बाइबल व्याख्या

1 यूहन्ना 5:19

बाइबल
यह वचन Dunamis ministries द्वारा समर्पित है

मूल पाठ

यूहन्ना एक ही साँस में दो वाक्य जोड़ देता है, और उनके बीच कोई तकिया नहीं रखता: "हम जानते हैं, कि हम परमेश्वर से हैं, और सारा संसार उस दुष्ट के वश में पड़ा है।" पहला आधा हिस्सा एक घर का पता है, एक वंश, एक अपनापन: हम कहीं से हैं, किसी के हैं। दूसरा आधा हिस्सा एक निदान है, और वह निर्दयी है: जो कुछ इस अपनेपन के बाहर है, वह तटस्थ नहीं, स्वतंत्र नहीं, बल्कि किसी और की पकड़ में है। यूहन्ना यह अनुमान के तौर पर नहीं कहता। वह "हम जानते हैं" कहता है, जैसे कोई तथ्य गिना रहा हो, जिसे उसके पाठक अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में पहले ही देख चुके हैं।

केंद्रीय बात

यूनानी में जो शब्द यहाँ "वश में पड़ा है" के लिए है, वह है कीताइ, यानी "पड़ा हुआ है", जैसे कोई चीज़ किसी की गोद में, किसी के कब्ज़े में निश्चल पड़ी हो। यूहन्ना यह नहीं कहता कि संसार दुष्ट से लड़ रहा है और हार रहा है; वह कहता है कि संसार उसकी गोद में शांत पड़ा है, बिना संघर्ष, बिना शिकायत। यही इस वचन की सबसे असहज बात है। बुराई यहाँ कोई शोर मचाती हुई ताकत नहीं, बल्कि एक मालिकाना हक़ है जिसे कोई चुनौती नहीं देता। और इसके सामने यूहन्ना कोई रणनीति नहीं रखता, केवल एक वंशावली: हम परमेश्वर से हैं। उद्धार यहाँ पहले हमारे प्रयास की बात नहीं, जन्म की बात है, और इसीलिए यह टिकाऊ है।

साझा सूत्र

यह दो-हिस्सों वाली दुनिया यूहन्ना की खोज नहीं है। पुराने नियम के शुरुआती पन्नों से ही एक सर्प बोलता है, और उसकी ताक़त हथियार में नहीं, बोलने में है: वह मनुष्य को समझा लेता है कि परमेश्वर की बात पर भरोसा करना घाटे का सौदा है। तब से कहानी एक ही दिशा में बढ़ती है, जब तक कि परमेश्वर का पुत्र स्वयं उस कब्ज़े वाले इलाक़े में नहीं उतरता। यूहन्ना अगले ही वचन में यही कहता है: "परमेश्वर का पुत्र आ गया है और उसने हमें समझ दी है"। यानी जहाँ सर्प ने समझ को भ्रष्ट किया था, वहाँ मसीह समझ लौटाते हैं। और वचन 4 में जो "जय" का शब्द आया था, वह यहाँ पूरा होता है: संसार को छीना नहीं गया, उसमें से लोग छीने गए। क्रूस एक क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ दायर किया गया दावा है, जिसे पुनरुत्थान ने मंज़ूर किया।

दर्पण

हम में से ज़्यादातर लोग "दुष्ट के वश" जैसी भाषा से असहज हो जाते हैं, क्योंकि हमारी दुनिया बुरी नहीं, बस व्यस्त लगती है। दफ़्तर में वह छोटा समझौता जो सबके लिए सामान्य है। पैसे का वह हिसाब जिसमें ईमानदारी थोड़ी लचीली हो जाती है। परिवार में वह चुप्पी जो दशकों से चली आ रही है और जिसे अब कोई तोड़ना नहीं चाहता। यूहन्ना का शब्द "पड़ा हुआ है" ठीक यहीं चुभता है: क़ब्ज़ा हिंसक नहीं होता, वह आरामदेह होता है। हम ज़ंजीरों में नहीं, तकिए पर पड़े होते हैं। और इसीलिए यूहन्ना अपनी पूरी चिट्ठी का अंत उस अजीब वाक्य से करता है: "अपने आपको मूरतों से बचाए रखो।" मूरत कोई पत्थर नहीं, वह हर वह चीज़ है जो आपको सुला देती है।

आज शाम अपने फ़ोन की स्क्रीन-टाइम रिपोर्ट खोलिए, सबसे ऊपर के तीन नाम ज़ोर से पढ़िए, और परमेश्वर से पूछिए: इनमें से कौन मुझे किसकी गोद में सुला रहा है।

संदर्भ

पहली सदी का आख़िरी दशक, संभवतः इफ़िसुस और उसके आसपास के छोटे घर-कलीसियाओं का जाल। शहर की सबसे ऊँची इमारत अरतिमिस का मंदिर है, जिसकी छाया में आधी अर्थव्यवस्था चलती है: चाँदी के मंदिर-मॉडल बनाने वाले कारीगर, तीर्थयात्रियों के सराय, बलि के जानवरों का बाज़ार। हवा में धुएँ और जली चर्बी की गंध है। हर व्यापारिक संघ का अपना देवता है, और संघ के भोज में शामिल हुए बिना आपका कारोबार चलता नहीं। ऊपर सम्राट का मंदिर है, जहाँ निष्ठा दिखाना नागरिकता का शिष्टाचार है, धर्म नहीं। इस माहौल में एक ऐसा छोटा समूह बैठा है जिसमें से कुछ लोग हाल ही में निकल गए हैं और यह दावा करते फिर रहे हैं कि असली ज्ञान उनके पास है। बचे हुए लोग डरे हुए हैं: क्या हम ही ग़लत थे? यूहन्ना उनके कानों में कहता है, "हम जानते हैं"।

दूसरे पन्नों की गूँज

यीशु ने अपने सुसमाचार में तीन बार इस संसार के "सरदार" की बात की थी, और हर बार क्रूस के साये में, यह कहते हुए कि वह सरदार अब बाहर निकाला जा रहा है। यूहन्ना अपने बुढ़ापे में वही शब्दावली उठाता है, पर एक बदलाव के साथ: सरदार अभी भी क़ब्ज़े में बैठा है, परंतु उसका पट्टा समाप्त हो चुका है। दूसरी ओर अय्यूब की किताब का पहला अध्याय याद कीजिए, जहाँ शत्रु पृथ्वी पर घूमता है पर परमेश्वर की अनुमति की सीमा के भीतर। यूहन्ना इसी सीमा को वचन 18 में दोहराता है: "वह दुष्ट उसे छूने नहीं पाता।" संसार उसकी गोद में है, पर परमेश्वर की सन्तान उसकी पहुँच से बाहर। दोनों बातें एक साथ सच हैं, और यही विश्वास का तनाव है।

मुख्य पात्र

इस वचन में असली पात्र वह "हम" है, और उस "हम" के पीछे खड़े परमेश्वर हैं जो जन्म देते हैं और थामे रखते हैं। ध्यान दीजिए, यूहन्ना यह नहीं कहता कि हम परमेश्वर के लिए लड़ रहे हैं; वह कहता है हम परमेश्वर से हैं, जैसे बच्चा अपने पिता से है, बिना किसी योग्यता के, केवल उत्पत्ति के आधार पर। यह एक बूढ़े आदमी की आवाज़ है जिसने क़त्ल होते देखे हैं, कलीसिया में फूट देखी है, और फिर भी उसकी भाषा घबराई हुई नहीं। उसके परमेश्वर वह हैं जो दुश्मन के इलाक़े के बीचोंबीच एक परिवार खड़ा करते हैं और उस परिवार पर अपना हाथ रखे रहते हैं। यह विजय का नारा नहीं, पते की घोषणा है: हम जानते हैं हम किसके हैं।

चिंतन के प्रश्न

आपकी ज़िंदगी में वह कौन-सी आरामदेह चीज़ है जिसके बारे में आपने कभी नहीं पूछा कि वह आपको जगाए रखती है या सुलाती है?

अगर आपकी पहचान आपके प्रयास से नहीं बल्कि आपके जन्म से तय है, तो आज आपके किस डर का वज़न तुरंत हल्का हो जाना चाहिए?

1 John में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of John's Letters

David Jackman

Assurance, love and truth in John's letters, warmly explained.

Early Christian Letters For Everyone

N.T. Wright

James, Peter, John and Jude in short accessible readings.

The Letters of John: An Introduction and Commentary

John Stott

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Letters of John

Gary Burge

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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1 John 5:19 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

1 यूहन्ना 5:19 का क्या अर्थ है?
यूहन्ना एक ही साँस में दो वाक्य जोड़ देता है, और उनके बीच कोई तकिया नहीं रखता: "हम जानते हैं, कि हम परमेश्वर से हैं, और सारा संसार उस दुष्ट के वश में पड़ा है।" पहला आधा हिस्सा एक घर का पता है, एक वंश, एक अपनापन: हम कहीं से हैं, किसी के हैं। दूसरा आधा हिस्सा एक निदान है, और वह निर्दयी है: जो कुछ इस अपनेपन के बाहर है, वह तटस्थ नहीं, स्वतंत्र नहीं, बल्कि किसी और की पकड़ में है। यूहन्ना यह अनुमान के तौर पर नहीं कहता। वह "हम जानते हैं" कहता है, जैसे कोई तथ्य गिना रहा हो, जिसे उसके पाठक अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में पहले ही देख चुके हैं।
1 यूहन्ना 5:19 किस विषय में है?
यह दो-हिस्सों वाली दुनिया यूहन्ना की खोज नहीं है। पुराने नियम के शुरुआती पन्नों से ही एक सर्प बोलता है, और उसकी ताक़त हथियार में नहीं, बोलने में है: वह मनुष्य को समझा लेता है कि परमेश्वर की बात पर भरोसा करना घाटे का सौदा है। तब से कहानी एक ही दिशा में बढ़ती है, जब तक कि परमेश्वर का पुत्र स्वयं उस कब्ज़े वाले इलाक़े में नहीं उतरता। यूहन्ना अगले ही वचन में यही कहता है: "परमेश्वर का पुत्र आ गया है और उसने हमें समझ दी है"। यानी जहाँ सर्प ने समझ को भ्रष्ट किया था, वहाँ मसीह समझ लौटाते हैं। और वचन 4 में जो "जय" का शब्द आया था, वह यहाँ पूरा होता है: संसार को छीना नहीं गया, उसमें से लोग छीने गए। क्रूस एक क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ दायर किया गया दावा है, जिसे पुनरुत्थान ने मंज़ूर किया।
1 यूहन्ना 5:19 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज शाम अपने फ़ोन की स्क्रीन-टाइम रिपोर्ट खोलिए, सबसे ऊपर के तीन नाम ज़ोर से पढ़िए, और परमेश्वर से पूछिए: इनमें से कौन मुझे किसकी गोद में सुला रहा है।
1 यूहन्ना 5:19 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यीशु ने अपने सुसमाचार में तीन बार इस संसार के "सरदार" की बात की थी, और हर बार क्रूस के साये में, यह कहते हुए कि वह सरदार अब बाहर निकाला जा रहा है। यूहन्ना अपने बुढ़ापे में वही शब्दावली उठाता है, पर एक बदलाव के साथ: सरदार अभी भी क़ब्ज़े में बैठा है, परंतु उसका पट्टा समाप्त हो चुका है। दूसरी ओर अय्यूब की किताब का पहला अध्याय याद कीजिए, जहाँ शत्रु पृथ्वी पर घूमता है पर परमेश्वर की अनुमति की सीमा के भीतर। यूहन्ना इसी सीमा को वचन 18 में दोहराता है: "वह दुष्ट उसे छूने नहीं पाता।" संसार उसकी गोद में है, पर परमेश्वर की सन्तान उसकी पहुँच से बाहर। दोनों बातें एक साथ सच हैं, और यही विश्वास का तनाव है।
1 यूहन्ना 5:19 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपकी ज़िंदगी में वह कौन-सी आरामदेह चीज़ है जिसके बारे में आपने कभी नहीं पूछा कि वह आपको जगाए रखती है या सुलाती है?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

1 John 5 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 5

संसार पर जय पाने वाला कौन है? केवल वह जो यह विश्वास करता है कि यीशु परमेश्वर का पुत्र है।" ध्यान दे, यूहन्ना यह नहीं कहता कि जीतने वाला वह है जो सबसे मजबूत है, या जिसने सबसे कम पाप किए। जीत तेरी कोशिश पर नहीं, तेरे भरोसे पर टिकी है। आज जब तू थका हुआ है, तो खुद को मत टटोल, मसीह को थाम ले।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 15

तो यह भी जानते हैं, कि जो कुछ हमने उससे माँगा है, वह पाया है।" ध्यान दो, यूहन्ना यह नहीं कहता कि मिलेगा। वह कहता है, मिल चुका है। तुम्हारी प्रार्थना अभी हवा में लटकी नहीं है। जिस पल परमेश्वर ने सुना, उसी पल उत्तर तय हो गया, भले तुम्हारी आँखें उसे अभी न देख पाएँ। शायद आज तुम्हें धीरज ही माँगना है, जवाब नहीं।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 10

जो परमेश्वर के पुत्र पर विश्वास करता है, वह अपने ही में गवाही रखता है।" यह गवाही कहीं दूर मंदिर या किताब में नहीं, तेरे भीतर रखी है। जब मन डगमगाए, तो बाहर प्रमाण ढूँढ़ने से पहले भीतर झाँक। जिस क्षण यीशु ने तुझे बदला, वही परमेश्वर की सच्चाई का हस्ताक्षर है। उस पर अविश्वास करना सिर्फ़ कमज़ोरी नहीं, परमेश्वर को झूठा कहना है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 3

और उसकी आज्ञाएँ कठिन नहीं," यूहन्ना यह उस समय लिख रहा है जब विश्वासी सताए जा रहे थे। फिर भी वह कहता है कि बोझ आज्ञा में नहीं, हमारे मन में होता है। जिससे हम प्रेम करते हैं, उसकी बात मानना कभी भारी नहीं लगता। सोचो, परमेश्वर की कौन सी बात तुम्हें आज भारी लग रही है? शायद सवाल आज्ञा का नहीं, प्रेम के ठंडे पड़ जाने का है।

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