बाइबल व्याख्या

1 यूहन्ना 2:7

बाइबल
यह वचन JASHUVA MINISTRIES -INDIA द्वारा समर्पित है

पाठ

यूहन्ना अपने पाठकों को "हे प्रियों" कहकर संबोधित करते हैं और एक ऐसी बात कहते हैं जो पहली नज़र में विनम्र, लगभग मामूली लगती है: "मैं तुम्हें कोई नई आज्ञा नहीं लिखता, पर वही पुरानी आज्ञा जो आरम्भ से तुम्हें मिली है।" वे कोई नया रहस्योद्घाटन, कोई गुप्त ज्ञान, कोई उन्नत शिक्षा नहीं परोस रहे। वे उसी बात की ओर लौट रहे हैं जो इन विश्वासियों ने शुरू से ही सुनी थी। और वे इसे स्पष्ट भी कर देते हैं: "यह पुरानी आज्ञा वह वचन है, जिसे तुम ने सुना है।" जो सुना गया, वही आज्ञा है। जो आरम्भ में था, वही अब भी मापदंड है। अगली ही आयत में वे इस पुरानेपन को पलटकर "नई आज्ञा" कह देंगे, पर पहले यह नींव रखी जाती है।

मूल

यह आयत एक ऐसी दुनिया के विरुद्ध खड़ी है जो नएपन को ही सच्चाई का प्रमाण मानती है। यूहन्ना की मंडली में ऐसे शिक्षक घुस आए थे जो दावा करते थे कि उनके पास कुछ आगे की, गहरी, उन्नत बात है, और यूहन्ना का उत्तर यह नहीं कि वे और भी गहरी बात बताएँगे, बल्कि यह कि परमेश्वर का वचन आरम्भ से ही पूरा दिया जा चुका है। यहाँ "आरम्भ" शब्द जानबूझकर गूँजता है: पत्री की पहली ही पंक्ति और यूहन्ना के सुसमाचार की पहली पंक्ति दोनों इसी शब्द से खुलती हैं। सत्य का अधिकार उसकी ताज़गी में नहीं, उसके स्रोत में है। और वह आज्ञा कौन-सी है? आयत 9 से 11 तक बात साफ़ हो जाती है: भाई से प्रेम। व्यवस्था में जो पहले से लिखा था, यीशु ने जिसे अपने जीवन से भर दिया, वही अब भी हमारी परीक्षा है।

जोड़ने वाला सूत्र

"पुरानी आज्ञा" कितनी पुरानी है? लैव्यव्यवस्था 19 में इस्राएल को आदेश मिला था कि वह अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखे, और यही वह वाक्य है जिसे यीशु ने पूरी व्यवस्था का सार कहा। तो यूहन्ना कुछ भी अविष्कार नहीं कर रहे; वे सीनै पर्वत तक पीछे की ओर इशारा कर रहे हैं। पर उनके पाठकों के लिए "आरम्भ" का अर्थ और भी निकट था: ऊपरी कमरे में, अपनी मृत्यु से कुछ घंटे पहले, यीशु ने इसी आज्ञा को "नई" कहकर अपने चेलों को सौंपा था, और उसका नयापन उसकी नाप में था, "जैसा मैंने तुम से प्रेम किया"। यही वह धागा है जो व्यवस्था से क्रूस तक और क्रूस से इन एशियाई मंडलियों तक खिंचा चला आता है। आयत 6 इसे पहले ही कह चुकी है: चाल वैसी ही हो "जैसे यीशु मसीह चलता था।"

दर्पण

हममें से अधिकांश को पुरानी बातें उबाऊ लगती हैं। हम नए अध्ययन, नए वक्ता, नई अंतर्दृष्टि की तलाश में रहते हैं, और चुपचाप मान बैठते हैं कि जो हमने बीस साल पहले सीखा था, वह अब हमारे पीछे छूट चुका है। यूहन्ना इस भूख को बेरहमी से उजागर करते हैं: तुम्हें कुछ नया नहीं चाहिए, तुम्हें वही चाहिए जो तुमने सुना और जिए बिना छोड़ दिया। कलीसिया में वह एक व्यक्ति जिससे आप वर्षों से कतराते हैं, वह रिश्तेदार जिसका नाम सुनते ही आपका चेहरा कड़ा हो जाता है, वहीं पर यह पुरानी आज्ञा आपकी प्रतीक्षा कर रही है। आगे बढ़ने का रास्ता पीछे लौटने से होकर जाता है। आज एक काग़ज़ पर उस एक विश्वासी भाई या बहन का नाम लिखिए जिससे आप बचते हैं, और अभी, अगले दस मिनट में, उन्हें एक छोटा-सा संदेश भेजिए।

कठिन प्रश्न

यूहन्ना बार-बार "अपने भाई" से प्रेम की बात करते हैं, और यहीं एक असुविधाजनक बात सामने आती है। यीशु ने शत्रुओं से प्रेम करने को कहा था; यूहन्ना का दायरा दिखने में संकरा है, मंडली के भीतर तक सीमित। क्या यह पीछे हटना है? शायद नहीं, शायद यह घाव की जगह पर उँगली रखना है। जिस समुदाय से लोग अभी-अभी टूटकर निकले हैं, वहाँ सबसे कठिन प्रेम दूर के शत्रु का नहीं, पास के उस भाई का है जिसने आपकी पीठ पीछे बात की। दूर के लोगों से प्रेम करना सस्ता है। फिर भी यह प्रश्न पूरी तरह शांत नहीं होता, और शायद होना भी नहीं चाहिए: जो अपने भाई से प्रेम नहीं कर पाता, वह शत्रु से प्रेम का दावा करके किसे धोखा दे रहा है?

संदर्भ

पहली सदी का अंत, संभवतः इफिसुस और उसके आसपास की घरेलू मंडलियाँ। चश्मदीद गवाहों की पीढ़ी मर रही है, और जो लोग यीशु को कभी नहीं देखा, वे अब बहुमत में हैं। ऐसे में ऐसे शिक्षक उठे जो आत्मिक श्रेष्ठता का दावा करते थे, जिनके लिए देह, पाप और साधारण नैतिकता निचले दर्जे की बातें थीं। आयत 19 बताती है कि वे मंडली से निकल गए, और ऐसा विभाजन छोटे घरेलू समुदायों में ज़लज़ले जैसा होता है: परिवार बँटते हैं, भोजन की मेज़ें टूटती हैं। जो पीछे रह गए, वे डगमगा रहे थे, सोच रहे थे कि कहीं सचमुच तो वे पीछे नहीं छूट गए। इसी कँपकँपाते समूह से बूढ़ा प्रेरित कहता है: तुम्हारे पास पहले से ही सब कुछ है।

मुख्य पात्र

यूहन्ना की आवाज़ यहाँ किसी वाद-विवाद जीतने वाले की नहीं, बल्कि एक बूढ़े पिता की है जो अपने बच्चों को "हे प्रियों" कहकर पुकारता है। यह वही व्यक्ति है जो कभी गरजने का पुत्र कहलाता था, जो सामरी गाँव पर आग उतारना चाहता था। दशकों ने उसे कोमल नहीं, बल्कि केंद्रित बना दिया है। वह जानता है कि उसके पास कहने को एक ही बात बची है, और वह उसी एक बात को बार-बार, लगभग ज़िद के साथ दोहराता है। "जिसे तुम ने सुना है" कहते समय उसकी अपनी स्मृति भी बोल रही है: उसने यह गलील की धूल में, ऊपरी कमरे की मोमबत्ती की रोशनी में सुना था। जो स्वयं आरम्भ से सुन चुका हो, उसे नएपन की भूख नहीं रहती।

मनन

आपके विश्वास में वह कौन-सी "पुरानी" बात है जिसे आप जानते तो हैं पर जीते नहीं, और आपने उसे किस नई रुचि से ढक रखा है?

यदि आपका प्रेम केवल उन्हीं तक सीमित है जो आपसे सहमत हैं, तो आयत 9 आपके बारे में क्या कहेगी?

1 John में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of John's Letters

David Jackman

Assurance, love and truth in John's letters, warmly explained.

Early Christian Letters For Everyone

N.T. Wright

James, Peter, John and Jude in short accessible readings.

The Letters of John: An Introduction and Commentary

John Stott

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Letters of John

Gary Burge

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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1 John 2:7 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

1 यूहन्ना 2:7 का क्या अर्थ है?
यूहन्ना अपने पाठकों को "हे प्रियों" कहकर संबोधित करते हैं और एक ऐसी बात कहते हैं जो पहली नज़र में विनम्र, लगभग मामूली लगती है: "मैं तुम्हें कोई नई आज्ञा नहीं लिखता, पर वही पुरानी आज्ञा जो आरम्भ से तुम्हें मिली है।" वे कोई नया रहस्योद्घाटन, कोई गुप्त ज्ञान, कोई उन्नत शिक्षा नहीं परोस रहे। वे उसी बात की ओर लौट रहे हैं जो इन विश्वासियों ने शुरू से ही सुनी थी। और वे इसे स्पष्ट भी कर देते हैं: "यह पुरानी आज्ञा वह वचन है, जिसे तुम ने सुना है।" जो सुना गया, वही आज्ञा है। जो आरम्भ में था, वही अब भी मापदंड है। अगली ही आयत में वे इस पुरानेपन को पलटकर "नई आज्ञा" कह देंगे, पर पहले यह नींव रखी जाती है।
1 यूहन्ना 2:7 किस विषय में है?
"पुरानी आज्ञा" कितनी पुरानी है? लैव्यव्यवस्था 19 में इस्राएल को आदेश मिला था कि वह अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखे, और यही वह वाक्य है जिसे यीशु ने पूरी व्यवस्था का सार कहा। तो यूहन्ना कुछ भी अविष्कार नहीं कर रहे; वे सीनै पर्वत तक पीछे की ओर इशारा कर रहे हैं। पर उनके पाठकों के लिए "आरम्भ" का अर्थ और भी निकट था: ऊपरी कमरे में, अपनी मृत्यु से कुछ घंटे पहले, यीशु ने इसी आज्ञा को "नई" कहकर अपने चेलों को सौंपा था, और उसका नयापन उसकी नाप में था, "जैसा मैंने तुम से प्रेम किया"। यही वह धागा है जो व्यवस्था से क्रूस तक और क्रूस से इन एशियाई मंडलियों तक खिंचा चला आता है। आयत 6 इसे पहले ही कह चुकी है: चाल वैसी ही हो "जैसे यीशु मसीह चलता था।"
1 यूहन्ना 2:7 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यूहन्ना बार-बार "अपने भाई" से प्रेम की बात करते हैं, और यहीं एक असुविधाजनक बात सामने आती है। यीशु ने शत्रुओं से प्रेम करने को कहा था; यूहन्ना का दायरा दिखने में संकरा है, मंडली के भीतर तक सीमित। क्या यह पीछे हटना है?
1 यूहन्ना 2:7 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यूहन्ना की आवाज़ यहाँ किसी वाद-विवाद जीतने वाले की नहीं, बल्कि एक बूढ़े पिता की है जो अपने बच्चों को "हे प्रियों" कहकर पुकारता है। यह वही व्यक्ति है जो कभी गरजने का पुत्र कहलाता था, जो सामरी गाँव पर आग उतारना चाहता था। दशकों ने उसे कोमल नहीं, बल्कि केंद्रित बना दिया है। वह जानता है कि उसके पास कहने को एक ही बात बची है, और वह उसी एक बात को बार-बार, लगभग ज़िद के साथ दोहराता है। "जिसे तुम ने सुना है" कहते समय उसकी अपनी स्मृति भी बोल रही है: उसने यह गलील की धूल में, ऊपरी कमरे की मोमबत्ती की रोशनी में सुना था। जो स्वयं आरम्भ से सुन चुका हो, उसे नएपन की भूख नहीं रहती।
1 यूहन्ना 2:7 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यदि आपका प्रेम केवल उन्हीं तक सीमित है जो आपसे सहमत हैं, तो आयत 9 आपके बारे में क्या कहेगी?
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1 John 2 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 20

पर तुम्हारा तो उस पवित्र से अभिषेक हुआ है, और तुम सब कुछ जानते हो।" यूहन्ना यह उन लोगों से कह रहा है जो डरे हुए थे कि कहीं वे धोखा न खा जाएँ। उसने उन्हें नई पढ़ाई नहीं दी, बस याद दिलाया कि भीतर कौन बसा है। तुम्हें हर उत्तर मालूम न भी हो, तब भी झूठ के सामने मन में जो बेचैनी उठती है, वही पवित्र आत्मा का काम है। उसे अनसुना मत करना।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 17

संसार और उसकी अभिलाषाएँ दोनों मिटती जाती हैं, पर जो परमेश्वर की इच्छा पर चलता है, वह सर्वदा बना रहेगा।"

ध्यान दे, सिर्फ संसार नहीं, उसकी चाहत भी मिट जाती है। जिस चीज़ के लिए तू दस साल पहले रोया था, आज उसका नाम भी याद नहीं। तेरी आज की बेचैनी भी एक दिन ऐसे ही ठंडी पड़ जाएगी।

फिर सवाल यह है: तेरे जीवन में ऐसा क्या है जो उस दिन भी बचा रहेगा?

प्रार्थना संपादकीय पर पद 26

पिता, इस दुनिया में इतनी आवाज़ें हैं जो मुझे सही रास्ते से भटकाना चाहती हैं। मुझे पहचानने की समझ दे कि क्या सच है और क्या सिर्फ़ चमक। मेरे मन को अपने सत्य में थामे रख, ताकि मैं किसी के बहकावे में न आऊँ, बल्कि तुझमें बना रहूँ।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 7

हे प्रियो, मैं तुम्हें कोई नई आज्ञा नहीं लिखता, परन्तु वही पुरानी आज्ञा जो आरम्भ से तुम्हारे पास है।" यूहन्ना बूढ़ा हो चुका है, और उसके पास कहने को कुछ नया नहीं। बस वही बात, प्रेम करो। हम अक्सर कोई नई गहराई, नया अनुभव ढूँढ़ते हैं, जबकि जो पहले दिन सुना था वही अब तक जिया नहीं गया। क्या सचमुच तुम्हें नई बात चाहिए, या पुरानी बात पर लौटना?

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