बाइबल व्याख्या

भजन संहिता 53:3

बाइबल

यह पाठ

"वे सब के सब हट गए; सब एक साथ बिगड़ गए; कोई सुकर्मी नहीं, एक भी नहीं।" तीन वाक्य, और हर वाक्य पिछले से भारी। पहले एक दिशा का पलटना, फिर एक साथ, सामूहिक रूप से बिगड़ जाना, और अंत में वह छोटा-सा जोड़ जो सारी गुंजाइश बंद कर देता है: एक भी नहीं। ऊपर से नीचे देखती हुई परमेश्वर की दृष्टि (पद 2) यहाँ अपना परिणाम बोलती है। खोज हुई थी, ईमानदारी से, बिना पूर्वाग्रह के, और खोज खाली लौटी। यह पद किसी शत्रु का वर्णन नहीं है; यह उस निगाह की रिपोर्ट है जो सबको देखती है और किसी को छोड़ती नहीं। और इसी में इसकी बेचैनी है।

केंद्रीय सत्य

यह पद हमें उस जगह ले जाता है जहाँ हमारी सामान्य श्रेणियाँ टूट जाती हैं। हम दुनिया को अच्छे और बुरे लोगों में बाँटकर जीते हैं, और आमतौर पर हम खुद को पहली सूची में रखते हैं। पद 3 वह सूची फाड़ देता है। ध्यान दीजिए कि परमेश्वर यहाँ अपराध गिनते नहीं, वे दिशा देखते हैं: सब "हट गए" हैं। पाप यहाँ मुख्यतः बुरे कामों की गिनती नहीं, बल्कि एक मुड़ी हुई मुखमुद्रा है, उस से दूर जो हमें बनाता है। और यही कारण है कि यह पद निराशावाद नहीं है। निराशावाद कहता है कि कुछ नहीं बदलेगा। यह पद कहता है कि बदलाव हमारे भीतर से नहीं आएगा, क्योंकि खोजनेवाला खुद खोया हुआ है। तब बचता क्या है? केवल यह कि जो ऊपर से देख रहे हैं, वे ऊपर से उतरें भी। भजन का अंत (पद 6) ठीक यही तड़प है: उद्धार सिय्योन से निकले। पद 3 उस तड़प को अनिवार्य बनाता है।

जोड़ने वाला धागा

पौलुस इस पद को रोमियों 3 में लगभग शब्दशः उठा लेते हैं, और वह उद्धरण आकस्मिक नहीं है। वे यह साबित करने के लिए इसे लाते हैं कि यहूदी और यूनानी, धर्मशास्त्र जाननेवाले और न जाननेवाले, सब एक ही अदालत में खड़े हैं। यानी भजन 53 का "एक भी नहीं" पुराने नियम की एक निराश आह नहीं है, बल्कि वह नींव है जिस पर सुसमाचार टिकता है। जहाँ तक मनुष्य की खोज जाती है, वहाँ शून्य मिलता है; इसलिए परमेश्वर ने खोजने का काम अपने हाथ में लिया। मसीह वह "एक" हैं जो इस पद के बाहर खड़े हैं, और साथ ही वह जो इस पद के भीतर खड़े लोगों के बीच आकर बसे। भजनकार जिस उद्धार के लिए तरसता है कि वह सिय्योन से निकले, वह एक व्यक्ति के रूप में निकला।

आईना

यह पद आपके उस चुपचाप चलनेवाले हिसाब पर हाथ रखता है जिसमें आप खुद को औसत से थोड़ा ऊपर पाते हैं। आप उस सहकर्मी से ईमानदार हैं जो खर्चे बढ़ा-चढ़ाकर लिखता है। आप उस रिश्तेदार से ज़्यादा धैर्यवान हैं जो अपने बूढ़े पिता को नहीं देखता। आप रविवार को वहाँ होते हैं जहाँ बहुत से नहीं होते। यह तुलना ही वह जगह है जहाँ पद 3 चोट करता है, क्योंकि परमेश्वर की दृष्टि तुलना नहीं करती, वह दिशा देखती है। और दिशा के मामले में आप और वह सहकर्मी एक ही सूची में हैं। यह अपमान नहीं, मुक्ति है: जब आप औरों से बेहतर होने का बोझ छोड़ देते हैं, तब कृपा के लिए हाथ खाली होते हैं। आज दिन ढलने से पहले उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिससे आप भीतर ही भीतर खुद को बेहतर मानते हैं, और उस नाम के नीचे लिखिए: "एक भी नहीं, मैं भी नहीं।" फिर उसके लिए प्रार्थना कीजिए।

संदर्भ

भजन 53 भजन 14 का लगभग जुड़वाँ है, पर इसमें एक अंतर है: यहाँ शत्रुओं की छावनी का ज़िक्र है, हड्डियों का बिखर जाना, युद्ध की भाषा। यानी यह किसी शांत अध्ययन-कक्ष का चिंतन नहीं, बल्कि उस समुदाय का गीत है जो घिरा हुआ है। बाहर वे लोग हैं जो "परमेश्वर का नाम नहीं लेते" और परमेश्वर के लोगों को रोटी की तरह खाते हैं, यानी उन्हें निगल जाना जिनके पास बचाव नहीं। प्राचीन पूर्व में देवता को नकारना दार्शनिक नास्तिकता नहीं थी; इसका अर्थ था यह मान लेना कि कोई ऊपर से देख नहीं रहा, कोई हिसाब नहीं लेगा। ऐसे माहौल में यह घोषणा कि परमेश्वर स्वर्ग से झाँकते हैं, ताकतवरों के लिए धमकी थी और कमज़ोरों के लिए साँस।

मुख्य पात्र

इस पद का असली पात्र वह परमेश्वर है जो देखते हैं। ध्यान दीजिए कि वे तुरंत दंड नहीं देते, वे पहले झाँकते हैं, खोजते हैं, मानो उम्मीद कर रहे हों कि कोई मिल जाए। यह एक न्यायाधीश की ठंडी जाँच नहीं, इसमें कुछ ऐसा है जैसे अदन के बगीचे में वह पुकार, "तू कहाँ है।" परमेश्वर की दृष्टि में खोज की एक बेचैनी है। और जब खोज खाली लौटती है, तब भी भजन विनाश की घोषणा पर नहीं, बल्कि उद्धार की चाह पर समाप्त होता है। यही इस परमेश्वर का स्वभाव है: वे सब कुछ देख लेते हैं और फिर भी छोड़ते नहीं। जो हमें पूरी तरह जानता है, वही अकेला हमें बचा भी सकता है, क्योंकि उसकी दया किसी भ्रम पर नहीं टिकी।

पहले सुननेवाले

कल्पना कीजिए कि यह गीत मंदिर में उन लोगों के बीच गाया जा रहा है जो अभी-अभी किसी हमले से बचे हैं, या जो बंधुवाई की स्मृति ढो रहे हैं। उन्होंने सुना होगा: हमारे शत्रु मूर्ख हैं, वे नहीं जानते कि कोई देख रहा है। पर फिर पद 3 आता है और "वे सब" का घेरा गाने वालों तक फैल जाता है। यह गीत उनके हाथ से हथियार छीन लेता है। इस्राएल जानता था कि वह बंधुवाई में क्यों गया था: शत्रुओं की ताकत से नहीं, अपनी ही मुड़ी हुई दिशा से। इसलिए पद 6 की तड़प उनके लिए भावुक कविता नहीं थी, बल्कि जीवित प्रश्न था: क्या परमेश्वर सचमुच लौटाएँगे?

चिंतन के प्रश्न

अगर परमेश्वर की दृष्टि आज सुबह आप पर पड़ी, तो वे किस दिशा में मुड़ा हुआ चेहरा देखते?

"एक भी नहीं" सुनकर आपके भीतर पहले क्या जागता है, बचाव या राहत, और यह आपके बारे में क्या कहता है?

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Psalms 53:3 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

भजन संहिता 53:3 का क्या अर्थ है?
"वे सब के सब हट गए; सब एक साथ बिगड़ गए; कोई सुकर्मी नहीं, एक भी नहीं।" तीन वाक्य, और हर वाक्य पिछले से भारी। पहले एक दिशा का पलटना, फिर एक साथ, सामूहिक रूप से बिगड़ जाना, और अंत में वह छोटा-सा जोड़ जो सारी गुंजाइश बंद कर देता है: एक भी नहीं। ऊपर से नीचे देखती हुई परमेश्वर की दृष्टि (पद 2) यहाँ अपना परिणाम बोलती है। खोज हुई थी, ईमानदारी से, बिना पूर्वाग्रह के, और खोज खाली लौटी। यह पद किसी शत्रु का वर्णन नहीं है; यह उस निगाह की रिपोर्ट है जो सबको देखती है और किसी को छोड़ती नहीं। और इसी में इसकी बेचैनी है।
भजन संहिता 53:3 किस विषय में है?
पौलुस इस पद को रोमियों 3 में लगभग शब्दशः उठा लेते हैं, और वह उद्धरण आकस्मिक नहीं है। वे यह साबित करने के लिए इसे लाते हैं कि यहूदी और यूनानी, धर्मशास्त्र जाननेवाले और न जाननेवाले, सब एक ही अदालत में खड़े हैं। यानी भजन 53 का "एक भी नहीं" पुराने नियम की एक निराश आह नहीं है, बल्कि वह नींव है जिस पर सुसमाचार टिकता है। जहाँ तक मनुष्य की खोज जाती है, वहाँ शून्य मिलता है; इसलिए परमेश्वर ने खोजने का काम अपने हाथ में लिया। मसीह वह "एक" हैं जो इस पद के बाहर खड़े हैं, और साथ ही वह जो इस पद के भीतर खड़े लोगों के बीच आकर बसे। भजनकार जिस उद्धार के लिए तरसता है कि वह सिय्योन से निकले, वह एक व्यक्ति के रूप में निकला।
भजन संहिता 53:3 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
भजन 53 भजन 14 का लगभग जुड़वाँ है, पर इसमें एक अंतर है: यहाँ शत्रुओं की छावनी का ज़िक्र है, हड्डियों का बिखर जाना, युद्ध की भाषा। यानी यह किसी शांत अध्ययन-कक्ष का चिंतन नहीं, बल्कि उस समुदाय का गीत है जो घिरा हुआ है। बाहर वे लोग हैं जो "परमेश्वर का नाम नहीं लेते" और परमेश्वर के लोगों को रोटी की तरह खाते हैं, यानी उन्हें निगल जाना जिनके पास बचाव नहीं। प्राचीन पूर्व में देवता को नकारना दार्शनिक नास्तिकता नहीं थी; इसका अर्थ था यह मान लेना कि कोई ऊपर से देख नहीं रहा, कोई हिसाब नहीं लेगा। ऐसे माहौल में यह घोषणा कि परमेश्वर स्वर्ग से झाँकते हैं, ताकतवरों के लिए धमकी थी और कमज़ोरों के लिए साँस।
भजन संहिता 53:3 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
कल्पना कीजिए कि यह गीत मंदिर में उन लोगों के बीच गाया जा रहा है जो अभी-अभी किसी हमले से बचे हैं, या जो बंधुवाई की स्मृति ढो रहे हैं। उन्होंने सुना होगा: हमारे शत्रु मूर्ख हैं, वे नहीं जानते कि कोई देख रहा है। पर फिर पद 3 आता है और "वे सब" का घेरा गाने वालों तक फैल जाता है। यह गीत उनके हाथ से हथियार छीन लेता है। इस्राएल जानता था कि वह बंधुवाई में क्यों गया था: शत्रुओं की ताकत से नहीं, अपनी ही मुड़ी हुई दिशा
भजन संहिता 53:3 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
"एक भी नहीं" सुनकर आपके भीतर पहले क्या जागता है, बचाव या राहत, और यह आपके बारे में क्या कहता है?
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Psalms 53 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 5

पिता, धन्यवाद कि जो मेरे विरुद्ध छावनी डाले पड़े थे, उन्हें तूने आप ही तितर-बितर कर दिया। मुझे लड़ना भी न पड़ा, तूने ही मेरी ओर से लड़ाई लड़ी। धन्यवाद कि तेरी उपस्थिति में डर की जड़ें उखड़ जाती हैं और मेरा मन शांत रहता है।

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