सपन्याह 2:7
पाठ
शाम ढल रही है, और भेड़ें अश्कलोन की गलियों से होकर लौट रही हैं। जो नगर कभी यहूदा के लिए डर और अपमान का नाम था, उसके सूने आँगनों में अब चरवाहे अपनी चादर बिछा रहे हैं। यही इस एक वचन का दृश्य है: "वही समुद्र तट यहूदा के घराने के बचे हुओं को मिलेगा, वे उस पर चराएँगे; वे अश्कलोन के छोड़े हुए घरों में साँझ को लेटेंगे।" पलिश्तियों की उपजाऊ तटीय पट्टी, जिस पर यहूदा ने कभी अधिकार नहीं जमाया, अब उन थोड़े-से बचे हुओं की चरागाह बन जाएगी। और इसका कारण कोई सैन्य विजय नहीं है, बल्कि यह: "उनका परमेश्वर यहोवा उनकी सुधि लेकर उनकी समृद्धि को लौटा लाएगा।" न्याय का तूफ़ान जिन घरों को खाली कर गया, वहाँ परमेश्वर अपने लोगों को लेटा देते हैं।
मर्म
ध्यान दीजिए कि यह वचन किसे मिलता है। पूरी जाति को नहीं, विजयी सेना को नहीं, बल्कि "बचे हुओं" को। सपन्याह का पूरा संदेश क्रोध के दिन के इर्द-गिर्द घूमता है, और तीसरे पद में सबसे सतर्क शब्द खड़ा है: "सम्भव है तुम यहोवा के क्रोध के दिन में शरण पाओ।" वहाँ कोई गारंटी नहीं दी जाती, केवल नम्रता से ढूँढ़ने का बुलावा। पर सातवें पद में वही अनिश्चितता वादे में बदल जाती है, और बदलाव का बिंदु मनुष्य की योग्यता नहीं, परमेश्वर की "सुधि" है। इब्रानी में जो शब्द है, पाक़द, उसका अर्थ है किसी की खोज-खबर लेना, उसकी ओर मुड़कर देखना। परमेश्वर वही हैं जो न्याय में हाथ बढ़ाते हैं और वही जो शेष रह गए लोगों को याद करते हैं। कृपा यहाँ न्याय का विरोध नहीं, उसका दूसरा किनारा है।
सूत्र
यह चरागाह वाला दृश्य अकेला नहीं खड़ा है। परमेश्वर के काम करने का ढंग बार-बार यही रहा है: पहले खाली करना, फिर भरना; पहले न्याय, फिर बसाना। मिस्र से निकाले गए लोग भी किसी और के बनाए नगरों में बसे थे। यहाँ भी बचे हुए लोग वे घर पाते हैं जो उन्होंने नहीं बनाए, वे खेत जो उन्होंने नहीं जोते। और यही आगे चलकर मसीह में अपने चरम पर पहुँचता है: वे स्वयं उस न्याय के भीतर से गुज़रते हैं जो हमारा था, ताकि हमें वह विश्रान्ति मिले जो हमारी नहीं थी। सपन्याह के "साँझ को लेटेंगे" में वह चरवाहा-छवि पहले से झलक रही है जिसे यीशु अपने ऊपर लेते हैं। बचे हुए लोगों को भूमि इसलिए नहीं मिलती कि वे बलवान निकले, बल्कि इसलिए कि परमेश्वर ने उनकी सुधि ली।
दर्पण
आपके जीवन में भी शायद कोई अश्कलोन है। कोई ऐसी जगह जहाँ आपको पीछे धकेला गया, कोई दफ़्तर जहाँ आपकी ईमानदारी को कमज़ोरी समझा गया, कोई रिश्ता जिसमें आप हमेशा छोटे पड़े। यह वचन सस्ता आश्वासन नहीं देता कि सब ठीक हो जाएगा। यह कुछ और कहता है, और वह ज़्यादा कठोर भी है और ज़्यादा गहरा भी: वह भूमि आपको जीतनी नहीं है, वह आपको दी जाएगी, और वह भी तब जब आप "बचे हुओं" में से हों, यानी उन लोगों में जिन्होंने अपनी ताक़त पर भरोसा करना छोड़ दिया। ध्यान दीजिए, यहाँ बदला लेने की कोई भाषा नहीं है। यहूदा के लोग तलवार लेकर नहीं, भेड़ों के साथ आते हैं। बदले की कल्पनाएँ छोड़ना उतना ही ज़रूरी है जितना अपमान को माफ़ करना।
श्रोता
सपन्याह के सुननेवाले योशिय्याह के यरूशलेम में रहते थे, एक ऐसे साम्राज्य की छाया में जो अभी टूटा नहीं था। पलिश्तियों के वे पाँच नगर उनके लिए इतिहास की किताब का पन्ना नहीं थे। शिमशोन वहीं अंधा किया गया था, वाचा का सन्दूक वहीं ले जाया गया था, दाऊद वहीं शरण खोजते-खोजते पागल बनने का नाटक कर बैठा था। समुद्र तट की वह उपजाऊ पट्टी, जिससे होकर व्यापार के काफ़िले और सेनाएँ गुज़रती थीं, यहूदा के लिए हमेशा दूसरे की चीज़ रही। तो जब भविष्यद्वक्ता कहते हैं कि तुम अश्कलोन के घरों में साँझ को लेटोगे, तो यह किसी दूर के स्वर्ग का चित्र नहीं था। यह उस ज़मीन का नाम था जिसे वे बचपन से डर के साथ जोड़ते आए थे।
अंतर्पाठ
सपन्याह जिन चार नगरों को गिनाते हैं, वे लगभग वही हैं जिन्हें 1 शमूएल में हम सन्दूक के साथ पाते हैं। वहाँ पलिश्ती अपने देवता दागोन के सामने इस्राएल के परमेश्वर को खड़ा करते हैं और दागोन गिर पड़ता है। यहाँ सपन्याह उसी बात को इतिहास के पैमाने पर दोहराते हैं, जब वे कहते हैं कि यहोवा "पृथ्वी भर के देवताओं को भूखा मार डालेगा।" दूसरी गूँज और भी सीधी है: तीसरे पद के "नम्र लोगों" को जब यीशु पहाड़ी उपदेश में धन्य कहते हैं और उनसे पृथ्वी के अधिकारी होने का वादा करते हैं, तो वे ठीक यही तर्क उठा रहे हैं। नम्र लोग भूमि पाते हैं, हड़पने से नहीं, बल्कि इसलिए कि भूमि देनेवाला उनकी सुधि लेता है।
मुख्य पात्र
इस पद में सचमुच जो पात्र चलता-फिरता है, वह परमेश्वर है। पहले वे हाथ बढ़ाते हैं और गाज़ा सूना हो जाता है; फिर वही हाथ थके हुए बचे हुओं के लिए बिस्तर बिछाता है। हमारा मन इन दोनों को अलग-अलग परमेश्वर मान लेना चाहता है, एक क्रोधी और एक कोमल। पर सपन्याह हमें यह सुविधा नहीं देते। जो घमंड को सह नहीं सकते, वही टूटे हुओं को नहीं भूलते। और उनकी कोमलता भावुक नहीं है, वह ठोस है: चरागाह, घर, शाम की नींद, लौटी हुई समृद्धि। यह वही परमेश्वर हैं जिनके बारे में सपन्याह आगे कहेंगे कि वे उद्धार करनेवाले वीर हैं। न्याय और करुणा उनके चरित्र में दो मूड नहीं, एक ही निष्ठा के दो चेहरे हैं।
चिंतन
आपकी ज़िंदगी में वह कौन-सी "अश्कलोन" है जिसे आप अपने बल पर जीतना चाहते हैं, और उसे परमेश्वर के हाथ में लौटाने का क्या अर्थ होगा?
"सम्भव है तुम शरण पाओ" और "वे साँझ को लेटेंगे" के बीच जो दूरी है, उसे आप अपने विश्वास में कैसे जीते हैं, अनिश्चितता में भी नम्रता से ढूँढ़ते हुए?
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सपन्याह 2:7 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Zephaniah 2 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, तेरी चेतावनी के शब्द भारी हैं, पर मैं जानता हूँ कि वे प्रेम से निकले हैं। जिन दीवारों और सुरक्षाओं पर मैं भरोसा करता हूँ, वे तेरे बिना कुछ भी नहीं। मेरा मन कठोर न हो जाए, बल्कि समय रहते तेरी ओर लौट आए। तू ही मेरा असली ठिकाना है।
पिता, धन्यवाद कि आपने नीनवे के उजड़े खण्डहरों में हमें आईना दिखाया। "मैं ही हूँ, और मुझे छोड़ कोई है ही नहीं," यह घमंड हमारे मन में भी छिपा रहता है, और आप उसे प्रेम से तोड़ देते हैं। धन्यवाद कि हमारी सुरक्षा हमारी दीवारों में नहीं, आपके हाथों में है।
हे प्रभु, जो कल भव्य था, आज उसकी खिड़कियों में पंछी बसेरा करते हैं। मुझे याद दिला कि मैं जिन चीज़ों पर भरोसा रखता हूँ, वे कितनी जल्दी ढह जाती हैं। मेरा मन घमंड से नहीं, तेरी स्थिर उपस्थिति से भरा रहे। जो टिकता है, वही मुझे बनाना सिखा।
यह उनके अहंकार के कारण उन पर पड़ेगा, क्योंकि उन्होंने सेनाओं के यहोवा की प्रजा की निन्दा की।" मोआब और अम्मोन ने परमेश्वर पर नहीं, उसके लोगों पर ताने मारे थे। पर परमेश्वर ने उसे अपने ऊपर लिया। सोचो, जब कोई तुम्हें नीचा दिखाता है, तब भी तुम अकेले नहीं खड़े होते। और यह भी सोचो: तुम्हारी हँसी किसके ऊपर है?
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