमारे कानों में लगभग अपमान की तरह पड़ता है, क्योंकि चुप होने का मतलब है मान लेना कि नियंत्रण कभी हमारे हाथ में था ही नहीं। पर यह भजन आपसे हार मानने को नहीं, हथियार डालने को कह रहा है, और दोनों में फ़र्क है। आज शाम फोन दूसरे कमरे में रखकर दस मिनट चुपचाप बैठिए, और उस एक डर का नाम ज़ोर से बोलकर उसके बाद यह वाक्य ज़ोर से कहिए: "सेनाओं का यहोवा हमारे संग है।"
अंतर्पाठ
दो जगहें इस भजन के साथ गूँजती हैं। पहली, गलील की वह रात जब नाव में पानी भर रहा था और यीशु मसीह सो रहे थे; चेले घबराकर उन्हें जगाते हैं, और वे हवा को डाँटकर चुप करा देते हैं। भजन 46 में जो परमेश्वर एक शब्द से पृथ्वी पिघला देते हैं, वही वहाँ नाव में सो रहे थे। दूसरी, प्रकाशितवाक्य का अंतिम दृश्य, जहाँ नए यरूशलेम के बीच से जीवन के जल की नदी बहती है। भजनकार ने जिस नदी की झलक देखी, वह वहाँ पूरी होती है। इन दोनों के बीच खड़े होकर यह भजन अलग सुनाई देता है: यह केवल एक प्राचीन नगर का युद्धगीत नहीं, बल्कि उस दिन की प्रतीक्षा है जब धनुष सचमुच और आख़िरी बार तोड़ दिए जाएँगे।
मुख्य पात्र
इस भजन का परमेश्वर एक योद्धा है, पर ध्यान दीजिए वे क्या करते हैं। वे युद्ध जीतते नहीं, वे युद्ध मिटाते हैं। "वह धनुष को तोड़ता, और भाले को दो टुकड़े कर डालता है, और रथों को आग में झोंक देता है।" यह किसी विजयी सेनापति की तस्वीर नहीं जो शत्रु के हथियार अपने कब्ज़े में लेता है; यह वह है जो हथियारों की पूरी व्यवस्था ही जला देता है, अपनों के भी। और साथ ही यह वही परमेश्वर है जो "याकूब का परमेश्वर" कहलाते हैं, उस धोखेबाज़ पूर्वज का परमेश्वर जो रात भर कुश्ती लड़कर लँगड़ा हो गया था। सेनाओं का स्वामी और एक टूटे हुए आदमी का परमेश्वर, एक ही साँस में। ताकत और झुकाव, ऊँचाई और निकटता, यही उनका स्वभाव है।
कठिन प्रश्न
पर युद्ध तो रुके नहीं। भजन गाए जाने के बाद भी यरूशलेम गिरा, मंदिर जला, और आज भी सीमाओं पर रथ जल नहीं रहे, चल रहे हैं। तो क्या यह भजन झूठ बोलता है? ईमानदारी से: यह भजन वर्तमान का विवरण नहीं, अंत का ऐलान है, और इन दोनों के बीच का समय लंबा और खूनी है। भजनकार इसे छिपाता नहीं; वह "आओ, यहोवा के महाकर्म देखो" कहकर उजाड़ की ओर इशारा करता है, न कि किसी सुंदर बगीचे की ओर। विश्वास यहाँ यह नहीं कि तूफ़ान नहीं आएगा, बल्कि यह कि आख़िरी शब्द तूफ़ान का नहीं होगा। इससे कम कुछ भी कहना इस पाठ को मीठा बनाना होगा, और यह भजन मीठा नहीं, मज़बूत है।
चिंतन के प्रश्न
आपके जीवन में इस समय कौन सा शोर आपको "चुप हो जाओ" सुनने से रोक रहा है, और वह शोर किस डर से पैदा हो रहा है?
अगर परमेश्वर सचमुच "उस नगर के बीच में" हैं, तो आपके घर या मंडली में कौन सी एक चीज़ बदलनी चाहिए जो अभी ऐसे चल रही है जैसे वे दूर हों?
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Psalms 46 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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भजन संहिता 46 का क्या अर्थ है?
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