1 कुरिन्थियों 1:17
पाठ
पौलुस अभी-अभी यह गिनवा चुके हैं कि उन्होंने कुरिन्थुस में किन-किन को बपतिस्मा दिया, और फिर अचानक वे इस पूरी गिनती को एक तरफ रख देते हैं: "क्योंकि मसीह ने मुझे बपतिस्मा देने को नहीं, वरन् सुसमाचार सुनाने को भेजा है।" उनका काम आत्मिक वंशावली बनाना नहीं था, बल्कि खबर पहुँचाना था। और वह खबर, वे जोड़ते हैं, "मनुष्यों के शब्दों के ज्ञान के अनुसार" नहीं सुनाई जाती। कारण भी वे साफ बताते हैं, और यही इस आयत का काँटा है: "ऐसा न हो कि मसीह का क्रूस व्यर्थ ठहरे।" यानी सुसमाचार को सजाने का एक ऐसा तरीका है जिससे वह खोखला हो जाता है।
मूल बात
यहाँ बात केवल प्रचार-शैली की नहीं, बल्कि इस बात की है कि उद्धार की सामर्थ्य कहाँ बसती है। पौलुस मानते हैं कि क्रूस का संदेश अपने भीतर ही शक्ति रखता है; वह वक्ता की वाक्पटुता से उधार नहीं लेता। जिस क्षण संदेश की प्रभावशीलता बोलनेवाले के कौशल पर टिक जाती है, उसी क्षण सुननेवाले का भरोसा मसीह से हटकर मनुष्य पर चला जाता है, और तब क्रूस "व्यर्थ" हो जाता है, खाली कर दिया जाता है। यही कुरिन्थुस की फूट की जड़ थी: लोग "पौलुस का," "अपुल्लोस का" कहकर बँट रहे थे, क्योंकि उन्होंने दूत को ही संदेश समझ लिया था। परमेश्वर एक ऐसी सामर्थ्य से बचाते हैं जो मनुष्य की योग्यता को श्रेय लेने की जगह ही नहीं देती।
साझा सूत्र
परमेश्वर का बचाने का तरीका हमेशा से ऐसा रहा है कि श्रेय बाँटा न जा सके। गिदोन की सेना घटाई जाती है, दाऊद के हाथ में तलवार नहीं बल्कि गोफन है, मूसा हकलाते हुए फिरौन के सामने भेजे जाते हैं। हर बार साधन इतना कमज़ोर रखा जाता है कि परिणाम को मानवीय क्षमता से समझाया न जा सके। पौलुस इसी धारा में खड़े हैं, और उसका चरम बिंदु क्रूस है: परमेश्वर का सबसे बड़ा उद्धार-कार्य एक रोमी फाँसी के तख्ते पर, सार्वजनिक अपमान में, पूरी विफलता जैसी दिखनेवाली घटना में हुआ। इसलिए उस संदेश को चमकदार भाषा की बैसाखी देना केवल बेकार नहीं, बल्कि उलटा है। यह उसी तर्क को झुठलाना है जिस पर पूरा उद्धार खड़ा है। पौलुस स्वयं यही निष्कर्ष निकालते हैं जब वे कहते हैं कि परमेश्वर ने "जगत के मूर्खों को चुन लिया है, कि ज्ञानियों को लज्जित करे।"
दर्पण
यह आयत उस जगह चुभती है जहाँ हम आत्मिक बातों में भी प्रभाव डालना चाहते हैं। आप समूह में बाइबल पढ़ाते हैं और भीतर एक छोटी-सी आवाज़ पूछती रहती है कि लोगों को अच्छा लगा या नहीं। आप गवाही देते समय शब्द इसलिए तौलते हैं कि आप बेवकूफ न लगें। या फिर आप दूसरी तरफ खड़े हैं: आपने किसी उपदेशक, किसी लेखक, किसी आत्मिक पिता से इतना जुड़ाव बना लिया है कि उनकी बात और मसीह की बात आपके मन में एक हो गई है, और अगर वे गिरें तो आपका विश्वास भी गिर जाएगा। पौलुस दोनों तरफ चाकू चलाते हैं: न वक्ता संदेश है, न श्रोता का लगाव उद्धार। आज ही एक काम कीजिए: उस व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसके आत्मिक प्रभाव पर आप सबसे ज़्यादा टिके हैं, और उस नाम के नीचे लिखिए "मसीह मेरे लिए क्रूस पर चढ़ा," फिर उस व्यक्ति के लिए दो मिनट प्रार्थना कीजिए, ताकि वह आपके और मसीह के बीच खड़ा न हो।
संदर्भ
कुरिन्थुस पहली सदी का एक नया-नवेला, पैसे और प्रतिष्ठा से भरा बंदरगाही शहर था, जहाँ पुराने खानदान कम थे और ऊपर चढ़ने की भूख ज़्यादा। वहाँ भाषण एक सार्वजनिक खेल था; घुमक्कड़ वक्ता शहर में आते, भीड़ जुटाते, शिष्य बनाते और शुल्क लेते। सुननेवाले पारखी थे, जैसे आज लोग संगीत या खेल की बारीकियाँ परखते हैं। ऐसे माहौल में एक कलीसिया का "मैं पौलुस का, मैं अपुल्लोस का" कहकर बँट जाना बिलकुल स्वाभाविक था; यह उनके शहर की संस्कृति थी, बस उसे कलीसिया के भीतर घसीट लाया गया था। बपतिस्मा देनेवाले का नाम गिनना भी इसी प्रतिष्ठा-खेल का हिस्सा बन गया था: किसने आपको डुबकी दी, यह आपकी आत्मिक हैसियत बताता था। पौलुस इसी सीढ़ी को लात मारते हैं।
एक बारीकी
"व्यर्थ ठहरे" के पीछे जो यूनानी शब्द है, वह है केनोओ, यानी खाली कर देना, भीतर से पोला कर देना। पौलुस यह नहीं कहते कि चतुर भाषण से क्रूस झूठा हो जाता है; वे कहते हैं कि वह खोखला हो जाता है। बाहर से वही आकार, वही शब्द, वही ईसाई शब्दावली, पर भीतर की सामर्थ्य निकल चुकी। यह चेतावनी विरोधियों को नहीं, प्रचारकों को है। एक ऐसा उपदेश संभव है जिसमें क्रूस का ज़िक्र हो और फिर भी वह खाली डिब्बा हो, क्योंकि उसका असली दम भाषा की चमक से आ रहा है, मसीह की मृत्यु से नहीं। मज़ेदार बात यह है कि यही शब्द-परिवार मसीह के अपने आपको रिक्त कर देने के लिए भी प्रयोग होता है। वे स्वयं को खाली करके बचाते हैं; हम उनके क्रूस को खाली करके नष्ट करते हैं।
मुख्य पात्र
इस आयत में पौलुस अपने बारे में सबसे कम गौरवपूर्ण बात कहते हैं जो कोई धर्मगुरु कह सकता है: मेरा काम इतना नहीं है जितना तुम समझते हो। जहाँ लोग उनके नाम पर गुट बना रहे थे, वहाँ वे राहत के साथ कहते हैं कि उन्होंने मुश्किल से किसी को बपतिस्मा दिया। यह विनम्रता का दिखावा नहीं, बल्कि एक भेजे हुए व्यक्ति की स्पष्ट आत्म-समझ है। "मसीह ने मुझे भेजा है" वाक्य में उनकी पूरी पहचान बँधी है: उनके पास अधिकार है, पर वह उधार का अधिकार है, और उधार की चीज़ पर नाम नहीं लिखा जाता। पीछे खड़े असली मुख्य पात्र मसीह हैं, जो अपने दूत को इस शर्त पर भेजते हैं कि दूत छिपा रहे और घाव दिखता रहे।
अंतर्पाठ
सबसे तीखी टकराहट मत्ती के अंत से है, जहाँ जी उठे मसीह चेलों को भेजते हैं कि जाओ, सब जातियों को चेला बनाओ और उन्हें बपतिस्मा दो। तो क्या पौलुस उसी आज्ञा को टाल रहे हैं? नहीं; वे बपतिस्मा को नकार नहीं रहे, बल्कि उस गिनती को नकार रहे हैं जिससे कुरिन्थ में गुटबाज़ी हो रही थी। बपतिस्मा कलीसिया का काम है, किसी एक व्यक्ति की छाप नहीं। दूसरी गूँज पौलुस स्वयं दो आयत बाद खोलते हैं, यशायाह से: "मैं ज्ञानवानों के ज्ञान को नाश करूँगा, और समझदारों की समझ को तुच्छ कर दूँगा।" यशायाह के दिनों में यरूशलेम के चतुर सलाहकार राजनीति से देश बचाने चले थे; परमेश्वर ने उनकी अक्ल को बेकार साबित किया। और अध्याय का अंत यिर्मयाह की उसी पुकार पर आता है: "जो घमण्ड करे वह प्रभु में घमण्ड करे।" तीनों जगह एक ही धुरी है, कि मनुष्य किस पर गर्व करे।
श्रोताओं का चेहरा
कुरिन्थ की कलीसिया में ज़्यादातर लोग वे थे जिन्हें शहर गिनता ही नहीं था: दास, कारीगर, बंदरगाह पर काम करनेवाले, कुछ थोड़े धनी संरक्षक। पौलुस उन्हें आगे याद दिलाते हैं कि "न शरीर के अनुसार बहुत ज्ञानवान, और न बहुत सामर्थी, और न बहुत कुलीन बुलाए गए।" ऐसे कानों के लिए यह आयत दो तरह से सुनाई देती होगी। एक तरफ राहत: तुम्हारा उद्धार उस भाषण-कौशल पर नहीं टिका जो तुम्हारे पास कभी नहीं था। दूसरी तरफ चुभन: तुमने भी उसी शहर की चाल पकड़ ली है, अपने शिक्षक के नाम से रौब जमाना, अपने बपतिस्मा की कहानी से हैसियत बनाना। जो लोग समाज में नीचे थे, वे कलीसिया के भीतर एक छोटी सीढ़ी बना चुके थे, और पौलुस वही सीढ़ी हटा देते हैं।
कठिन प्रश्न
अगर मनुष्यों के शब्दों का ज्ञान क्रूस को खोखला करता है, तो पौलुस स्वयं इतनी कसी हुई, अलंकारपूर्ण भाषा में क्यों लिखते हैं? इसी अध्याय में उनके प्रश्नों की झड़ी, विरोधाभासों का खेल, "परमेश्वर की मूर्खता मनुष्यों के ज्ञान से ज्ञानवान है" जैसे वाक्य, यह सब बेहद कुशल भाषा है। तो क्या तैयारी करना, अच्छा बोलना, ठीक से समझाना पाप है? इसका आसान जवाब नहीं है, और पौलुस देते भी नहीं। जो वे कहते हैं वह उद्देश्य के बारे में है, शैली के बारे में नहीं: भाषा का काम क्रूस को दिखाना है, या वक्ता को? यह अंतर बाहर से अक्सर नहीं दिखता, न सुननेवाले को, कभी-कभी न बोलनेवाले को भी। इसीलिए यह आयत एक नियम नहीं देती, एक लगातार चलनेवाली आत्म-परीक्षा देती है, जिससे कोई अच्छा वक्ता कभी मुक्त नहीं होता।
चिंतन
जब आप किसी को मसीह के बारे में बताते हैं, तो आपके भीतर का असली डर क्या होता है: कि वे मसीह को ठुकरा देंगे, या कि वे आपको मूर्ख समझेंगे?
आपकी आत्मिक कहानी में कौन-सा नाम इतना बड़ा हो गया है कि वह मसीह की जगह घेरने लगा है, और उसे उसकी सही जगह पर लौटाने के लिए आज क्या करना होगा?
क्रूस को "खाली" किए बिना उसे समझाने का मतलब आपके अपने संदर्भ में, आपकी कक्षा या समूह या घर में, ठोस रूप से क्या दिखेगा?
1 Corinthians में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
Church problems, cross shaped answers: Corinth feels very modern.
Paul For Everyone: 1 Corinthians
Wright's readable guide through love, gifts and resurrection.
1 Corinthians: An Introduction and Commentary
A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.
Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
1 Corinthians 1:17 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
1 कुरिन्थियों 1:17 का क्या अर्थ है?
1 कुरिन्थियों 1:17 किस विषय में है?
1 कुरिन्थियों 1:17 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
1 कुरिन्थियों 1:17 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 कुरिन्थियों 1:17 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Corinthians 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
कुरिन्थ की कलीसिया में लोग गुट बना चुके थे, और पौलुस एक ही सवाल से सब तोड़ देता है: "क्या मसीह बँट गया? क्या पौलुस तुम्हारे लिये क्रूस पर चढ़ाया गया?" पूछ लो अपने आप से, जिस नाम से तुम खुद को जोड़ते हो, क्या उसने तुम्हारे लिये लहू बहाया? जो तुम्हारे लिये मरा, वही तुम्हें बाँटने नहीं, जोड़ने आया है।
परमेश्वर की इच्छा से" पौलुस अपनी पहचान नहीं गिनाता, बल्कि बताता है कि यह चुनाव उसका अपना नहीं था। जिस कलीसिया में लोग गुटों में बँटे थे, वहाँ वह शुरू ही यहाँ से करता है कि बुलाहट ऊपर से आती है। और उसके साथ खड़ा है सोस्थिनेस, जो कभी विरोधी खेमे में था, अब "भाई" कहलाता है। सोचो, तुम्हारा नाम किसके साथ लिखा जा सकता है, अगर अनुग्रह अपना काम पूरा करे?
परमेश्वर ने जगत के नीचों और तुच्छों को, वरन् जो कुछ नहीं हैं उन्हें भी चुन लिया।" पौलुस कुरिन्थुस की उस कलीसिया को लिख रहा है जहाँ लोग अपने ज्ञान और रुतबे पर इतराते थे। और वह कहता है, देखो, परमेश्वर ने तुम्हें इसलिए नहीं चुना कि तुम कुछ थे। तुम्हारा खालीपन ही उसकी जगह बना। आज जो कमी तुझे शर्मिंदा करती है, वही शायद उसका दरवाजा हो।
पिता, धन्यवाद कि आपने हमें प्रभु यीशु मसीह के नाम में एक साथ बुलाया है, ताकि हम एक ही बात कहें और हम में फूट न हो। धन्यवाद उन भाई बहनों के लिए जिनके साथ मैं एक ही मन और एक ही मत होकर मिला रहता हूँ, और उस क्षमा के लिए जो हमारी दरारों को भरती है।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें