स्थिर रहो · रविवार, सितम्बर 13, 2026

छोटों पर परमेश्वर की कृपा

तुच्छता में कृपा

आज 2 मिनट का पठन 4 बाइबिल के अंश

शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए मत्ती 26:15, मरकुस 6:4-6, मीका 5:2 and लूका 18:13.

☀ सुबह का पल

“यदि मैं उसे तुम्हारे हाथ पकड़वा दूँ, तो मुझे क्या दोगे?” उन्होंने उसे तीस चाँदी के सिक्के तौलकर दे दिए।

मत्ती 26:15

वाक्य में एक शब्द छिपा है जिसे अक्सर पढ़कर हम आगे बढ़ जाते हैं, 'तौल दिए'। यहूदा को पैसे गिनकर नहीं, तौलकर दिए गए, जैसे कोई अनाज या धातु का सौदा हो रहा हो। यह शब्द बताता है कि याजकों की नज़र में यह किसी व्यक्ति का नहीं, एक वस्तु का लेनदेन था।

पुराने नियम की व्यवस्था में तीस शेकेल चांदी वह रकम थी जो किसी दास की जान के मुआवज़े में दी जाती थी, अगर बैल किसी दास को मार डालता। यह कोई बड़ी रकम नहीं थी, बल्कि सबसे साधारण, सबसे सस्ती मानी जाने वाली कीमत थी, एक दास की कीमत

जब जकर्याह ने भविष्यवाणी में यही रकम सुनी, तो उसमें कड़वा व्यंग्य छिपा था, मानो परमेश्वर के लोग अपने ही चरवाहे को दास से अधिक कुछ न समझें। सदियों बाद वही रकम मंदिर के आंगन में फिर गिनी गई, इस बार यीशु के लिए। जिसे स्वर्ग का राजा कहा जाता है, उसे बाज़ार में दास की कीमत पर तौला गया।

आज रविवार है, वह दिन जब विश्वासी इकट्ठे होकर कहते हैं कि यही यीशु किसी कीमत में बंधा नहीं जा सकता। दुनिया ने उसे तीस टुकड़ों में तौला, पर हम उसे अपनी आराधना, अपने गीत, अपने समय से मूल्य देने आते हैं। बाज़ार का हिसाब उसकी सच्चाई को कभी नहीं नाप सकता।

आज
आज सुबह चर्च जाने से पहले एक सिक्का हाथ में लें, उसे कुछ पल अपनी हथेली में तौलें, फिर ज़ोर से कहें, 'यीशु, तेरा मूल्य किसी तराज़ू से नहीं आंका जा सकता।'

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✦ दोपहर का पल

यीशु ने उनसे कहा, “भविष्यद्वक्ता का अपने देश और अपने कुटुम्ब और अपने घर को छोड़ और कहीं भी निरादर नहीं होता।” और वह वहाँ कोई सामर्थ्य का काम न कर सका, केवल थोड़े बीमारों पर हाथ रखकर उन्हें चंगा किया। और उसने उनके अविश्वास पर आश्चर्य किया और चारों ओर से गाँवों में उपदेश करता फिरा।

मरकुस 6:4-6

नासरत की उस बढ़ई की दुकान में लकड़ी की छीलन और चूरे की गंध बसी रहती थी, जहाँ यूसुफ का बेटा बड़ा हुआ था। पहाड़ी पर बसा यह छोटा-सा गाँव था, जहाँ हर कोई एक-दूसरे को जन्म से जानता था, हर चेहरा परिचित, हर कहानी सुनी-सुनाई।

जब यीशु वापस अपने ही गाँव में आए और आराधनालय में सिखाने लगे, तो लोग चौंक गए, पर आश्चर्य से नहीं, ठिठुरन से। क्या यह वही बढ़ई नहीं जिसे हमने बड़ा होते देखा है। उनकी आँखों में परिचय था, विश्वास नहीं।

यही वह जगह है जहाँ यीशु बड़ा काम नहीं कर सके, ऐसा नहीं कि उनके पास सामर्थ्य कम थी, बल्कि नासरत के लोगों ने अपने भीतर उनके लिए कोई जगह ही नहीं छोड़ी थी। जिसे हम भली-भाँति जानने का दावा करते हैं, उसके लिए अक्सर हम सबसे कम जगह छोड़ देते हैं। पड़ोसी और घरवाले कई बार सबसे कठोर आलोचक बन जाते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है वे पहले से सब जान चुके हैं।

आज जब हम आराधना के लिए इकट्ठा होते हैं, वही खतरा हमारे भीतर भी छिपा हो सकता है। हम इतनी बार यही भजन गा चुके हैं, यही चेहरे देख चुके हैं, कि परमेश्वर के लिए नई जगह बनाना भूल जाते हैं। परिचय आसानी से आश्चर्य को चुरा लेता है।

आज
आज आराधना सभा में किसी ऐसे भाई या बहन के पास जाइए जिसे आप वर्षों से जानते हैं, और उससे ऐसे मिलिए जैसे पहली बार मिल रहे हों, ध्यान से उसकी आँखों में देखकर दिल से पूछिए, तुम्हारा हाल असल में कैसा है।

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◐ दोपहर का पल

हे बैतलहम एप्राता, यदि तू ऐसा छोटा है कि यहूदा के हजारों में गिना नहीं जाता, तो भी तुझ में से मेरे लिये एक पुरुष निकलेगा, जो इस्राएलियों में प्रभुता करनेवाला होगा; और उसका निकलना प्राचीनकाल से, वरन् अनादिकाल से होता आया है। (मत्ती 2:6, यूह. 7:42)

मीका 5:2

भूसी हवा में तिरती है, खलिहान की धूल गेहूँ की महक के साथ मिलती है। बेतलहम की तंग गलियों में भेड़ों की गंध, पत्थर की छोटी दीवारें, चरवाहों की आवाज़ें इतनी दूर तक भी नहीं सुनाई देतीं, यह नगर उतना ही छोटा है। यहूदा के बड़े कुलों की सूची में इसका नाम कभी ऊँचा नहीं गिना गया।

फिर भी भविष्यवक्ता मीका इसी छोटे नाम को उठाकर कहता है कि यहीं से वह आएगा जो इस्राएल पर शासक होगा। बेतलहम, जिसका अर्थ है रोटी का घर, यहूदा के कुलों में छोटा गिना जाता था, फिर भी परमेश्वर की योजना ठीक इसी भुला दिए गए कोने से निकली। रूत यहीं गेहूँ बीनती थी, दाऊद यहीं भेड़ें चराता था, और सदियों बाद वही गलियाँ मरियम और यूसुफ के पैरों की धूल से भर गईं।

यह बात चुभती है। हम बड़े नामों, बड़े मंचों, बड़ी भीड़ में परमेश्वर के काम को ढूँढ़ते हैं। पर मीका कहता है कि इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ एक ऐसे गाँव की गलियों में तैयार हुआ जिसे कोई गिनता भी नहीं था। शायद तुम्हारा जीवन भी छोटा, अनदेखा, किसी सूची से बाहर लगता हो।

आज प्रभु का दिन है, कलीसिया छोटी हो या बड़ी, यह सवाल वहीं खड़ा है, क्या हम मानते हैं कि परमेश्वर छोटी जगहों से भी बड़ा काम रचता है।

आज
आज किसी छोटे, भुला दिए गए स्थान का नाम कागज़ पर लिखो, फिर अपने मन में उस जगह को याद करो जहाँ तुम्हें लगता है कुछ नहीं हो रहा, और वहाँ के लिए एक छोटी प्रार्थना ज़ोर से कहो।

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☾ संध्या का क्षण

“परन्तु चुंगी लेनेवाले ने दूर खड़े होकर, स्वर्ग की ओर आँख उठाना भी न चाहा, वरन् अपनीछाती पीट-पीट करकहा, ‘हे परमेश्वर मुझ पापी पर दया कर!’(भज. 51:1)

लूका 18:13

यरूशलेम के मंदिर में प्रार्थना के लिए दो तरह की जगहें थीं, भीतरी आंगन के पास जहां सम्मानित लोग खड़े होते थे, और पीछे के छोर पर, दरवाज़े के करीब, जहां कोई ध्यान न दे। वह चुंगी लेनेवाला वहीं रुक गया, पीछे, दूर, और अपनी छाती पर मुट्ठी से वार करता रहा। उस समय यह गहरे शोक और पछतावे का शारीरिक चिन्ह था।

वह जानता था कि लोग उसे किस निगाह से देखते हैं। चुंगी लेनेवाले रोमी सरकार के लिए कर वसूलते थे, अक्सर अपने ही लोगों से अधिक ऐंठकर, इसलिए वे धोखेबाज़ और गद्दार गिने जाते थे। उसे मंदिर के भीतरी आंगन तक जाने का मन ही नहीं हुआ, आंखें आसमान की ओर उठाने की भी हिम्मत नहीं हुई। उसने बस इतने शब्द कहे, जो आज भी सुने जा सकते हैं।

उसकी प्रार्थना में कोई सफाई नहीं थी, कोई तर्क नहीं, कोई अच्छे कामों की सूची नहीं। कुछ ही शब्द, और सारी बात कह दी गई।

आज रविवार है, आराधना का दिन, वह दिन जब लोग साथ इकट्ठे होकर परमेश्वर के सामने खड़े होते हैं। पर हर किसी को अगली पंक्ति में खड़े होने जैसा भरोसा महसूस नहीं होता। कोई पीछे बैठा हो, सिर झुकाए, दिल में कुछ भारी लिए, तो यही प्रार्थना उसके लिए भी खुली है।

यीशु ने कहा कि यही मनुष्य धर्मी ठहरकर अपने घर गया, न कि वह जो आगे खड़ा था। यह प्रार्थना काम की सूची नहीं मांगती, बस सच्चाई मांगती है।

आज
आज रात, अकेले में, अपनी छाती पर हल्के से हाथ रखकर ये शब्द ज़ोर से बोल, हे परमेश्वर, मुझ पापी पर दया कर।

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