2 कुरिन्थियों 2
पाठ
पौलुस बताता है कि उसने कुरिन्थ लौटने का इरादा टाल दिया, क्योंकि वह दूसरी बार उदासी लेकर नहीं आना चाहता था; इसके बदले उसने आँसुओं में डूबा हुआ एक पत्र लिखा, इसलिए नहीं कि वे दुखी हों, बल्कि इसलिए कि वे उसका प्रेम पहचानें। फिर वह उस व्यक्ति की बात करता है जिसने कलीसिया को ठेस पहुँचाई थी: दण्ड पर्याप्त हो चुका, अब क्षमा और सान्त्वना का समय है, वरना शैतान इसी दरार से भीतर घुस आएगा। अन्त में दृश्य बदल जाता है: त्रोआस में खुला द्वार, बेचैन मन, और अचानक एक विजय-जुलूस, जिसमें परमेश्वर मसीह में अपने जन को लिए फिरते हैं और उनके द्वारा अपने ज्ञान की सुगन्ध हर जगह फैलाते हैं।
मर्म
इस अध्याय का धड़कता हुआ केन्द्र यह है कि कलीसिया का अनुशासन भी अनुग्रह की सेवा है, न्याय की नहीं। पौलुस दण्ड को अन्तिम शब्द नहीं बनने देता: "इससे यह भला है कि उसका अपराध क्षमा करो; और शान्ति दो, न हो कि ऐसा मनुष्य उदासी में डूब जाए।" यहाँ क्षमा कोई भावुक ढील नहीं, बल्कि परमेश्वर के न्याय की सही दिशा है, क्योंकि परमेश्वर का न्याय कभी नष्ट करने के लिए नहीं, सदा बहाल करने के लिए होता है। और ध्यान दीजिए कि पौलुस अपनी क्षमा को कहाँ टिकाता है: "मसीह की जगह में होकर क्षमा किया है।" अर्थात् मनुष्य की क्षमा उधार ली हुई क्षमा है, क्रूस से निकली हुई। जहाँ यह उधार टूटता है, वहाँ शैतान की युक्ति काम करने लगती है; कठोरता वह दरवाज़ा है जिससे वह भीतर आता है।
सूत्र
वचन 14 का चित्र रोमी विजय-जुलूस का है: विजयी सेनापति नगर में प्रवेश करता है, धूप के धुएँ की सुगन्ध हवा में भरी है, और उसके पीछे बन्दी चलते हैं। पौलुस अपने आप को सेनापति नहीं, उस जुलूस में लिए जाते हुए व्यक्ति के रूप में देखता है, और यही सुसमाचार का पूरा तर्क है: विजय मसीह की है, हम केवल उसमें सम्मिलित किए गए हैं। और जो सुगन्ध फैलती है, वह पुराने नियम की बलिवेदी की सुगन्ध की गूँज है, वह "सुखदायक सुगन्ध" जो चढ़ाए हुए बलिदान से उठकर परमेश्वर तक पहुँचती थी। अब वह सुगन्ध किसी पशु से नहीं, बल्कि मसीह के लोगों के जीवन से उठती है, क्योंकि क्रूस पर चढ़ा हुआ बलिदान एक ही बार सदा के लिए चढ़ चुका है। कलीसिया का क्षमा करना और उसका गवाही देना, दोनों उसी एक सुगन्ध के दो रूप हैं।
दर्पण
आप जानते हैं कि किसका नाम इस अध्याय को पढ़ते समय आपके मन में उभरा। वह व्यक्ति जिसने कलीसिया में, या परिवार में, या दफ़्तर में सचमुच गलत किया, और जिसके विरुद्ध आपका गुस्सा जायज़ है। पौलुस उस जायज़ गुस्से को झुठलाता नहीं; वह मानता है कि चोट पहुँची, और सबको पहुँची। पर वह पूछता है: अब कितना बहुत है? हम प्रायः दण्ड को अनिश्चित काल तक खींचते हैं, ठण्डे शिष्टाचार के रूप में, नाम न लेने के रूप में, उसे किसी सेवा में वापस न आने देने के रूप में। और हम इसे विवेक कहते हैं, जबकि यह अक्सर सुरक्षित बदला होता है। पौलुस इसे शैतान की युक्ति कहता है, और वह ठीक कहता है। आज ही उस व्यक्ति को एक छोटा, स्पष्ट सन्देश भेजिए जिसमें कोई शर्त, कोई उपदेश, कोई "लेकिन" न हो, केवल प्रेम का एक प्रमाण।
मुख्य पात्र
पौलुस यहाँ अपने सबसे कम सुरक्षित रूप में दिखाई देता है। वह प्रेरित जो अधिकार से लिखता है, वही स्वीकार करता है कि उसने "बहुत से आँसू बहा बहाकर" लिखा। त्रोआस में परमेश्वर ने उसके लिए द्वार खोला, सुसमाचार सुनाने का सुनहरा अवसर, और वह वहाँ से चला गया, क्योंकि उसके मन में चैन नहीं था; तीतुस नहीं मिला, और कुरिन्थ की खबर नहीं मिली। यह अध्यात्मिक विफलता नहीं, यह पिता का हृदय है। पौलुस का अधिकार उसकी दूरी में नहीं, उसकी घायल होने की क्षमता में है। और ठीक इसी बेचैन, अधूरी, थकी हुई अवस्था में वह लिखता है कि परमेश्वर उसे विजय के उत्सव में लिए फिरते हैं। विजय उसकी मनोदशा पर नहीं, मसीह पर टिकी है।
अन्तर्पाठ
पहले पत्र के पाँचवें अध्याय में पौलुस ने कुरिन्थ की कलीसिया को उस पापी को बाहर करने का कठोर आदेश दिया था, और वहाँ भी उसका उद्देश्य नाश नहीं, अन्ततः उद्धार था। अब वही कलम उल्टी दिशा में चलती है: दण्ड "बहुत है", अब सान्त्वना दो। दोनों पत्र मिलकर दिखाते हैं कि कलीसियाई अनुशासन का पैमाना अपराध की गम्भीरता नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की बहाली है। जो कलीसिया केवल कठोरता जानती है वह क्रूर हो जाती है, और जो केवल ढील जानती है वह पाप को हल्का कर देती है। बाइबल इन दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू मानती है, क्योंकि परमेश्वर का पवित्र क्रोध और उनका क्षमाशील प्रेम एक ही हृदय से निकलते हैं।
प्रश्न
वचन 16 चुभता है: एक ही सुगन्ध कुछ लोगों के लिए जीवन है और कुछ के लिए मृत्यु। यह हमें असहज करता है, क्योंकि हम चाहते हैं कि सुसमाचार सबके लिए केवल मीठा हो। पर पौलुस यह नहीं कहता कि सुसमाचार बदलता है; वह कहता है कि सुननेवाले बदलते हैं। वही मसीह जो एक के लिए जीवन का द्वार है, दूसरे के लिए ठोकर का पत्थर बन जाता है, और यह चुनाव हमारे हाथ में नहीं कि हम गवाही को इतना मधुर बना दें कि कोई ठोकर न खाए। पौलुस स्वयं इसका उत्तर नहीं देता; वह प्रश्न में ही रुक जाता है: "इन बातों के योग्य कौन है?" कोई नहीं। और शायद यही एकमात्र ईमानदार जगह है जहाँ से गवाही देना शुरू किया जा सकता है, बिना मिलावट के, परमेश्वर को उपस्थित जानकर।
चिन्तन
आपकी कलीसिया या परिवार में किसका दण्ड चुपचाप उससे कहीं आगे खिंच गया है जितना "बहुत है" कहा जा सकता था?
पौलुस खुले द्वार से लौट आया क्योंकि उसका मन बेचैन था; आपकी बेचैनी इस समय किस अधूरे रिश्ते की ओर इशारा कर रही है?
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2 Corinthians 2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
2 कुरिन्थियों 2 का क्या अर्थ है?
2 कुरिन्थियों 2 किस विषय में है?
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2 कुरिन्थियों 2 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
2 कुरिन्थियों 2 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
2 Corinthians 2 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पौलुस के सामने त्रोआस में प्रभु ने द्वार खोला था, फिर भी वह लिखता है, "तब मेरे मन में चैन न मिला, क्योंकि मैंने अपने भाई तीतुस को न पाया।" सेवा का अवसर था, पर एक भाई की खबर न मिलने से दिल बेचैन रहा। कितना अच्छा है कि प्रेरित भी अपनी बेचैनी छिपाता नहीं। क्या तुम्हारा दिल किसी के लिए ऐसे धड़कता है?
पौलुस कहता है, "क्योंकि यदि मैं तुम्हें उदास करूँ, तो मुझे आनन्द देनेवाला कौन होगा, उसे छोड़ जिसको मैंने उदास किया?" वह उन्हीं लोगों से खुशी पाता है जिन्हें उसने डाँटा था। सोच, तेरा आनन्द किससे बँधा है? जिसे तू ठेस पहुँचाता है, कहीं वही तेरी खुशी का सोता न हो। रिश्तों में जीतने से पहले यह पूछना पड़ता है कि जीत के बाद साथ कौन बचेगा।
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