हर परिस्थिति में परमेश्वर साथ
सदा साथ परमेश्वर
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए रोमियों 8:38-39, यूहन्ना 18:18, निर्गमन 25:12-13 and मत्ती 1:23.
☀ सुबह का पल
क्योंकि मैं निश्चय जानता हूँ, कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएँ, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ्य, न ऊँचाई, न गहराई और न कोई और सृष्टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी।
रोमियों 8:38-39
घर अभी पूरी तरह जागा नहीं है, पर्दों के पीछे से बस हल्की रोशनी आ रही है। इस शांति में एक मिनट रुको, इससे पहले कि दिन की सूची तुम्हें खींच ले।
यह शब्द रोमियों की कलीसिया के लिए लिखे गए थे, जो एक ऐसे शहर में रहते थे जहाँ सत्ता रोम के हाथ में थी, और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अनिश्चितता गहरी थी। पौलुस जानता था कि लोग किन चीज़ों से डरते थे, मृत्यु से, भविष्य से, और उन अदृश्य शक्तियों से जिन्हें 'स्वर्गदूत' और 'प्रधानताएँ' कहा जाता था, क्योंकि उस ज़माने में माना जाता था कि आकाश की शक्तियाँ और तारे मनुष्य की किस्मत तय करती हैं।
पौलुस इन सारी शक्तियों की सूची एक-एक करके गिनाता है, और फिर कहता है, इनमें से कोई भी इतनी बड़ी नहीं है कि वह परमेश्वर के प्रेम और तुम्हारे बीच खड़ी हो सके। यह केवल सांत्वना का वाक्य नहीं, एक घोषणा है, एक सार्वजनिक चुनौती उन सब शक्तियों को जो दिन को डरावना बना देती थीं।
आज तुम्हारी सूची अलग दिखेगी, शायद काम का दबाव, कोई रिपोर्ट, कोई रिश्ता जो तनावपूर्ण है। पर पौलुस की बात वही रहती है, कोई भी चीज़ इतनी बड़ी नहीं कि मसीह में परमेश्वर के प्रेम से तुम्हें अलग कर दे।
आज
एक कागज़ निकालो और आज की सबसे बड़ी चिंता या डर उस पर लिख दो। उसके नीचे यह पंक्ति लिख दो, 'कोई भी वस्तु हमें अलग नहीं कर सकती', और घर से निकलने से पहले इसे एक बार ज़ोर से पढ़ो।
✦ दोपहर का पल
दास और प्यादे जाड़े के कारण कोयले धधकाकर खड़े आग ताप रहे थे और पतरस भी उनके साथ खड़ा आग ताप रहा था।
यूहन्ना 18:18
रात की ठंड में जब कोयले जलते हैं, तो उनसे एक खास तरह की गर्माहट उठती है, धीमी, लाल, और धुआं हल्का सा तीखा। लोग उसके पास सिकुड़कर खड़े होते हैं, हाथ आगे बढ़ाकर, बिना एक-दूसरे को पहचाने भी पास आ जाते हैं। आग सबको बराबर गर्मी देती है, चाहे वे मित्र हों या शत्रु।
महायाजक के आँगन में भी ऐसी ही आग जल रही थी। पतरस दूर से पीछे-पीछे आया था, डरा हुआ, पर फिर भी वहाँ पहुँच गया। वह अजनबी सिपाहियों और सेवकों के बीच जा खड़ा हुआ, सिर्फ गर्मी के लिए। वह घेरा निष्पक्ष नहीं था, वह वही जगह थी जहाँ यीशु को बंदी बनाकर लाया गया था।
उसी गर्माहट में खड़े रहते हुए पतरस ने तीन बार कहा कि वह यीशु को जानता ही नहीं। जिन हाथों ने आग ताप रखी थी, उन्हीं होंठों से डर के मारे झूठ निकला। गर्मी ने उसे सुरक्षित महसूस कराया, पर वही जगह उसके इनकार की जगह बन गई।
दोपहर का यह समय भी ऐसा ही है। सहकर्मियों के बीच, हल्की बातचीत में, चुप रहना आसान लगता है जब विश्वास की बात उठे। कोई जोर से मना नहीं करता, बस धीरे से घुलमिल जाता है।
आज
आज भोजन के समय किसी सहकर्मी से एक छोटा सच बोल दो, कि आज सुबह प्रार्थना की थी, या यह कि रविवार को कलीसिया जाते हो। एक वाक्य काफी है।
◐ दोपहर का पल
और सोने के चार कड़े ढलवा कर उसके चारों पायों पर, एक ओर दो कड़े और दूसरी ओर भी दो कड़े लगवाना। फिर बबूल की लकड़ी के डंडे बनवाना, और उन्हें भी सोने से मढ़वाना।
निर्गमन 25:12-13
कुछ चीज़ें इसलिए पवित्र हैं क्योंकि वे कभी हिलाई नहीं गईं। वे वहीं रहीं, तैयार।
सन्दूक की हर बनावट में एक अजीब सी बेचैनी छिपी है। सोने की परतें, करूबों के पंख, और फिर ये छल्ले और लकड़ी के डंडे, जिन्हें एक बार छल्लों में डाल दिया गया तो वे वहीं रह गए। जब सन्दूक यात्रा पर नहीं था, जब वह पवित्रस्थान में शांत पड़ा था, तब भी डंडे अपनी जगह पर टिके रहे। इस्राएल को याद दिलाया जा रहा था कि यह उपस्थिति स्थायी निवास का सामान नहीं है, यह हमेशा कूच के लिए तैयार रहने वाली चीज़ है। डंडों का मकसद यह भी था कि किसी इंसान का हाथ सीधे उस पवित्र पेटी को न छुए, उसे कंधों पर उठाने का एक सुरक्षित रास्ता बना रहे।
यह दोपहर का सवाल है, जब दिन थम सा गया लगता है और हम सोचते हैं कि अब सब कुछ जमा हुआ, स्थिर है। पर क्या तुमने परमेश्वर की उपस्थिति को अपने जीवन के किसी कोने में जमा दिया है, उसे वहीं बाँध दिया है जहाँ वह सुविधाजनक लगे?
डंडे इसलिए नहीं निकाले गए ताकि वह उपस्थिति कभी भी, किसी भी दिशा में चल सके।
आज
आज अपने कमरे या मेज़ पर किसी एक स्थिर पड़ी चीज़ को उठाओ, जो महीनों से अपनी जगह से नहीं हिली। उसे हाथ में पकड़कर पूछो, क्या मैंने परमेश्वर की उपस्थिति को भी कहीं ऐसे ही जमा दिया है। फिर उसे रखते हुए ज़ोर से कहो, आज मुझे चलने दे।
☾ संध्या का क्षण
“देखो, एक कुँवारी गर्भवती होगी और एक पुत्र जनेगी, और उसका नाम इम्मानुएल रखा जाएगा,” जिसका अर्थ है - परमेश्वर हमारे साथ।
मत्ती 1:23
मत्ती कुछ ऐसा करता है जो वह शायद ही कहीं और करता है। वह एक नाम लिखता है, और फिर रुककर उसका अर्थ समझाता है। जैसे कोई लेखक पाठक की ओर झुककर कहे, रुको, इससे पहले कि तुम आगे बढ़ो, यह शब्द सुन लो। यह छोटा सा रुकना किसी संयोग से नहीं है।
इम्मानुएल एक इब्रानी नाम है, जो दो शब्दों से बना है, एक का अर्थ है हमारे साथ, दूसरे का अर्थ है परमेश्वर। यशायाह के समय में यह नाम एक चिन्ह था, राजा आहाज के डर भरे दिनों में दिया गया आश्वासन कि परमेश्वर अपने लोगों को छोड़ेंगे नहीं। सदियों बाद मत्ती उसी नाम को उठाता है और उसे यीशु पर रखता है।
यह केवल एक उपाधि नहीं है, यह एक पता है। जैसे कोई कहे कि यह व्यक्ति कहाँ रहता है, कहाँ मिलेगा। इम्मानुएल का अर्थ है कि परमेश्वर अब दूर किसी ऊँचे स्थान पर नहीं बैठा, वह मनुष्यों के बीच, उनकी थकान और उनके अंधेरे में आ बैठा है।
आज का दिन चाहे जैसा भी बीता हो, काम की भागदौड़, थकी हुई बातचीत, अधूरे काम, यह नाम आज रात कुछ कहता है। परमेश्वर किसी दूरी से नहीं देख रहा, वह साथ है, इसी कमरे में, इसी चुप्पी में।
आज
आज रात एक कागज़ के टुकड़े पर बस यह शब्द लिखो, इम्मानुएल, और उसे अपने तकिए के पास या मेज़ पर रख दो ताकि सोने से पहले तुम्हारी नज़र उस पर पड़े।
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38क्योंकि मैं निश्चय जानता हूँ, कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएँ, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ्य, न ऊँचाई,
39न गहराई और न कोई और सृष्टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी।
18दास और प्यादे जाड़े के कारण कोयले धधकाकर खड़े आग ताप रहे थे और पतरस भी उनके साथ खड़ा आग ताप रहा था।
12और सोने के चार कड़े ढलवा कर उसके चारों पायों पर, एक ओर दो कड़े और दूसरी ओर भी दो कड़े लगवाना।
13फिर बबूल की लकड़ी के डंडे बनवाना, और उन्हें भी सोने से मढ़वाना।
23“देखो, एक कुँवारी गर्भवती होगी और एक पुत्र जनेगी, और उसका नाम इम्मानुएल रखा जाएगा,” जिसका अर्थ है - परमेश्वर हमारे साथ।
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