स्थिर रहो · शुक्रवार, अक्टूबर 16, 2026

असंभव को संभव करता परमेश्वर

असंभव में अनुग्रह

आज 2 मिनट का पठन 4 बाइबिल के अंश

शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए मरकुस 10:25, भजन संहिता 121:1-2, निर्गमन 32:11 and मत्ती 18:21.

☀ सुबह का पल

परमेश्वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊँट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है!”

मरकुस 10:25

शिष्यों के चेहरे पर सन्नाटा छा जाता है। अभी-अभी एक धनी जवान उदास होकर लौट गया था, और अब यीशु एक ऐसी तस्वीर खींचते हैं जो उनकी समझ से परे चली जाती है।

ऊँट उस धरती का सबसे जाना-पहचाना जानवर था। व्यापारियों के काफ़िले उसी की पीठ पर सामान लादकर मीलों रेगिस्तान पार करते थे, क्योंकि वह बड़ा, मजबूत और थकान सहने वाला था। हर सुनने वाला जानता था कि एक सुई का छेद कितना छोटा होता है और ऊँट कितना विशाल। यीशु जानबूझकर दो बिल्कुल विपरीत चीज़ें जोड़ते हैं, सबसे बड़ा जीव और सबसे छोटा छेद, ताकि सुनने वालों को एक झटका लगे।

यह कोई पहेली नहीं थी जिसे सुलझाना था, बल्कि एक असंभव दृश्य था जिसे महसूस करना था। शिष्य घबराकर पूछते हैं, तो फिर किसका उद्धार हो सकता है? और यीशु का उत्तर उसी असंभवता को स्वीकार करता है, पर उसे परमेश्वर के हाथ में रख देता है।

शुक्रवार की इस सुबह शायद आप भी किसी चीज़ को अपने बल से, अपनी चतुराई से, अपने पैसों या मेहनत से उस तंग छेद में से निकालने की कोशिश कर रहे हों। कोई रिश्ता, कोई लक्ष्य, कोई डर। यह तस्वीर याद दिलाती है कि कुछ दरवाज़े इंसानी ज़ोर से नहीं, परमेश्वर के हाथ से खुलते हैं।

आज
आज सुबह एक कागज़ पर वह एक बात लिख लें जिसे आप पूरी तरह अपने ही बल पर पार करने में लगे हैं, और फिर उसे ज़ोर से पढ़कर प्रार्थना में परमेश्वर के हाथ में सौंप दें।

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✦ दोपहर का पल

मैं अपनी आँखें पर्वतों की ओर उठाऊँगा। मुझे सहायता कहाँ से मिलेगी? मुझे सहायता यहोवा की ओर से मिलती है, जो आकाश और पृथ्वी का कर्ता है।

भजन संहिता 121:1-2

उठाऊंगा। यह शब्द पढ़ते हुए अक्सर नज़र उस पर टिकती ही नहीं, मानो आँखें अपने आप ऊपर चली जाती हों। पर मूल में यह एक चुना हुआ काम है। यात्री खुद तय करता है कि वह थकी, धूल भरी निगाह को पहाड़ों की ओर उठाएगा, जहाँ उस समय मंदिर की उम्मीद भी थी और डाकुओं का डर भी, ऊँचे स्थानों की झूठी पूजा भी।

यह गीत यात्रा का गीत है, उन में से एक जिसे यरूशलेम जाने वाले तीर्थयात्री रास्ते में गाते थे, जब सालाना पर्वों के लिए पैदल चढ़ाई करनी होती थी। कोई आरामदायक घर की भजन नहीं, बल्कि सड़क के बीच का गीत, जब पैर दुखने लगे हों और मंज़िल अभी दूर हो।

शुरुआत सवाल से होती है, मदद कहाँ से मिलेगी। यही ईमानदारी इस गीत को असली बनाती है। यात्री ढोंग नहीं करता कि वह मजबूत है। वह बस पूछता है, और फिर खुद जवाब देता है, उस परमेश्वर की ओर इशारा करते हुए जिसने आकाश और पृथ्वी दोनों बनाए।

दोपहर का यह पल भी एक तरह की यात्रा के बीच का पल है, काम आधा हो चुका है, दिन अभी बाकी है। यह गीत शाम की थकान के लिए नहीं, दिन के बीचोंबीच के सवाल के लिए शब्द देता है।

आज
अभी अपनी कुर्सी से थोड़ा पीछे टिको, नज़र खिड़की या आसमान की ओर उठाओ, और धीरे से ज़ोर से कह दो, मेरी सहायता यहोवा की ओर से आती है, जिस ने आकाश और पृथ्वी को बनाया।

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◐ दोपहर का पल

तब मूसा अपने परमेश्वर यहोवा को यह कहकर मनाने लगा, “हे यहोवा, तेरा कोप अपनी प्रजा पर क्यों भड़का है, जिसे तू बड़े सामर्थ्य और बलवन्त हाथ के द्वारा मिस्र देश से निकाल लाया है?

निर्गमन 32:11

जब कोई तुम्हारे सामने ही गलत कर चुका है, और परमेश्वर का गुस्सा जायज़ लगता है, तो क्या तुम फिर भी उसके लिए प्रार्थना करने की हिम्मत करोगे?

मूसा पहाड़ पर था जब लोगों ने सोने का बछड़ा बना लिया। परमेश्वर ने कहा, मुझे अकेला छोड़ दे, मैं इन्हें मिटा दूँगा। यह मूसा के लिए भागने का, या चुप रहने का, या सहमत होने का मौका था। पर वह बीच में खड़ा हो गया।

जो वह कहता है, वह साधारण नहीं है। वह परमेश्वर के अपने क्रोध पर सवाल उठाता है, और परमेश्वर की ही महिमा का हवाला देता है, मिस्री क्या कहेंगे। यह चापलूसी नहीं, दुस्साहस है। भड़कना वही शब्द है जो आग के लिए इस्तेमाल होता है, जलता हुआ, फैलता हुआ क्रोध। मूसा उसी आग के सामने खड़ा हुआ, बिना यह कहे कि लोगों ने कुछ गलत नहीं किया।

यह बीच में खड़े होना पाप को नज़रअंदाज़ करना नहीं है। यह उस जगह पर खड़े रहना है जहाँ न्याय और दया टकराते हैं, और वहाँ से हटना नहीं।

शायद आज किसी ऐसे व्यक्ति का नाम तुम्हारे मन में है जिसे तुमने अंदर ही अंदर दोषी ठहरा दिया है, सहकर्मी, परिवार का कोई, खुद भी। उसके लिए आसानी से फैसला सुनाने के बजाय, उस जगह खड़े होना जहाँ मूसा खड़ा था।

आज
उस व्यक्ति का नाम एक कागज़ पर लिख लो, और आज अकेले में ज़ोर से यह कहो, परमेश्वर, इस पर दया कर, जैसे तूने उन पर की।

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☾ संध्या का क्षण

तब पतरस ने पास आकर, उससे कहा, “हे प्रभु, यदि मेरा भाई अपराध करता रहे, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ, क्या सात बार तक?”

मत्ती 18:21

उस ज़माने के व्यापारी अपने हर लेन-देन को मिट्टी की पटिया पर खुरच कर लिखते थे। कौन कितना देनदार है, किसने कब चूक की, सब कुछ गिना जा सकता था, याद रखा जा सकता था, और ज़रूरत पड़ने पर निकाल कर सामने रखा जा सकता था। हिसाब पक्का होता था।

पतरस भी ऐसा ही एक हिसाब लेकर यीशु के पास आता है। अभी-अभी यीशु ने भाई के अपराध और मेल-मिलाप की बात की थी, और भीड़ में खड़े पतरस के मन में शायद किसी एक चेहरे की छवि रही होगी, किसी एक नाम का बोझ। वह पूछता है, कितनी बार क्षमा करूं।

उस समय के गुरु आमतौर पर सिखाते थे कि तीन बार क्षमा करना पर्याप्त है, उसके बाद बहाने की ज़िम्मेदारी ख़त्म। पतरस सात का आंकड़ा रखता है, जो उस सीमा से दुगुने से भी ज़्यादा है। उसे लगता है वह उदार है।

यह सवाल ही बहुत कुछ खोल देता है। यह दिखाता है कि हर दिल में एक चुपचाप रखी हुई गिनती होती है, एक सीमा जहां तक हम माफ़ करने को तैयार हैं, उसके आगे नहीं।

आज की शाम, उस गिनती को एक बार सामने रखिए। कोई है जिसकी चूक को आप मन ही मन गिन रहे हैं।

आज
सोने से पहले एक कागज़ पर उस व्यक्ति का नाम लिखिए जिसने आज आपको चोट पहुंचाई, और उसके नीचे लिख दीजिए, आज का हिसाब बंद।

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