बाइबल पुस्तक

प्रेरितों के काम: पवित्र आत्मा से जन्मी कलीसिया की कहानी

परिचय

एक छोटे कमरे में लगभग एक सौ बीस लोग बैठे हैं। उनका गुरु मार डाला गया था, फिर जी उठा, और अब उनकी आँखों के सामने से उठा लिया गया है। उनके पास न मंदिर है, न पैसा, न कोई राजनीतिक ताक़त, न कोई योजना। उनके पास बस एक वादा है और बंद दरवाज़े के पीछे की प्रार्थना। तीस साल बाद वही संदेश रोमी साम्राज्य की राजधानी में, एक कैदी के मुँह से, बिना किसी रोक-टोक के सुनाया जा रहा है।

बीच में क्या हुआ? यही प्रेरितों के काम की पुस्तक है।

इस पृष्ठ पर आप जानेंगे कि यह पुस्तक किसने लिखी, किस समय और किन हालात में, इसकी बुनावट कैसी है, इसके मुख्य विषय क्या हैं, बाइबल की पूरी कहानी में इसका स्थान क्या है, और सबसे ज़रूरी बात, यह पुस्तक आपके अपने जीवन से क्या माँगती है। साथ में पढ़ने की एक व्यावहारिक योजना भी मिलेगी।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

हम इस पुस्तक को एक ख़ास कोण से देखेंगे: प्रेरितों के काम एक अधूरी किताब है, और इसका असली नायक कोई इंसान नहीं है। नाम में "प्रेरितों" लिखा है, पर कहानी में हर मोड़ पर पहल पवित्र आत्मा करते हैं। और पुस्तक का अंत किसी निष्कर्ष पर नहीं, बल्कि एक खुले दरवाज़े पर होता है: पौलुस रोम में कैद है और सुसमाचार आज़ाद है। लूका जान-बूझकर कहानी को अधूरी छोड़ते हैं, क्योंकि उसका अगला अध्याय हर उस कलीसिया में लिखा जाता है जो इस आत्मा पर भरोसा करना सीखती है। यही कोण हमें पूरे पृष्ठ में साथ देगा।

बाइबल प्रेरितों के काम के बारे में क्या कहती है?

पुस्तक अपनी पहचान खुद बताती है। पहली पंक्ति में लेखक कहता है: "हे थियुफिलुस, मैं ने पहला वृत्तान्त उन सब बातों के विषय में लिखा, जो यीशु आरम्भ से करता और सिखाता रहा" (प्रेरितों 1:1)। यह "पहला वृत्तान्त" लूका का सुसमाचार है, जो उसी थियुफिलुस को समर्पित है। इसलिए लूका और प्रेरितों के काम को एक ही लेखक की दो-खंडों वाली रचना समझना चाहिए। कलीसिया की सबसे पुरानी गवाही एकमत है कि लेखक लूका है, वह वैद्य जिसे पौलुस "प्रिय वैद्य लूका" कहता है (कुलुस्सियों 4:14) और जो पौलुस के कारावास के दिनों में भी उसके साथ था (2 तीमुथियुस 4:11)। पुस्तक के भीतर कुछ हिस्सों में कथन अचानक "वे" से "हम" में बदल जाता है, जैसे प्रेरितों 16, 20, 21 और 27 अध्यायों में। यह लेखक का हस्ताक्षर है: वह वहीं था, उसने यह सब देखा था।

लिखे जाने का समय तय करना कठिन है, पर सबसे स्वाभाविक अनुमान यही है कि लूका ने यह पुस्तक पौलुस के रोम के दो साल के कारावास के आसपास, यानी लगभग सन् 62 से 70 के बीच पूरी की। इसका सबसे बड़ा कारण खुद पुस्तक की चुप्पी है: वह यरूशलेम के मंदिर के नाश (सन् 70), नीरो के भयानक अत्याचार और पौलुस की मृत्यु के बारे में कुछ नहीं कहती। जो लेखक स्तिफनुस और याकूब की मृत्यु दर्ज करता है, वह पौलुस की मृत्यु को क्यों छोड़ देगा, यदि वह उस समय तक हो चुकी होती?

पुस्तक का मक़सद केवल इतिहास लिखना नहीं है। लूका दिखाना चाहता है कि जो यीशु मसीह ने शुरू किया, वे उसे आत्मा के द्वारा जारी रखे हुए हैं। इसीलिए वह "उन सब बातों" की बात करता है जो यीशु "आरम्भ से करता और सिखाता रहा"। पुनरुत्थान के बाद यीशु का काम रुका नहीं; उसका तरीका बदल गया।

इस काम का पूरा नक़्शा एक ही पद में खिंचा हुआ है: "परन्तु जब पवित्र आत्मा तुम पर आएगा तब तुम सामर्थ्य पाओगे; और यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक मेरे गवाह होगे" (प्रेरितों 1:8)। ध्यान दीजिए कि यह आज्ञा नहीं, भविष्यवाणी है। यीशु यह नहीं कहते, "कोशिश करो कि तुम गवाह बन जाओ"; वे कहते हैं, "तुम गवाह होगे।" और उससे पहले वह सामर्थ्य का वादा करते हैं, क्योंकि गवाही इंसानी हिम्मत से नहीं, आत्मा की सामर्थ्य से निकलती है।

वह वादा दूसरे अध्याय में पूरा होता है: "और वे सब पवित्र आत्मा से भर गए, और जिस प्रकार आत्मा ने उन्हें बोलने की सामर्थ्य दी, वे अन्य अन्य भाषा बोलने लगे" (प्रेरितों 2:4)। यह अनुभव किसी चुने हुए धार्मिक वर्ग को नहीं मिला, "वे सब" भर गए, स्त्रियाँ भी, साधारण गलीली मछुए भी। और पहला फल क्या था? दूसरों की भाषाओं में परमेश्वर के बड़े कामों का वर्णन। आत्मा से भरना, लूका के लिए, सबसे पहले बोलने की हिम्मत है।

उस भरने के तुरंत बाद पतरस का प्रचार होता है, और तीन हज़ार लोग विश्वास करते हैं। नई भीड़ क्या करती है? "और वे प्रेरितों से शिक्षा पाने, और संगति रखने में, और रोटी तोड़ने और प्रार्थना करने में लौलीन रहे" (प्रेरितों 2:42)। आत्मा से जन्मी कलीसिया अराजक भीड़ नहीं बनी, वह एक सिखाई जाने वाली, साथ खाने वाली, प्रार्थना करने वाली मंडली बनी।

और इस पूरी गवाही का केन्द्र एक ही नाम है। महासभा के सामने खड़ा होकर पतरस कहता है: "और किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं, क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें" (प्रेरितों 4:12)। पवित्र आत्मा कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं जो जहाँ चाहे ले जाए; वे हमेशा यीशु मसीह की ओर इशारा करते हैं। जहाँ आत्मा काम करते हैं, वहाँ मसीह बड़ा होता है।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

प्रेरितों के काम आसमान से गिरी हुई कोई नई कहानी नहीं है। यह पुरानी वाचा के कई अधूरे धागों को एक साथ बाँधती है।

पहला धागा अब्राहम का है। परमेश्वर ने उससे कहा था: "और पृथ्वी के सारे कुल तेरे द्वारा आशीष पाएँगे" (उत्पत्ति 12:3)। सदियों तक यह वादा एक ही राष्ट्र की सीमाओं में सिमटा दिखा। प्रेरितों के काम में वह बाँध टूटता है: सामरी विश्वास करते हैं, कूश देश का एक अधिकारी बपतिस्मा लेता है, रोमी सेना का कप्तान कुरनेलियुस आत्मा पाता है, और अन्ताकिया, इफिसुस, कुरिन्थ, रोम तक कलीसियाएँ खड़ी होती हैं। पौलुस अपनी सेवा को समझाने के लिए यशायाह के शब्द उठाता है: "मैं ने तुझे अन्यजातियों के लिये ज्योति ठहराया है, कि तू पृथ्वी की छोर तक उद्धार का द्वार हो" (प्रेरितों 13:47)।

दूसरा धागा योएल की भविष्यवाणी है। पिन्तेकुस्त के दिन जब भीड़ हैरान होती है, पतरस कोई नई बात नहीं गढ़ता, वह पुरानी वाचा खोलता है: "परमेश्वर कहता है, कि अन्त कदमों में ऐसा होगा, कि मैं अपना आत्मा सब मनुष्यों पर उंडेलूँगा" (प्रेरितों 2:17)। जो कभी केवल भविष्यद्वक्ताओं, राजाओं और चुने हुए न्यायियों पर आता था, अब वह सब विश्वासियों पर उँडेला जा रहा है। मूसा की एक तड़प, "भला होता कि यहोवा की सारी प्रजा भविष्यद्वक्ता होती" (गिनती 11:29), यहाँ पूरी होती है।

तीसरा धागा बाबेल है। उत्पत्ति 11 में मनुष्य ने अपने नाम के लिए एक गुम्मट बनाया और परमेश्वर ने भाषाएँ बिखेर दीं। पिन्तेकुस्त में परमेश्वर भाषाओं को मिटाते नहीं, उन्हें अपनी महिमा के लिए इस्तेमाल करते हैं; हर आदमी अपनी ही बोली में परमेश्वर के बड़े काम सुनता है। बाबेल का शाप उलट गया, पर एकरूपता से नहीं, अनुग्रह से।

नई वाचा में यह पुस्तक एक पुल की तरह खड़ी है। चारों सुसमाचार बताते हैं कि यीशु ने क्या किया और क्या सहा; पत्रियाँ उन कलीसियाओं को लिखी गई हैं जिनका जन्म प्रेरितों के काम में दर्ज है। यदि यह पुस्तक न होती, तो हम रोमियों, गलातियों, थिस्सलुनीकियों या इफिसियों की पत्रियों के पीछे की गलियाँ, दंगे, जेलें और आँसू कभी न समझ पाते। और सारी कहानी मसीह पर आकर टिकती है: पतरस का उपदेश यीशु के पुनरुत्थान पर टिका है, स्तिफनुस मरते समय "मनुष्य के पुत्र" को परमेश्वर की दाहिनी ओर खड़ा देखता है, पौलुस राजा अग्रिप्पा के सामने भी अंत में क्रूस और जी उठने की बात पर पहुँचता है। आत्मा का पूरा अभियान एक ही व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमता है।

रचना और मुख्य विषय

पुस्तक की बुनावट समझने की सबसे आसान चाबी प्रेरितों 1:8 है। लूका उसी क्रम में कहानी बढ़ाता है, जैसे किसी पत्थर को पानी में फेंकने पर लहरें फैलती हैं।

अध्याय 1 से 7 यरूशलेम की कहानी है। आत्मा का उतरना, पतरस का प्रचार, कलीसिया का साझा जीवन, पहला चमत्कार, पहली गिरफ़्तारी, पहला भीतरी पाप (हनन्याह और सफीरा), पहला प्रशासनिक संकट (सात सेवकों का चुनाव), और अंत में स्तिफनुस की गवाही और हत्या। अध्याय 8 से 12 में सुसमाचार यहूदिया और सामरिया में फैलता है: फिलिप्पुस सामरिया और गाज़ा की सड़क पर, शाऊल का दमिश्क के रास्ते पर परिवर्तन, पतरस का कैसरिया में कुरनेलियुस के घर जाना, और अन्ताकिया में पहली मिली-जुली कलीसिया, जहाँ "चेले पहले-पहल मसीही कहलाए" (प्रेरितों 11:26)। अध्याय 13 से 28 में लहर पृथ्वी की छोर तक जाती है: पौलुस की तीन मिशन यात्राएँ, यरूशलेम की सभा (अध्याय 15) जहाँ यह तय होता है कि अन्यजातियों को यहूदी बनने की ज़रूरत नहीं, फिर गिरफ़्तारी, कैसरिया में दो साल, तूफ़ान, जहाज़ का टूटना, और रोम।

एक और तरीके से देखें तो पुस्तक दो हिस्सों में बँटी है: पहले बारह अध्यायों में केन्द्र में पतरस है, बाद के अध्यायों में पौलुस। लूका दोनों की कहानी जान-बूझकर आपस में गूँथता है; दोनों लंगड़े को चंगा करते हैं, दोनों जेल जाते हैं, दोनों को आत्मा एक दर्शन के द्वारा नई दिशा देते हैं। संदेश साफ़ है: यह किसी एक व्यक्ति की प्रतिभा नहीं, एक ही आत्मा का काम है।

लूका बीच-बीच में छोटे-छोटे "प्रगति वाक्य" रखता है, जैसे "और परमेश्वर का वचन बढ़ता गया और यरूशलेम में चेलों की गिनती बहुत ही बढ़ती गई" (प्रेरितों 6:7)। ये वाक्य अध्यायों को जोड़ने वाली कीलें हैं और ध्यान दिलाते हैं कि बढ़ने वाला "वचन" है, संस्था नहीं।

मुख्य विषय कुछ इस तरह उभरते हैं। सबसे पहले, पवित्र आत्मा की पहल। आत्मा प्रचार करने को कहते हैं, कभी रोकते हैं, कभी सेवकों को अलग करते हैं: "पवित्र आत्मा ने कहा, 'मेरे लिये बरनबास और शाऊल को अलग करो'" (प्रेरितों 13:2)। मिशन का पहला विचार किसी बैठक में नहीं जन्मा, आत्मा से आया। दूसरा विषय गवाही और साहस है। जब अधिकारी चुप रहने का हुक्म देते हैं, पतरस और यूहन्ना जवाब देते हैं: "क्योंकि यह तो हम से हो नहीं सकता, कि जो हम ने देखा और सुना है, वह न कहें" (प्रेरितों 4:20)। तीसरा, विरोध के बीच बढ़ना: कोड़े, पत्थर, जेल और तूफ़ान कहानी को धीमा नहीं करते, वे उसे नए इलाकों में धकेलते हैं। चौथा, दीवारों का टूटना: भाषा, जाति, वर्ग और धार्मिक शुद्धता की दीवारें एक-एक कर गिरती हैं। पाँचवाँ, कलीसिया का ठोस जीवन: शिक्षा, संगति, रोटी तोड़ना, प्रार्थना, ग़रीबों की देखभाल, अगुवों की नियुक्ति। और आख़िर में, परमेश्वर की सर्वसामर्थी अगुवाई: हर बंद दरवाज़ा किसी और दरवाज़े को खोलता है।

इस पुस्तक के मुख्य पद

प्रेरितों 1:8: "परन्तु जब पवित्र आत्मा तुम पर आएगा तब तुम सामर्थ्य पाओगे; और यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक मेरे गवाह होगे।" चेलों ने अभी-अभी पूछा था कि राज्य कब बहाल होगा; वे नक़्शे और तारीख़ें चाहते थे। यीशु उन्हें समय नहीं, सामर्थ्य देते हैं, और उनकी नज़र सिंहासन से हटाकर पड़ोसी की ओर मोड़ देते हैं। यहाँ "गवाह" शब्द अदालत की भाषा है: गवाह अपनी राय नहीं देता, जो देखा उसकी सच्चाई बताता है। इसलिए मसीही गवाही का बोझ यह नहीं कि हम कितने चतुर हैं, बल्कि यह कि हमने किसे देखा है। और ध्यान दीजिए, यरूशलेम छोड़े बिना कोई छोर तक नहीं पहुँचता; अपने घर और मुहल्ले से भागकर मिशन नहीं होता।

प्रेरितों 2:42: "और वे प्रेरितों से शिक्षा पाने, और संगति रखने में, और रोटी तोड़ने और प्रार्थना करने में लौलीन रहे।" पिन्तेकुस्त की आग के ठीक बाद लूका हमें भावनाओं का वर्णन नहीं, बल्कि चार आदतें देता है। "लौलीन रहे" का अर्थ है डटे रहना, लगातार जुटे रहना। यह पद हर पीढ़ी की कलीसिया के लिए पैमाना है: क्या हम प्रेरितों की शिक्षा के अधीन हैं, या अपनी पसंद के विचारों के? क्या हमारी संगति में पैसा और समय भी साझा होता है, या केवल मुस्कुराहटें? क्या हम प्रभु भोज पर एक ही मेज़ के आसपास आते हैं? क्या हमारी प्रार्थना संकट के समय की मजबूरी है या रोज़ की साँस? आत्मा उत्साह देते हैं, फिर उसे आदतों में ढालते हैं।

प्रेरितों 28:31: "और वह बिना रोक-टोक, बड़े निडर होकर परमेश्वर के राज्य का प्रचार करता और प्रभु यीशु मसीह के विषय में सिखाता रहा।" यह बाइबल के सबसे चौंकाने वाले अंतों में से एक है। न पौलुस की रिहाई, न उसकी मृत्यु, न कोई विजय-गीत। एक जंजीर में बँधा आदमी, किराए के घर में, और आख़िरी शब्द यूनानी में एक ही शब्द है जिसका अर्थ है "बिना रोक-टोक"। लूका कहना चाहता है: इंसान बाँधा जा सकता है, वचन नहीं। कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती, वह हमारे हाथ में सौंप दी जाती है।

दर्पण

अब सवाल आपसे है। आप इस पुस्तक को पढ़ते समय किस तरफ़ खड़े हैं?

अगर आप ईमानदार हैं, तो प्रेरितों के काम पढ़ना थोड़ा असहज करता है। हम अपनी आत्मिकता को इतना सुरक्षित बना लेते हैं कि उसमें जोखिम की कोई गुंजाइश नहीं बचती। हम प्रार्थना करते हैं कि परमेश्वर हमारा मार्ग "खोल दें", पर हमारा मतलब सिर्फ़ प्रमोशन, वीज़ा और अच्छे रिश्ते होते हैं। पौलुस के लिए खुला दरवाज़ा अक्सर जेल का दरवाज़ा था। जिस रात वह फिलिप्पी की काल कोठरी में गीत गा रहा था, उसकी पीठ पर कोड़ों के निशान ताज़े थे।

सोचिए कहाँ-कहाँ यह पुस्तक आपकी ज़िंदगी से टकराती है। दफ़्तर में, जहाँ आप सालों से उन साथियों के बीच काम कर रहे हैं जिन्हें आपने कभी नहीं बताया कि आपकी आशा किस पर टिकी है। पैसे में, जहाँ प्रेरितों 2 और 4 की कलीसिया अपनी संपत्ति खोलकर बैठ जाती है और हम अपने बजट के हर हिस्से पर अपना नाम लिखकर रखते हैं। परिवार में, जहाँ फिलिप्पी के जेलर का पूरा घराना उसी रात बदल गया और हम अपने ही घर में सुसमाचार की बात करने से हिचकते हैं। अकेलेपन में, जहाँ हमें लगता है कि हमारी उपस्थिति किसी के लिए मायने नहीं रखती, पर तबीता जैसी एक विधवा की सिलाई पूरे याफ़ा शहर को रुला देती है।

और फिर एक और तरह के पाठक हैं: वे जो थक चुके हैं। जिन्होंने सेवा की, दिया, प्रार्थना की, और फल नहीं देखा। यह पुस्तक आपके लिए भी है, क्योंकि यह ईमानदार है। इसमें ऐसी सभाएँ हैं जहाँ लोग हँसते हैं, ऐसे शहर हैं जहाँ से भागना पड़ता है, ऐसे मतभेद हैं जो दो साथियों को अलग कर देते हैं (प्रेरितों 15:39), और ऐसे लोग हैं जो शहीद हो जाते हैं। फिर भी वचन बढ़ता जाता है।

आपको हीरो बनने के लिए नहीं बुलाया गया। आपको गवाह बनने के लिए बुलाया गया, और गवाह को केवल सच बोलना है।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को प्रेरितों के काम बहुत पसंद आती है, क्योंकि यह घटनाओं से भरी है: आग जैसी जीभें, जेल के दरवाज़े खुल जाना, समुद्र में तूफ़ान, अंधे की आँखें खुलना, और एक ऐसा आदमी जो पहले मसीहियों को पकड़वाता था और बाद में सबसे बड़ा प्रचारक बन गया।

छोटे बच्चों से बात करते समय सबसे सरल तरीका यह है: यीशु स्वर्ग जाने से पहले अपने दोस्तों से कहते हैं, "मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूँगा, मैं तुम्हें अपना आत्मा दूँगा।" फिर एक दिन परमेश्वर का आत्मा आता है और डरे हुए दोस्त बहादुर हो जाते हैं। वे सब लोगों को यीशु के बारे में बताने लगते हैं, और चाहे कोई उन्हें रोकने की कोशिश करे, ख़ुशख़बरी रुकती नहीं। इस तरह दुनिया भर में परमेश्वर का परिवार, यानी कलीसिया, बनने लगा, और आज हम भी उसी परिवार का हिस्सा हैं।

बच्चों के मन में सवाल भी उठेंगे: पवित्र आत्मा दिखते क्यों नहीं? स्तिफनुस को क्यों मारा गया? क्या आज भी चमत्कार होते हैं? इन सवालों को टालने की ज़रूरत नहीं; उन्हें उमर के हिसाब से सच्चे और सरल जवाब देना ही सबसे अच्छी शिक्षा है।

Faith.network पर इस पुस्तक की अलग-अलग उम्र के हिसाब से व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: छोटे बच्चों (3 से 6 वर्ष) के लिए कहानी-रूप में, स्कूल जाने वाले बच्चों (7 से 12 वर्ष) के लिए नक़्शे और सवाल-जवाब के साथ, और किशोरों (12 वर्ष से ऊपर) के लिए गहरे प्रश्न, जैसे साहस, पहचान और मित्रों के दबाव के बीच विश्वास। घर की उपासना या रविवार की कक्षा के लिए उन पृष्ठों का इस्तेमाल कीजिए।

पढ़ने की व्यावहारिक मार्गदर्शिका

इस पुस्तक को टुकड़ों में नहीं, बहाव में पढ़िए। चार हफ़्तों की एक सरल योजना यह है। पहले हफ़्ते में अध्याय 1 से 7 पढ़िए और हर दिन एक सवाल साथ रखिए: पवित्र आत्मा यहाँ क्या करते हैं? दूसरे हफ़्ते में अध्याय 8 से 14, और इस बार देखिए कि सुसमाचार किन-किन दीवारों को पार करता है, और उसकी कीमत कौन चुकाता है। तीसरे हफ़्ते में अध्याय 15 से 21, जहाँ यरूशलेम की सभा और पौलुस की यात्राएँ हैं; एक नक़्शा सामने रखिए, क्योंकि भूगोल जानने से यह पुस्तक अचानक जीवित हो जाती है। चौथे हफ़्ते में अध्याय 22 से 28, जहाँ पौलुस अपनी गवाही बार-बार दोहराता है; उसकी गवाही के ढाँचे से सीखिए कि अपनी कहानी दूसरों को कैसे सुनाई जाती है।

साथ में तीन आदतें रखिए। पहला, हर अध्याय में एक प्रार्थना खोजिए और उसे अपने शब्दों में दोहराइए। दूसरा, पौलुस की यात्राओं के साथ-साथ उसी शहर की पत्री पढ़िए, जैसे अध्याय 17 के बाद 1 थिस्सलुनीकियों और अध्याय 18 के बाद 1 कुरिन्थियों; कहानी और चिट्ठी एक-दूसरे को समझाती हैं। तीसरा, हर हफ़्ते के अंत में एक ठोस कदम लिखिए, कोई नाम, कोई फ़ोन कॉल, कोई दान, कोई माफ़ी। यह पुस्तक जानकारी के लिए नहीं, चलने के लिए लिखी गई है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रेरितों के काम पुस्तक का लेखक कौन है?

लेखक अपना नाम नहीं लिखता, पर पहली पंक्ति में वह अपनी पिछली रचना का ज़िक्र करता है, जो लूका का सुसमाचार है; दोनों पुस्तकें थियुफिलुस को समर्पित हैं। भाषा, शैली और चिकित्सा से जुड़े शब्दों के प्रयोग के साथ-साथ पुस्तक के "हम" वाले हिस्से (जैसे प्रेरितों 16:10 से आगे) बताते हैं कि लेखक पौलुस की यात्राओं में शामिल था। दूसरी सदी की कलीसिया की एकमत गवाही यही है कि यह लूका है, वह अन्यजाति वैद्य जिसे पौलुस "प्रिय वैद्य" कहता है।

प्रेरितों के काम कब लिखी गई थी?

सबसे स्वाभाविक अनुमान लगभग सन् 62 से 70 के बीच का है। पुस्तक पौलुस के रोम के दो साल के कारावास पर अचानक ख़त्म हो जाती है और उसकी मृत्यु, नीरो के अत्याचार या सन् 70 में यरूशलेम के मंदिर के नाश का कोई ज़िक्र नहीं करती। जो लेखक स्तिफनुस और याकूब की हत्या को दर्ज करता है, वह इतनी बड़ी घटनाओं को शायद ही छोड़ता। कुछ विद्वान इसे 80 के दशक में रखते हैं, पर पुस्तक की चुप्पी पहले वाले समय की ओर ही इशारा करती है।

प्रेरितों के काम में कितने अध्याय हैं और यह कितने साल की कहानी है?

इसमें अट्ठाईस अध्याय हैं और यह लगभग तीस साल की कहानी कहती है, यीशु मसीह के स्वर्गारोहण (लगभग सन् 30) से लेकर पौलुस के रोम में कैद रहने (लगभग सन् 60 से 62) तक। लूका सब कुछ नहीं लिखता; वह चुनकर लिखता है, इसलिए कहीं एक दिन का ब्यौरा कई अध्यायों में फैला है और कहीं कई साल एक वाक्य में निकल जाते हैं। उसका मक़सद पूरा इतिहास नहीं, बल्कि यह दिखाना है कि सुसमाचार यरूशलेम से रोम तक कैसे पहुँचा।

प्रेरितों के काम का मुख्य विषय क्या है?

मुख्य विषय यह है कि जी उठे यीशु मसीह अपना काम पवित्र आत्मा और अपने गवाहों के द्वारा जारी रखते हैं, और कोई विरोध उसे रोक नहीं सकता। इसका नक़्शा प्रेरितों 1:8 में है: आत्मा की सामर्थ्य, मसीह की गवाही, और यरूशलेम से पृथ्वी की छोर तक फैलाव। साथ में तीन बड़े उपविषय चलते हैं: कलीसिया का साझा जीवन, जाति और वर्ग की दीवारों का गिरना, और दुख के बीच परमेश्वर की अगुवाई। नाम "प्रेरितों के काम" है, पर असली नायक पवित्र आत्मा हैं।

पिन्तेकुस्त के दिन असल में क्या हुआ था?

यीशु के स्वर्गारोहण के दस दिन बाद, यहूदी पर्व पिन्तेकुस्त पर, प्रार्थना करते हुए चेलों पर पवित्र आत्मा उतरे। आँधी जैसा शब्द हुआ, आग की जीभें दिखीं, और "वे सब पवित्र आत्मा से भर गए, और जिस प्रकार आत्मा ने उन्हें बोलने की सामर्थ्य दी, वे अन्य अन्य भाषा बोलने लगे" (प्रेरितों 2:4)। यरूशलेम में जुटे विभिन्न देशों के यहूदी अपनी-अपनी बोली में परमेश्वर के बड़े काम सुनने लगे। पतरस के उपदेश के बाद लगभग तीन हज़ार लोगों ने विश्वास किया और बपतिस्मा लिया। उस दिन कलीसिया सार्वजनिक रूप से जन्मी।

प्रेरितों 2:42 में "रोटी तोड़ना" का क्या अर्थ है?

"रोटी तोड़ना" उन दिनों साधारण भोजन के लिए भी कहा जाता था, पर यहाँ यह प्रभु भोज की ओर भी इशारा करता है, क्योंकि पहली कलीसिया घरों में मिलकर खाना खाती थी और उसी मेज़ पर प्रभु की मृत्यु को स्मरण करती थी। इसका मतलब है कि उनकी संगति केवल आत्मिक बातों तक सीमित नहीं थी; वे एक-दूसरे के घरों में जाते, साथ खाते, और उसी मेज़ पर मसीह के बलिदान को याद करते। आज भी सच्ची कलीसियाई संगति में शिक्षा, मेज़ और प्रार्थना अलग नहीं होते।

क्या प्रेरितों के काम में वर्णित संपत्ति साझा करना समाजवाद था?

नहीं, वह किसी सरकारी नीति या ज़बरदस्ती की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि आत्मा से जन्मी उदारता थी। लूका बताता है कि विश्वासी अपनी संपत्ति बेचकर ज़रूरतमंदों को देते थे, पर पतरस हनन्याह से साफ़ कहता है कि खेत उसका ही था और बेचने के बाद पैसा भी उसके ही अधिकार में था (प्रेरितों 5:4); उसका पाप देना नहीं, झूठ बोलना था। यह ऐसी दिल की खुशी है जो कहती है कि मेरा कुछ भी सिर्फ़ मेरा नहीं, क्योंकि मसीह ने मुझे सब कुछ दिया है।

पौलुस के जीवन का बदलाव क्यों इतना महत्वपूर्ण है?

क्योंकि वह कलीसिया के सबसे बड़े दुश्मन का सबसे बड़े मिशनरी में बदल जाना है, और यह पूरी तरह परमेश्वर की पहल है। दमिश्क के रास्ते पर वह अपने मन को नहीं बदलता; जी उठे प्रभु उसे रोक लेते हैं। अनन्याह के डर के जवाब में प्रभु कहते हैं: "तू चला जा; क्योंकि वह अन्यजातियों और राजाओं, और इस्राएलियों के सामने मेरा नाम प्रगट करने के लिये मेरा चुना हुआ पात्र है" (प्रेरितों 9:15)। ध्यान दीजिए, बुलाहट के साथ ही दुख की भविष्यवाणी भी जुड़ी है। पौलुस की कहानी हर उस इंसान के लिए आशा है जो सोचता है कि वह बहुत दूर निकल गया है।

प्रेरितों 16:31 का क्या अर्थ है, क्या एक व्यक्ति के विश्वास से पूरा घर बच जाता है?

फिलिप्पी के जेलर के सवाल के जवाब में पौलुस और सीलास कहते हैं: "प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर, तो तू और तेरा घराना उद्धार पाएगा" (प्रेरितों 16:31)। इसका अर्थ यह नहीं कि किसी और के विश्वास से आपका उद्धार हो जाएगा; अगले पद में वे "उसे और उसके सारे घर के लोगों को" वचन सुनाते हैं और सब बपतिस्मा लेते हैं। यानी उद्धार का रास्ता हर एक के लिए एक ही है, विश्वास; पर परमेश्वर अक्सर एक व्यक्ति के विश्वास को पूरे परिवार तक ख़ुशख़बरी पहुँचाने का दरवाज़ा बनाते हैं।

क्या प्रेरितों 4:12 का मतलब है कि उद्धार का कोई और रास्ता नहीं है?

हाँ, पतरस बिल्कुल यही कहता है: "और किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं, क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें" (प्रेरितों 4:12)। यह घमंड का दावा नहीं, गवाही है: जो एक बार मरकर जी उठा, वही पाप और मृत्यु को हरा सकता है। ध्यान दीजिए कि यह बात एक चंगाई के संदर्भ में कही गई है, यानी यह अपवाद बनाने का हथियार नहीं, बल्कि आशा का ऐलान है। इसलिए मसीही गवाही में नरमी होनी चाहिए, पर समझौता नहीं।

प्रेरितों के काम का अंत इतना अचानक क्यों होता है?

क्योंकि लूका पौलुस की जीवनी नहीं, वचन की यात्रा लिख रहा है। आख़िरी पद कहता है कि पौलुस "बिना रोक-टोक, बड़े निडर होकर परमेश्वर के राज्य का प्रचार करता और प्रभु यीशु मसीह के विषय में सिखाता रहा" (प्रेरितों 28:31)। जंजीर में इंसान है, पर सुसमाचार आज़ाद है, और वह साम्राज्य की राजधानी तक पहुँच चुका है। यही लूका की मंज़िल थी। अंत खुला छोड़ा गया है, ताकि पाठक समझे कि यह कहानी हर पीढ़ी में जारी है और अगला अध्याय उसे जीना है।

क्या आज भी प्रेरितों के काम जैसे चमत्कार होते हैं?

बाइबल कहीं नहीं कहती कि परमेश्वर ने चमत्कार करना बंद कर दिया, और आज भी दुनिया भर से चंगाई और अद्भुत छुटकारे की सच्ची गवाहियाँ आती हैं। साथ ही ध्यान रखिए कि प्रेरितों के काम में भी चमत्कार रोज़ की बात नहीं थे; पौलुस पत्थरवाह हुआ, कोड़े खाए, जहाज़ टूटा, और उसका साथी तीमुथियुस बीमार रहा। इसलिए चमत्कार परमेश्वर की सामर्थ्य का प्रमाण हैं, हमारे विश्वास की डिग्री का नहीं। मुख्य चमत्कार जो हर दिन होता है, वह है पत्थर जैसे दिल का बदल जाना।

प्रेरितों के काम और लूका के सुसमाचार का क्या संबंध है?

दोनों एक ही लेखक की दो-खंडों वाली रचना हैं। लूका का सुसमाचार बताता है कि यीशु ने क्या "करना और सिखाना" शुरू किया, और प्रेरितों के काम बताती है कि वे उसी काम को आत्मा और कलीसिया के द्वारा कैसे जारी रखते हैं। लूका का सुसमाचार यरूशलेम की ओर बढ़ता है; प्रेरितों के काम यरूशलेम से बाहर निकलती है। दोनों में प्रार्थना, आत्मा, ग़रीब, स्त्रियाँ और हाशिये पर पड़े लोग बार-बार सामने आते हैं। इसीलिए इन्हें लगातार, एक साथ पढ़ना सबसे लाभदायक होता है।

अंत में

प्रेरितों के काम एक अधूरी किताब है, और यह उसकी कमज़ोरी नहीं, उसका संदेश है। लूका हमें एक बंद निष्कर्ष नहीं देता, वह हमें एक किराए के घर में बैठा एक कैदी दिखाता है जिसके होंठों से परमेश्वर का राज्य बिना रोक-टोक बहता जा रहा है। यह पुस्तक हमें कोई नई तकनीक नहीं सिखाती; यह हमारा भरोसा उस पवित्र आत्मा पर लौटाती है जिनके बिना पहली कलीसिया एक कदम भी नहीं चली।

इसलिए इसे पढ़ते समय दो सवाल साथ रखिए: पवित्र आत्मा इस अध्याय में क्या कर रहे हैं, और मुझसे क्या चाहते हैं? प्रेरितों 1:8 से शुरू कीजिए, प्रेरितों 2:42 को अपनी कलीसिया के आगे आईने की तरह रखिए, और प्रेरितों 28:31 को अपनी प्रार्थना बना लीजिए। फिर आगे बढ़कर लूका का सुसमाचार पढ़िए, या पौलुस की उन पत्रियों में उतर जाइए जिनके शहर आपने इस पुस्तक में देखे।

क्योंकि अध्याय अट्ठाईस के बाद पन्ने ख़ाली हैं, और वह ख़ाली जगह आपके नाम की है।

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