आज्ञाकारिता से मिलती भरपूर आशीष
आज्ञाकारिता और आशीष
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए 1 राजा 17:14, 2 राजा 4:2, यूहन्ना 13:14 and यूहन्ना 9:7.
☀ सुबह का पल
For Yahweh, the God of Israel says, 'The jar of meal shall not empty, neither shall the jar of oil fail, until the day that Yahweh sends rain on the earth.'
1 राजा 17:14
अगर आज रात के खाने के बाद घर में कुछ भी न बचे, तो कल सुबह तुम सबसे पहले क्या सोचोगे?
सारेप्तात की वह विधवा सिदोन के पास रहती थी, इस्राएल के बाहर, एक ऐसी स्त्री जिसका इस्राएल के परमेश्वर से कोई सीधा नाता नहीं था। अकाल के दिनों में वह लकड़ी के दो टुकड़े बीन रही थी, ताकि आखिरी बार अपने और अपने बेटे के लिए रोटी बना सके, और फिर मरने के लिए तैयार हो जाए। यह उसकी आखिरी रसोई थी।
तभी एलिय्याह ने उससे कुछ माँगा जो असंभव लगता था, पहले उसके लिए एक रोटी बना दे, फिर अपने लिए। यही उसका खर्चा था, अपने बेटे से पहले एक अजनबी को खिलाना। डर के बावजूद उसने वैसा ही किया, और आटे का घड़ा खाली नहीं हुआ।
यहाँ ध्यान देने की बात है, घड़ा भरा हुआ नहीं रहा, बस हर दिन उतना ही निकलता रहा जितना उस दिन के लिए काफी था। परमेश्वर ने भंडार नहीं भरा, उसने हर सुबह नया दिया।
शनिवार की सुबह जब घर में परिवार जुटता है, आराम के साथ थोड़ी चिंता भी रहती है कि हफ्ते भर की कमी कैसे पूरी होगी। यह कहानी वादा नहीं करती कि सब कुछ भरपूर होगा, पर यह दिखाती है कि थोड़े में भी बांटने की जगह बचती है।
आज
आज सुबह रसोई में जो भी थोड़ा बचा है उसमें से एक हिस्सा निकालो और किसी पड़ोसी या दोस्त को भेज दो, या फोन करके पूछो कि उसे किस चीज़ की ज़रूरत है।
✦ दोपहर का पल
एलीशा ने उससे कहा, "मैं तेरे लिये क्या करूं? मुझे बता, तेरे घर में क्या है?" उसने कहा, "तेरी दासी के घर में तेल की एक कुप्पी को छोड़ और कुछ नहीं है।"
2 राजा 4:2
रसोई से हल्की भाप उठ रही है, कोई बर्तन धीरे से खनक रहा है, घर में आज कोई हड़बड़ी नहीं है। शनिवार की दोपहर है, मेज़ पर वही रोज़ का भोजन है, फिर भी कुछ ठहरा हुआ सा।
हर घर में एक तेल की कुप्पी होती थी, रोज़ के खाने के लिए, दीये में डालने के लिए, कभी किसी मेहमान के पैर पर मलने के लिए भी। छोटी सी, मामूली सी चीज़, पर उसके बिना घर नहीं चलता था।
इस स्त्री के पति की मृत्यु हो चुकी थी, कर्ज़दार उसके बेटों को दास बनाकर ले जाने आया था। एलीशा ने बड़ा सवाल नहीं पूछा, उन्होंने पूछा, तेरे घर में क्या है? जवाब बहुत छोटा था, बस एक कुप्पी तेल।
चमत्कार किसी नई चीज़ से शुरू नहीं हुआ। जो पहले से घर में था, उसी को उधार के बर्तनों में उतारा गया, और वह तब तक बहता रहा जब तक हर बर्तन भर नहीं गया। उसे कुछ अलग से लाना नहीं पड़ा, जो था उसे बहने देना पड़ा।
आज परिवार साथ है, समय है, हाथ खाली नहीं हैं। शायद आज कुछ बड़ा जोड़ने की ज़रूरत नहीं, जो घर में पहले से है, वही किसी और के बर्तन में उतर सके।
आज
आज दोपहर घर में बना खाना थोड़ा ज़्यादा परोसें और एक कटोरी अपने पड़ोसी या रिश्तेदार के लिए अलग रखकर स्वयं उनके दरवाज़े पर पहुंचा आएं।
◐ दोपहर का पल
यदि मैंने प्रभु और गुरु होकर तुम्हारे पाँव धोए; तो तुम्हें भी एक दूसरे के पाँव धोना चाहिए।
यूहन्ना 13:14
पतरस का चेहरा गरम हो उठा था। गुरु उसके सामने घुटनों पर बैठे थे, हाथ में तौलिया, आंखों के सामने वही धूल भरे पांव जिन्हें कोई सम्मानित व्यक्ति कभी नहीं छूता। उसने कहा था, तू मेरे पांव कभी न धोएगा।
उस दुनिया में यह काम सबसे नीचे के दास का था। घर के दरवाजे पर पानी और बर्तन रखे रहते, क्योंकि रास्ते खुले सैंडल में, धूल और गोबर से भरे होते थे। जो इब्राहीम ने उन तीन अजनबियों से कहा, थोड़ा पानी लाने दो कि तुम्हारे पांव धोए जाएं, वह केवल शिष्टाचार नहीं था। यह एक वचन था, मैं तुझे अपनी छत के नीचे सुरक्षित रखूंगा। मेहमान के पांव धोना मेजबान की जिम्मेदारी को, उसके संरक्षण को बांधता था।
और अब वही प्रभु, जिसे पिता ने सब कुछ सौंप दिया था, वह दास का तौलिया उठा लेता है। कोई नौकर नहीं था वहां, इसलिए वह स्वयं झुका। यह विनम्रता का दिखावा नहीं था, यह बता रहा था कि परमेश्वर का हृदय किस दिशा में झुकता है, नीचे की ओर, गंदे पांवों की ओर।
यह चुभता है कि जिसे झुकना चाहिए वह मैं हूं, पर अक्सर मैं वह हूं जो हाथ पीछे खींच लेता है।
आज
आज घर में किसी एक के पांव धो दो, बिना बताए कि क्यों, गुनगुने पानी और तौलिये से, चुपचाप।
☾ संध्या का क्षण
उससे कहा, “जा, शीलोह के कुण्ड में धो ले” (शीलोह का अर्थ भेजा हुआ है) अतः उसने जाकर धोया, और देखता हुआ लौट आया। (यशा. 35:5)
यूहन्ना 9:7
जिस रास्ते पर आँखें साथ न दें, वहाँ कदम बढ़ाना डर लगता है। दुनिया सिखाती है कि पहले रास्ता साफ देखो, फिर चलो। पर यरूशलेम की तंग गलियों में एक अंधा आदमी ठीक इसके उलट करता है, वह बिना देखे चल पड़ता है।
शीलोह का यह कुण्ड शहर की दीवार के नीचे, एक गहरी घाटी में था। सदियों पहले राजा हिजकिय्याह ने चट्टान काटकर एक सुरंग बनवाई थी, जिससे गीहोन के सोते का पानी छिपकर इस कुण्ड तक पहुँचता था। यह वह जगह थी जहाँ यरूशलेम के लोग रोज़ पानी भरने आते थे, जहाँ पर्व के दिनों में मंदिर के लिए जल लाया जाता था। हवा में गीली मिट्टी और पत्थर की सीलन की गंध रही होगी, सीढ़ियों पर भीड़ और बर्तनों की आवाज़।
यीशु ने उस अंधे व्यक्ति की आँखों पर मिट्टी लगाई और उसे इसी कुण्ड तक भेजा। नाम का अर्थ ही 'भेजा हुआ' है। वह आदमी बिना देखे, टटोलते हुए, शायद किसी और के सहारे उन सीढ़ियों तक उतरा, पानी में झुका, और जब सिर उठाया तो पहली बार दुनिया को देखा।
इस शनिवार की शाम, जब दिन का सारा दौड़ना थम रहा है, यही सवाल ठहरता है, क्या मैं उस जगह जाने को तैयार हूँ जहाँ यीशु मुझे भेजे, भले वह रास्ता अभी अंधेरा ही क्यों न लगे।
आज
आज रात मुँह धोते या नहाते समय पानी को हाथ में लेकर रुक जाओ और धीरे से कहो, 'यीशु, मुझे भी भेज दे, नए सिरे से देखने के लिए।'
इन अंशों को IRV Hindi 2019 में पढ़ें
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14यदि मैंने प्रभु और गुरु होकर तुम्हारे पाँव धोए; तो तुम्हें भी एक दूसरे के पाँव धोना चाहिए।
7उससे कहा, “जा, शीलोह के कुण्ड में धो ले” (शीलोह का अर्थ भेजा हुआ है) अतः उसने जाकर धोया, और देखता हुआ लौट आया। (यशा. 35:5)
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