जकर्याह 7
पाठ
बेतेल के लोगों ने याजकों और भविष्यद्वक्ताओं के पास एक प्रश्न भेजा: क्या हमें पाँचवें महीने में उपवास और विलाप करते रहना चाहिए, जैसा वर्षों से करते आए हैं? परमेश्वर का उत्तर आता है, पर वह उत्तर सीधे प्रश्न का जवाब नहीं देता, बल्कि प्रश्न के पीछे के हृदय को उघाड़ देता है। परमेश्वर पूछते हैं: क्या तुम सचमुच मेरे लिए उपवास करते थे? और फिर वे पुरानी बात दोहराते हैं जो पहले भविष्यद्वक्ताओं ने कही थी, और जिसे न मानने के कारण यह देश उजाड़ हुआ।
मर्म
यह अध्याय एक ऐसे प्रश्न से खुलता है जो हर धार्मिक जीवन के केंद्र पर वार करता है: क्या हमारी भक्ति सचमुच परमेश्वर के लिए है, या हमारे अपने आराम, अपनी पहचान, अपनी अंतरात्मा को शांत करने के लिए है? सत्तर साल से लोग उपवास कर रहे थे, मंदिर के विनाश का शोक मनाते हुए। पर परमेश्वर पूछते हैं, "क्या तुम सचमुच मेरे ही लिये उपवास करते थे?" यह प्रश्न कठोर है। यह बताता है कि धार्मिक अनुशासन अपने आप में परमेश्वर तक नहीं पहुँचाता। उपवास और भोजन, दोनों "अपने ही लिये" हो सकते हैं। परमेश्वर बाहरी अनुष्ठान के भीतर छिपे स्वार्थ को देखते हैं, और वहीं से बात शुरू करते हैं।
सामान्य सूत्र
यहाँ एक गहरा सूत्र है जो पूरे बाइबल में चलता है: परमेश्वर बलिदान से अधिक दया चाहते हैं। मीका, आमोस, यशायाह, सब यही कहते आए। और यीशु मसीह जब फरीसियों से कहते हैं कि उन्होंने "व्यवस्था की गम्भीर बातों, अर्थात् न्याय, दया और विश्वास को छोड़ दिया है," तो वे ठीक जकर्याह की परंपरा में बोल रहे हैं। परमेश्वर की वाचा कभी केवल कर्मकांड की वाचा नहीं थी। वह हमेशा हृदय की वाचा थी, जो न्याय, कृपा और दया में प्रकट होती है। मसीह में यह वाचा पूरी होती है, क्योंकि वे स्वयं वह न्यायी हैं जिन्होंने विधवा, अनाथ, परदेशी और दीन को अपने राज्य के केंद्र में रखा।
दर्पण
यह पाठ हमें एक असहज दर्पण देता है। हम भी पूछते हैं: क्या मुझे यह उपवास रखना चाहिए, वह प्रार्थना पढ़नी चाहिए, इस सेवा में जाना चाहिए? और परमेश्वर उत्तर देते हैं: पहले बताओ, तुम्हारे पड़ोस में वह अकेली माँ कैसी है जिसका पति छोड़ गया? तुम्हारे दफ्तर में वह प्रवासी सहकर्मी जिसे सब हल्के में लेते हैं, उसके बारे में तुम्हारे मन में क्या है? क्या तुम अपने भाई के विरुद्ध मन में योजना बना रहे हो, यह सोचकर कि वह तुम्हें दिखेगा नहीं? रविवार की भक्ति और सोमवार का व्यवहार, दोनों एक ही परमेश्वर के सामने खड़े हैं। यहाँ बहाने की जगह नहीं है।
मुख्य पात्र
इस अध्याय में परमेश्वर स्वयं मुख्य पात्र हैं, और उनका चित्र चौंकाने वाला है। वे एक धार्मिक प्रश्न पर एक नैतिक उत्तर देते हैं। वे उपवास की तिथियों में उलझने से इनकार करते हैं और सीधे हृदय पर पहुँचते हैं। वे भावुक हैं: "उन पर बड़ा क्रोध भड़का।" पर उनका क्रोध मनमाना नहीं है, वह पत्थर हुए हृदयों की प्रतिक्रिया है, जिन्होंने विधवा और अनाथ को कुचला और फिर मंदिर में आकर उपवास किया। यह वही परमेश्वर हैं जो पुकारते हैं और सुनना चाहते हैं, पर जब मनुष्य कान बंद कर लेता है, तब एक भयानक न्याय आता है: "उनके पुकारने पर मैं भी न सुनूँगा।" यह उदासीनता नहीं, यह न्याय की गंभीरता है।
अंतर्पाठ
यशायाह 58 इस अध्याय का जुड़वाँ भाई है। वहाँ भी लोग पूछते हैं कि हम उपवास करते हैं पर परमेश्वर ध्यान क्यों नहीं देते, और उत्तर आता है: वह उपवास जो मुझे भाता है, वह है भूखों को रोटी देना, नंगों को कपड़ा पहनाना, अन्याय के बंधन तोड़ना। और याकूब का पत्र इसी धारा में बहता है जब वह कहता है कि शुद्ध भक्ति यह है कि अनाथों और विधवाओं की सुधि ली जाए। जकर्याह 7 अकेला नहीं खड़ा है। यह उस स्वर का हिस्सा है जो पूरे बाइबल में गूँजता है: परमेश्वर की उपासना और पड़ोसी की सेवा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
प्रश्न
पर एक कठिन प्रश्न बचा रहता है। परमेश्वर कहते हैं, "उनके पुकारने पर मैं भी न सुनूँगा।" क्या परमेश्वर सचमुच किसी की पुकार अनसुनी कर सकते हैं? यह उस परमेश्वर की छवि से कैसे मेल खाता है जो सदा सुनने वाले हैं? यहाँ सरल उत्तर नहीं है। पाठ हमें बताता है कि लगातार, जिद्दी, हृदय को पत्थर बनाने वाला इनकार, एक ऐसी स्थिति पैदा करता है जहाँ पुकार अब पुकार नहीं रह जाती, वह केवल परिणामों से बचने की चीख बन जाती है। परमेश्वर इसका उत्तर तुरंत नहीं देते। पर जकर्याह की पुस्तक यहीं नहीं रुकती, आगे के अध्यायों में वही परमेश्वर पुनःस्थापन का वचन देते हैं। मौन अंतिम शब्द नहीं है, पर वह वास्तविक है।
चिंतन
मेरी कौन सी धार्मिक आदतें असल में "अपने ही लिये" हैं, न कि परमेश्वर के लिए, और मैं यह कैसे पहचानूँ?
*मेरे जीवन में वह विधवा, अनाथ,
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Zechariah 7 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
जकर्याह 7 का क्या अर्थ है?
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जकर्याह 7 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Zechariah 7 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
वे लोग बेतेल से आए थे, एक धार्मिक सवाल लेकर: क्या हम उपवास करते रहें? उन्होंने याजकों से पूछा, पर उत्तर याजकों से नहीं आया। "तब सेनाओं के यहोवा का यह वचन मेरे पास पहुँचा:" परमेश्वर स्वयं बीच में आ गए, और उनका जवाब नियम के बारे में नहीं, मन के बारे में था। सत्तर साल से वे उपवास रख रहे थे, पर किसके लिए? कभी सोचा कि तुम्हारी लंबी आदतें असल में किसके लिए हैं?
पिता, धन्यवाद कि आपने हमें अनिश्चितता में नहीं छोड़ा, बल्कि साफ कहा कि "सच्चाई से न्याय करो, और हर एक अपने भाई के साथ कृपा और दया से व्यवहार करे।" धन्यवाद कि आपकी नज़र में कमज़ोर और भूला हुआ इंसान भी अनमोल है, और आप हमें ऐसे ही दिल देना चाहते हैं।
हे प्रभु, धन्यवाद कि आपने विधवा, अनाथ, परदेशी और दीन पर अन्धेर न करने की शिक्षा दी। धन्यवाद कि आप कमज़ोरों की सुध लेते हैं, और हमें भी सिखाते हैं कि मन में एक दूसरे की बुराई की कल्पना न करें, पर करुणा से भरा हृदय रखें।
ज़करयाह के समय लोग सत्तर साल से उपवास कर रहे थे, पाँचवें और सातवें महीने में। पर परमेश्वर उनसे एक चुभता हुआ सवाल पूछते हैं, "जब तुम खाते और पीते हो, तो क्या तुम अपने ही लिये नहीं खाते, और अपने ही लिये नहीं पीते?"
सोचिए, उपवास भी अपने लिए हो सकता है? हाँ। जब मैं रोता हूँ अपने दुख पर, अपने खोए हुए मंदिर पर, अपनी तकलीफ़ों पर, और भूल जाता हूँ कि परमेश्वर मुझसे क्या चाहते हैं, तब मेरी भक्ति भी बस मेरे इर्दगिर्द घूमने लगती है। आज खुद से पूछिए: मेरी प्रार्थना किसके लिए है?
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