विषय

पवित्र आत्मा कौन है और उसका कार्य क्या है

परिचय

सेवा के बाद एक युवा भाई ने चाय के कप के साथ धीरे से पूछा, "पिता को मैं समझ पाता हूँ, वे परमेश्वर हैं। यीशु को भी समझता हूँ, वे मेरे लिए क्रूस पर चढ़े। पर पवित्र आत्मा? वे मुझे किसी अदृश्य बिजली जैसे लगते हैं, जिसे लोग सभा में 'महसूस' करते हैं और मैं चुपचाप बैठा रह जाता हूँ।" उसकी झिझक में ईमानदारी थी, और शायद वही झिझक आपके भीतर भी कहीं बैठी हो।

यह पृष्ठ उसी सवाल के लिए लिखा गया है। यहाँ आप जानेंगे कि पवित्र आत्मा कौन हैं, वे उत्पत्ति के पहले पन्ने से प्रकाशितवाक्य के अंतिम पन्ने तक कैसे काम कर रहे हैं, वे यीशु मसीह से कैसे जुड़े हैं, कौन-सी आम ग़लतफ़हमियाँ लोगों को थका देती हैं, और सोमवार की सुबह, बिलों के बीच, बीमारी में और अकेलेपन में उनकी उपस्थिति का क्या अर्थ है।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

अधिकतर लेख पवित्र आत्मा को "सामर्थ्य" के रूप में पेश करते हैं, जिसे पाना, माँगना या इस्तेमाल करना है। यह पृष्ठ एक दूसरे कोण से चलता है: पवित्र आत्मा कोई शक्ति नहीं जिसे हम चलाएँ, बल्कि एक व्यक्ति हैं जो हमारे भीतर घर बनाने आए हैं। पूरी बाइबल असल में परमेश्वर के निवास की कहानी है, अदन की वाटिका से लेकर मिलापवाले तम्बू, मन्दिर, देहधारी मसीह और अंत में नए यरूशलेम तक। पवित्र आत्मा वह हैं जो इस निवास को हमारे भीतर वास्तविक बनाते हैं। इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि "मैं आत्मा की सामर्थ्य कैसे पाऊँ", बल्कि यह कि "जो पहले से मेरे भीतर रह रहे हैं, उनके साथ मेरा जीवन कैसा है"।

बाइबल पवित्र आत्मा के बारे में क्या कहती है?

सबसे पहली और सबसे ज़रूरी बात यह है कि बाइबल पवित्र आत्मा के लिए कभी "यह" नहीं कहती। यीशु उन्हें "वह" कहकर पुकारते हैं, और ऐसे कामों का ज़िक्र करते हैं जो केवल कोई व्यक्ति ही कर सकता है: सिखाना, स्मरण कराना, गवाही देना, अगुवाई करना, विनती करना।

यूहन्ना 14:26 में यीशु अपने चेलों से कहते हैं, "परन्तु सहायक अर्थात् पवित्र आत्मा जिसे पिता मेरे नाम से भेजेगा, वह तुम्हें सब बातें सिखाएगा, और जो कुछ मैं ने तुम से कहा है, वह सब तुम्हें स्मरण कराएगा।" ध्यान दीजिए, यहाँ शिक्षक और स्मरण कराने वाला कोई ऊर्जा नहीं है। बिजली सिखाती नहीं। हवा याद नहीं दिलाती। जो सिखाता और याद दिलाता है, वह जानता है, चाहता है, और सम्बन्ध बनाता है। और वह जो सिखाते हैं, वह कोई नई-नवेली बात नहीं, बल्कि वही है जो मसीह ने कहा। पवित्र आत्मा हमें मसीह से दूर नहीं ले जाते, वे हमें बार-बार मसीह के पास लौटा लाते हैं।

यही बात यूहन्ना 16:13 में और साफ़ होती है: "परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा, परन्तु जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा।" पवित्र आत्मा अपनी ओर से नहीं बोलते। इसमें एक गहरी नम्रता है। वे पिता और पुत्र के साथ पूर्ण सामंजस्य में काम करते हैं, और उनका आनन्द इसी में है कि मसीह की महिमा हो। इसलिए जो भी शिक्षा या अनुभव आपको मसीह से दूर, बाइबल से ऊपर, या अपने आप पर घमंडी बनाता है, वह चाहे कितना ही आत्मिक दिखे, पवित्र आत्मा की ओर से नहीं है।

पवित्र आत्मा केवल व्यक्ति नहीं, वे परमेश्वर हैं। प्रेरितों के काम 5 में जब हनन्याह झूठ बोलता है, पतरस कहता है कि उसने पवित्र आत्मा से झूठ बोला, और अगली ही साँस में कहता है कि उसने मनुष्यों से नहीं, परमेश्वर से झूठ बोला। दोनों वाक्य एक ही सच्चाई के दो पहलू हैं। यीशु ने बपतिस्मे की आज्ञा में पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा को एक ही नाम में जोड़ा। त्रिएकता का सिद्धान्त किसी दार्शनिक पहेली से नहीं, बल्कि इसी सादे अनुभव से निकला कि प्रेरितों ने आत्मा से मिलकर स्वयं परमेश्वर से भेंट की।

और यह परमेश्वर सामर्थ्य लेकर आते हैं। प्रेरितों के काम 1:8 में यीशु के अंतिम शब्दों में से एक है, "परन्तु जब पवित्र आत्मा तुम पर आएगा तब तुम सामर्थ्य पाओगे; और यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक मेरे गवाह होगे।" पर ध्यान दीजिए कि यह सामर्थ्य किस लिए है। यह चमत्कारों का तमाशा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि गवाह बनने के लिए है, उन जगहों पर जहाँ गवाही देना महँगा पड़ता है। सामर्थ्य यहाँ मिशन से जुड़ी है, और मिशन एक व्यक्ति से, यानी मसीह से।

पवित्र आत्मा मेहमान नहीं, गृहस्वामी बनकर आते हैं।

रोमियों 8:9 इसे बहुत सीधे कहता है कि यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं तो वह उसका जन नहीं। यानी पवित्र आत्मा कुछ "उन्नत" मसीहियों के लिए बोनस नहीं हैं। जो भी सचमुच मसीह का है, उसके भीतर आत्मा बसे हुए हैं। सवाल पाने का नहीं, पहचानने और मानने का है।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

बाइबल का दूसरा ही वाक्य पवित्र आत्मा का ज़िक्र करता है। उत्पत्ति 1:2 कहता है, "और पृथ्वी बेडौल और सुनसान पड़ी थी, और गहरे जल के ऊपर अन्धियारा था: तथा परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर मण्डलाता था।" जहाँ भी अव्यवस्था, सूनापन और अंधकार है, वहाँ आत्मा मण्डराते हैं और उसमें से जीवन निकालते हैं। यह छवि पूरी बाइबल में लौटती रहती है, और आपके अपने बेडौल दिनों पर भी लागू होती है।

पुराने नियम में आत्मा चुने हुए लोगों पर, चुने हुए कामों के लिए आते हैं। बसलेल पर, ताकि वह मिलापवाले तम्बू के लिए कारीगरी कर सके; न्यायियों पर, ताकि वे छुड़ाएँ; भविष्यद्वक्ताओं पर, ताकि वे परमेश्वर का वचन बोलें; शाऊल और दाऊद पर, ताकि वे राज करें। पर वहाँ एक बेचैनी भी दिखती है। दाऊद भजन 51:11 में गिड़गिड़ाता है, "मुझे अपने सामने से निकाल न दे, और अपने पवित्र आत्मा को मुझ से अलग न कर।" यह डर बताता है कि उस युग में आत्मा की उपस्थिति स्थायी और सार्वभौमिक नहीं समझी जाती थी।

इसी बीच परमेश्वर के निवास की कहानी चलती रहती है। अदन में परमेश्वर अपने लोगों के बीच चलते थे; पाप के बाद वह निकटता टूटी। फिर मिलापवाला तम्बू आया, फिर मन्दिर, जहाँ परमेश्वर की महिमा बसी, पर एक परदे के पीछे, एक इमारत में, एक शहर में। यहेजकेल के दिनों में वह महिमा मन्दिर छोड़कर चली गई, और यही सबसे बड़ी त्रासदी थी। पर उसी यहेजकेल के मुँह से परमेश्वर ने वादा किया कि वे नया मन देंगे, पत्थर का हृदय निकालकर माँस का हृदय देंगे, और अपना आत्मा लोगों के भीतर रखेंगे ताकि वे उनकी विधियों पर चलें। योएल 2:28 ने और आगे बढ़कर कहा, "उन बातों के बाद मैं सब प्राणियों पर अपना आत्मा उण्डेलूँगा।" कुछ पर नहीं, सब पर।

फिर मसीह आते हैं, और सूत्र उनमें आकर बँध जाता है। वे आत्मा से गर्भ में आए, बपतिस्मे पर आत्मा उन पर कबूतर की नाईं उतरे, आत्मा उन्हें जंगल में ले गए, और नासरत की सभा में उन्होंने यशायाह की पुस्तक खोलकर पढ़ा, "प्रभु का आत्मा मुझ पर है, इसलिए कि उसने कंगालों को सुसमाचार सुनाने के लिये मेरा अभिषेक किया है।" यीशु स्वयं वह मन्दिर हैं जिसमें परमेश्वर की पूर्णता बसती है। और वे इसलिए मरे और जी उठे कि जो निवास उनमें था, वह हममें भी हो सके। पिन्तेकुस्त के दिन योएल की भविष्यद्वाणी फूट पड़ी, और जो महिमा कभी एक इमारत में उतरी थी, वह अब साधारण स्त्री-पुरुषों में उतर आई।

इसीलिए पौलुस चौंकाने वाली बात कह पाता है कि हमारी देह पवित्र आत्मा का मन्दिर है, जो हममें बसा हुआ है। और कहानी वहीं नहीं रुकती। प्रकाशितवाक्य 21:3 में वह आवाज़ गूँजती है, "देख, परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है; वह उनके साथ डेरा करेगा।" जो अदन में टूटा, वह नए यरूशलेम में पूरा होगा, और आज पवित्र आत्मा उसी आने वाले घर की पहली किश्त हैं, बयाना हैं, हमारे भीतर रखी हुई एक चाबी।

आम भ्रांतियाँ

पहली भ्रांति यह है कि पवित्र आत्मा एक अवैयक्तिक शक्ति हैं, कोई आत्मिक बिजली जिसे "पाकर" इस्तेमाल किया जाए। इसका सीधा खण्डन इफिसियों 4:30 में है: "और परमेश्वर के पवित्र आत्मा को शोकित मत करो, जिससे तुम पर छुटकारे के दिन के लिये छाप दी गई है।" शक्ति शोकित नहीं होती। बिजली को दुख नहीं होता। केवल कोई ऐसा शोकित होता है जो प्रेम करता है। जब आप कड़वे शब्द बोलते हैं, जब आप जानबूझकर पाप में लौटते हैं, तो भीतर जो बेचैनी उठती है, वह नियम की चोट नहीं, किसी अपने का दुख है। यह जानना अनुशासन को रिश्ते में बदल देता है।

दूसरी भ्रांति यह है कि पवित्र आत्मा की उपस्थिति का प्रमाण भावनाओं का उफान है। सभा में आँसू आए तो आत्मा थे, न आए तो नहीं। पर गलातियों 5:22 आत्मा की उपस्थिति की जो सूची देता है, वह भावनाओं की नहीं, चरित्र की है: "पर आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, मेल, धीरज, और कृपा, भलाई, विश्वास।" धीरज किसी सभा में नहीं, दस साल की मुश्किल शादी में उगता है। कृपा उस सहकर्मी के साथ दिखती है जिसने आपका श्रेय चुरा लिया। फल धीरे उगता है, पर वह झूठ नहीं बोलता।

तीसरी भ्रांति यह है कि आत्मा के वरदान कुछ खास लोगों के लिए हैं, मंच पर खड़े होने वालों के लिए। 1 कुरिन्थियों 12:7 इसे साफ़ काट देता है: "किन्तु सब के लाभ पहुँचाने के लिये हर एक को आत्मा का प्रकाश दिया जाता है।" हर एक को। और मक़सद भी बताया गया है, सबके लाभ के लिए, न कि अपने रुतबे के लिए। अगर आपने कभी सोचा कि कलीसिया में आपके होने या न होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता, तो यह पद आपके नाम पर लिखा गया है। आपको कुछ दिया गया है, और वह किसी और के लिए दिया गया है।

चौथी भ्रांति यह है कि पवित्र आत्मा की अगुवाई और लिखा हुआ वचन दो अलग रास्ते हैं, और आत्मिक लोग वचन से आगे निकल जाते हैं। पर यूहन्ना 16:13 के अनुसार आत्मा "अपनी ओर से न कहेगा"। जिस आत्मा ने पवित्रशास्त्र को प्रेरित किया, वे उसके विरुद्ध जाकर आपको मार्ग नहीं दिखाएँगे। जब कोई कहे कि "आत्मा ने मुझसे कहा" और वह बात मसीह की शिक्षा से टकराती हो, तो आदर के साथ, पर बिना डरे, ना कहिए। आत्मा और वचन एक ही दिशा में इशारा करते हैं, और उस दिशा का नाम यीशु मसीह है।

आज इसे जीवन में उतारना

अगर पवित्र आत्मा मेहमान नहीं बल्कि आपके भीतर बसने आए व्यक्ति हैं, तो सबसे बड़ा बदलाव यह होगा कि आप अकेले फ़ैसले लेना बंद कर देंगे। सुबह की शुरुआत माँग से नहीं, स्वीकार से होगी: "आप यहाँ हैं। आज का दिन हम साथ जिएँगे।"

प्रार्थना में यह सबसे पहले महसूस होता है। ऐसे दिन आते हैं जब शब्द ख़त्म हो जाते हैं, जब रिपोर्ट अस्पताल से आई हो या घर में चुप्पी इतनी भारी हो कि दुआ भी न निकले। रोमियों 8:26 ठीक उसी जगह खड़ा है: "इसी रीति से आत्मा भी हमारी दुर्बलता में सहायता करता है, क्योंकि हम नहीं जानते, कि प्रार्थना किस रीति से करना चाहिए; परन्तु आत्मा आप ही ऐसी आहें भर भरकर जो बयान से बाहर है, हमारे लिये विनती करता है।" आपकी टूटी-फूटी प्रार्थना सिंहासन तक अकेली नहीं जाती। कोई उसे भीतर से पकड़कर पूरा करता है। इसलिए जब शब्द न हों, चुप बैठिए, और मान लीजिए कि उस चुप्पी में भी प्रार्थना हो रही है।

काम की जगह पर यह अलग रूप लेता है। 1 कुरिन्थियों 12:7 आपको बताता है कि आपके भीतर कुछ है जो दूसरों के लाभ के लिए है। शायद वह प्रबंधन की क्षमता है, या धैर्य से सुनने का स्वभाव, या हिसाब-किताब की समझ, या ऐसा दिल जो नए आदमी को पहले दिन अकेला नहीं छोड़ता। इन्हें छोटा मत समझिए। कलीसिया में सेवकाई की शुरुआत अक्सर उसी काम से होती है जिसे आप बिना सोचे करते हैं।

पैसे, शरीर और समय पर भी यह असर डालता है। अगर आपकी देह पवित्र आत्मा का मन्दिर है, तो जो आप देखते हैं, खाते हैं, और जिस तरह अपने शरीर के साथ पेश आते हैं, वह आत्मिक मामला है, नैतिक नियमों की सूची नहीं बल्कि किसी के साथ साझा किया गया घर। और गलातियों 5:22 का फल आपको एक बहुत व्यावहारिक जाँच देता है: पिछले महीने में क्या आप ज़्यादा धीरजवान हुए या कम? अपनी पत्नी, पति, बच्चों, बूढ़े माता-पिता के साथ आपकी आवाज़ का लहजा किस दिशा में जा रहा है? यह जाँच निर्दयी नहीं है, क्योंकि फल उगाना माली का काम है, टहनी का नहीं। आपका काम जुड़े रहना है।

फल उगाना माली का काम है, टहनी का नहीं।

दर्पण

अब मैं सीधे आपसे बात करना चाहता हूँ। आप जिस थकान को "व्यस्तता" कहकर टालते आए हैं, वह शायद अकेलेपन की थकान है। आप सुबह उठते हैं, ट्रैफ़िक में बैठते हैं, दिनभर लोगों की माँगें उठाते हैं, रात को फ़ोन की रोशनी में सो जाते हैं, और कहीं गहरे यह मान चुके हैं कि यह सब आपको अकेले ही ढोना है। यही झूठ है जिसे पवित्र आत्मा की सच्चाई तोड़ती है। आप अकेले नहीं ढो रहे। जिस दिन आपने मसीह पर भरोसा किया, परमेश्वर आपके भीतर रहने आ गए, और वे आपके अच्छे मूड के दिन जितने पास हैं, उतने ही उस दिन भी, जब आपने कुछ ऐसा किया जिस पर आपको शर्म आती है।

पर यही सच्चाई चुभती भी है। अगर कोई आपके साथ रह रहा है, तो कुछ दरवाज़े आप अब चुपचाप नहीं खोल सकते। वह पुराना गुस्सा जिसे आपने "मेरा स्वभाव है" कहकर पाल रखा है, वह हिसाब जिसमें आपने थोड़ी चालाकी कर ली, वह बात जो आपने अपने बच्चे से कही और माफ़ी नहीं माँगी, वे सब अब निजी मामले नहीं रहे। और मैं यह डराने के लिए नहीं लिख रहा। इफिसियों 4:30 कहता है कि आत्मा शोकित होते हैं, नाराज़ होकर निकल नहीं जाते। वे रुकते हैं, दुखी होकर रुकते हैं, और यही उनकी वफ़ादारी है।

तो आज एक ईमानदार सवाल पूछिए। पिछली बार आपने भीतर की उस हल्की-सी बेचैनी को कब सुना जो कहती है, "यह मत कर, यह कह दे, उसे फ़ोन कर"? क्या आपने उसे टाल दिया क्योंकि आप थके थे? पवित्र आत्मा चीख़कर नहीं बोलते; वे प्रायः फुसफुसाते हैं। और जो फुसफुसाहट लगातार टाली जाए, उसे सुनना मुश्किल होता जाता है। आज ही रुकिए, दो मिनट के लिए, और कहिए: मैं सुन रहा हूँ। बस इतना काफ़ी है शुरुआत के लिए।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों के साथ इस विषय पर बात करते समय सबसे बड़ी ग़लती यह होती है कि हम इसे रहस्यमय बना देते हैं, और बच्चा या तो डर जाता है या ऊब जाता है। सादगी बेहतर काम करती है। बच्चों को यह बताया जा सकता है कि परमेश्वर इतने बड़े हैं कि वे एक ही समय में स्वर्ग में भी हैं और हमारे दिल में भी। यीशु जब स्वर्ग गए, तो उन्होंने अपने दोस्तों को अकेला नहीं छोड़ा; उन्होंने पवित्र आत्मा को भेजा, जो हमेशा साथ रहते हैं, ठीक वैसे जैसे कोई सबसे अच्छा दोस्त जो कभी नहीं जाता।

छोटे बच्चों के लिए हवा का उदाहरण मददगार होता है। हवा दिखती नहीं, पर पंखा घूमता है, पत्ते हिलते हैं, पतंग ऊपर उठती है। वैसे ही पवित्र आत्मा दिखते नहीं, पर उनका काम दिखता है: जब दिल में सच बोलने की हिम्मत आती है, जब किसी को माफ़ करने का मन होता है, जब डर के समय शांति मिलती है। बड़े बच्चों को गलातियों 5:22 का फल दिखाया जा सकता है, कि सेब का पेड़ मेहनत करके सेब नहीं बनाता, वह बस जुड़ा रहता है और फल आ जाता है।

और यह भी बताइए कि पवित्र आत्मा हमें डाँटने के लिए नहीं, बल्कि यीशु की याद दिलाने के लिए आए हैं, जैसा यूहन्ना 14:26 कहता है।

हर उम्र के लिए यह बातचीत अलग होती है। हमारे पास इस विषय की अलग-अलग व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: छोटे बच्चों के लिए तीन से छह वर्ष तक, स्कूली बच्चों के लिए सात से बारह वर्ष तक, और किशोरों के लिए बारह वर्ष से ऊपर। अपने बच्चे की उम्र के अनुसार उसे चुनिए, और उसे पढ़ाइए नहीं, उसके साथ बैठकर बात कीजिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पवित्र आत्मा कौन है, क्या वे सचमुच परमेश्वर हैं?

पवित्र आत्मा त्रिएक परमेश्वर के तीसरे व्यक्ति हैं, पिता और पुत्र के समान ही सच्चे परमेश्वर। बाइबल उन्हें कोई शक्ति या प्रभाव नहीं, बल्कि एक व्यक्ति के रूप में दिखाती है जो सिखाते हैं, अगुवाई करते हैं, गवाही देते हैं और शोकित होते हैं। प्रेरितों के काम 5 में पतरस हनन्याह से कहता है कि उसने पवित्र आत्मा से झूठ बोला, और तुरंत जोड़ता है कि उसने परमेश्वर से झूठ बोला। यीशु ने बपतिस्मे की आज्ञा में पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा को एक ही नाम में रखा, जो उनकी बराबरी और एकता दोनों दिखाता है।

पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा में क्या अंतर है?

तीनों एक ही परमेश्वर हैं, पर तीन अलग व्यक्ति, और उनके काम अलग-अलग रूप से दिखते हैं। पिता ने उद्धार की योजना बनाई और अपने पुत्र को भेजा; पुत्र ने देह धारण करके क्रूस पर हमारे पाप उठाए और जी उठे; पवित्र आत्मा उस पूरे किए गए काम को हमारे भीतर लागू करते हैं, हमें नया जन्म देते हैं, मसीह की ओर खींचते हैं और हममें बस जाते हैं। यूहन्ना 16:13 के अनुसार आत्मा अपनी ओर से नहीं बोलते, बल्कि मसीह की महिमा करते हैं। तीनों एक-दूसरे के विरोध में नहीं, पूर्ण सामंजस्य में काम करते हैं।

मुझे कैसे पता चले कि पवित्र आत्मा मुझमें वास करते हैं?

रोमियों 8:9 कहता है कि यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं तो वह उसका जन नहीं, यानी हर सच्चे विश्वासी में आत्मा बसते हैं। इसका प्रमाण भावनाओं का उफान नहीं, बल्कि कुछ शांत निशानियाँ हैं: यीशु आपको प्रिय लगते हैं, पाप अब मीठा नहीं बल्कि भारी लगता है, आप परमेश्वर को पिता कहकर पुकारने लगते हैं, और आपके चरित्र में धीरे-धीरे गलातियों 5:22 का फल दिखने लगता है। रोमियों 8:16 कहता है कि आत्मा हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं।

क्या पवित्र आत्मा पाने के लिए कोई विशेष अनुभव ज़रूरी है?

नए नियम में पवित्र आत्मा उद्धार के साथ मिलते हैं, बाद में मिलने वाला कोई दूसरा दर्जा नहीं हैं। जब आपने मसीह पर भरोसा किया, आत्मा उसी क्षण आपमें बसे और आप पर छाप लगी। इसका अर्थ यह नहीं कि आत्मा से भरे जाने के गहरे अनुभव नहीं होते; बाइबल में और कलीसिया के इतिहास में ऐसे कई क्षण दिखते हैं। पर अनुभव को प्रमाणपत्र मत बनाइए। कुछ लोग आँसुओं के साथ मिलते हैं, कुछ चुपचाप, और परमेश्वर दोनों को समान रूप से अपनाते हैं।

आत्मा का फल और आत्मा के वरदान में क्या अंतर है?

वरदान वह है जो आत्मा आपको करने के लिए देते हैं; फल वह है जो आत्मा आपको बनाते हैं। 1 कुरिन्थियों 12:7 कहता है कि सबके लाभ पहुँचाने के लिये हर एक को आत्मा का प्रकाश दिया जाता है, यानी वरदान अलग-अलग होते हैं और सेवा के लिए दिए जाते हैं। गलातियों 5:22 का फल सबके लिए एक ही है और चरित्र से जुड़ा है। वरदान बिना फल के ख़तरनाक हो जाते हैं, इसीलिए पौलुस वरदानों की चर्चा के ठीक बीच में प्रेम का अध्याय रखता है।

पवित्र आत्मा को शोकित करने का क्या मतलब है?

इफिसियों 4:30 कहता है, "और परमेश्वर के पवित्र आत्मा को शोकित मत करो, जिससे तुम पर छुटकारे के दिन के लिये छाप दी गई है।" इस पद के आसपास पौलुस झूठ, कड़वाहट, क्रोध, गाली और क्षमा न करने की बात कर रहा है। यानी आत्मा को शोकित करना कोई रहस्यमय बात नहीं, यह रोज़मर्रा के रिश्तों में जानबूझकर की गई निर्दयता है। ध्यान दीजिए कि पद में छाप का भी ज़िक्र है, यानी वे दुखी होते हैं पर छोड़कर नहीं जाते। यही अनुग्रह है जो पश्चाताप को आसान बनाता है।

पवित्र आत्मा के विरुद्ध निन्दा क्या है, क्या वह कभी क्षमा नहीं होती?

यीशु ने यह चेतावनी उन धार्मिक अगुवों से कही थी जो उनके स्पष्ट भले कामों को शैतान का काम बता रहे थे, यानी जो सत्य को जानते हुए जानबूझकर उसे उलटा कह रहे थे। यह एक बार की फिसलन नहीं, बल्कि दिल की जमी हुई और लगातार बनी रहने वाली कठोरता है। जो व्यक्ति डरकर यह पूछता है कि कहीं मैंने तो यह पाप नहीं कर दिया, उसका डर ही इस बात का चिन्ह है कि आत्मा अब भी उसके भीतर काम कर रहे हैं। कठोर दिल ऐसा सवाल नहीं पूछता।

क्या पवित्र आत्मा आज भी चंगाई और चमत्कार करते हैं?

बाइबल में कहीं यह नहीं लिखा कि आत्मा के कार्य किस

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