भजन संहिता 61
पाठ स्वयं
एक आदमी देश के किनारे से, बस्ती की आखिरी सीमा से चिल्ला रहा है: "हे परमेश्वर, मेरा चिल्लाना सुन, मेरी प्रार्थना की ओर ध्यान दे।" उसका मन बैठ रहा है, हिम्मत टूट रही है, और वह ऐसी चट्टान माँगता है जो उसकी पहुँच से ऊपर है, इसलिए वह कहता है कि परमेश्वर स्वयं उसे वहाँ ले चलें। इसके बाद स्वर बदल जाता है: शिकायत से भरोसे की ओर, और भरोसे से मन्नत की ओर। वह परमेश्वर के तम्बू में बसने और उनके पंखों की ओट में शरण लेने की बात करता है, राजा की लंबी आयु के लिए प्रार्थना करता है, और अंत में वादा करता है कि वह हर दिन अपनी मन्नतें पूरी करेगा और परमेश्वर के नाम का भजन गाता रहेगा। आठ पद, और उनमें पूरा सफर: गिरने से गाने तक।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि प्रार्थना में वह क्या नहीं माँगता। वह यह नहीं कहता कि मुझे ताकत दो ताकि मैं चढ़ सकूँ। वह कहता है, "जो चट्टान मेरे लिये ऊँची है, उस पर मुझ को ले चल।" यही इस भजन का धर्मशास्त्रीय केंद्र है: सुरक्षा वहाँ है जहाँ मनुष्य अपने बल पर पहुँच नहीं सकता, और इसलिए उद्धार हमेशा एक उठाए जाने का अनुभव है, अपने चढ़ने का नहीं। इब्रानी में जो शब्द यहाँ "शरणस्थान" के लिए आया है, वह पत्थर की ठोस पनाह की तस्वीर है, कोई भावना नहीं। परमेश्वर के बारे में यह भजन दो बातें साथ रखता है जो हम अक्सर अलग कर देते हैं: वे ऊँचे गढ़ हैं, दुर्गम और मजबूत, और वे पंखों की ओट भी हैं, गर्म और कोमल। जो अपने आप को बचा नहीं सकता, उसके लिए यही दोनों चाहिए।
जोड़ने वाला सूत्र
"मैं तेरे तम्बू में युगानुयुग बना रहूँगा" कहने वाला आदमी कुछ ऐसा माँग रहा है जो उसके हक में नहीं था। तम्बू में स्थायी रूप से रहना याजकों की बात थी, आम इस्राएली की नहीं; और "पंखों की ओट" संदूक के ऊपर फैले करूबों के पंखों की याद दिलाती है, वह जगह जहाँ कोई बिना बुलाए नहीं जाता। यह प्रार्थना अपनी सीमा लाँघकर माँगती है। पद 6 और 7 उसी दिशा में और आगे जाते हैं: एक राजा जिसके वर्ष "पीढ़ी-पीढ़ी के बराबर" हों, जो "परमेश्वर के सम्मुख सदा बना रहेगा"। यह भाषा दाऊद से की गई उस वाचा से आती है जिसमें परमेश्वर ने उसके घराने को स्थिर करने का वादा किया (2 शमूएल 7)। कोई भी दाऊदी राजा इस प्रार्थना के बराबर नहीं उतरा। मसीह में यह दोनों बातें एक साथ पूरी होती हैं: वह राजा जो सचमुच सदा परमेश्वर के सम्मुख खड़ा है, और जिसके कारण हम जैसे बाहरी लोग भी तम्बू के भीतर स्थायी जगह पाते हैं।
आईना
"मूर्छा खाते समय" वाला अनुवाद ठीक पकड़ता है: यह वह घड़ी है जब मन के भीतर कुछ बैठ जाता है। नौकरी की उस चिट्ठी के बाद जो आपने दो बार पढ़ी और फिर दराज में रख दी। जाँच की रिपोर्ट आने से पहले वाली रात। वह बेटा या बेटी जिससे बात करने की सारी कोशिशें खत्म हो चुकी हैं। ऐसे समय हमारी प्रार्थना अक्सर यह होती है कि मुझे संभलने की ताकत दीजिए, यानी नियंत्रण मेरे हाथ में रहे और मदद बस थोड़ी बाहर से आए। यह भजन उस समझौते को तोड़ता है। वह चट्टान जान-बूझकर ऊँची है, पहुँच से बाहर, ताकि प्रार्थना करने वाला उठाया जाए, चढ़े नहीं।
आज किसी ऐसे कमरे में जाइए जहाँ कोई सुन न रहा हो, और ज़ोर से, नाम लेकर वह एक चीज़ कहिए जो सचमुच आपकी पहुँच से ऊपर है, और फिर यही शब्द बोलिए: "उस पर मुझ को ले चल।"
पहले सुनने वाले
इस भजन को गाने वाले लोग नक्शे को धार्मिक रूप से पढ़ते थे। यरूशलेम केंद्र था, और उससे दूरी सिर्फ किलोमीटर नहीं, उपस्थिति से दूरी थी। "पृथ्वी की छोर" का मतलब था: वह इलाका जहाँ दूसरे देवताओं का राज माना जाता था, जहाँ बलिदान नहीं चढ़ सकता, जहाँ त्योहारों का शोर नहीं पहुँचता। किसी सीमा पर तैनात सिपाही ने, किसी बंधुआई में ले जाए गए परिवार ने, किसी व्यापारी ने जो महीनों घर से बाहर था, इन शब्दों को इसी अर्थ में सुना: मैं वहाँ हूँ जहाँ से चिल्लाना बेकार लगता है, और फिर भी चिल्ला रहा हूँ। और जब उन्होंने "तू राजा की आयु को बहुत बढ़ाएगा" गाया, तो वह कोई रस्मी दुआ नहीं थी। राजा जीवित रहे तो सीमाएँ सुरक्षित, फसल सुरक्षित, बच्चे सुरक्षित। राजा गिरा तो सब गिरा।
कठिन सवाल
तो फिर वह प्रार्थना हुई क्या? राजा के वर्ष पीढ़ी-पीढ़ी के बराबर नहीं हुए। दाऊद का घराना बाबुल के सामने टूटा, आखिरी राजा की आँखें फोड़ दी गईं, और सिंहासन खाली रहा। और फिर भी इस्राएल ने यह भजन गाना बंद नहीं किया, तब भी नहीं जब गाने के लिए कोई राजा बचा ही नहीं था। यह ईमानदार बात है और असुविधाजनक भी: कुछ प्रार्थनाएँ अपने समय में पूरी नहीं होतीं, और विश्वास का काम यह है कि टूटे वादे को फेंक न दिया जाए बल्कि गाते हुए आगे ले जाया जाए। मसीह में इसका उत्तर मिलता है, पर वह उत्तर सदियों बाद आया। बीच के अंधेरे को जल्दी से रोशन कर देना इस भजन के साथ बेईमानी होगी।
संदर्भ
मंदिर अभी नहीं, तम्बू है: कपड़े और खालों की छत, धुएँ की गंध, जले हुए चर्बी की महक, बाहर बलि के जानवरों की आवाज़। धर्म यहाँ चलता-फिरता है, और इसीलिए उससे दूर होना मुमकिन है। मन्नत उस दुनिया का सामान्य सामाजिक रिवाज थी: संकट में आदमी परमेश्वर से वादा करता था, और छूटने पर धन्यवाद-बलि लेकर लौटता, जिसका माँस परिवार और दोस्तों के साथ खाया जाता। इसलिए पद 8 कोई भावुक वादा नहीं, बल्कि सार्वजनिक, खर्चीला और गवाहों के सामने निभाया जाने वाला काम है। परंपरा इस भजन को दाऊद से जोड़ती है, शायद अबशालोम के विद्रोह के दिनों से, जब वह यरदन पार भागा हुआ था: राजा, फिर भी शरणार्थी; अभिषिक्त, फिर भी बेघर। ऐसे आदमी के मुँह में "ऊँचा गढ़" कोई कविता नहीं, ज़रूरत है।
चिंतन के प्रश्न
आपके जीवन में इस समय वह "ऊँची चट्टान" क्या है, यानी वह हल जो सचमुच आपकी पहुँच से बाहर है, और आप अब भी किस कोशिश से खुद चढ़ने में लगे हैं?
क्या कोई मन्नत, कोई वादा है जो आपने संकट के समय परमेश्वर से किया था और छूट जाने के बाद चुपचाप भुला दिया?
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