विनम्रता में छिपा परमेश्वर का चुनाव
विनम्रता और चुनाव
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए गिनती 17:5, उत्पत्ति 31:34, रूत 3:2 and फिलिप्पियों 2:6-7.
☀ सुबह का पल
और जिस पुरुष को मैं चुनूँगा उसकी छड़ी में कलियाँ फूट निकलेंगी; और इस्राएली जो तुम पर बुड़बुड़ाते रहते हैं, वह बुड़बुड़ाना मैं अपने ऊपर से दूर करूँगा।”
गिनती 17:5
बारह सूखी छड़ें रातभर मिलापवाले तम्बू के अंधेरे में, साक्षीपत्र के सामने पड़ी रहीं। लकड़ी की गंध, धूल भरी सतह, कोई हलचल नहीं। बाहर इस्त्राएल का शिविर बड़बड़ाहट से भरा था, कौन असली याजक है, किसकी अगुवाई सच्ची है, इस पर झगड़ा चल रहा था।
हर छड़ी एक अगुवे की अपनी ही लाठी थी, वही जिसे वह रोज़ हाथ में लेकर चलता था, भेड़ें हाँकते समय, रास्ता नापते समय। साधारण, सूखी, मरी हुई लकड़ी। परमेश्वर ने उसी साधारण चीज़ को चुना ताकि वह बोले बिना बोल सके।
सुबह जब मूसा तम्बू में गया, हारून की छड़ी में कलियाँ थीं, फूल खिले थे, पके बादाम लटके थे। किसी ने शोर नहीं मचाया, किसी ने दलील नहीं दी। परमेश्वर ने चुपचाप जीवन दे दिया, और सारी बड़बड़ाहट थम गई।
शनिवार की सुबह अक्सर हमारे भीतर भी कोई न कोई शिकायत लेकर आती है, थकान, असुरक्षा, यह साबित करने की चाहत कि हम काफी हैं। यह छड़ी याद दिलाती है कि परमेश्वर को आपकी दलीलों की नहीं, आपकी उपलब्धता की ज़रूरत है। वह सूखी लकड़ी में भी फूल ला सकता है।
आज
आज सुबह घर से बाहर निकलकर कोई एक सूखी टहनी उठाइए और उसे मेज़ या खिड़की पर रख दीजिए। जब भी आज उस पर नज़र पड़े, याद रखिए, परमेश्वर मरे हुए में भी जीवन ला सकते हैं।
✦ दोपहर का पल
राहेल तो गृहदेवताओं को ऊँट की काठी में रखकर उन पर बैठी थी। लाबान ने उसके सारे तम्बू में टटोलने पर भी उन्हें न पाया।
उत्पत्ति 31:34
बैठ गई, यह शब्द एक पल के लिए रुकने लायक है। राहेल सिर्फ उन मूर्तियों को छुपाती नहीं, वह उन पर बैठ जाती है, अपने पूरे शरीर के भार से उन्हें दबा देती है। घर के देवता, तराफीम, छोटी-छोटी मूर्तियाँ थीं जो हर घर में रखी जाती थीं, रोज़ की सुरक्षा और मार्गदर्शन के लिए पूजी जाती थीं। उस ज़माने में इन्हें रखना केवल धार्मिक आदत नहीं थी, यह परिवार की संपत्ति और विरासत के दावे से भी जुड़ा था। जो इन्हें अपने पास रखता, वह घर का उत्तराधिकारी माना जाता।
राहेल अपने पिता लाबान का घर छोड़कर याहवे के बुलावे पर निकली है, याकूब के साथ, नए जीवन की ओर। फिर भी वह चुपके से इन पुराने देवताओं को अपने साथ ले लेती है। शायद सुरक्षा की पुरानी आदत, शायद विरासत का हक़, शायद बस यह डर कि नया रास्ता अकेले काफी नहीं होगा।
आज शनिवार है, घर का दिन, सामान समेटने और व्यवस्थित करने का दिन। हो सकता है हमारे घर में भी कुछ ऐसी चीज़ें पड़ी हों, जिन पर हम चुपचाप बैठे रहते हैं, पुराने भरोसे, पुरानी सुरक्षाएँ, जिन्हें नए विश्वास के सफ़र में भी हम छोड़ नहीं पाते।
आज
आज अपने घर में एक ऐसी छोटी चीज़ ढूंढो, एक पत्थर, एक पुरानी तस्वीर, कोई चीज़ जो तुम्हारे लिए ज़रूरत से ज़्यादा भार रखती है, और उसे उसकी हमेशा वाली जगह से हटाकर किसी और जगह रख दो, इस बात के भौतिक चिन्ह के रूप में कि उसका तुम पर आख़िरी अधिकार नहीं है।
◐ दोपहर का पल
अब जिसकी दासियों के पास तू थी, क्या वह बोअज हमारा कुटुम्बी नहीं है? वह तो आज रात को खलिहान में जौ फटकेगा।
रूत 3:2
एक आदमी को अपने ही खेत में, अपने ही अनाज के ढेर के पास, रात में सोना क्यों पड़ता था, जैसे कोई चोर उसकी फसल चुरा ले जाएगा?
खलिहान खुली जगह पर होता था, जहाँ हवा चलती रहे। बैल या मवेशी बालों पर चलकर अनाज को भूसे से अलग करते, और फिर शाम को हवा उठते ही किसान पंजे से अनाज को हवा में उछालता। भारी दाने सीधे गिर जाते, हल्का भूसा उड़ जाता। यह काम घंटों चलता, रात तक, और खुले में पड़ा अनाज बहुमूल्य था, इसलिए मालिक खुद उसकी रखवाली करते हुए वहीं सो जाता। बोअज़ उस रात वहाँ इसीलिए था, कोई विलासिता नहीं, बस अपनी मेहनत की रखवाली।
नाओमी रूत को ठीक उसी असुरक्षित घड़ी में भेजती है, जहाँ परंपरा और इज़्ज़त की रेखा बहुत पतली थी। और वहीं बोअज़ का असली चरित्र भी छनकर सामने आता है, वह छीनता नहीं, वह सुबह तक रूत की इज़्ज़त की रखवाली करता है।
यही तस्वीर बाद में यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला भी उठाता है, जब वह कहता है कि आनेवाला अपने हाथ में फटकनी लिए हुए है। खलिहान सिर्फ अनाज का स्थान नहीं, सच और झूठ के छँटने का स्थान बन जाता है।
आज सवाल यह नहीं कि तुम कितना अनाज हो, सवाल यह है कि हवा चलने पर क्या उड़ जाएगा।
आज
रसोई में जाओ, मुट्ठी भर चावल या दाल लो, और उसमें से कंकड़ बीनो। जब हाथ छाँट रहा हो, मन में एक चीज़ चुनो जो तुम्हें अलग करनी है, और उसे ज़ोर से बोल दो।
☾ संध्या का क्षण
जिसने परमेश्वर के स्वरूप में होकर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। वरन् अपने आपको ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया।
फिलिप्पियों 2:6-7
"परमेश्वर ने स्वयं को खाली कर दिया।"
यह वाक्य जितना सरल लगता है, उतना ही चौंकाने वाला है। ग्रीक भाषा में इस "खाली करने" के लिए एक खास शब्द है। इसका सीधा चित्र है एक घड़े का पूरी तरह उंडेला जाना, जब तक उसमें एक बूंद भी शेष न रहे। यह केवल कुछ कम करना नहीं है, यह पूरी तरह रिक्त हो जाना है।
पौलुस यह शब्द मसीह के लिए प्रयोग करता है। वह परमेश्वर के स्वरूप में था, पर उसने उस बराबरी को पकड़े रखने की चीज़ नहीं माना। उसने स्वयं को उंडेल दिया, दास का रूप धारण किया, मनुष्यों के समान बन गया। हमारे अनुवाद "विनम्रता" या "त्याग" कह सकते हैं, पर मूल शब्द उससे कहीं गहरा है, वह पूर्ण रिक्तता की तस्वीर है, जहाँ अपने लिए कुछ भी शेष नहीं बचता।
शनिवार की शाम अक्सर दिन भर की उपलब्धियों, निर्णयों और नियंत्रण को अपने हाथ में कसकर पकड़े रखने का समय बन जाती है। आज का दिन कैसा बीता, किसने क्या कहा, क्या ठीक हुआ, क्या नहीं। मसीह का उदाहरण आज रात पूछता है, क्या तुम अपने हाथ खोल सकते हो?
खाली होना कमज़ोरी नहीं, यह विश्वास का एक कार्य है। जो स्वयं को उंडेल सकता है, वही जानता है कि उसका भरना कोई और करेगा।
आज
आज रात एक गिलास पानी लो और उसे धीरे धीरे सिंक में उंडेल दो। जैसे पानी बहता है, उस एक बात का नाम ले लो जिसे तुम आज अपनी मुट्ठी में पकड़े हुए थे, और उसे परमेश्वर के हाथों सौंप दो।
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5और जिस पुरुष को मैं चुनूँगा उसकी छड़ी में कलियाँ फूट निकलेंगी; और इस्राएली जो तुम पर बुड़बुड़ाते रहते हैं, वह बुड़बुड़ाना मैं अपने ऊपर से दूर करूँगा।”
34राहेल तो गृहदेवताओं को ऊँट की काठी में रखकर उन पर बैठी थी। लाबान ने उसके सारे तम्बू में टटोलने पर भी उन्हें न पाया।
2अब जिसकी दासियों के पास तू थी, क्या वह बोअज हमारा कुटुम्बी नहीं है? वह तो आज रात को खलिहान में जौ फटकेगा।
6जिसने परमेश्वर के स्वरूप में होकर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा।
7वरन् अपने आपको ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया।
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