1 कुरिन्थियों 12:1
पाठ
पौलुस एक नया विषय शुरू करते हैं और उसे एक अजीब-सी नकारात्मक वाक्य-रचना से खोलते हैं: "हे भाइयों, मैं नहीं चाहता कि तुम आत्मिक वरदानों के विषय में अज्ञात रहो।" वे यह नहीं कहते कि "अब मैं तुम्हें वरदानों के बारे में सिखाता हूँ," बल्कि यह कि उनकी अनिच्छा है कि कुरिन्थ की कलीसिया इस क्षेत्र में अंधेरे में टटोलती रहे। और वे उन्हें "भाइयों" कहकर पुकारते हैं, यानी जो आगे आता है वह डाँट नहीं, परिवार के भीतर की बात है। अगले ही वाक्य में वे उनके अतीत की याद दिलाएँगे, जब वे "गूँगी मूरतों के पीछे" चलाए जाते थे। यह एक वाक्य पूरे अध्याय का दरवाज़ा है।
मर्म
ध्यान दीजिए कि पौलुस अज्ञानता को एक मासूम कमी नहीं, बल्कि एक ख़तरा मानते हैं। बाइबल में "जानना" कभी भी केवल सूचना इकट्ठा करना नहीं है; यह वाचा का शब्द है, वह जानना जिससे रिश्ता बनता है। इसलिए परमेश्वर के लोगों का अंधकार में रहना उनके परमेश्वर के चरित्र के विरुद्ध है। जो परमेश्वर बोलते हैं, वे छिपाना नहीं चाहते। यहाँ अनुग्रह और प्रकाशन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं: आत्मा केवल वरदान देती नहीं, वह वरदानों को समझने की समझ भी देती है। और यह बहुत व्यावहारिक है। जहाँ कलीसिया आत्मा के कामों के बारे में अज्ञात रहती है, वहाँ या तो डर पैदा होता है, या घमंड, या नकली आत्मिकता। पौलुस दोनों गड्ढों से बचाना चाहते हैं, इसलिए वे सिखाने बैठते हैं।
सूत्र
परमेश्वर की पूरी कहानी में एक ही दिशा दिखती है: वे अपने लोगों को अनजान नहीं छोड़ते। अदन में वे टहलते हुए बोलते हैं, अब्राहम को अपनी योजना बताते हैं, सीनै पर्वत पर वाचा की शर्तें लिखवाते हैं, भविष्यद्वक्ताओं के मुँह में शब्द रखते हैं, और अंत में देहधारी वचन में स्वयं को पूरी तरह खोल देते हैं। यह वाक्य, "मैं नहीं चाहता कि तुम अज्ञात रहो," उसी लम्बी धारा में बहता है। और यह इत्तिफ़ाक नहीं कि पौलुस अगली ही साँस में यीशु के प्रभुत्व की कसौटी देते हैं: "न कोई पवित्र आत्मा के बिना कह सकता है कि यीशु प्रभु है।" यानी आत्मा का काम कभी मसीह से अलग जाकर चमत्कार दिखाना नहीं, बल्कि मसीह को केंद्र में लाना है। वरदानों का ज्ञान अंततः मसीह का ज्ञान है।
दर्पण
हममें से बहुतों ने आत्मा के विषय को चुपचाप छोड़ रखा है। कारण अलग-अलग हैं: किसी ने बचपन में अतिरेक देखा और डर गया, किसी को लगता है यह भावुक लोगों का इलाक़ा है, किसी को गहरे में यह डर सताता है कि अगर उसने पूछा तो पता चलेगा कि उसे कोई वरदान मिला ही नहीं। यह डर बहुत ठोस जगहों पर काम करता है: सभा में हाथ न उठाना, सेवा की सूची में नाम न लिखवाना, यह मान लेना कि कलीसिया में असली काम पाँच लोग करते हैं और बाक़ी दर्शक हैं। पौलुस इस चुप्पी को आराम नहीं, अज्ञानता कहते हैं, और वे उसे तोड़ना चाहते हैं। आज ही, दस मिनट निकालकर 1 कुरिन्थियों 12 पूरा पढ़िए और काग़ज़ पर एक वाक्य लिखिए: "आत्मा के बारे में मैं यह नहीं जानता और जानना चाहता हूँ।"
श्रोता
कुरिन्थ की कलीसिया के लोग बहुसंख्यक रूप से अन्यजातियों में से आए थे, वही जिन्हें पौलुस याद दिलाते हैं कि वे "गूँगी मूरतों के पीछे" चलाए जाते थे। उनके पुराने मंदिरों में आत्मिक अनुभव कोई अजनबी चीज़ नहीं थी; परमानंद, बेहोशी, अजीब आवाज़ें, भविष्य बताने वाले, यह सब बाज़ार का सामान्य दृश्य था। इसलिए जब कलीसिया में भाषाएँ और भविष्यद्वाणी प्रकट हुईं, तो उनके कानों ने इसे परिचित ढाँचे में सुना: जिसके पास ज़्यादा नाटकीय अनुभव है, वह आत्मिक रूप से ऊँचा है। यही उनकी फूट की जड़ थी। पौलुस का "अज्ञात न रहो" इसीलिए इतना तीखा है: तुम अनुभव जानते हो, पर तुम आत्मा को नहीं जानते। मूरतें गूँगी थीं; तुम्हारा परमेश्वर बोलता है, और उसकी आत्मा जोड़ती है, तोड़ती नहीं।
मुख्य पात्र
इस वाक्य के पीछे असली पात्र पवित्र आत्मा हैं, और पूरा अध्याय उनका चित्र खींचता है। वे बाँटने वाले हैं: "जिसे जो चाहता है वह बाँट देता है," यानी उनकी अपनी इच्छा है, वे कोई शक्ति नहीं जिसे हम इस्तेमाल करें। वे एक करने वाले हैं: यहूदी और यूनानी, दास और स्वतंत्र, सब "एक ही आत्मा के द्वारा एक देह होने के लिये" बपतिस्मा पाते हैं। और वे उदार हैं: "हर एक को आत्मा का प्रकाश दिया जाता है," किसी को छोड़ा नहीं जाता। यह परमेश्वर का ही स्वभाव है, वही परमेश्वर जो सृष्टि में विविधता रचते हैं और फिर भी एक हैं। आत्मा हमें अपने जैसा बनाते हैं: अलग-अलग, पर बँटे हुए नहीं।
अंतर्पाठ
योएल की भविष्यद्वाणी, जिसे पतरस पिन्तेकुस्त के दिन दोहराते हैं, वादा करती है कि परमेश्वर अपनी आत्मा हर प्राणी पर उंडेलेंगे, बेटों और बेटियों पर, दासों और दासियों पर। कुरिन्थ में वह वादा उतर चुका है, और इसीलिए किसी के लिए यह कहना असंभव है कि "मुझे कुछ नहीं मिला।" दूसरी ओर यहेजकेल का वह वचन याद रखिए जिसमें परमेश्वर पत्थर का हृदय निकालकर माँस का हृदय देने और अपनी आत्मा भीतर रखने का वादा करते हैं। वरदान इसी नई वाचा का फल हैं, न कि आत्मिक उपलब्धि का प्रमाणपत्र। इसीलिए पौलुस अध्याय को "सबसे उत्तम मार्ग" की ओर मोड़ते हैं: प्रेम, जो नए हृदय का सबसे साफ़ लक्षण है।
चिंतन
आत्मा के काम के बारे में मेरी चुप्पी कहाँ से आती है: सचमुच की श्रद्धा से, या किसी पुराने डर से जिसे मैंने कभी परखा नहीं?
अगर परमेश्वर सचमुच नहीं चाहते कि मैं इस विषय में अज्ञात रहूँ, तो अगला कदम क्या है जो मुझे इस हफ़्ते उठाना चाहिए?
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1 Corinthians 12:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
1 कुरिन्थियों 12:1 का क्या अर्थ है?
1 कुरिन्थियों 12:1 किस विषय में है?
1 कुरिन्थियों 12:1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
1 कुरिन्थियों 12:1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 कुरिन्थियों 12:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Corinthians 12 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
परमेश्वर की गिनती हमारी गिनती से उलटी है। जिस अंग के पास पहले से शोभा है, उसे और सजाने की ज़रूरत नहीं। "परन्तु परमेश्वर ने देह को ऐसा बनाया है कि जिस अंग को घटी थी, उसी को और भी बहुत आदर दिया।" कलीसिया का जो कोना किसी को दिखता ही नहीं, वहीं उसकी नज़र टिकी रहती है। तुम्हें अपनी जगह छोटी लगती है? वहीं वह आदर रखता है।
पिता, मुझे पता नहीं मेरे पास क्या है और क्या नहीं। कभी लगता है दूसरों की समझ और ज्ञान मुझसे बहुत आगे है। पर आपका आत्मा ही सब बाँटता है, और जो आपने मुझे दिया वह भी आपसे ही आया है। मुझे उसे पहचानने और बाँटने का मन दीजिए।
यदि वे सब एक ही अंग होते, तो देह कहाँ होती?" पौलुस का यह सवाल चुभता है। हम चाहते हैं कि कलीसिया में सब हमारे जैसे सोचें, हमारे जैसे सेवा करें, हमारे जैसे प्रार्थना करें। पर जिस दिन सब एक जैसे हो जाएँ, उस दिन देह खत्म हो जाएगी। जो भाई तुमसे बहुत अलग है, वह गलत नहीं है। वह वही अंग है जिसके बिना तुम अधूरे हो।
तुम बड़े से बड़े वरदानों की धुन में रहो। परन्तु मैं तुम्हें और भी सबसे उत्तम मार्ग बताता हूँ।" पौलुस वरदानों की चाह को गलत नहीं कहता, पर बीच वाक्य में ही रुककर कहता है, एक और रास्ता है। और वह रास्ता प्रेम है। सोच, तेरी सारी सेवा, सारी काबिलियत जिस गली से गुज़रती है, वह गली प्रेम की है या नहीं?
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