बाइबल व्याख्या

रोमियों 15:20

बाइबल
यह वचन Masagram Elohim Gospel Church and Follow up of the World Mission द्वारा समर्पित है

पाठ

कुरिन्थुस में सर्दियों की एक शाम। पौलुस बोल रहा है, तिर्तियुस लिख रहा है, और अचानक वाक्य की चाल बदल जाती है। अभी-अभी उसने यरूशलेम से इल्लुरिकुम तक की यात्रा गिनाई, और फिर एक निजी स्वीकारोक्ति फिसल पड़ती है: "पर मेरे मन की उमंग यह है, कि जहाँ-जहाँ मसीह का नाम नहीं लिया गया, वहीं सुसमाचार सुनाऊँ; ऐसा न हो, कि दूसरे की नींव पर घर बनाऊँ।" यह रणनीति की घोषणा नहीं, दिल की बेचैनी है। जहाँ मसीह का नाम पहले से गूँज रहा है, वहाँ उसका मन नहीं टिकता। उसे नक्शे का वह किनारा खींचता है जहाँ अभी कोई नाम नहीं पुकारा गया।

मूल बात

ध्यान दीजिए, पौलुस यह नहीं कहता कि वह लोगों तक पहुँचना चाहता है। वह कहता है, जहाँ "मसीह का नाम नहीं लिया गया।" उसके लिए संसार का नक्शा जनसंख्या से नहीं, नाम की उपस्थिति से बँटा है। कहीं यीशु का नाम उच्चारा जा रहा है, कहीं सन्नाटा है, और वह सन्नाटा उसे सोने नहीं देता। यह परमेश्वर के बारे में कुछ कहता है: वे किसी एक जाति या भाषा के भीतर बंद रहकर संतुष्ट नहीं हैं। उनकी महिमा तब तक अधूरी लगती है जब तक कोई कोना बचा है जहाँ उनके पुत्र का नाम अनसुना है। और यह मनुष्य के बारे में भी कुछ कहता है: सेवा का सबसे शुद्ध रूप वह है जिसमें आपको श्रेय की गिनती में कोई रुचि न रहे, केवल यह चिंता रहे कि नाम पहुँचे।

सूत्र

"दूसरे की नींव पर घर बनाऊँ" वाली बात को हल्के में मत लीजिए। नींव का ठेकेदार कोई और है। पौलुस स्वयं को केवल राजमिस्त्री मानता है जो बुनियाद डालता है, और वह बुनियाद भी उसकी अपनी नहीं, मसीह की है। यही वह धागा है जो पूरी बाइबल से होकर गुजरता है: परमेश्वर एक ऐसा घर बना रहे हैं जिसमें हर जाति के लोग बसें। इसी अध्याय में पौलुस यशायाह को उद्धृत कर चुका है, "यिशै की एक जड़ प्रगट होगी, और अन्यजातियों का अधिपति होने के लिये एक उठेगा, उस पर अन्यजातियाँ आशा रखेंगी।" पौलुस की यात्राएँ उस पुराने वचन के पैर हैं। वह नई बात नहीं कर रहा, वह एक प्राचीन वादे को भूगोल में उतार रहा है।

दर्पण

हममें से अधिकांश उल्टी दिशा में चलते हैं। हम वहीं सेवा करना चाहते हैं जहाँ पहले से व्यवस्था है, जहाँ श्रेय दिखता है, जहाँ लोग तालियाँ बजाना जानते हैं। दूसरे की डाली हुई नींव पर अपनी दीवार खड़ी करके हम "मेरी सेवकाई" कह देते हैं। आपके दफ्तर में, आपके परिवार में, आपकी कलीसिया में कोई न कोई ऐसा है जिसके पास अब तक कोई नहीं गया, क्योंकि वहाँ जाने में कोई चमक नहीं है। पौलुस की उमंग हमारी सुविधा पर सवाल उठाती है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम व्यस्त बहुत हैं, पर वहीं-वहीं व्यस्त हैं जहाँ काम पहले से हो चुका है?

आज ही एक नाम लिखिए: वह व्यक्ति जिसके जीवन में, जहाँ तक आप जानते हैं, मसीह का नाम कभी गंभीरता से नहीं पहुँचा। नाम कागज पर लिखिए और उसके लिए दो मिनट प्रार्थना कीजिए।

संदर्भ

यह पत्र लगभग सन् 57 में लिखा गया। पौलुस पूर्वी भूमध्यसागर का चक्कर पूरा कर चुका है और अब उसकी नज़र इसपानिया पर है, साम्राज्य का पश्चिमी छोर, दुनिया का किनारा। पर वहाँ जाने के लिए उसे एक ऐसी कलीसिया चाहिए जो उसे भेजे, और रोम की कलीसिया उसने स्थापित नहीं की थी। यह अजीब स्थिति है: वह उन लोगों को लंबा पत्र लिख रहा है जिनसे कभी मिला नहीं, यह जानते हुए कि उनमें यहूदी और अन्यजाति विश्वासियों के बीच तनाव है। उस समय संरक्षण और समर्थन का पूरा तंत्र सम्मान पर टिका था, और पौलुस को अपनी साख साबित करनी थी बिना यह दिखाए कि वह रोम की कलीसिया पर दावा ठोक रहा है। पद 20 उसका शिष्टाचार भी है और उसका जुनून भी।

अंतर्पाठ

अगला ही पद पौलुस के मन की जड़ खोल देता है: "जिन्हें उसका सुसमाचार नहीं पहुँचा, वे ही देखेंगे और जिन्होंने नहीं सुना वे ही समझेंगे।" यह यशायाह 52 से है, उस गीत से जो पीड़ित सेवक के बारे में है। पौलुस अपनी यात्रा-योजना को भविष्यद्वाणी की पूर्ति के रूप में पढ़ता है, न कि अपनी महत्वाकांक्षा के रूप में। दूसरा प्रतिध्वनि इसी अध्याय के आरंभ से आती है, जहाँ वह लिखता है कि "मसीह ने अपने आपको प्रसन्न नहीं किया।" जो व्यक्ति अनजाने सुदूर शहरों की ओर खिंचता है, वह उसी स्वामी के पीछे चल रहा है जो स्वर्ग में अपनी सुविधा में नहीं रुका।

बारीकी

"मेरे मन की उमंग" के पीछे जो यूनानी शब्द है, वह है फ़िलोतिमेओमाई, जिसका शाब्दिक अर्थ है "सम्मान से प्रेम करना", यानी महत्वाकांक्षी होना। यह वही शब्द है जिससे रोमी कुलीन अपनी राजनीतिक दौड़ का वर्णन करते थे: और ऊँचा पद, और बड़ा नाम। पौलुस इस शब्द को उठाकर उल्टा कर देता है। उसकी महत्वाकांक्षा यह है कि वह वहाँ जाए जहाँ कोई देखेगा नहीं, जहाँ नींव डालने का कठिन, अनदेखा, अक्सर खतरनाक काम होगा। महत्वाकांक्षा मरी नहीं; वह धर्मान्तरित हुई। और शायद यही सबसे कठिन बात है: परमेश्वर हमारी ऊर्जा नहीं छीनते, वे उसका मुँह मोड़ देते हैं।

आपकी महत्वाकांक्षा इस समय किस दिशा में मुँह किए खड़ी है, और क्या वह दिशा बदली जा सकती है?

आपके जीवन के किस कोने में मसीह का नाम अब तक अनकहा है, और आप ही क्यों न वहाँ पहली नींव डालें?

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The Message of Romans

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A modern classic on the letter that has changed history more than once.

Romans: An Introduction and Commentary

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Romans 15:20 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

रोमियों 15:20 का क्या अर्थ है?
कुरिन्थुस में सर्दियों की एक शाम। पौलुस बोल रहा है, तिर्तियुस लिख रहा है, और अचानक वाक्य की चाल बदल जाती है। अभी-अभी उसने यरूशलेम से इल्लुरिकुम तक की यात्रा गिनाई, और फिर एक निजी स्वीकारोक्ति फिसल पड़ती है: "पर मेरे मन की उमंग यह है, कि जहाँ-जहाँ मसीह का नाम नहीं लिया गया, वहीं सुसमाचार सुनाऊँ; ऐसा न हो, कि दूसरे की नींव पर घर बनाऊँ।" यह रणनीति की घोषणा नहीं, दिल की बेचैनी है। जहाँ मसीह का नाम पहले से गूँज रहा है, वहाँ उसका मन नहीं टिकता। उसे नक्शे का वह किनारा खींचता है जहाँ अभी कोई नाम नहीं पुकारा गया।
रोमियों 15:20 किस विषय में है?
"दूसरे की नींव पर घर बनाऊँ" वाली बात को हल्के में मत लीजिए। नींव का ठेकेदार कोई और है। पौलुस स्वयं को केवल राजमिस्त्री मानता है जो बुनियाद डालता है, और वह बुनियाद भी उसकी अपनी नहीं, मसीह की है। यही वह धागा है जो पूरी बाइबल से होकर गुजरता है: परमेश्वर एक ऐसा घर बना रहे हैं जिसमें हर जाति के लोग बसें। इसी अध्याय में पौलुस यशायाह को उद्धृत कर चुका है, "यिशै की एक जड़ प्रगट होगी, और अन्यजातियों का अधिपति होने के लिये एक उठेगा, उस पर अन्यजातियाँ आशा रखेंगी।" पौलुस की यात्राएँ उस पुराने वचन के पैर हैं। वह नई बात नहीं कर रहा, वह एक प्राचीन वादे को भूगोल में उतार रहा है।
रोमियों 15:20 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज ही एक नाम लिखिए: वह व्यक्ति जिसके जीवन में, जहाँ तक आप जानते हैं, मसीह का नाम कभी गंभीरता से नहीं पहुँचा। नाम कागज पर लिखिए और उसके लिए दो मिनट प्रार्थना कीजिए।
रोमियों 15:20 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
अगला ही पद पौलुस के मन की जड़ खोल देता है: "जिन्हें उसका सुसमाचार नहीं पहुँचा, वे ही देखेंगे और जिन्होंने नहीं सुना वे ही समझेंगे।" यह यशायाह 52 से है, उस गीत से जो पीड़ित सेवक के बारे में है। पौलुस अपनी यात्रा-योजना को भविष्यद्वाणी की पूर्ति के रूप में पढ़ता है, न कि अपनी महत्वाकांक्षा के रूप में। दूसरा प्रतिध्वनि इसी अध्याय के आरंभ से आती है, जहाँ वह लिखता है कि "मसीह ने अपने आपको प्रसन्न नहीं किया।" जो व्यक्ति अनजाने सुदूर शहरों की ओर खिंचता है, वह उसी स्वामी के पीछे चल रहा है जो स्वर्ग में अपनी सुविधा में नहीं रुका।
रोमियों 15:20 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपकी महत्वाकांक्षा इस समय किस दिशा में मुँह किए खड़ी है, और क्या वह दिशा बदली जा सकती है?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Romans 15 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 6

धन्यवाद, पिता, कि आपने हमें अकेला नहीं छोड़ा, बल्कि एक कलीसिया दी, जहाँ हम "एक मन और एक स्वर होकर" आपकी महिमा करते हैं। हमारे अलग अलग स्वभाव और भाषाओं के बीच भी आप हमें मसीह में जोड़ते हैं, यह आपकी अनुग्रह भरी देन है।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 31

पिता, धन्यवाद कि आप अपने सेवकों को अविश्वासियों के हाथों से बचाते हैं, जैसे पौलुस के लिए प्रार्थना की गई थी। धन्यवाद कि हमारी सेवा आपके सामने व्यर्थ नहीं, और जो हम भाई बहनों के लिए करते हैं, वह उनके लिए ग्रहणयोग्य बनता है। प्रार्थना में एक दूसरे का बोझ उठाने की कृपा देने के लिए भी धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 30

पिता, तेरे प्रेम ने हमें एक दूसरे से जोड़ा है। मुझे याद दिला कि मेरी प्रार्थना किसी और के संघर्ष में साथ खड़े होने का तरीका है। जो थके हुए हैं, जो अकेले लड़ रहे हैं, उन्हें उठा ले, और मुझे उनके लिए घुटनों पर बने रहना सिखा।

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