रोमियों 1:22
पाठ
पौलुस एक ही साँस में एक पूरी सभ्यता का चित्र खींच देता है: "वे अपने आपको बुद्धिमान जताकर मूर्ख बन गए।" यह वाक्य किसी अनपढ़ भीड़ के बारे में नहीं है, बल्कि उन लोगों के बारे में जिनके पास ज्ञान था, तर्क था, दर्शनशास्त्र था। पिछली आयत में कारण साफ है: परमेश्वर को जानने पर भी उन्होंने न बड़ाई की, न धन्यवाद दिया, और उनका मन अंधेरा हो गया। आयत 22 उसी अंधेरे का नाम रखती है, और अगली आयत बताती है कि यह मूर्खता किस रूप में प्रकट हुई: अविनाशी परमेश्वर की महिमा को पशु-पक्षियों की मूरत से बदल देना। दावा ऊँचा, परिणाम नीचा।
मर्म
यहाँ मूर्खता का अर्थ कम बुद्धि नहीं है। पौलुस जिस यूनानी क्रिया का प्रयोग करता है, एमोरान्थेसान, उसका मूल अर्थ है स्वाद खो देना, बेकार हो जाना, जैसे नमक फीका पड़ जाए। यानी मस्तिष्क चलता रहता है, तर्क तेज़ रहते हैं, पर उनका असली स्वाद, उनकी दिशा, मर जाती है। और यह कोई अचानक गिरावट नहीं है। पौलुस के अनुसार पतन की जड़ धन्यवाद न देने में है। जिस क्षण मैं मान लेता हूँ कि मेरा ज्ञान, मेरा घर, मेरी सेहत मेरी अपनी उपलब्धि है, उसी क्षण मैं सृष्टिकर्ता के सामने खड़ा प्राणी नहीं, बल्कि अपने ही जगत का छोटा-सा देवता बन जाता हूँ। बुद्धि तब मुकुट नहीं, पर्दा बन जाती है। परमेश्वर के बारे में सच्चाई मिटती नहीं, बस दबा दी जाती है, और दबाने में हम अपनी ही समझ को अंधा कर लेते हैं।
जोड़ने वाला सूत्र
यह कहानी नई नहीं है। बाग़ में पहला प्रलोभन भी यही था: फल खाओ, और आँखें खुल जाएँगी, बुद्धि मिल जाएगी। मनुष्य ने ज्ञान चुना, पर उस स्रोत के बाहर जिससे ज्ञान अर्थ पाता है, और परिणाम में नंगापन और छिपना मिला। इस्राएल ने भी सीनै के नीचे यही दोहराया, महिमा को बछड़े से बदल दिया। पौलुस इसी पुराने पैटर्न पर उँगली रखता है। और यहीं मसीह का सुसमाचार अपनी पूरी उलटी चाल दिखाता है: परमेश्वर मनुष्य की बुद्धि को क्रूस से चुनौती देते हैं, एक ऐसी बात से जो यूनानियों को मूर्खता लगी (1 कुरिन्थियों 1)। जो अपने आपको बुद्धिमान जताते हैं वे मूर्ख बनते हैं; जो क्रूस के सामने अपनी मूर्खता स्वीकार करते हैं, वे पहली बार सचमुच समझदार होते हैं।
दर्पण
यह आयत उन पर वार नहीं करती जो कम जानते हैं, बल्कि उन पर जो अच्छा जानते हैं। यानी आप पर, जो हर सुबह पढ़ते हैं, समूह चलाते हैं, दूसरों को समझाते हैं। ख़तरा यह नहीं कि आप परमेश्वर को नकार देंगे; ख़तरा यह है कि आप उन्हें अपनी व्याख्याओं का विषय बना लेंगे और धन्यवाद देना भूल जाएँगे। ध्यान दीजिए कहाँ आप बिना सोचे मान लेते हैं कि यह सब आपका किया हुआ है: बच्चों की परवरिश, नौकरी की सुरक्षा, वह राय जो आप बहस में सबसे तेज़ रखते हैं। जब कोई आपको सुधारता है और भीतर गर्मी उठती है, वह आयत 22 की आहट है। बुद्धि जब बचाव का कवच बन जाए, तो वह स्वाद खो चुकी है।
आज, दस मिनट के भीतर: कागज़ पर आज की तीन चीज़ें लिखिए जो आपने स्वयं नहीं बनाईं, और हर एक के लिए ज़ोर से, बोलकर, परमेश्वर को धन्यवाद दीजिए।
संदर्भ
पौलुस यह पत्र साम्राज्य की राजधानी को लिख रहा है, उस शहर को जो अपनी विधि, अपनी वास्तुकला और अपने देवताओं पर गर्व करता था। रोम में मंदिर हर गली में थे, और शिक्षित वर्ग यूनानी दर्शन को अपनी पहचान मानता था। ऐसे पाठकों के सामने यह कहना कि "बुद्धिमान जताकर मूर्ख बन गए" सिर्फ़ धार्मिक टिप्पणी नहीं, सांस्कृतिक चुनौती थी। साथ ही याद रखिए, यह पत्र यहूदी और अन्यजाति दोनों पृष्ठभूमि के विश्वासियों की मिली-जुली मंडली को जाता है। पौलुस अध्याय 2 में तुरंत यहूदी पाठक की ओर मुड़ेगा। इसलिए यह आयत ताली बजाने के लिए नहीं है, बल्कि हर श्रोता को धीरे-धीरे उसी कठघरे में लाने के लिए, जहाँ केवल अनुग्रह बचा रहता है।
शास्त्र की गूँज
पौलुस यहाँ यिर्मयाह की भाषा उधार लेता है। यिर्मयाह 10 में मूर्ति बनाने वाला कारीगर अपने ही हुनर से लज्जित होता है: वह जानता है कि उसने लकड़ी को आकार दिया, फिर भी उसके आगे झुकता है। यही विडम्बना रोमियों 1 में है, ज्ञान और अंधेपन का एक साथ होना। दूसरी ओर भजन 19, जिसका संकेत आयत 20 में है, कहता है कि आकाश परमेश्वर की महिमा सुनाता है। यानी गवाही की कमी नहीं है; कमी सुनने की इच्छा में है। दोनों पाठ मिलकर एक ही बात कहते हैं: सृष्टि बोलती रहती है, और मनुष्य अपनी बुद्धि को इतना ऊँचा कर लेता है कि उसे उस आवाज़ के ऊपर बैठा देता है।
कठिन प्रश्न
अगर मन का अंधेरा पाप का परिणाम भी है और परमेश्वर का न्याय भी, तो वह व्यक्ति दोषी कैसे ठहरे जो अपने अंधेरे को देख ही नहीं सकता? पौलुस इसे नरम नहीं करता। वह कहता है वे "निरुत्तर हैं", और साथ ही कहता है कि परमेश्वर ने उन्हें छोड़ दिया। यहाँ दो सच्चाइयाँ एक-दूसरे को काटती नहीं, बल्कि एक-दूसरे में गुँथी हैं, और शास्त्र इस गाँठ को खोलता नहीं। जो राहत मिलती है वह तर्क से नहीं आती, आयत 16 से आती है: सुसमाचार परमेश्वर की सामर्थ्य है। अंधेरे से निकलने का रास्ता बेहतर सोचना नहीं, बुलाया जाना है। और वही बुलाहट इस पत्र की पहली पंक्तियों में पहले ही सुनाई दे चुकी है।
चिंतन के प्रश्न
पिछले हफ़्ते किस बात पर आपने सबसे ज़्यादा गर्व महसूस किया, और क्या आपने उसके लिए एक बार भी धन्यवाद दिया?
आपके जीवन में कौन ऐसा व्यक्ति है जिसकी बात आप इसलिए नहीं सुनते क्योंकि आप मानते हैं कि आप उससे बेहतर समझते हैं?
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Romans 1:22 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
रोमियों 1:22 का क्या अर्थ है?
रोमियों 1:22 किस विषय में है?
रोमियों 1:22 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
रोमियों 1:22 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
रोमियों 1:22 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Romans 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
धर्मी जन विश्वास से जीवित रहेगा।" ध्यान दो, पौलुस यह नहीं कहता कि धर्मी जन विश्वास से बचाया जाएगा, बल्कि जीवित रहेगा। यानी हर सुबह, हर बिल दिखने पर, हर जाँच रिपोर्ट पर, यही साँस लेनी है। और परमेश्वर की धार्मिकता "विश्वास से और विश्वास के लिये" प्रकट होती है, एक कदम भरोसे का, फिर अगला। तुम्हारा आज का कदम कौन सा है?
पौलुस यहाँ सिर्फ किसी एक पाप की सूची नहीं बना रहा। पीछे मुड़कर देखो: जड़ यह है कि मनुष्य ने "परमेश्वर की सच्चाई को झूठ से बदल डाला।" जब परमेश्वर हटता है, तो जगह खाली नहीं रहती, वहाँ हमारी अपनी इच्छाएँ बैठ जाती हैं और मालिक बन जाती हैं। इसलिए पूछ: मेरे जीवन में किस छोटी चीज़ को मैंने परमेश्वर की जगह दे दी है?
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