2 राजाओं 20
पाठ
हिजकिय्याह मरने पर है। दीवार की ओर मुँह फेरे हुए एक राजा रोता है, और यशायाह, जो अभी-अभी मृत्यु का समाचार सुनाकर निकला था, आँगन पार करने से पहले ही लौटा दिया जाता है: "मैंने तेरी प्रार्थना सुनी और तेरे आँसू देखे हैं।" पन्द्रह वर्ष और मिलते हैं, अंजीरों की टिकिया से फोड़ा चंगा होता है, और छाया धूपघड़ी पर दस अंश पीछे लौट जाती है। फिर बाबेल से दूत आते हैं, और वही राजा अपने भण्डार, चाँदी, सोना, हथियार, सब कुछ दिखा देता है, और यशायाह को दूसरी बार आना पड़ता है, इस बार यह कहने: एक दिन यह सब बाबेल को उठ जाएगा, और तेरे वंशज वहाँ खोजे बनकर खड़े रहेंगे।
मर्म
यह अध्याय परमेश्वर की करुणा और मनुष्य की उथलेपन को एक ही साँस में रखता है। परमेश्वर प्रार्थना से डिगते हैं, आँसुओं को गिनते हैं, मृत्यु का आदेश वापस लेते हैं, यहाँ तक कि सूरज की छाया को उलटा चला देते हैं, और यह सब "अपने निमित्त और अपने दास दाऊद के निमित्त", यानी अपने वाचा-प्रेम के कारण, हिजकिय्याह की योग्यता के कारण नहीं। पर यही अनुग्रह मनुष्य को बदल ही दे, इसकी कोई गारंटी नहीं। जो राजा दीवार की ओर मुँह करके रोया था, वही बाद में बाबेल के दूतों के सामने अपना खजाना खोलकर खड़ा है, और भविष्य के न्याय को सुनकर सोचता है, मेरे दिनों में शान्ति तो रहेगी। चंगाई मिल सकती है और हृदय फिर भी छोटा रह सकता है। यही इस अध्याय की चुभन है।
सूत्र
ध्यान दीजिए कि परमेश्वर हिजकिय्याह को क्यों बचाते हैं: "मैं अपने निमित्त और अपने दास दाऊद के निमित्त इस नगर की रक्षा करूँगा।" यह वाक्य पूरे राजाओं की पुस्तक की रीढ़ है। दाऊद से की गई प्रतिज्ञा एक धागे की तरह चलती है, टूटती नहीं, चाहे राजा कितने भी छोटे क्यों न निकलें। और यही धागा आगे बढ़ता है, बाबेल की बन्धुआई से भी पार, जब तक दाऊद का एक वंशज न आए जो अपने दिनों की शान्ति के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए अपना जीवन दे देगा। हिजकिय्याह ने पन्द्रह वर्ष माँगे और पाए। मसीह ने तीन दिन मृत्यु में बिताए और उनमें से सब के लिए जीवन निकाल लाए। छाया पीछे लौटी थी एक चिन्ह के रूप में; मसीह में समय स्वयं नई दिशा पाता है।
दर्पण
"यदि मेरे दिनों में शान्ति और सच्चाई बनी रहेंगी? तो क्या यह भला नहीं है?" यह वाक्य हमें चुभता है क्योंकि यह हमारा अपना वाक्य है। हम अपनी नौकरी की सुरक्षा तक सोचते हैं, अपनी पेंशन तक, अपने घर के शान्त रहने तक। जो उसके बाद आएगा, वह किसी और की समस्या है। मंडली के बच्चे, वह युवा जो अभी संदेह में है, वह कर्ज़ जो हम अगली पीढ़ी पर छोड़ रहे हैं, इन सब पर हम तब सोचते हैं जब उनका असर हम पर पड़ने लगे। और दूसरी ओर, हिजकिय्याह का भण्डार खोलना: वह सुख जो मिलता है जब कोई हमें गंभीरता से लेता है, जब हमारी उपलब्धियाँ देखी जाती हैं। आज एक नाम लिखिए, किसी ऐसे व्यक्ति का जो आपके बाद भी जीएगा, और उसके विश्वास के लिए ऊँची आवाज़ में प्रार्थना कीजिए।
अंतर्पाठ
हिजकिय्याह की प्रार्थना में एक बात खटकती है: वह अपनी सच्चाई गिनाता है, "मैं सच्चाई और खरे मन से… चलता आया हूँ।" यह झूठ नहीं है, पर इसके सामने गतसमनी के बाग को रखिए, जहाँ एक और यहूदी अपने पिता से मृत्यु का कटोरा टालने की विनती करता है और फिर जोड़ता है कि आपकी ही इच्छा पूरी हो। वहाँ कोई योग्यता नहीं गिनाई जाती। दूसरा सूत्र आगे खुलता है: अगले ही अध्याय में मनश्शे राज करता है, वह पुत्र जो संभवतः इन्हीं पन्द्रह अतिरिक्त वर्षों में जन्मा, और जो यहूदा को उस मूर्तिपूजा में धकेल देता है जिसकी कीमत बाबेल ही होगी। जीवन का वरदान भी अनुग्रह था, और उसका फल भी हमारे हाथ में नहीं रहा।
पृष्ठभूमि
आठवीं सदी ईसा पूर्व का अंत। अश्शूर संसार की एकमात्र महाशक्ति है; उसके सैनिक यरूशलेम के फाटकों तक आ चुके हैं। बाबेल अभी एक विद्रोही प्रांत है, बरोदक-बलदान अश्शूर के विरुद्ध सहयोगी ढूँढ़ रहा है, और एक बीमार राजा को भेजी गई "पत्री और भेंट" केवल शिष्टाचार नहीं, कूटनीति है। हिजकिय्याह जानता है कि उसे तौला जा रहा है, इसीलिए वह सब कुछ दिखाता है: देखो, मैं कमज़ोर साथी नहीं हूँ। पद 20 में जिस जलाशय और नहर का ज़िक्र है, वह शिलोह की वह सुरंग है जिसे आज भी चट्टान में काटा हुआ देखा जा सकता है, घेराबंदी के लिए तैयार एक नगर। यह एक सक्षम, व्यावहारिक, सफल राजा है। और उसी की सफलता उसका जाल बनती है।
मुख्य पात्र
हिजकिय्याह दो दृश्यों में बँटा हुआ आदमी है। पहले दृश्य में वह दीवार की ओर मुँह फेरता है, जहाँ कोई दरबारी उसका चेहरा न देख सके, और "फूट फूटकर" रोता है। यह वह क्षण है जब राजा का मुकुट उतर जाता है और केवल एक मरता हुआ मनुष्य बचता है, जो जीना चाहता है। परमेश्वर उसी मनुष्य को उत्तर देते हैं, "मेरी प्रजा के प्रधान" कहकर, एक नाम जो गरिमा लौटाता है। दूसरे दृश्य में वही आदमी भण्डारों की चाबियाँ घुमाता फिरता है, और उसके उत्तर में एक भी बार परमेश्वर का नाम नहीं आता। वह चिन्ह माँगने में तो साहसी था, पर अपने हृदय की जाँच में नहीं। उसकी कहानी हमें चेतावनी देती है: संकट में हम अक्सर सबसे सच्चे होते हैं, और छुटकारे के बाद सबसे लापरवाह।
चिंतन
आपकी प्रार्थनाओं में कितना हिस्सा "मेरे दिनों" तक सीमित है, और क्या होगा यदि आप अगले तीस वर्षों के लिए प्रार्थना करना शुरू करें?
जब कोई आपको गंभीरता से लेता है, आप उसे अपना कौन-सा "भण्डार" दिखाने के लिए सबसे ज़्यादा लालायित होते हैं?
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2 Kings 20 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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