समझने और उत्तर देने का मन
समझ और समर्पण
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए 1 राजा 3:9, प्रेरितों के काम 8:30-31, निर्गमन 16:18 and यशायाह 6:8.
☀ सुबह का पल
इसलिए अपने दास को समझने वाला मन दे, कि मैं तेरी प्रजा का न्याय कर सकूं, और भले बुरे में भेद कर सकूं; क्योंकि तेरी इस बड़ी प्रजा का न्याय कौन कर सकता है?
1 राजा 3:9
सुलैमान की इस प्रार्थना में एक छोटा सा शब्द है जिसे हम अक्सर पढ़ते हुए छोड़ देते हैं, 'इसलिए'। वह राजगद्दी पर बैठते ही सीधे कोई मांग नहीं रखता। पहले वह मान लेता है कि वह एक लड़का है, जिसे नहीं मालूम कि बाहर कैसे जाना है और भीतर कैसे आना है। उसकी मांग इस स्वीकार के बाद आती है, उसके पहले नहीं।
यह रात गिबोन में हुई थी, सपने में। परमेश्वर ने पूछा, मांग, मैं तुझे क्या दूं। सुलैमान के सामने पूरी दुनिया खुली थी, धन, लंबी आयु, शत्रुओं पर विजय, सब कुछ उसकी पहुंच में था।
पर उसने और कुछ नहीं मांगा सिवाय एक सुनने वाले हृदय के, जो भले और बुरे में भेद कर सके। यह उसकी अपनी सफलता के लिए नहीं था, बल्कि उन लोगों के लिए जो उसे सौंपे गए थे।
आज की सुबह भी ऐसे ही निर्णयों से भरी है जिनका परिणाम हमें अभी नहीं दिखता। दफ्तर में, घर में, किसी बातचीत में, हमें भी नहीं मालूम कि बाहर कैसे जाना है और भीतर कैसे आना है। यही वह जगह है जहां यह प्रार्थना फिर से बोली जा सकती है।
आज
आज किसी एक निर्णय को, जिसका सामना तुम्हें करना है, कागज़ पर लिख दो, और शुरू करने से पहले ज़ोर से कहो, मुझे समझने वाला, सुनने वाला हृदय दे।
✦ दोपहर का पल
फिलिप्पुस उसकी ओर दौड़ा और उसे यशायाह भविष्यद्वक्ता की पुस्तक पढ़ते हुए सुना, और पूछा, “तू जो पढ़ रहा है क्या उसे समझता भी है?” उसने कहा, “जब तक कोई मुझे न समझाए तो मैं कैसे समझूँ?” और उसने फिलिप्पुस से विनती की, कि चढ़कर उसके पास बैठे।
प्रेरितों के काम 8:30-31
अगर काम के बीचोबीच कोई अजनबी सवाल पूछ ले, तो मैं उसे रुकावट मानूँगा या मौका?
फिलिप्पुस किसी भरी हुई सभा में नहीं था। वह एक सुनसान मार्ग पर था, जहाँ कोई भीड़ नहीं, सिर्फ धूल और एक अकेला रथ। और वह दौड़ा। कोई तैयारी नहीं, कोई योजना नहीं, बस एक आदमी जो पढ़ रहा था और एक सवाल जो पूछा जाना बाकी था।
फिलिप्पुस ने बड़ा काम नहीं किया। उसने बस पूछा, "क्या तू समझता है?" इतना छोटा सवाल, फिर भी उसी ने दरवाज़ा खोल दिया। उस आदमी ने कहा, "जब तक कोई न समझाए" और फिर आगे बढ़कर कहा, आकर बैठ। एक दौड़, एक सवाल, एक निमंत्रण, यही पूरी कहानी का मोड़ था।
यह दोपहर का समय ऐसा ही है। काम की रफ़्तार के बीच कोई सवाल, कोई उलझन लिए हुए सहकर्मी, कोई संदेश जिसे टाला जा सकता था, वह सुनसान मार्ग पर अचानक दिखा रथ हो सकता है। दौड़ने लायक चीज़ हमेशा सभा में नहीं होती, कभी वह अकेले रास्ते में खड़ी होती है।
आज
आज किसी एक सहकर्मी या परिचित के पास जाओ, जिसके किसी सवाल या उलझन को तुमने टाल दिया था, और उसके पास बैठकर, आमने-सामने, दस मिनट में उसे सच में समझाओ, संदेश भेजकर नहीं।
◐ दोपहर का पल
जब उन्होंने उसको ओमेर से नापा, तब जिसके पास अधिक था उसके कुछ अधिक न रह गया, और जिसके पास थोड़ा था उसको कुछ घटी न हुई; क्योंकि एक-एक मनुष्य ने अपने खाने के योग्य ही बटोर लिया था।
निर्गमन 16:18
ज़्यादा जमा करना भी एक तरह का अविश्वास हो सकता है।
ओमर कोई बड़ा बर्तन नहीं था, बस इतना अनाज कि एक दिन में एक इंसान खा सके, लगभग दो लीटर के आसपास। जंगल में न फ्रिज था, न कोठार। हर सुबह आसमान से मन्ना गिरता, और हर घर को उतना ही मिलता जितना उस दिन की ज़रूरत थी। जिसने ज़्यादा बटोरा, उसके पास बचा नहीं रहा। जिसने कम बटोरा, उसे कमी महसूस नहीं हुई। नाप सही निकला, हर बार।
यह बात सुनने में सुकून देने वाली लगती है, पर रुककर सोचो तो चुभती भी है। हम कल की चिंता में आज का भंडार भरते रहते हैं, पैसा, समय, योजनाएँ, सब कुछ इसलिए कि कल पर भरोसा नहीं होता। परमेश्वर ने इस्राएलियों को एक दिन की रोटी दी, पूरे महीने की नहीं। उन्हें हर सुबह फिर से हाथ फैलाना पड़ता था।
यह दोपहर का सवाल है, जब आज का काम अभी खत्म नहीं हुआ और कल की फिक्र पहले से शुरू हो गई है, क्या मैं आज के ओमर पर भरोसा कर सकता हूँ, बिना कल का भंडार बनाए?
आज
आज किसी एक काम को, जिसे तुमने कल के लिए जमा कर रखा था क्योंकि आज का काफी लगता था, आज ही निपटा दो। उसे टालो मत, बस आज की ज़रूरत भर उठाओ और बाकी परमेश्वर पर छोड़ दो।
☾ संध्या का क्षण
तब मैंने प्रभु का यह वचन सुना, “मैं किसको भेजूँ, और हमारी ओर से कौन जाएगा?” तब मैंने कहा, “मैं यहाँ हूँ! मुझे भेज।”
यशायाह 6:8
आवाज़। यह शब्द यहाँ भारी है। यह कोई आदेश नहीं है जो ऊपर से गरजता हुआ आता है, यह एक प्रश्न है जो हवा में छोड़ दिया जाता है, मानो कोई कमरे में बोल रहा हो और सुन रहा हो कि कौन उत्तर देगा।
यशायाह उस क्षण मंदिर में खड़ा है, और जो उसने अभी देखा है वह उसे चुप कर देने के लिए काफी है, प्रभु का ऊँचा सिंहासन, उसकी पवित्रता की गूंज, और वह जलता हुआ कोयला जो अभी-अभी उसके होठों को छू चुका है। ठीक उसी घड़ी यह प्रश्न सुनाई देता है। यह प्रभु अपने आप से नहीं पूछ रहा, मानो उसे उत्तर न पता हो। यह एक निमंत्रण है, जो किसी व्यक्ति विशेष के नाम से नहीं, बल्कि पूरे कक्ष में गूंजता है।
और ध्यान दें, यशायाह जल्दी नहीं बोला। पहले सफाई हुई, पहले पवित्रता का अनुभव हुआ, फिर यह प्रश्न सुनाई दिया। यही क्रम कुछ सिखाता है, कि यह प्रश्न किसी थके हुए, भरे-पूरे दिल पर आता है, खाली हाथों पर नहीं।
आज का दिन भी समाप्त हो रहा है, और शायद यह प्रश्न अभी उत्तर मांगता नहीं। बस इसे कमरे में रहने दें। इसे सुनें, जैसे यह अभी कहा गया हो, बिना जल्दबाज़ी के।
आज
आज रात सोने से पहले, एक मिनट चुपचाप बैठें और धीरे से यह प्रश्न दोहराएँ, मुझे किसे भेजना है, किसे, और फिर बस चुप रहें, बिना उत्तर दिए।
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30फिलिप्पुस उसकी ओर दौड़ा और उसे यशायाह भविष्यद्वक्ता की पुस्तक पढ़ते हुए सुना, और पूछा, “तू जो पढ़ रहा है क्या उसे समझता भी है?”
31उसने कहा, “जब तक कोई मुझे न समझाए तो मैं कैसे समझूँ?” और उसने फिलिप्पुस से विनती की, कि चढ़कर उसके पास बैठे।
18जब उन्होंने उसको ओमेर से नापा, तब जिसके पास अधिक था उसके कुछ अधिक न रह गया, और जिसके पास थोड़ा था उसको कुछ घटी न हुई; क्योंकि एक-एक मनुष्य ने अपने खाने के योग्य ही बटोर लिया था।
8तब मैंने प्रभु का यह वचन सुना, “मैं किसको भेजूँ, और हमारी ओर से कौन जाएगा?” तब मैंने कहा, “मैं यहाँ हूँ! मुझे भेज।”
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