बाइबल व्याख्या

2 इतिहास 21

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

यहोशापात की मृत्यु के बाद उसका बड़ा बेटा यहोराम राजा बनता है, और सत्ता में बैठते ही अपने छह भाइयों को तलवार से मार डालता है। वह अहाब की बेटी से विवाह करता है, यहूदा में ऊँचे स्थान बनवाता है, और परमेश्वर से दूर हो जाता है। एलिय्याह का एक पत्र उसके पास आता है जिसमें भयानक न्याय की घोषणा है, और वह अंतड़ियों के असाध्य रोग से तड़प-तड़पकर मरता है, बिना किसी के शोक मनाए।

मर्म

यह अध्याय एक ठंडी सच्चाई सामने रखता है: विरासत में मिली आशीषें अपने आप ईश्वरभक्ति नहीं देतीं। यहोशापात एक भला राजा था, उसने बेटों को धन, नगर, अवसर दिए, पर यहोराम ने वह सब लेकर भी अपने पिता का परमेश्वर नहीं चुना। परमेश्वर यहाँ सज़ा देनेवाले न्यायी के रूप में दिखते हैं, पर एक बात पर ध्यान दीजिए, पद 7: "यहोवा ने दाऊद के घराने को नाश करना न चाहा।" न्याय पूरा हो रहा है, फिर भी वाचा जीवित है। परमेश्वर के धैर्य का कारण यहोराम की कोई अच्छाई नहीं, बल्कि उनका अपना दिया हुआ वचन है। यही अनुग्रह की कठोर सुंदरता है।

सूत्र

पद 7 का "दीपक कभी न बुझेगा" पूरी बाइबल का एक दबा हुआ धागा है। दाऊद के घराने में एक के बाद एक राजा बिगड़ते जाते हैं, यहोराम जैसे तो भाई-हत्यारे भी होते हैं, फिर भी परमेश्वर उस दीपक को बुझने नहीं देते। क्यों? क्योंकि उस वंश से एक आना है जो सचमुच धर्मी राजा होगा। यहोराम की कहानी हमें दिखाती है कि मसीह का आना किसी योग्य वंश की उपलब्धि नहीं थी, बल्कि परमेश्वर की उस ज़िद का फल था कि वे अपनी वाचा पर अटल रहेंगे, चाहे मनुष्य कितना भी गिरे। यहूदा के सिंहासन पर बैठा हत्यारा भी उस दीपक को बुझा नहीं सका जो अंततः बैतलहम में जलेगा।

दर्पण

यहोराम अपने भाइयों को इसलिए मारता है क्योंकि वे "उससे अच्छे थे" (पद 13)। यह वाक्य रुककर पढ़िए। क्या आपके भीतर भी कहीं ऐसा कोई कोना है जो उन लोगों से चिढ़ता है जो आपसे बेहतर हैं, ज़्यादा ईमानदार, ज़्यादा प्रार्थनाशील, ज़्यादा उदार? हम उन्हें तलवार से नहीं मारते, पर हम उन्हें बातों से काटते हैं, उनकी अनदेखी करते हैं, उनकी सफलता पर चुप रहते हैं। यहोराम का विवाह भी सोच-समझकर हुआ, अहाब की बेटी, सत्ता का गठजोड़। हम भी ऐसे ही समझौते करते हैं, नौकरी में, रिश्तों में, पैसे के मामलों में। यह अध्याय पूछता है: आपने किन दरवाज़ों को इसलिए खोला है क्योंकि वे लाभदायक थे, यह जानते हुए भी कि उनसे भीतर क्या आएगा? और सबसे चुभनेवाला अंत: "सब को अप्रिय होकर जाता रहा।" कोई नहीं रोया।

प्रश्न

एलिय्याह का पत्र (पद 12) एक अजीब पहेली है। एलिय्याह उत्तरी राज्य के नबी थे, और अधिकांश गणना के अनुसार वे इससे पहले उठा लिए गए थे। तो यह पत्र कैसे आया? कुछ लोग सोचते हैं कि उन्होंने इसे पहले से लिखकर छोड़ा था, कुछ मानते हैं कि कालक्रम हमारी सोच से अलग है। पर असली सवाल यह नहीं है। असली सवाल यह है: क्यों यहोराम को यह चेतावनी भेजी गई जब उसका न्याय पहले ही तय था? परमेश्वर चेतावनी क्यों देते हैं जब वे जानते हैं कि हृदय नहीं फिरेगा? शायद इसलिए कि न्याय कभी अंधा नहीं होता, वह हमेशा प्रकाश के बाद आता है। यहोराम अनजाने में नहीं, जानबूझकर मरा। यह रहस्य आरामदेह नहीं है, पर यह परमेश्वर के न्याय की गरिमा को बचाता है।

विवरण

पद 20 का वह छोटा वाक्य: "सब को अप्रिय होकर जाता रहा।" मूल में यह और भी तीखा है, "बिना किसी की चाहत के" वह चला गया। बत्तीस साल का जवान राजा, आठ साल की सत्ता, और अंत में कोई नहीं जो आँसू बहाए। उसकी प्रजा ने उसके पिता के लिए सुगन्ध-द्रव्य जलाया था, उसके लिए कुछ नहीं। उसे दाऊदपुर में तो दफनाया गया, पर राजाओं के कब्रिस्तान में नहीं। यह एक ऐसा अंत है जो सत्ता के हर भूखे व्यक्ति को कँपा देना चाहिए। आप कितना भी बटोर लें, अंत में यही बचता है, कि लोग आपके जाने पर राहत महसूस करते हैं या कमी। यहोराम की कब्र पर मुहर लगी है: कोई कमी नहीं।

परिप्रेक्ष्य

इतिहासकार यह अध्याय बंधुआई से लौटे यहूदी समुदाय के लिए लिख रहा था, जो अपनी टूटी हुई पहचान समेट रहे थे। उनके लिए यह सवाल जीवित था: क्या दाऊद का घराना सच में परमेश्वर की वाचा में है? क्या हमारा भविष्य है? इतिहासकार पद 7 में उन्हें आश्वस्त करता है, हाँ, है। पर वह उन्हें यह भी दिखाता है कि वाचा में होने का मतलब पापों से बच जाना नहीं। यहोराम की कहानी उनके लिए चेतावनी थी: तुम भी परमेश्वर के लोग होकर भी, विदेशी गठजोड़ों और ऊँचे स्थानों में फिसल सकते हो। पहले हियारों को यह दोहरा संदेश सुनाई देता था, वाचा अटल है, पर व्यक्तिगत विश्वासघात की कीमत असली है। दोनों बातें एक साथ सच थीं, और आज भी हैं।

चिंतन

*आपके जीवन में कौन-सा "अहाब की बेटी" वाला समझौता है, जि

2 Chronicles में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Chronicles

Michael Wilcock

Shows why the retold history of Chronicles is a book of hope.

2 Chronicles: An Introduction and Commentary

Martin Selman

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

1 and 2 Chronicles

Andrew Hill

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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2 Chronicles 21 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

2 इतिहास 21 का क्या अर्थ है?
यहोशापात की मृत्यु के बाद उसका बड़ा बेटा यहोराम राजा बनता है, और सत्ता में बैठते ही अपने छह भाइयों को तलवार से मार डालता है। वह अहाब की बेटी से विवाह करता है, यहूदा में ऊँचे स्थान बनवाता है, और परमेश्वर से दूर हो जाता है। एलिय्याह का एक पत्र उसके पास आता है जिसमें भयानक न्याय की घोषणा है, और वह अंतड़ियों के असाध्य रोग से तड़प-तड़पकर मरता है, बिना किसी के शोक मनाए।
2 इतिहास 21 किस विषय में है?
यह अध्याय एक ठंडी सच्चाई सामने रखता है: विरासत में मिली आशीषें अपने आप ईश्वरभक्ति नहीं देतीं। यहोशापात एक भला राजा था, उसने बेटों को धन, नगर, अवसर दिए, पर यहोराम ने वह सब लेकर भी अपने पिता का परमेश्वर नहीं चुना। परमेश्वर यहाँ सज़ा देनेवाले न्यायी के रूप में दिखते हैं, पर एक बात पर ध्यान दीजिए, पद 7: "यहोवा ने दाऊद के घराने को नाश करना न चाहा।" न्याय पूरा हो रहा है, फिर भी वाचा जीवित है। परमेश्वर के धैर्य का कारण यहोराम की कोई अच्छाई नहीं, बल्कि उनका अपना दिया हुआ वचन है। यही अनुग्रह की कठोर सुंदरता है।
2 इतिहास 21 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पद 7 का "दीपक कभी न बुझेगा" पूरी बाइबल का एक दबा हुआ धागा है। दाऊद के घराने में एक के बाद एक राजा बिगड़ते जाते हैं, यहोराम जैसे तो भाई-हत्यारे भी होते हैं, फिर भी परमेश्वर उस दीपक को बुझने नहीं देते। क्यों? क्योंकि उस वंश से एक आना है जो सचमुच धर्मी राजा होगा। यहोराम की कहानी हमें दिखाती है कि मसीह का आना किसी योग्य वंश की उपलब्धि नहीं थी, बल्कि परमेश्वर की उस ज़िद का फल था कि वे अपनी वाचा पर अटल रहेंगे, चाहे मनुष्य कितना भी गिरे। यहूदा के सिंहासन पर बैठा हत्यारा भी उस दीपक को बुझा नहीं सका जो अंततः बैतलहम में जलेगा।
2 इतिहास 21 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यहोराम अपने भाइयों को इसलिए मारता है क्योंकि वे "उससे अच्छे थे" (पद 13)। यह वाक्य रुककर पढ़िए। क्या आपके भीतर भी कहीं ऐसा कोई कोना है जो उन लोगों से चिढ़ता है जो आपसे बेहतर हैं, ज़्यादा ईमानदार, ज़्यादा प्रार्थनाशील, ज़्यादा उदार?
2 इतिहास 21 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
एलिय्याह का पत्र (पद 12) एक अजीब पहेली है। एलिय्याह उत्तरी राज्य के नबी थे, और अधिकांश गणना के अनुसार वे इससे पहले उठा लिए गए थे। तो यह पत्र कैसे आया? कुछ लोग सोचते हैं कि उन्होंने इसे पहले से लिखकर छोड़ा था, कुछ मानते हैं कि कालक्रम हमारी सोच से अलग है। पर असली सवाल यह नहीं है। असली सवाल यह है: क्यों यहोराम को यह चेतावनी भेजी गई जब उसका न्याय पहले ही तय था?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

2 Chronicles 21 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 4

यहोराम ने तब तलवार उठाई जब वह "स्थिर हो गया।" ताकत मिलने के बाद भी भीतर का डर नहीं गया, और उस डर ने उसके अपने भाइयों को निगल लिया। जो कुर्सी भाइयों की लाशों पर टिकी हो, वह कभी सुरक्षित नहीं लगती। सोचो, अपनी जगह बचाने के लिए तुमने किसे पीछे धकेला है? डर से लिया गया हर फैसला आगे चलकर भारी पड़ता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 9

योराम रात को उठकर घेरे से निकल तो आया, एदोमियों को मारा भी, पर अगली ही आयत कहती है कि एदोम आज तक बागी है। जीत मिली, पर कुछ भी न बदला। जब हम परमेश्वर को छोड़ देते हैं, तो हमारी मेहनत हमें एक रात के लिए बचा सकती है, पर टूटी हुई चीज़ें वापस नहीं जोड़ सकती। तू किस घेरे से भागने में लगा है, और किस जड़ को अनदेखा कर रहा है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 18

यहोराम का जीवन एक चेतावनी है। उसने अपने भाइयों को मार डाला, मूर्तिपूजा को बढ़ावा दिया, और परमेश्वर से मुँह मोड़ लिया। फिर लिखा है, "इन सब के बाद यहोवा ने उसकी अंतड़ियों में एक असाध्य रोग लगाया।"

सोचिए, आठ साल राज किया, पर कोई शोक न हुआ जब वह मरा। पाप धीरे-धीरे भीतर से खाता है। आज अपने भीतर झाँकिए, कहीं कोई छिपा हुआ रोग तो नहीं जिसे आप अनदेखा कर रहे हैं?

धन्यवाद संपादकीय पर पद 15

पिता, तेरा धन्यवाद कि तू पाप को हल्के में नहीं लेता। यहोराम की अंतड़ियों पर आया वह भारी रोग हमें याद दिलाता है कि तू न्यायी है। धन्यवाद कि तूने हमें चेतावनी देकर पश्चाताप का अवसर दिया, ताकि हम तेरी राहों से न भटकें।

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