परमेश्वर का प्रेम, हर हाल में साथ
प्रेम और सुरक्षा
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए रोमियों 8:38-39, सभोपदेशक 3:13, यिर्मयाह 18:4 and भजन संहिता 121:7.
☀ सुबह का पल
क्योंकि मैं निश्चय जानता हूँ, कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएँ, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ्य, न ऊँचाई, न गहराई और न कोई और सृष्टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी।
रोमियों 8:38-39
आज का दिन शुरू होते ही यह अनकहा नियम फिर से काम पर लग जाता है, कि आपकी कीमत आज के प्रदर्शन से तय होगी। अच्छा काम, सही जवाब, समय पर पहुँचना, यही मानो आपके होने का आधार है। और अगर आज कुछ गड़बड़ हो जाए, तो जैसे आपकी जगह भी हिल जाती है।
पौलुस इस सुबह उस नियम में दरार डालता है। वह मृत्यु, जीवन, स्वर्गदूत, वर्तमान, भविष्य, ऊँचाई, गहराई, सब कुछ गिनता है, और कहता है इनमें से कोई भी परमेश्वर के प्रेम से आपको अलग नहीं कर सकता। यह प्रेम आपके आज के काम पर टिका नहीं है।
जब आप अभी थके हुए उठे हैं, या मन में कोई चिंता पहले से बैठी है, तो यही आधार काफी है। यीशु मसीह में आप पहले से ही थामे हुए हैं, इससे पहले कि दिन कुछ साबित करने की माँग करे।
यह सोच लापरवाही नहीं सिखाती, यह जड़ मजबूत करती है। आप काम करेंगे, बात करेंगे, चलेंगे, पर एक ऐसी जगह से जहाँ आपकी पहचान पहले से सुरक्षित है, न कि उससे जो आज बनेगी या बिगड़ेगी।
आज
एक छोटा कागज़ का टुकड़ा लें और उस पर वह एक चिंता लिखें जो आज सुबह आपके मन में सबसे पहले आई। नीचे लिख दें, यह मुझे परमेश्वर के प्रेम से अलग नहीं कर सकती। इस कागज़ को अपनी जेब में या मेज़ पर रख दें, ताकि दिन में एक बार नज़र पड़े।
✦ दोपहर का पल
और यह भी परमेश्वर का दान है कि मनुष्य खाए-पीए और अपने सब परिश्रम में सुखी रहे।
सभोपदेशक 3:13
थाली सामने रखी है, पर मन अभी भी सुबह की मीटिंग में अटका है।
भोजन का समय आ गया है, पर शरीर बैठा है और मन कहीं और भागता रहता है। हम खाना निगल लेते हैं ताकि जल्दी वापस काम पर लौट सकें, मानो यह समय बस एक रुकावट हो जिसे पार करना है।
पर सुलैमान कुछ और ही कहता है। वह खाने-पीने को, और अपने परिश्रम में भलाई भोगने को, परमेश्वर का उपहार बताता है। यह छोटी सी बात नहीं है। रोटी का हर टुकड़ा, हर घूंट पानी, हर पल जो दोपहर में मिलता है, वह उसकी ओर से दिया गया है।
जब हम उपहार को जल्दी में निगल जाते हैं, तो हम देने वाले को भूल जाते हैं। परमेश्वर चाहता है कि हम काम में डूबे रहें, पर काम के बीच जो सांस मिलती है उसे भी पहचानें। यह भोजन का समय आराम नहीं, बल्कि उसकी भलाई का एक छोटा प्रमाण है।
आज
आज दोपहर के भोजन से पहले अपना फोन और लैपटॉप एक ओर रख दें। खाना शुरू करने से पहले धीरे से बोलें, यह भोजन तेरा उपहार है, प्रभु, धन्यवाद। फिर पहले पाँच कौर बिना जल्दी किए, ध्यान से खाएं।
◐ दोपहर का पल
जो मिट्टी का बर्तन वह बना रहा था वह बिगड़ गया, तब उसने उसी का दूसरा बर्तन अपनी समझ के अनुसार बना दिया।
यिर्मयाह 18:4
कुम्हार का चाक तेज़ी से घूमता है, हाथ भीगी मिट्टी को थामे रहते हैं, और अचानक बर्तन एक तरफ झुक जाता है, दीवार पतली रह जाती है, आकार बिगड़ जाता है। कुम्हार उसे फेंकता नहीं। वह उसी मिट्टी को दबाकर फिर एक ढेर बना देता है और नए सिरे से शुरू करता है, चाक फिर घूमता है।
दोपहर का यही समय है जब दिन का बना हुआ बर्तन बिगड़ता दिखता है। सुबह की योजना टेढ़ी हो गई, बातचीत बिगड़ गई, काम का हिसाब गड़बड़ा गया। मन कहता है, अब इसका कुछ नहीं हो सकता।
पर यशायाह का यह चित्र इतनी जल्दी दिलासा नहीं देता। यह सिर्फ यह कहता है कि कुम्हार के हाथ में मिट्टी दबती है, फिर से आकार बदलती है। यह प्रक्रिया आसान नहीं, दबाव है, दोबारा शुरुआत है, और मिट्टी को इसमें कोई राय नहीं दी जाती।
यही जगह है जहाँ मन चुभता है। हम सुधरना चाहते हैं पर अपनी शर्तों पर, दबे हुए नहीं, दोबारा गूँधे हुए नहीं। परमेश्वर के हाथ में होना अक्सर वैसा ही लगता है जैसा बिगड़े हुए बर्तन को फिर से ढेर बनना।
फिर भी वही हाथ है जो फेंकता नहीं, बनाता रहता है, जैसा उसे भला लगे।
आज
एक कागज़ का टुकड़ा लो, आज जो योजना या रिश्ता बिगड़ा हुआ लगता है उसे एक पंक्ति में लिख दो। उस कागज़ को हाथ में एक मिनट थामे रहो और धीरे से कहो, प्रभु, इसे फिर से आकार दे।
☾ संध्या का क्षण
यहोवा सारी विपत्ति से तेरी रक्षा करेगा; वह तेरे प्राण की रक्षा करेगा।
भजन संहिता 121:7
रखेगा। यही एक शब्द दो बार आया है, और यह दिन के अंत में सुनने के लिए सबसे ज़रूरी शब्द है। पूरे दिन तुमने खुद को रखने की कोशिश की, हर मीटिंग, हर फैसला, हर छोटी झुंझलाहट को संभाला। अब कोई और बोल रहा है, कोई कह रहा है कि रखने का काम अब उसका है।
ध्यान देना, यह वादा हर मुसीबत को टालने का नहीं है। यह इससे गहरा है, यह कहता है कि जब मुसीबत आए भी, तब भी वह तुम्हारी आत्मा को रखेगा। यानी तुम्हारी बाहरी परिस्थिति नहीं, बल्कि तुम्हारा भीतरी अस्तित्व उसकी सुरक्षा में है, वह हिस्सा जिसे तुम अपने हाथों से नहीं थाम सकते।
आज का दिन जैसा भी बीता हो, अच्छा या थका देने वाला, अभी यही सच है। परमेश्वर ने आज दिन भर तुम्हें देखा, और अब भी वह जाग रहा है जबकि तुम विश्राम करने जा रहे हो। तुम्हें अपनी रक्षा का बोझ अब उठाना नहीं है।
यह भी सोचो, वह तुम्हारी आत्मा को रखता है, तुम्हारे भीतर की शांति, तुम्हारी पहचान, तुम्हारा विश्वास। जो कुछ आज तुम्हें छू गया या हिला गया, वह उसे भी थामे रखने में सक्षम है।
आज
आज रात सोने से पहले, बिस्तर पर बैठकर धीरे से यह शब्द बोलो, वह मेरी आत्मा को रखेगा। इसे तीन बार दोहराओ, धीरे धीरे, जब तक साँस शांत न हो जाए।
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38क्योंकि मैं निश्चय जानता हूँ, कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएँ, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ्य, न ऊँचाई,
39न गहराई और न कोई और सृष्टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी।
13और यह भी परमेश्वर का दान है कि मनुष्य खाए-पीए और अपने सब परिश्रम में सुखी रहे।
4जो मिट्टी का बर्तन वह बना रहा था वह बिगड़ गया, तब उसने उसी का दूसरा बर्तन अपनी समझ के अनुसार बना दिया।
7यहोवा सारी विपत्ति से तेरी रक्षा करेगा; वह तेरे प्राण की रक्षा करेगा।
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