2 शमूएल 15:22
पाठ
दाऊद इत्तै को समझा चुका है कि वह लौट जाए; परदेशी होने के नाते उसका इस डूबते हुए राजा के साथ भागना कोई कर्तव्य नहीं था। पर इत्तै शपथ खा चुका है कि मरने या जीने, जहाँ राजा रहेगा वहीं वह भी रहेगा। और तब वचन 22 में दाऊद केवल दो शब्द कहता है: "पार चल।" कोई भाषण नहीं, कोई धन्यवाद नहीं, कोई वादा नहीं। बस अनुमति। और इत्तै "अपने समस्त जनों और अपने साथ के सब बाल-बच्चों समेत पार हो गया" — यानी वह अकेले अपनी जान नहीं, बल्कि अपने पूरे घराने का भविष्य किद्रोन के उस पार ले जाता है, वहाँ जहाँ जंगल और अनिश्चितता के सिवा कुछ नहीं दिखता। एक वाक्य में एक निर्णय, और उस निर्णय के पीछे स्त्रियाँ और बच्चे चल पड़ते हैं।
मूल बात
यह वचन बताता है कि परमेश्वर का राज्य कैसे टिकता है: वादों से नहीं, सत्ता से नहीं, बल्कि निष्ठा से। दाऊद के पास इस घड़ी में देने को कुछ नहीं है; उसका सिंहासन छिन चुका है, उसका बेटा उसके पीछे तलवार लिए है, उसके अपने मंत्री अहीतोपेल ने उसे छोड़ दिया है। ठीक इसी क्षण एक गती, एक परदेशी, एक ऐसा आदमी जिसके पूर्वज इस्राएल के शत्रु थे, उसके साथ बंध जाता है। शास्त्र में बार-बार यही उलटफेर दिखता है: जो भीतर के हैं वे मुँह मोड़ते हैं, और जो बाहर के माने जाते थे वे विश्वास के साथ आगे आते हैं। रूत के मुँह से मोआब की भूमि पर जो निष्ठा फूटी थी, वही यहाँ गत के इस सिपाही में फिर बोलती है। और यह हमें बताता है कि परमेश्वर की वाचा खून से नहीं, चुनाव और अनुग्रह से चलती है। "पार चल" कहकर दाऊद एक विदेशी को अपने दुःख में हिस्सेदार बनाता है, और वह हिस्सेदारी ही उसे राज्य का सच्चा नागरिक बना देती है।
सूत्र
किद्रोन की घाटी बाइबल में दो बार पार की जाती है, और दोनों बार एक ठुकराया हुआ राजा उसे पार करता है। वचन 23 बताता है कि "राजा भी किद्रोन नामक घाटी के पार हुआ" और वचन 30 में वह जैतून के पहाड़ पर रोता हुआ चढ़ता है, सिर ढाँके, नंगे पाँव। एक हज़ार साल बाद यूहन्ना अपने सुसमाचार में लगभग वही शब्द दोहराता है: यीशु अपने शिष्यों के साथ किद्रोन के नाले के पार गए, और जैतून के पहाड़ पर पहुँचे। यूहन्ना यह संयोग से नहीं लिखता; वह पाठक को दाऊद की उस रात में ले जाना चाहता है। पर अंतर भी उतना ही तीखा है। दाऊद के साथ इत्तै पार होता है और उसके छह सौ आदमी; यीशु के साथ पार होनेवाले कुछ ही घंटों में भाग जाएँगे। दाऊद को एक परदेशी की निष्ठा मिली; मसीह को अपनों का त्याग। और ठीक इसी अकेलेपन में वे वह राजा बनते हैं जिसके पीछे अंततः सब जातियाँ पार होंगी।
दर्पण
आप जानते हैं कि निष्ठा तब सस्ती होती है जब वह लाभदायक हो। दफ़्तर में उस बॉस के साथ खड़े रहना जिसकी पदोन्नति तय है, उस मित्र के साथ जिसका जीवन ठीक चल रहा है, उस कलीसिया के साथ जो बढ़ रही है, इसमें कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती। इत्तै का चुनाव इसलिए चुभता है क्योंकि उसने ऐसे आदमी को चुना जिसके पास देने को कुछ नहीं था, और दाऊद ने उसे बार-बार बाहर का रास्ता दिखाया। "तू लौट जा," राजा ने कहा। हमारी अधिकतर वफ़ादारियाँ ठीक वहीं टूटती हैं जहाँ हमें एक सम्मानजनक निकास मिल जाता है: बीमार रिश्तेदार से दूरी, टूटती दोस्ती से चुपचाप हटना, उस व्यक्ति से किनारा जिसकी बदनामी हो गई है। इत्तै के पास वह निकास था और उसने ठुकरा दिया।
आज ही उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिससे लोग अब दूरी बना रहे हैं, और उसे एक संदेश भेजिए जिसमें केवल इतना हो कि आप उसके साथ हैं।
संदर्भ
यह लगभग तीन हज़ार साल पहले की एक सुबह है। अबशालोम ने चार वर्ष तक फाटक पर खड़े होकर लोगों का मन चुराया, हेब्रोन में, यानी उसी नगर में जहाँ दाऊद पहले राजा बना था, अपने को राजा घोषित किया, और दाऊद के सबसे तेज़ दिमाग़ वाले सलाहकार अहीतोपेल को अपनी ओर कर लिया। यरूशलेम खाली हो रहा है। दाऊद पैदल भाग रहा है, अपने घराने और उन विदेशी भाड़े के सैनिकों के साथ जो उसकी अंगरक्षक टुकड़ी थे: करेती, पलेती, और गती। इत्तै गत का है, गोलियत का नगर, इस्राएल का पुराना शत्रु। वचन 20 में दाऊद कहता है, "तू तो कल ही आया है," यानी यह आदमी बमुश्किल शरणार्थी बना है, अपनी जड़ें छोड़कर आया है, और अब जिस राजा की छत्रछाया में आया था वही राजा भाग रहा है।
एक बारीकी
दाऊद के दो शब्दों में जो क्रिया है, वह इस पूरे अध्याय की रीढ़ है। इब्रानी में यह शब्द है עָבַר, अवर, "पार होना, आगे बढ़ जाना।" ध्यान दीजिए यह शब्द कितनी बार लौटता है: वचन 18 में कर्मचारी "आगे गए", छह सौ गती "राजा के सामने से होकर आगे चले", वचन 22 में इत्तै "पार हो गया", वचन 23 में "सब लोग पार हुए, और राजा भी किद्रोन नामक घाटी के पार हुआ।" यही क्रिया इस्राएल के इतिहास की सबसे बड़ी घड़ियों में बजती है: लाल समुद्र पार करना, यरदन पार करके प्रतिज्ञा के देश में घुसना। पर यहाँ दिशा उलटी है। यह देश में प्रवेश नहीं, देश से निकास है। राजा जंगल की ओर जा रहा है, वहीं जहाँ से इस्राएल कभी आया था। और इस उलटी यात्रा में एक पलिश्ती शामिल हो रहा है। यह केवल भूगोल नहीं, यह पहचान का पार होना है।
मुख्य पात्र
इत्तै के बारे में हम बहुत कम जानते हैं, और शायद यही उसकी ताक़त है। उसने शपथ में दो नाम जोड़े: "यहोवा के जीवन की शपथ, और मेरे प्रभु राजा के जीवन की शपथ।" एक पलिश्ती के मुँह से यहोवा का नाम असामान्य है; इसका मतलब है कि यह आदमी केवल एक सेनापति नहीं, एक धर्मान्तरित हृदय है। उसने इस्राएल के परमेश्वर को चुना है, और उस चुनाव की परीक्षा ठीक उसी दिन आ गई जब उस परमेश्वर के अभिषिक्त राजा को हार मिल रही थी। इत्तै ने विश्वास तब नहीं किया जब चमत्कार दिख रहे थे, बल्कि तब जब सब कुछ बिखर रहा था। और उसका "चाहे मरने के लिये हो चाहे जीवित रहने के लिये" कोई भावुक नारा नहीं है; उसके पीछे उसकी पत्नी और बच्चे किद्रोन की ढलान उतर रहे हैं। यह वह निष्ठा है जिसे कीमत मालूम है।
अंतर्पाठ
इत्तै की शपथ के दो जुड़वाँ भाई हैं शास्त्र में, और वे एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े हैं। पहला, रूत, जो मोआब की स्त्री नाओमी से कहती है कि जहाँ तू जाएगी वहीं मैं जाऊँगी और जहाँ तू मरेगी वहीं मैं मरूँगी। रूत भी बाहर की थी, उसे भी लौट जाने का भरपूर मौका दिया गया, और उसने भी उस समय बंधना चुना जब उसके सामने केवल गरीबी थी। रूत दाऊद की परदादी बनी; अब उसके परपोते के साथ एक और परदेशी वही शपथ दोहरा रहा है।
दूसरा जुड़वाँ भाई पतरस है, जिसने कहा था कि वह प्रभु के साथ मरने को तैयार है, और उसी रात मुकर गया। शब्द लगभग वही, परिणाम उलटा। बाइबल इन दोनों को साथ रखकर हमें बेचैन करती है: बड़ी शपथ खाना आसान है, उसे उस रात निभाना जब कुछ भी सुरक्षित न बचा हो, यह मनुष्य के बस में नहीं, अनुग्रह के बस में है।
श्रोता
शमूएल की ये पुस्तकें उन इस्राएलियों के लिए संजोई गईं जो बाद की पीढ़ियों में स्वयं शरणार्थी बन गए थे, जिन्होंने अपना राजा खोया, अपना नगर जलते देखा, और परदेस में बैठकर पूछा कि क्या परमेश्वर का चुनाव अब भी टिका है। उनके कानों में यह वचन अलग ही बजा होगा। उनका महान राजा भी एक दिन नंगे पाँव नगर से निकला था, और तब भी परमेश्वर की कहानी खत्म नहीं हुई थी। साथ ही यह उन्हें एक असुविधाजनक सवाल देता है, वही सवाल जो निर्वासन के बाद यरूशलेम में बहस का विषय बना: परमेश्वर की प्रजा में कौन गिना जाएगा? जन्म से इस्राएली अहीतोपेल राजद्रोह में शामिल है; गत का इत्तै किद्रोन पार कर रहा है। श्रोता समझ गए होंगे कि सीमा वंश पर नहीं, निष्ठा पर खिंची है।
कठिन प्रश्न
इत्तै ने अपने लिए चुना, पर वचन कहता है कि वह "अपने समस्त जनों और अपने साथ के सब बाल-बच्चों समेत पार हो गया।" उन बच्चों से किसी ने नहीं पूछा। वे एक ऐसे युद्ध में घसीटे गए जो उनका नहीं था, और यदि अबशालोम जीतता तो पहला कत्लेआम उन्हीं का होता। क्या ऐसी निष्ठा उचित है जिसकी कीमत दूसरे चुकाते हैं? पाठ इसका उत्तर नहीं देता, और हमें भी जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए। यह सच है कि हमारे विश्वास के निर्णय कभी अकेले हमारे नहीं होते; ईमानदारी की कीमत परिवार चुकाता है, सेवा की कीमत बच्चे चुकाते हैं। बाइबल इसे न महिमामंडित करती है न माफ़ करती है। वह बस दिखाती है कि निष्ठा हमेशा किसी न किसी को साथ खींचती है, और इसलिए वह हल्के मन से नहीं ली जाती। यह जिम्मेदारी हमें डराए, यही ठीक है।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन-सा "सम्मानजनक निकास" है जिसे आप स्वीकार करने की सोच रहे हैं, और क्या वह वास्तव में परमेश्वर की ओर से है या केवल सुविधाजनक?
इत्तै ने विश्वास तब चुना जब दाऊद के पास देने को कुछ न था। आप परमेश्वर से जो अपेक्षा रखते हैं, यदि वह पूरी न हो, तो क्या आपकी निष्ठा टिकेगी?
आपके निर्णयों की कीमत आपके साथ और कौन चुका रहा है, और क्या आपने कभी उनसे इस बारे में बात की है?
2 Samuel में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
2 Samuel: Out of Every Adversity
Follows David's reign with honesty about sin and wonder at grace.
One clear guide through both books of Samuel and their flawed kings.
David's kingdom, David's failures and God's unshakable promise.
1 and 2 Samuel: An Introduction and Commentary
A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.
Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
2 Samuel 15:22 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
2 शमूएल 15:22 का क्या अर्थ है?
2 शमूएल 15:22 किस विषय में है?
2 शमूएल 15:22 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
2 शमूएल 15:22 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
2 शमूएल 15:22 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
2 Samuel 15 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
दाऊद भाग रहा है, राज्य हाथ से निकल रहा है, और ऐसे में वह इत्तै से कहता है, "मेरे संग तू भी क्यों चलता है?" जिसके पास कुछ नहीं बचा, वह भी दूसरे का बोझ सोच रहा है। वह अपने साथी को जाने की खुली छूट देता है। सच्चा साथ वहीं परखा जाता है जहाँ लौट जाने का दरवाज़ा खुला हो। तू किसके साथ तब भी खड़ा रहेगा, जब जाने की पूरी आज़ादी हो?
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें