स्थिर रहो · शुक्रवार, अगस्त 28, 2026

जो पास है उसी में संतोष

संतोष और संयम

आज 2 मिनट का पठन 4 बाइबिल के अंश

शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए भजन संहिता 108:1-2, नीतिवचन 25:16, यशायाह 1:16-17 and इब्रानियों 13:5-6.

☀ सुबह का पल

हे परमेश्वर, मेरा हृदय स्थिर है; मैं गाऊँगा, मैं अपनी आत्मा से भी भजन गाऊँगा। हे सारंगी और वीणा जागो! मैं आप पौ फटते जाग उठूँगा

भजन संहिता 108:1-2

इस भजन में एक बात उल्टी है। सामान्य तौर पर तो भोर हमें जगाती है, सूरज की पहली किरण खिड़की से आती है और नींद तोड़ती है। पर यहाँ भजनकार कहता है, मैं भोर को जगाऊंगा। दिन उसके लिए बाहर से आने वाली कोई घटना नहीं है, बल्कि वह खुद उठकर दिन का स्वागत करने निकलता है, गीत और वाद्य लेकर।

यह छोटी सी बात दिखाती है कि उसका हृदय पहले से तैयार है। सोने से पहले ही तय हो चुका था कि सुबह किस दिशा में जाएगी। नींद टूटते ही परिस्थिति नहीं, बल्कि आराधना पहला शब्द होगी।

आज की सुबह शायद थकान लेकर आई हो, या मन में किसी काम की चिंता पहले से बैठी हो। पर भजनकार का हृदय दृढ़ है, वह कहता है, हे परमेश्वर, यह भावना बाहर से नहीं आती, यह भीतर से चुनी गई है। आराधना कोई मूड नहीं, एक निर्णय है।

यीशु भी सुबह जल्दी उठकर एकांत में जाते थे, इससे पहले कि दिन की मांगें उन्हें घेर लें। पहला शब्द, पहला श्वास, प्रभु की ओर मोड़ना संभव है, चाहे बाहर अभी अंधेरा ही क्यों न हो।

आज
आज उठते ही, फोन उठाने से पहले, ज़ोर से यह पंक्ति बोलें, हे परमेश्वर, मेरा हृदय स्थिर है, मैं आज के दिन को गीत से जगाऊंगा। इसे कहते हुए एक गहरी सांस लें, फिर दिन शुरू करें।

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✦ दोपहर का पल

क्या तूने मधु पाया? तो जितना तेरे लिये ठीक हो उतना ही खाना, ऐसा न हो कि अधिक खाकर उसे उगल दे।

नीतिवचन 25:16

प्रिया अपनी कुर्सी से उठे बिना टिफ़िन खोलती है, आंखें अब भी स्क्रीन पर टिकी हैं। रोटी मुंह में जाती है, पर स्वाद कहीं दर्ज नहीं होता, बस पेट भरना है ताकि अगला काम शुरू हो सके।

सुलैमान अपने बेटे को एक बहुत साधारण बात समझाता है, शहद अच्छा है, पर उसे हद से ज़्यादा खाओ तो वही चीज़ जो मीठी थी, बीमार कर देती है। बुद्धि यह नहीं कि अच्छी चीज़ों से भागा जाए, बुद्धि यह है कि उन्हें ठीक नाप में लिया जाए।

दोपहर का यह छोटा ब्रेक भी वैसा ही है। यह काम की सूची में एक और लाइन नहीं है जिसे जल्दी पार करना है, यह एक उपहार है, थोड़ी देर सांस लेने का, भोजन को असल में चखने का।

परमेश्वर ने यह भोजन दिया है, यह पेट भरने के लिए नहीं बना, यह जीने के लिए बना है। जब हम इसे भागते हुए निगल जाते हैं, तो हम वह भेंट खो देते हैं जो उसमें छिपी थी।

आज
अगले दस मिनट के लिए फोन और लैपटॉप को थोड़ा परे रखें। एक-एक कौर को धीरे चबाएं, स्वाद पर ध्यान दें, और मन में एक छोटा सा धन्यवाद कहें, इस भोजन के लिए जो आज आपको दिया गया।

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◐ दोपहर का पल

अपने को धोकर पवित्र करो: मेरी आँखों के सामने से अपने बुरे कामों को दूर करो; भविष्य में बुराई करना छोड़ दो, (1 पत. 2:1, याकू. 4:8) भलाई करना सीखो; यत्न से न्याय करो, उपद्रवी को सुधारो; अनाथ का न्याय चुकाओ, विधवा का मुकद्दमा लड़ो।”

यशायाह 1:16-17

दफ्तर में शुक्रवार की दोपहर यह मान लेती है कि सूची में जो काम था वह पूरा हो गया तो हिसाब बराबर है। फाइल बंद, ईमेल भेजा, मीटिंग निपटी, बस इतना ही काफी है।

यशायाह की यह पुकार उस हिसाब को तोड़ देती है। परमेश्वर यहाँ सिर्फ काम पूरा होने की बात नहीं कर रहे, वह भीतर की सफाई मांग रहे हैं। धोना, शुद्ध होना, बुराई छोड़ना, यह किसी टिक-बॉक्स से कहीं गहरी बात है।

और फिर सूची और भी असहज हो जाती है। न्याय ढूंढो, पीड़ितों की सहायता करो, अनाथ का हक दिलाओ, विधवा के लिए वकालत करो। ये शब्द किसी दूर के इतिहास की नहीं, आज की गली-मोहल्ले, दफ्तर और परिवार की बात करते हैं।

यह चुभता है क्योंकि हम अक्सर पूजा और भलाई को अलग खाते में रख देते हैं। परमेश्वर के सामने झुकना एक बात, बगल वाले की तकलीफ देखना दूसरी। यशायाह कहता है, ये दोनों एक ही चीज़ हैं, इन्हें अलग नहीं किया जा सकता।

आज
आज दोपहर के दस मिनट निकालो। किसी एक व्यक्ति का नाम सोचो जिसे तुम जानते हो पर जिसे अक्सर अनदेखा किया जाता है, दफ्तर में, परिवार में या मोहल्ले में। उसे अभी एक संदेश भेजो, या फोन करके पूछो, 'तुम कैसे हो, सच में?'

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☾ संध्या का क्षण

तुम्हारा स्वभाव लोभरहित हो, और जो तुम्हारे पास है, उसी पर संतोष किया करो; क्योंकि उसने आप ही कहा है, “मैं तुझे कभी न छोड़ूँगा, और न कभी तुझे त्यागूँगा।” (भज. 37:25, व्यव. 31:8, यहो. 1:5) इसलिए हम बेधड़क होकर कहते हैं, “प्रभु, मेरा सहायक है; मैं न डरूँगा; मनुष्य मेरा क्या कर सकता है?” (भज. 118:6, भज. 27:1)

इब्रानियों 13:5-6

उँगलियाँ अपने आप मुट्ठी में बंध जाती हैं, जब दिन भर की मेहनत के बाद जेब हल्की लगती है। कल के बिल याद आते हैं, वेतन कब मिलेगा यह सोच मन में घूमती है, और हाथ अनजाने में कस जाते हैं जैसे कुछ पकड़े रखना हो।

इब्रानियों के लेखक ऐसे ही खाली हाथों से बात करता है। वह पैसे के प्रेम की बात नहीं छिपाता, वह जानता है कि खालीपन का डर कितना असली होता है। पर फिर वह एक वादा रख देता है, ऐसा वादा जो हाथों को खोलने पर मजबूर कर दे, मैं तुझे कभी न छोड़ूँगा।

यह वादा किसी दूर के भविष्य के लिए नहीं दिया गया, यह आज शाम के लिए भी उतना ही सच है। जो चिंता सुबह से पीछा कर रही थी, वह अब भी परमेश्वर की उपस्थिति से बड़ी नहीं है।

शुक्रवार की यह शाम एक हफ्ते को बंद करती है। जो कुछ अधूरा रह गया, जो हिसाब पूरे नहीं हुए, उन्हें आज रात परमेश्वर के हाथ में सौंपा जा सकता है। वह हाथ पकड़े हुए नहीं, थामे हुए है।

आज
अपनी दोनों मुट्ठियाँ खोलकर घुटनों पर रख दें, और धीरे से बोलें, “प्रभु मेरा सहायक है।” इसे तीन बार दोहराएँ, जब तक हाथ सच में ढीले न पड़ जाएँ।

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