संकट में भी परमेश्वर का साथ
परमेश्वर का साथ
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए उत्पत्ति 32:30, उत्पत्ति 40:14, 2 राजा 25:9 and निर्गमन 25:14-15.
☀ सुबह का पल
तब याकूब ने यह कहकर उस स्थान का नाम पनीएल रखा; “परमेश्वर को आमने-सामने देखने पर भी मेरा प्राण बच गया है।”
उत्पत्ति 32:30
रात भर लड़ने के बाद आज तुम किस चीज़ के साथ लंगड़ाते हुए उठे हो? कौन सी बात है जिसने रातभर तुम्हें जकड़े रखा और जाने नहीं दिया?
याकूब उस रात अकेला था, यब्बोक नदी के किनारे, अंधेरे में। भाई एसाव से मिलने से पहले की वह आखिरी रात थी, और डर उसकी छाती पर बैठा था। वहीं एक पुरुष उससे भोर तक मल्लयुद्ध करता रहा। याकूब ने उसे जाने नहीं दिया जब तक उसने आशीष न दी।
सुबह होते ही याकूब ने उस जगह को अपना नाम नहीं, परमेश्वर का नाम दिया, पनीएल, यानी परमेश्वर का मुख। उसने वहाँ कोई इमारत नहीं बनाई, कोई वेदी नहीं बनाई, बस एक नाम रखा, ताकि हर कोई जो वहाँ से गुजरे जान जाए कि यहाँ किसी ने परमेश्वर को आमने-सामने देखा और जीवित बच निकला।
और वह लंगड़ाता हुआ चला गया। चोट बाकी रह गई। यही आश्चर्य की बात है, वह जगह जहाँ परमेश्वर से मुलाकात हुई, वहीं से एक निशान भी मिला, जिसे वह जीवन भर अपने साथ ले गया।
हो सकता है आज सुबह तुम भी किसी रात के बाद उठे हो जिसने तुम्हें हिला दिया। वह निशान शर्म की नहीं, गवाही की बात हो सकती है, कि वहाँ परमेश्वर मिला था।
आज
आज सुबह उस रात या उस लड़ाई को एक नाम दो। एक कागज़ पर लिखो, 'यहाँ मैंने परमेश्वर को देखा', और उसे अपनी मेज़ पर या जेब में रखो, जहाँ दिनभर तुम्हारी नज़र उस पर पड़े।
✦ दोपहर का पल
अतः जब तेरा भला हो जाए तब मुझे स्मरण करना, और मुझ पर कृपा करके फ़िरौन से मेरी चर्चा चलाना, और इस घर से मुझे छुड़वा देना।
उत्पत्ति 40:14
जेल की कोठरी में सुबह होती है, और यूसुफ दो उदास चेहरे देखता है। पिलानेहारा और पकानेहारा, दोनों फिरौन के अफसर, रात को सपने देख चुके हैं और अब परेशान बैठे हैं। यूसुफ खुद बंदी है, झूठे इल्ज़ाम में सालों से यहीं पड़ा है, फिर भी वह रुक जाता है और पूछता है कि उनके चेहरे आज उदास क्यों हैं।
यही यूसुफ की पहचान है। वह अपने दुख में डूबा नहीं रहता, दूसरे की उलझन पर ध्यान देता है। सपनों का अर्थ परमेश्वर से मांगकर वह बताता है, और जब बात सही निकलती है, तब वह एक छोटी सी विनती करता है, याद रखना।
यह विनती कुछ ज़्यादा नहीं मांगती, बस इतना कि किसी की नज़र में आना, भुलाया न जाना। पिलानेहारा ने फिर भी उसे भुला दिया, दो साल तक। यूसुफ का भला करना उसी क्षण फल नहीं लाया।
दोपहर के इस छोटे ठहराव में यही सवाल उठता है, किसकी याद में तुम आज किसी काम आए, और किसने तुम्हें भुला दिया है। यूसुफ का भरोसा उस भलाई पर टिका नहीं था कि कोई याद रखेगा, पर उसने फिर भी कहा, फिर भी मांगा। ईमानदार विनती कमजोरी नहीं है।
आज
आज किसी एक व्यक्ति का नाम लिखो जिसकी मदद की थी और जिसकी खबर लेना भूल गए, और अभी उसे एक संदेश भेज दो।
◐ दोपहर का पल
He burned Yahweh's house, and the king's house, and all the houses of Jerusalem, even every great house, he burned with fire.
2 राजा 25:9
जला। एक शब्द, और उसमें पत्थर की दीवारें नहीं, बल्कि वह जगह राख हो जाती है जिसे कभी कोई नहीं छू सकता था समझा गया था। यह मंदिर था, जहाँ परमेश्वर की उपस्थिति रहती थी, जहाँ बलिदान चढ़ते थे, जहाँ पीढ़ियों ने भरोसा रखा कि यह स्थान सदा खड़ा रहेगा।
इससे पहले अठारह महीने की घेराबंदी थी। अन्न खत्म हो चुका था, दीवार में दरार पड़ गई थी, राजा सिदकिय्याह रात में भाग निकला पर पकड़ा गया, उसके बेटों को उसकी आँखों के सामने मार डाला गया, और फिर उसकी आँखें फोड़ दी गईं। यह अंतिम दृश्य था जो उसने देखा। उसके बाद अंधेरा ही अंधेरा।
यह दिन अचानक नहीं आया। यिर्मयाह वर्षों से चेतावनी देता रहा था, और किसी ने नहीं सुना। जो स्थायी लगता था, वह न्याय के नीचे गिर गया। यही इस कहानी का मोड़ है, जहाँ से निर्वासन शुरू होता है, जहाँ से इस्राएल को नए सिरे से सीखना पड़ा कि परमेश्वर मंदिर की दीवारों में बंद नहीं है।
सवाल यह नहीं कि यह उचित था या नहीं। सवाल यह है, जब वह चीज़ जल जाए जिसे आप अडिग मानते थे, तो उसके बाद आप क्या मानेंगे?
आज
आज दस मिनट निकालें। एक मोमबत्ती जलाएं और उसे पूरी तरह जलने दें, और ज़ोर से वह एक चीज़ नाम लें जिसे आप अपने जीवन में अडिग और सुरक्षित समझते आए हैं।
☾ संध्या का क्षण
और डंडों को सन्दूक की दोनों ओर के कड़ों में डालना जिससे उनके बल सन्दूक उठाया जाए। वे डंडे सन्दूक के कड़ों में लगे रहें; और उससे अलग न किए जाएँ।
निर्गमन 25:14-15
सोने से मढ़े हुए डण्डे कड़ों के भीतर टिके हैं, न हिलते, न खड़खड़ाते। खेमा रात को शांत पड़ा है, सन्दूक अपने स्थान पर स्थिर है, और वे डण्डे फिर भी वहीं हैं, जैसे दिन में यात्रा के समय थे।
यह एक छोटी सी आज्ञा है, पर उसमें गहरी बात छिपी है। डण्डे कभी नहीं निकाले जाते थे, चाहे इस्राएल कूच कर रहा हो या महीनों तक एक ही जगह टिका हो। सन्दूक को छूना किसी को अधिकार नहीं था, इसलिए डण्डे सदा तैयार रहते थे, भले ही उनका उपयोग अभी न हो रहा हो।
यही बात आज की शाम को छूती है। दिन भर जो हाथ चले, जो काम उठाए, जो बोझ ढोए गए, वे अब टिक सकते हैं, बिना यह डर कि कल के लिए तैयारी टूट जाएगी। परमेश्वर की उपस्थिति हर दिन नए सिरे से नहीं जोड़नी पड़ती, वह स्थिर रहती है, जैसे वे डण्डे कड़ों में स्थिर रहते थे।
विश्राम का अर्थ यह नहीं कि तैयारी खो गई, बल्कि यह कि आज रात उसे छूने की जरूरत नहीं। जो टिका है, टिका रहे। जो कल के लिए रखा है, वह बिना हलचल के भी अपनी जगह बना रहेगा।
आज
आज रात अपने बैग, चाबियाँ या कल के काम की सूची दरवाजे के पास ऐसे रख दें जैसे वे पहले से तैयार हैं, और फिर उन्हें दोबारा मत छुएं, उन्हें वहीं टिके रहने दें।
इन अंशों को IRV Hindi 2019 में पढ़ें
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30तब याकूब ने यह कहकर उस स्थान का नाम पनीएल रखा; “परमेश्वर को आमने-सामने देखने पर भी मेरा प्राण बच गया है।”
14अतः जब तेरा भला हो जाए तब मुझे स्मरण करना, और मुझ पर कृपा करके फ़िरौन से मेरी चर्चा चलाना, और इस घर से मुझे छुड़वा देना।
14और डंडों को सन्दूक की दोनों ओर के कड़ों में डालना जिससे उनके बल सन्दूक उठाया जाए।
15वे डंडे सन्दूक के कड़ों में लगे रहें; और उससे अलग न किए जाएँ।
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