जो सच में मायने रखता है
सच्ची प्राथमिकताएँ
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए फिलिप्पियों 4:8, नीतिवचन 12:11, सभोपदेशक 7:2-3 and भजन संहिता 63:8.
☀ सुबह का पल
इसलिए, हे भाइयों, जो-जो बातें सत्य हैं, और जो-जो बातें आदरणीय हैं, और जो-जो बातें उचित हैं, और जो-जो बातें पवित्र हैं, और जो-जो बातें सुहावनी हैं, और जो-जो बातें मनभावनी हैं, अर्थात्, जो भी सद्गुण और प्रशंसा की बातें हैं, उन्हीं पर ध्यान लगाया करो।
फिलिप्पियों 4:8
पौलुस रोम की एक अंधेरी कोठरी में जंजीरों से बंधा बैठा है। पहरेदार बदलते रहते हैं, दीवारें ठंडी हैं, आगे क्या होगा यह भी पक्का नहीं। फिर भी वहीं से वह उठकर लिखता है कि मन किन बातों पर टिकाना चाहिए।
तेरा आज सुबह शायद इतना कठोर नहीं, पर मन उतना ही भटका हुआ हो सकता है। बिस्तर से उठते ही सूची बन जाती है, क्या गलत हो सकता है, कौन नाराज़ है, कल की चिंता आज ही खिंच आती है। सोच का प्रवाह कोई खुद नहीं चुनता, वह अपने आप बहता है।
पौलुस कहता है कि इस बहाव को मोड़ा जा सकता है। जो सच है, जो शुद्ध है, जो प्रशंसा के योग्य है, वहाँ ध्यान लगाना एक चुनाव है, हर सुबह नया। यह हालात को नकारना नहीं है, कोठरी अब भी वहीं थी, पर मन कहाँ रहेगा यह तय किया जा सकता है।
परमेश्वर का यही तरीका है, वह हमें कठिनाई से बचाने का वादा नहीं करता, पर सोच को नया करने की शक्ति देता है। जहाँ आँख टिकती है, वहीं दिल भी बस जाता है।
आज
आज सुबह चाय या नाश्ते की मेज़ पर बैठते ही एक कागज़ पर तीन ऐसी बातें लिख, जो सच, अच्छी या सुंदर हैं, चाहे कितनी छोटी क्यों न हों, और उन्हें ज़ोर से पढ़ ले इससे पहले कि फोन उठाए।
✦ दोपहर का पल
जो अपनी भूमि को जोतता, वह पेट भर खाता है, परन्तु जो निकम्मों की संगति करता, वह निर्बुद्धि ठहरता है।
नीतिवचन 12:11
क्या यह काम सच में जरूरी है, या मैं बस दिन भर भागता रहता हूँ बिना यह जाने कि किस दिशा में?
दोपहर तक पहुँचते-पहुँचते अक्सर यही सवाल भीतर कहीं दबा पड़ा मिलता है। सुबह से मीटिंग्स, फोन कॉल्स, ईमेल्स की झड़ी, और भीतर एक बेचैनी कि यह सब आखिर कहाँ ले जा रहा है। मन कभी-कभी असली काम से भटककर उन कल्पनाओं में उड़ने लगता है, वह नौकरी जो नहीं मिली, वह जीवन जो अलग हो सकता था, वह पहचान जो अभी तक नहीं बनी।
नीतिवचन का यह वचन कठोर लगता है, पर सच्चा है। जो अपनी ज़मीन पर लगा रहता है, धीरे-धीरे, दिन-प्रतिदिन, उसे रोटी मिलती है। जो बस कल्पनाओं के पीछे दौड़ता है, उसके हाथ खाली रहते हैं। यह कोई बड़ा सपना देखने के विरुद्ध नहीं है, यह उस भटकाव के विरुद्ध है जो असली काम से मुँह मोड़ लेता है।
यीशु ने भी कहा था कि जो थोड़े में विश्वासयोग्य रहता है, उसे बहुत पर अधिकार दिया जाता है। आज की दोपहर, आज की मेज़ पर पड़ा काम, यही तेरी ज़मीन है। इसे टालना नहीं, इसमें जड़ें जमानी हैं।
आज
इस ब्रेक के खत्म होने से पहले एक कागज़ पर आज दोपहर का सबसे जरूरी एक काम लिख लो, केवल एक। फिर बाकी दोपहर उसी एक काम पर ध्यान लगाओ, बिना कल्पनाओं में भटके।
◐ दोपहर का पल
भोज के घर जाने से शोक ही के घर जाना उत्तम है; क्योंकि सब मनुष्यों का अन्त यही है, और जो जीवित है वह मन लगाकर इस पर सोचेगा। हँसी से खेद उत्तम है, क्योंकि मुँह पर के शोक से मन सुधरता है।
सभोपदेशक 7:2-3
दफ्तर की मेज पर दोपहर 2:15 बजे वह शोक-कार्ड अभी भी बिना हस्ताक्षर के पड़ा है। सहकर्मी के पिता का देहांत हुआ है, और तुमने सोचा था लंच के बाद लिख दूँगा, पर अब भी हाथ नहीं बढ़ा। दुख से कतराने का यह छोटा-सा उदाहरण है, इससे बड़े रूप में भी हम यही करते हैं।
यह वाक्य चुभता है। हम जन्मदिन की पार्टी को शोक सभा से बेहतर मानते हैं, यही स्वाभाविक भी है। पर बुद्धिमान लेखक ठीक उल्टी बात कहता है, शोक का घर हँसी के घर से बेहतर है। क्यों? क्योंकि वहाँ झूठ नहीं टिकता। वहाँ हर मुखौटा उतर जाता है, और यही सच्चाई हृदय को गढ़ती है।
हँसी अक्सर टाल-मटोल है, वह पल को हल्का कर देती है पर बदलती नहीं। दुख रुकने पर मजबूर करता है। वह पूछता है, अंत क्या है, जीवन किसलिए है। यह प्रश्न अभी हल नहीं होगा, और शायद यही सही है।
जो कतरा रहे हो, उसका सामना करना कठिन लगता है। पर परमेश्वर हमें यही सिखाना चाहता है, गंभीरता से जीना, हल्केपन में भागना नहीं।
आज
अभी वह कार्ड उठाओ, उस पर कुछ सच्चे शब्द लिखो, न कि रटे-रटाए, और उसे आज ही सहकर्मी की मेज पर रख आओ।
☾ संध्या का क्षण
मेरा मन तेरे पीछे-पीछे लगा चलता है; और मुझे तो तू अपने दाहिने हाथ से थाम रखता है।
भजन संहिता 63:8
"स्टेज़ क्लोज़", लिपटी रहती है। यह शब्द किसी दूर से पुकारने वाले की भाषा नहीं है, यह उस बच्चे की भाषा है जो थककर माँ के आँचल से चिपक जाता है। दाऊद यहाँ दूरी की बात नहीं कर रहा, नज़दीकी की बात कर रहा है, ऐसी नज़दीकी जो आत्मा खुद चुनती है।
आज गुरुवार का दिन था, शायद कामकाज़ी हलचल से भरा, फ़ोन कॉल्स, मेल्स, थकान जो शाम तक कंधों पर जमा हो गई। ऐसे दिन के बाद आत्मा अक्सर बिखरी हुई महसूस होती है, इधर-उधर फैली हुई। पर दाऊद कोई नई ताकत नहीं माँगता, वह बस लौटकर लिपट जाता है।
और फिर वह दूसरा हिस्सा है, "तेरा दाहिना हाथ मुझे सम्भाले रखता है"। लिपटना एकतरफ़ा नहीं है। जब आत्मा प्रभु से चिपकती है, उसी पल प्रभु का हाथ नीचे से थाम लेता है। यह कोई प्रयास नहीं, यह विश्राम है।
शाम के इस समय में, जब दिन की सब बातें अभी भी मन में गूँज रही हों, यही शब्द काफ़ी है, लिपटना। कुछ साबित करने को नहीं, कुछ सुलझाने को नहीं, बस लिपट जाना।
आज
आज रात सोने से पहले दो मिनट के लिए हाथ जोड़कर बैठिए और मन में या ज़ोर से कहिए, "मेरी आत्मा तुझसे लिपटी रहती है", फिर चुपचाप बैठे रहिए, बिना कुछ और माँगे, बस उस नज़दीकी में रहिए।
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8इसलिए, हे भाइयों, जो-जो बातें सत्य हैं, और जो-जो बातें आदरणीय हैं, और जो-जो बातें उचित हैं, और जो-जो बातें पवित्र हैं, और जो-जो बातें सुहावनी हैं, और जो-जो बातें मनभावनी हैं, अर्थात्, जो भी सद्गुण और प्रशंसा की बातें हैं, उन्हीं पर ध्यान लगाया करो।
11जो अपनी भूमि को जोतता, वह पेट भर खाता है, परन्तु जो निकम्मों की संगति करता, वह निर्बुद्धि ठहरता है।
2भोज के घर जाने से शोक ही के घर जाना उत्तम है; क्योंकि सब मनुष्यों का अन्त यही है, और जो जीवित है वह मन लगाकर इस पर सोचेगा।
3हँसी से खेद उत्तम है, क्योंकि मुँह पर के शोक से मन सुधरता है।
8मेरा मन तेरे पीछे-पीछे लगा चलता है; और मुझे तो तू अपने दाहिने हाथ से थाम रखता है।
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