बाइबल व्याख्या

2 कुरिन्थियों 4:17

बाइबल
यह वचन POWER OF GOD FAITH MINISTRIES द्वारा समर्पित है

पाठ

कुरिन्थुस की गलियों में तराजू हर जगह थे। बंदरगाह का शहर, व्यापार का शहर; वहाँ माल तौला जाता था, और आदमी भी तौले जाते थे। पौलुस इसी शहर को लिखते हैं और एक तराजू खड़ा कर देते हैं: एक पलड़े में उनका अपना कष्ट, दूसरे में वह जो आने वाला है। "हमारा पल भर का हलका सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्त्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।" कहने का अर्थ यह है: जो अभी सह रहे हैं वह क्षणिक है और भार में हल्का है, और वही भविष्य की उस महिमा को गढ़ता चला जा रहा है जिसका कोई अंत नहीं। पिछली आयत इसे थामे हुए है, बाहरी मनुष्यत्व घिसता है, भीतरी हर दिन नया होता है।

मर्म

यह आयत दर्द को छोटा नहीं बताती, वह उसे तौलती है। पौलुस की पीठ पर कोड़ों के निशान थे, उनकी गिनती वे खुद इसी पत्री में करते हैं; "हलका सा" कहना उनके मुँह से भावुक दिलासा नहीं, एक हिसाब है। यूनानी में महिमा के साथ जो शब्द जुड़ा है वह है बारोस, यानी वज़न, बोझ। और यह संयोग नहीं: इब्रानी में भी महिमा का मूल अर्थ भारीपन है। परमेश्वर की महिमा हवा में तैरती कोई चमक नहीं, वह ठोस वज़न है, जिसके सामने हमारे कष्ट का पलड़ा ऊपर उठ जाता है। यहाँ सुसमाचार का तर्क दिखता है: दुःख व्यर्थ नहीं जलता, वह उत्पन्न करता है। कृपा घाटे को भी उत्पादक बना देती है।

सूत्र

यह तराजू पौलुस ने खुद नहीं गढ़ा; उन्होंने इसे क्रूस के पास पड़ा हुआ पाया। पूरे अध्याय में वे एक ही बात दोहराते हैं: "हम यीशु की मृत्यु को अपनी देह में हर समय लिये फिरते हैं; कि यीशु का जीवन भी हमारी देह में प्रगट हो।" मसीह का रास्ता पहले शुक्रवार था, फिर रविवार, और यह क्रम पलटा नहीं जा सकता। जो शरीर कब्र में रखा गया वही उठाया गया, वही जो घायल था वही महिमित हुआ। इसलिए पौलुस का हिसाब कोई आशावादी अनुमान नहीं, वह एक खाली कब्र पर टिका है। पुराने नियम में भी यही धड़कन है: दास मिस्र में कराहते हैं, और वही कराह छुटकारे की कहानी बन जाती है। परमेश्वर कष्ट को नज़रअंदाज़ नहीं करते, वे उसे अपनी मुक्ति की कथा में पिरो लेते हैं।

दर्पण

कुरिन्थुस के लोग ताकत के दीवाने थे; वहाँ का मुहावरा था चमक, वाक्पटुता, सफल दिखना। पौलुस उनके सामने आते हैं टूटी देह और मिट्टी के बरतन की भाषा लेकर, और यह उन्हें अखरता है। हमें भी अखरता है। हम भी चाहते हैं कि विश्वास हमें ऊपर उठाए, नीचे न ले जाए। पर आपका असली बोझ शायद वह है जो किसी को दिखता नहीं: वह रिपोर्ट जो डॉक्टर ने छह महीने पहले दी थी, वह बेटा जो फोन नहीं उठाता, वह नौकरी जिसमें आपकी ईमानदारी को मूर्खता समझा जाता है, वह देह जो अब पहले जैसी नहीं चलती। पौलुस इसे झुठलाते नहीं, वे इसे तौलते हैं। आज एक कागज़ पर वह एक बोझ लिखिए जिसे आप महीनों से ढो रहे हैं, उसके नीचे लिखिए "पल भर का", और उसे ज़ोर से पढ़कर परमेश्वर के हाथ में सौंप दीजिए।

अन्तर्पाठ

पौलुस खुद इसी अध्याय में भजन 116 का हवाला देते हैं, उस भजनकार का जो मृत्यु के फंदों में फँसा था और फिर भी बोला। विश्वास वहाँ चुप्पी नहीं, आवाज़ है; कष्ट के बीच से निकली आवाज़। रोमियों की पत्री में पौलुस यही तराजू फिर उठाते हैं और कहते हैं कि इस समय के दुःख उस महिमा के सामने तौलने लायक भी नहीं जो प्रगट होने वाली है। वहाँ वे इसे सारी सृष्टि की प्रसव-पीड़ा से जोड़ते हैं, यानी यह दर्द बाँझ नहीं है, यह किसी चीज़ को जन्म दे रहा है। दोनों जगह एक ही आदमी बोल रहा है, और दोनों बार वह जेल, कोड़े और भूख के अनुभव से बोल रहा है, आराम की कुर्सी से नहीं।

बारीकी

ध्यान दीजिए क्रिया पर: "उत्पन्न करता जाता है।" यह भविष्य की क्रिया नहीं, चलती हुई क्रिया है। कष्ट महिमा की प्रतीक्षा-कक्ष नहीं, कार्यशाला है। पौलुस यह नहीं कहते कि दुःख के बाद इनाम मिलेगा, वे कहते हैं कि दुःख अभी, इसी घड़ी, कुछ गढ़ रहा है। पहली सदी के सुनने वाले इस शब्द को कारीगर की दुकान से जोड़ते; कुरिन्थुस में कांसे का काम मशहूर था, आग और हथौड़े के बिना कुछ नहीं बनता था। यानी जब आप सोचते हैं कि यह साल बर्बाद गया, तब भी भट्ठी में कुछ बन रहा है। यह हर दुःख पर अपने आप लागू होने वाला जादू नहीं; पौलुस मसीह के कारण सहे जाने वाले दुःख की बात कर रहे हैं, उस जीवन की जो यीशु से जुड़ा है।

प्रश्न

क्या यह आयत किसी शोक में डूबे माँ-बाप के सामने बोली जा सकती है? ईमानदारी से: नहीं, दूसरे के दुःख पर हथौड़े की तरह नहीं। पौलुस यह अपने बारे में कह रहे हैं, दूसरों के घाव पर लेबल लगाने के लिए नहीं। "हलका सा" तभी सच लगता है जब आप दूसरे पलड़े को देख चुके हों, और वह पलड़ा हमें अभी दिखता नहीं, इसलिए अगली ही आयत कहती है कि हम अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं। यह तनाव बना रहता है। तराजू का दूसरा सिरा विश्वास के हाथ में है, आँख के सामने नहीं। और जब तक वह दिन नहीं आता, यह आयत सांत्वना कम और पकड़ ज़्यादा है, वह रस्सी जिसे थामकर आदमी एक और दिन खड़ा रहता है।

मनन

आप अपने कष्ट को किस पलड़े में तौल रहे हैं: दूसरों की नज़र, अपनी उम्मीदें, या वह महिमा जो अभी अनदेखी है?

पौलुस ने कोड़े खाकर "हलका सा" कहा; आपके जीवन में वह कौन-सी बात है जिसे आप अब तक भारी कहते आए हैं और जिसे आज दोबारा तौलने की ज़रूरत है?

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2 Corinthians: An Introduction and Commentary

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2 Corinthians 4:17 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

2 कुरिन्थियों 4:17 का क्या अर्थ है?
कुरिन्थुस की गलियों में तराजू हर जगह थे। बंदरगाह का शहर, व्यापार का शहर; वहाँ माल तौला जाता था, और आदमी भी तौले जाते थे। पौलुस इसी शहर को लिखते हैं और एक तराजू खड़ा कर देते हैं: एक पलड़े में उनका अपना कष्ट, दूसरे में वह जो आने वाला है। "हमारा पल भर का हलका सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्त्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।" कहने का अर्थ यह है: जो अभी सह रहे हैं वह क्षणिक है और भार में हल्का है, और वही भविष्य की उस महिमा को गढ़ता चला जा रहा है जिसका कोई अंत नहीं। पिछली आयत इसे थामे हुए है, बाहरी मनुष्यत्व घिसता है, भीतरी हर दिन नया होता है।
2 कुरिन्थियों 4:17 किस विषय में है?
यह तराजू पौलुस ने खुद नहीं गढ़ा; उन्होंने इसे क्रूस के पास पड़ा हुआ पाया। पूरे अध्याय में वे एक ही बात दोहराते हैं: "हम यीशु की मृत्यु को अपनी देह में हर समय लिये फिरते हैं; कि यीशु का जीवन भी हमारी देह में प्रगट हो।" मसीह का रास्ता पहले शुक्रवार था, फिर रविवार, और यह क्रम पलटा नहीं जा सकता। जो शरीर कब्र में रखा गया वही उठाया गया, वही जो घायल था वही महिमित हुआ। इसलिए पौलुस का हिसाब कोई आशावादी अनुमान नहीं, वह एक खाली कब्र पर टिका है। पुराने नियम में भी यही धड़कन है: दास मिस्र में कराहते हैं, और वही कराह छुटकारे की कहानी बन जाती है। परमेश्वर कष्ट को नज़रअंदाज़ नहीं करते, वे उसे अपनी मुक्ति की कथा में पिरो लेते हैं।
2 कुरिन्थियों 4:17 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पौलुस खुद इसी अध्याय में भजन 116 का हवाला देते हैं, उस भजनकार का जो मृत्यु के फंदों में फँसा था और फिर भी बोला। विश्वास वहाँ चुप्पी नहीं, आवाज़ है; कष्ट के बीच से निकली आवाज़। रोमियों की पत्री में पौलुस यही तराजू फिर उठाते हैं और कहते हैं कि इस समय के दुःख उस महिमा के सामने तौलने लायक भी नहीं जो प्रगट होने वाली है। वहाँ वे इसे सारी सृष्टि की प्रसव-पीड़ा से जोड़ते हैं, यानी यह दर्द बाँझ नहीं है, यह किसी चीज़ को जन्म दे रहा है। दोनों जगह एक ही आदमी बोल रहा है, और दोनों बार वह जेल, कोड़े और भूख के अनुभव से बोल रहा है, आराम की कुर्सी से नहीं।
2 कुरिन्थियों 4:17 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
क्या यह आयत किसी शोक में डूबे माँ-बाप के सामने बोली जा सकती है? ईमानदारी से: नहीं, दूसरे के दुःख पर हथौड़े की तरह नहीं। पौलुस यह अपने बारे में कह रहे हैं, दूसरों के घाव पर लेबल लगाने के लिए नहीं। "हलका सा" तभी सच लगता है जब आप दूसरे पलड़े को देख चुके हों, और वह पलड़ा हमें अभी दिखता नहीं, इसलिए अगली ही आयत कहती है कि हम अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं। यह तनाव बना रहता है। तराजू का दूसरा सिरा विश्वास के हाथ में है, आँख के सामने नहीं। और जब तक वह दिन नहीं आता, यह आयत सांत्वना कम और पकड़ ज़्यादा है, वह रस्सी जिसे थामकर आदमी एक और दिन खड़ा रहता है।
2 कुरिन्थियों 4:17 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पौलुस ने कोड़े खाकर "हलका सा" कहा; आपके जीवन में वह कौन-सी बात है जिसे आप अब तक भारी कहते आए हैं और जिसे आज दोबारा तौलने की ज़रूरत है?
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2 Corinthians 4 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 1

इसलिए जब हम पर ऐसी दया हुई कि हमें यह सेवकाई मिली, तो हम हियाव नहीं छोड़ते।"

ध्यान दे, पौलुस हिम्मत इसलिए नहीं रखता कि वह मजबूत है, बल्कि इसलिए कि यह काम उसे दया से मिला था। जिसने कलीसिया को सताया था, वही अब सुसमाचार सुनाता है। जब सेवा योग्यता से नहीं, करुणा से मिली हो, तो उसे छोड़ने का हक भी अपने पास नहीं रहता। तू थक गया है? याद कर, तुझे बुलाया किसने था।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 6

हे प्रभु, जिस तरह आपने अंधकार में से उजियाले को चमकने की आज्ञा दी, वैसे ही मेरे मन के अंधेरे कोनों को भी रोशन कर दीजिए। मसीह के चेहरे में मुझे आपकी महिमा दिखाई दे, और यही ज्योति मेरे हर दिन का सहारा बने।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 15

पौलुस पिटता है, कैद होता है, टूटता है, और फिर कहता है, "क्योंकि सब वस्तुएँ तुम्हारे लिये हैं।" उसका दुःख उसकी अपनी कहानी नहीं था, वह किसी और तक अनुग्रह पहुँचाने का रास्ता था। सोचो, जो कठिनाई आज तुम्हें बेकार लग रही है, शायद परमेश्वर उसके ज़रिए किसी और के होंठों पर धन्यवाद रख रहा हो।

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