भजन संहिता 103
पाठ
अपने ही मन को आदेश देकर भजनकार शुरू करता है: "हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह; और जो कुछ मुझ में है, वह उसके पवित्र नाम को धन्य कहे!" फिर वह गिनाता है कि किस बात के लिए, क्षमा, चंगाई, गड्ढे से छुड़ाया जाना, करुणा का मुकुट, नई जवानी, और पिसे हुओं के लिए न्याय। इसके बाद भजन का बीच का हिस्सा परमेश्वर के स्वभाव पर ठहरता है: वे दयालु और अनुग्रहकारी हैं, विलम्ब से कोप करनेवाले, ऐसे जो हमारे पापों के अनुसार व्यवहार नहीं करते, और जो जानते हैं कि हम मिट्टी हैं और घास की तरह क्षणभंगुर। अंत में दायरा फैलता जाता है: स्वर्ग में स्थिर सिंहासन, स्वर्गदूत, सेनाएँ, सारी सृष्टि, और फिर वही अकेला मन जिससे भजन शुरू हुआ था।
मूल बात
इस भजन का धड़कता हुआ केंद्र आठवीं आयत है, और वह कोई नई बात नहीं कह रही। "यहोवा दयालु और अनुग्रहकारी, विलम्ब से कोप करनेवाला और अति करुणामय है" वही घोषणा है जो परमेश्वर ने सीनै पर मूसा के सामने अपने विषय में की थी, ठीक उस सोने के बछड़े की घटना के बाद जब इस्राएल ने वाचा तोड़ दी थी। यानी यह वाक्य किसी सुखद दिन की भावुकता नहीं, वाचा-भंग के मलबे पर खड़ी घोषणा है। इसीलिए दसवीं आयत इतनी सटीक है: "उसने हमारे पापों के अनुसार हम से व्यवहार नहीं किया।" यह न्याय का इनकार नहीं है, यह स्वीकार है कि न्याय हमारा हक़ था और हमें कुछ और मिला।
यहाँ जो शब्द बार-बार "करुणा" अनुवाद हुआ है, वह इब्रानी हेसेद है, वाचा में बँधी वफ़ादारी, वह प्रेम जो वादे से जुड़ा है इसलिए मनोदशा के साथ बदलता नहीं। और इसीलिए भजनकार दो नाप देता है जो नापी नहीं जा सकतीं: आकाश की ऊँचाई और पूरब-पश्चिम की दूरी। ध्यान दीजिए, वह उत्तर-दक्षिण नहीं कहता; उत्तर और दक्षिण के छोर होते हैं, पूरब और पश्चिम कभी नहीं मिलते। क्षमा को वह अंतहीन दूरी के रूप में मापता है।
इसके साथ चौदहवीं आयत जुड़ती है, और यही इस भजन की सबसे कोमल धर्मशास्त्रीय चाल है: परमेश्वर की करुणा का आधार हमारी योग्यता नहीं, बल्कि उनका सृष्टिकर्ता होना है। "वह हमारी सृष्टि जानता है; और उसको स्मरण रहता है कि मनुष्य मिट्टी ही है।" जिसने हमें गूँधा, वही जानता है कि हम कितने भुरभुरे हैं। यह क्षमा को भावुक नहीं बनाता, यथार्थवादी बनाता है। और उन्नीसवीं आयत बताती है कि यह करुणा कमज़ोरी नहीं: यह उस राजा की करुणा है जिसका सिंहासन स्वर्ग में स्थिर है और जिसका राज्य पूरी सृष्टि पर है। दया और प्रभुता एक ही व्यक्ति में मिलती हैं, और यही सुसमाचार की नींव है।
सूत्र
आयत 7 पीछे देखती है, "उसने मूसा को अपनी गति, और इस्राएलियों पर अपने काम प्रगट किए", और आयत 17 आगे, "नाती-पोतों पर भी"। यह भजन इतिहास के बीच में खड़ा है और दोनों तरफ़ देखता है। मरियम ने अपने गीत में ठीक यही पंक्ति उठाई: पीढ़ी-पीढ़ी तक उन पर दया, जो उनका भय मानते हैं। यानी जिस हेसेद को यह भजन गाता है, वह एक गर्भवती लड़की के गर्भ में शरीर बन गया। और आयत 12 की वह अनंत दूरी, पूरब से पश्चिम, केवल कविता नहीं रही; उस दूरी की एक क़ीमत थी, और वह क़ीमत गोलगोथा पर चुकाई गई। आयत 3 भी वहीं पूरी होती है, जहाँ यीशु मसीह एक ही साँस में पाप क्षमा करते हैं और लकवे के रोगी को उठा खड़ा करते हैं।
दर्पण
यह भजन उस पाप पर उँगली रखता है जिसे आप रात के दो बजे बार-बार दोहराते हैं, वह बात जो क्षमा हो चुकी है पर आपने अपने से दूर नहीं की। परमेश्वर ने उसे पूरब-पश्चिम जितना दूर किया है और आप उसे हर हफ़्ते वापस खींच लाते हैं। यह उस डर को भी छूता है जो शरीर के ढलने से आता है, रिपोर्ट, थकान, माता-पिता का बूढ़ा होना, "घास के समान" होने का ठंडा एहसास। भजनकार इसे नकारता नहीं, वह इसे परमेश्वर की स्मृति में रखता है।
आज एक काग़ज़ पर वह एक पाप लिखिए जिसे आप घसीटते फिरते हैं, उस पर आयत 12 ज़ोर से पढ़िए, फिर काग़ज़ फाड़कर फेंक दीजिए।
श्रोता
पहले गानेवाले वे लोग थे जो जानते थे कि "पिसे हुए" कौन होते हैं: कर्ज़ में डूबे किसान, साम्राज्य के अधीन जीती हुई पीढ़ियाँ, वे जिनका न्याय अदालत में नहीं मिला। उनके कानों में आयत 6 सैद्धांतिक नहीं थी, वह उम्मीद थी। और आयत 15-16 की तस्वीर उनके लिए रोज़मर्रा थी: पूरब से आती लू एक ही दोपहर में मैदान का फूल सुखा देती है, और उसकी जगह भी नहीं मिलती। जिस समाज में वंश ही आपकी स्थायी पहचान था, वहाँ "नाती-पोतों पर भी" सुनना यह सुनना था कि परमेश्वर की वफ़ादारी हमारी मौत से बड़ी है।
मुख्य पात्र
इस भजन का मुख्य पात्र वह परमेश्वर है जो याद रखते हैं। वे याद रखते हैं कि हम मिट्टी हैं, और यही उनके धीरज की जड़ है; और वे हमारे अपराधों को याद नहीं रखते, यही उनकी क्षमा है। ध्यान दीजिए कि यहाँ परमेश्वर के तीन चेहरे एक साथ हैं: न्यायी जो पिसे हुओं का पक्ष लेते हैं, पिता जो बालकों पर दया करते हैं, और राजा जिसका सिंहासन स्थिर है। एक ही व्यक्ति में। कोई भी अकेला चेहरा भरोसे लायक नहीं होता, केवल न्याय कुचल देता है, केवल कोमलता बचा नहीं पाती।
प्रश्न
आयत 17 और 18 एक शर्त लगाती हैं: यह करुणा "उसके डरवैयों" पर है, उन पर जो वाचा का पालन करते हैं। तो क्या अनुग्रह आख़िर कमाया जाता है? भजन इस काँटे को हटाता नहीं। पर ध्यान दीजिए, वाचा का पालन करना करुणा की क़ीमत नहीं, उसमें ठहरे रहने का तरीका है। जो व्यक्ति क्षमा को हल्के में लेकर चलता जाता है, वह उस क्षमा के भीतर नहीं रहता जिसे वह गाता है। फिर भी सवाल पूरी तरह शांत नहीं होता, और शायद होना भी नहीं चाहिए। यह भजन हमें सुरक्षा नहीं, भय और भरोसे का साथ-साथ जीना सिखाता है।
चिंतन
आयत 14 कहती है कि परमेश्वर हमारी कमज़ोरी जानते हैं; आप अपने बारे में कौन-सी बात छिपाकर रखते हैं मानो वे नहीं जानते?
भजनकार अपने ही मन को आदेश देता है। इस हफ़्ते आपके मन को किस सच्चाई का आदेश चाहिए, और आप उसे किस समय ज़ोर से कहेंगे?
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