2 शमूएल 15
पाठ
अबशालोम रथ, घोड़े और पचास धावक जुटाता है, और हर सुबह नगर के फाटक पर खड़ा होकर फ़रियादियों को रोकता है: तेरा मुकदमा सही है, पर राजा के यहाँ तुझे सुननेवाला कोई नहीं। चार वर्ष तक वह मन्नत के बहाने हेब्रोन जाता है, नरसिंगा बजवाता है, और दाऊद का मंत्री अहीतोपेल भी उसके पक्ष में चला जाता है। दाऊद यरूशलेम छोड़कर नंगे पाँव, सिर ढाँके, रोते हुए जैतून के पहाड़ पर चढ़ता है, सन्दूक को नगर में लौटा देता है, और हूशै को गुप्तचर बनाकर पीछे भेजता है।
मर्म
यह अध्याय दो तरह की सत्ता को आमने-सामने रखता है। एक सत्ता जो खुद को गढ़ती है: रथ, धावक, चुंबन, वादे, और वह वाक्य जो हर असंतुष्ट आदमी सुनना चाहता है। दूसरी सत्ता जो खुद को परमेश्वर के हाथ में छोड़ देती है: "जैसा उसको भाए वैसा ही वह मेरे साथ बर्ताव करे।" ध्यान दीजिए, दाऊद यह कहते हुए भी हूशै को भेजता है, यानी वह हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठता। समर्पण निष्क्रियता नहीं है। परमेश्वर का राज्य इस अध्याय में विजय से नहीं, बल्कि एक राजा के खुले हाथों से पहचाना जाता है, जो सिंहासन को अपनी मुट्ठी में जकड़ने से इनकार करता है।
सूत्र
दाऊद किद्रोन की घाटी पार करता है, जैतून के पहाड़ पर रोते हुए चढ़ता है, एक विश्वासपात्र मित्र से विश्वासघात पाता है। सदियों बाद उसी घाटी को पार करके एक और राजा उसी पहाड़ पर जाता है, वहाँ रोता है, और अपने ही एक चेले के हाथों बेचा जाता है। यह जोड़ जबरदस्ती नहीं है; यूहन्ना स्वयं किद्रोन का नाम लेता है। लेकिन फ़र्क भी देखिए: दाऊद भागकर बचता है, यीशु मसीह वहाँ से नहीं भागते। दाऊद सन्दूक को लौटा देता है क्योंकि वह परमेश्वर की उपस्थिति को अपना कवच नहीं बनाना चाहता; मसीह स्वयं वह उपस्थिति हैं जो हमारे लिए छोड़ी नहीं, बल्कि दी जाती है।
दर्पण
अबशालोम की चाल इतनी आधुनिक है कि डर लगता है। वह किसी से झूठ नहीं बोलता, वह बस सहमति जताता है। "तेरा पक्ष तो ठीक और न्याय का है" कहना सस्ता है और असर गहरा। दफ़्तर में वह सहकर्मी जो सबकी शिकायत सुनता है और किसी की ज़िम्मेदारी नहीं लेता, कलीसिया में वह व्यक्ति जो हर नाराज़ भाई का कंधा थपथपाता है पर अगुवे के पास कभी नहीं जाता, परिवार में वह रिश्तेदार जो बच्चों को माँ-बाप के विरुद्ध थोड़ी-थोड़ी हमदर्दी देता है, यह सब फाटक पर खड़ा अबशालोम है। और सच कहिए: हमने भी यह किया है। हमदर्दी दिखाकर किसी की निष्ठा चुराना बहुत सुविधाजनक है, क्योंकि इसमें हाथ गंदे नहीं होते।
दूसरी ओर इत्तै है, एक परदेशी, जिसके पास वफ़ादार होने की कोई वजह नहीं थी। दाऊद उसे जाने की छूट देता है, और वह रुक जाता है: "चाहे मरने के लिये हो चाहे जीवित रहने के लिये।" वफ़ादारी तब सिद्ध होती है जब निकलने का दरवाज़ा खुला हो।
आज यह कीजिए: उस एक व्यक्ति के बारे में सोचिए जिसकी शिकायत आपने हाल में सुनकर सिर्फ़ "हाँ, तुम सही हो" कहा था। उसे फ़ोन या संदेश कीजिए और यह कहिए कि आप उस समस्या को सही जगह तक ले जाने में उसकी मदद करेंगे, या उसे स्वयं वहाँ जाने के लिए कहेंगे। दस मिनट, एक संदेश, आज।
विवरण
पद 5 का चुंबन ठहरकर देखने लायक है। लोग अबशालोम को दण्डवत् करने आते हैं, यानी वे उसे राजकुमार के रूप में सम्मान देना चाहते हैं; और वह हाथ बढ़ाकर उन्हें उठा लेता है और चूम लेता है। बाहर से यह विनम्रता है, अंदर से यह सबसे चतुर चाल। वह उनका झुकना स्वीकार नहीं करता, वह उनका हृदय ले लेता है। इब्रानी क्रिया जो पद 6 में आई है, गानाव, का अर्थ है "चुराना"; अबशालोम ने इस्राएल के मन "चुरा" लिए। चोरी इसलिए, क्योंकि जो प्रेम वह पाता है उसका दाम वह कभी नहीं चुकाता। सस्ती गर्मजोशी हमेशा चोरी होती है।
अंतर्पाठ
नातान की भविष्यवाणी याद रखिए: "मैं तेरे घर में से ही तेरे विरुद्ध विपत्ति उठाऊँगा" (2 शमूएल 12:11)। अबशालोम आकाश से नहीं टपका; वह उस घर की उपज है जहाँ न्याय एक बार दबाया गया था, और जहाँ पिता ने तामार के साथ हुए अन्याय पर कुछ नहीं किया। इसलिए "राजा की ओर से तेरी सुननेवाला कोई नहीं है" वाक्य में झूठ के साथ कड़वा सच भी मिला हुआ है। और इसके विपरीत भजन 3, जिसका शीर्षक ही इस भागने से जुड़ा है, दिखाता है कि उसी रात दाऊद ने क्या किया: वह सोया, क्योंकि "यहोवा मुझे सम्भालता है।" प्रार्थना ने उसे राजनीति से मुक्त नहीं किया, पर भय से मुक्त किया।
मुख्य पात्र
दाऊद यहाँ अपने सबसे कमज़ोर और सबसे सुंदर रूप में है। वह पिता के रूप में असफल, राजा के रूप में पराजित, और फिर भी परमेश्वर के सामने आश्चर्यजनक रूप से खुला। सन्दूक को लौटाना उसका सबसे बड़ा कार्य है: वह परमेश्वर को अपने साथ घसीटने से इनकार करता है, मानो कहता हो कि यदि परमेश्वर उसे चाहते हैं तो वे उसे वापस लाएँगे, और यदि नहीं, तो भी वह हाजिर है। नंगे पाँव, ढँका सिर, आँसू; यह पश्चाताप की मुद्रा है, विरोध की नहीं। पर उसी सिर में एक तेज़ दिमाग़ चल रहा है जो हूशै को योजना समझाता है। यही परिपक्व विश्वास है: पूरी तरह समर्पित, और पूरी तरह जागा हुआ।
चिंतन
मैं किसी की हमदर्दी पाकर खुश होता हूँ या सच सुनकर? और मेरे आसपास कौन है जो मुझे केवल वही कहता है जो मैं सुनना चाहता हूँ?
अगर आज मेरी पकड़ किसी चीज़ पर से छूट जाए, मेरा पद, मेरा नाम, मेरा घर, तो क्या मैं दाऊद के साथ कह सकूँगा: "जैसा उसको भाए वैसा ही वह मेरे साथ बर्ताव करे"?
2 Samuel में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
2 Samuel: Out of Every Adversity
Follows David's reign with honesty about sin and wonder at grace.
One clear guide through both books of Samuel and their flawed kings.
David's kingdom, David's failures and God's unshakable promise.
1 and 2 Samuel: An Introduction and Commentary
A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.
Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
2 Samuel 15 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
2 शमूएल 15 का क्या अर्थ है?
2 शमूएल 15 किस विषय में है?
2 शमूएल 15 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
2 शमूएल 15 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
2 शमूएल 15 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
2 Samuel 15 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
दाऊद भाग रहा है, राज्य हाथ से निकल रहा है, और ऐसे में वह इत्तै से कहता है, "मेरे संग तू भी क्यों चलता है?" जिसके पास कुछ नहीं बचा, वह भी दूसरे का बोझ सोच रहा है। वह अपने साथी को जाने की खुली छूट देता है। सच्चा साथ वहीं परखा जाता है जहाँ लौट जाने का दरवाज़ा खुला हो। तू किसके साथ तब भी खड़ा रहेगा, जब जाने की पूरी आज़ादी हो?
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें
