भजन संहिता 79
पाठ
586 ईसा पूर्व की गर्मियों में यरूशलेम की दीवारों के बाहर गिद्ध मँडरा रहे थे, और किसी के पास इतना समय या साहस नहीं बचा था कि लाशों को मिट्टी दे सके। यही इस भजन का दृश्य है। अन्यजातियाँ परमेश्वर के "निज भाग" में घुस आईं, मन्दिर अशुद्ध हुआ, नगर खण्डहर बना, और भक्तों का लहू "जल के समान" बहा। चारों ओर के पड़ोसी हँसते हैं। इस मलबे के बीच से एक समूह पुकारता है: "हे यहोवा, कब तक?" वे अपने पुरखाओं के पाप को स्वीकारते हैं, परमेश्वर के नाम की दुहाई देकर सहायता माँगते हैं, बन्दियों के कराहने की ओर ध्यान खींचते हैं, और निन्दा करनेवालों से सात गुणा बदला माँगते हैं। अंत में एक प्रतिज्ञा: हम तेरी चराई की भेड़ें हैं, हम पीढ़ी से पीढ़ी तक तेरा गुणानुवाद करते रहेंगे।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि यह प्रार्थना किस आधार पर खड़ी है। बचे हुए लोग यह नहीं कहते कि हम निर्दोष हैं; वे साफ कहते हैं कि अधर्म हुआ है और पाप ढाँपे जाने की आवश्यकता है। फिर भी वे चुप नहीं रहते, क्योंकि दाँव पर उनकी प्रतिष्ठा नहीं, परमेश्वर का नाम है। पड़ोसियों का ताना है, "उनका परमेश्वर कहाँ रहा?" प्राचीन संसार में हारी हुई जाति का अर्थ था हारा हुआ देवता। इसलिए वे दो बार दोहराते हैं, "अपने नाम की महिमा के निमित्त", "अपने नाम के निमित्त"। यही अनुग्रह का तर्क है: जब हमारे पास दिखाने को कुछ नहीं बचता, तब भी परमेश्वर के पास अपनी प्रतिष्ठा बचाने का कारण बचा रहता है। उद्धार हमारी योग्यता से नहीं, उनके चरित्र से निकलता है, और यही इस मलबे में एकमात्र ठोस ज़मीन है।
जोड़नेवाला सूत्र
यह भजन उस प्रश्न को जीवित रखता है जिसका उत्तर सदियों बाद आता है: परमेश्वर अपने नाम के निमित्त पापों को कैसे "ढाँप" सकते हैं, और फिर भी बहाए गए लहू का हिसाब कैसे चुका सकते हैं? यहाँ दोनों माँगें एक साथ रखी गई हैं, पद 9 में क्षमा और पद 10 में पलटा, और भजन उन्हें सुलझाता नहीं। क्रूस पर वे मिलते हैं। वहाँ एक और शरीर नगर की दीवार के बाहर पड़ा रहता है, वहाँ भी भीड़ ठट्ठा करती है, "तेरा परमेश्वर कहाँ रहा?" जैसा ताना गूँजता है। पर वह लहू बदला नहीं, क्षमा पुकारता है। यीशु मसीह स्वयं वही बने जिसका लहू बहाया गया, ताकि परमेश्वर का नाम न्याय छोड़े बिना महिमा पाए।
दर्पण
हम अक्सर सोचते हैं कि प्रार्थना तभी पवित्र है जब वह शान्त हो। यह भजन इस धारणा को तोड़ता है। जब आपकी नौकरी किसी की चालाकी से छिनती है, जब परिवार में कोई आपकी बदनामी फैलाता है, जब बीमारी ने शरीर को लूट लिया और लोग आपकी आस्था पर हँसते हैं, तो आप भीतर ही भीतर यही कहते हैं: कब तक? यह भजन आपको वह गुस्सा दबाने को नहीं कहता, बल्कि उसे परमेश्वर के हाथ में सौंपने को कहता है। बदला माँगा जाता है, लिया नहीं जाता; यही अंतर एक हत्यारे और एक प्रार्थी के बीच है। आज एक काम कीजिए: अकेले बैठकर, ज़ोर से, उस व्यक्ति या स्थिति का नाम लेकर परमेश्वर से कहिए, "हे यहोवा, कब तक?" और फिर चुप हो जाइए, बिना कोई हल सुझाए।
कठिन प्रश्न
"सात गुणा बदला" माँगना क्या मसीही प्रार्थना हो सकती है? ईमानदारी से: यीशु मसीह ने हमें शत्रुओं के लिए प्रार्थना करना सिखाया, और इस पद को सीधे अपनी प्रार्थना बना लेना उस शिक्षा को काट देना होगा। पर इसे बाइबल से निकाल फेंकना भी बेईमानी है। यह भजन उन लोगों की आवाज़ है जिनके बच्चे मारे गए और जिनके पास कोई अदालत नहीं थी। उनका "बदला" वास्तव में न्याय की भूख है, और वह भूख परमेश्वर ने ही मनुष्य में रखी है। तनाव बना रहता है: हम क्षमा के लिए बुलाए गए हैं, फिर भी शहीदों की पुकार स्वर्ग में सुनी जाती है। इस तनाव को जल्दी सुलझा लेना दुख को सस्ता कर देना है।
एक बारीकी
"मिट्टी देनेवाला कोई न था।" आज हमारे कानों में यह केवल एक दुखद पंक्ति है; उस समय यह सबसे भयानक शाप था। इस्राएल में दफ़न का अर्थ था पुरखाओं के साथ जुड़ना, नाम का बचा रहना, मृत्यु में भी समुदाय का होना। बिना दफ़न पड़ी लाश का अर्थ था कि यह व्यक्ति कहीं का नहीं रहा, न जीवितों का, न मरे हुओं का। पक्षी और वन-पशु उसे खा जाते हैं और कुछ शेष नहीं रहता। इसलिए पद 2 और 3 केवल हिंसा का वर्णन नहीं, पहचान के पूर्ण मिटने का विलाप हैं। और ठीक इसी के उत्तर में पद 13 खड़ा होता है: "पीढ़ी से पीढ़ी तक"। जिनका नाम मिटाया गया, वे फिर भी स्मरण करनेवाली एक जाति बने रहेंगे।
शास्त्र की गूँज
विलापगीत इसी मलबे पर खड़ा है और लगभग वही शब्द बोलता है, पर वहाँ भी हर सुबह नई करुणा की बात निकल आती है; दोनों पुस्तकें मिलकर दिखाती हैं कि इस्राएल ने अपने सबसे बड़े विनाश को परमेश्वर से छिपाया नहीं, उसे प्रार्थना बना दिया। और प्रकाशितवाक्य में शहीदों की आत्माएँ वेदी के नीचे से वही पुकार लगाती हैं जो इस भजन के पद 5 और 10 में है, "कब तक?" उन्हें तुरंत उत्तर नहीं, सफेद वस्त्र और थोड़ा और ठहरने का वचन मिलता है। इसका अर्थ यह है कि भजन 79 बंद अध्याय नहीं है। यह प्रार्थना अब भी चल रही है, और उसका उत्तर इतिहास के अंत में आएगा।
चिंतन
आपके जीवन की कौन सी पीड़ा आप परमेश्वर के सामने इसलिए नहीं रखते क्योंकि वह "बहुत कड़वी" लगती है, और इस भजन को पढ़ने के बाद क्या बदलता है?
पद 9 कहता है "अपने नाम के निमित्त"। जब आप प्रार्थना करते हैं, तो आपकी बिनती का आधार आपकी ज़रूरत है या परमेश्वर का चरित्र?
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