बाइबल व्याख्या

रूत 1

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

नाओमी का घर लौटना, पर खाली हाथ

"मैं भरी पूरी चली गई थी, परन्तु यहोवा ने मुझे खाली हाथ लौटाया है" (पद 21)। यह वाक्य पूरे अध्याय का भार अपने कंधों पर उठाए हुए है। एक स्त्री जो अपने पति और दो बेटों के साथ अकाल से बचने मोआब गई थी, अब अकेली, बूढ़ी और कड़वी होकर लौट रही है। उसके साथ केवल एक मोआबी बहू है, जो उस समय के हिसाब से "कुछ" नहीं थी। यह अध्याय हमें दिखाता है कि जब जीवन खाली हो जाए, तब भी परमेश्वर की कहानी में एक पंक्ति और लिखी जा रही होती है, यद्यपि दुःख झेलने वाला इसे उस क्षण देख नहीं पाता।

पाठ

न्यायियों के दिनों में बैतलहम में अकाल पड़ा, तो एलीमेलेक अपनी पत्नी नाओमी और दो बेटों के साथ मोआब चला गया। वहाँ पति मरा, बेटों ने मोआबी स्त्रियों से विवाह किया, फिर बेटे भी मर गए। नाओमी ने सुना कि यहोवा ने अपनी प्रजा की सुधि ली है, तो लौटने चली। ओर्पा वापस गई, पर रूत ने कहा, "तेरे लोग मेरे लोग होंगे, और तेरा परमेश्वर मेरा परमेश्वर होगा।" दोनों जौ कटने के समय बैतलहम पहुँचीं।

मर्म

यह कहानी परमेश्वर के "छिपे हुए हाथ" के बारे में है। पूरे अध्याय में यहोवा एक बार भी सीधे कुछ नहीं करते, न कोई चमत्कार, न कोई आवाज। फिर भी नाओमी उन्हीं पर आरोप लगाती है, "सर्वशक्तिमान ने मुझ को बड़ा दुःख दिया है।" यह विश्वास की एक कठिन परिपक्वता है, जो सुख में भी और दुःख में भी यहोवा को ही केंद्र मानती है। और इसी छिपेपन के बीच रूत की प्रतिज्ञा गूँजती है, जो पूरी बाइबल की सबसे सुंदर धर्मपरिवर्तन-प्रतिज्ञाओं में से एक है। एक मोआबी स्त्री, इस्राएल के परमेश्वर को अपना कहती है, बिना किसी लाभ की आशा के, केवल प्रीति से बंधकर।

साझा सूत्र

बैतलहम, "रोटी का घर", जहाँ रोटी नहीं थी। सदियों बाद इसी बैतलहम में जीवन की रोटी जन्म लेंगे। और वह रूत जो यहाँ एक विदेशी विधवा के रूप में प्रवेश करती है, मत्ती 1 में यीशु मसीह की वंशावली में नाम पाएगी। परमेश्वर का उद्धार-कार्य ऐसे ही चलता है, टूटे परिवारों से, विदेशी स्त्रियों से, अकाल और मृत्यु के बीच से। रूत की प्रतिज्ञा, "जहाँ तू जाएगी उधर मैं भी जाऊँगी," उस समर्पण की झलक है जो मसीह अपनी कलीसिया से चाहते हैं, और जो वे स्वयं अपने लोगों से करते हैं, "मैं तुम्हें अनाथ न छोड़ूँगा।"

दर्पण

नाओमी की कड़वाहट को सस्ते में मत टालिए। वह कहती है, "मुझे नाओमी (सुखदाई) न कहो, मुझे मारा (कड़वी) कहो।" वह अपना नाम बदल देना चाहती है क्योंकि उसका जीवन बदल गया है। क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है, कि जो नाम, जो पहचान लोग आप पर लगाते हैं, वह अब आपके भीतर के सच से मेल नहीं खाती? नौकरी छूटी, विवाह टूटा, बच्चा नहीं हुआ, स्वास्थ्य गया, और लोग अभी भी वही पुरानी पहचान से बुलाते हैं। नाओमी हमें सिखाती है कि परमेश्वर के सामने कड़वे होकर आना भी विश्वास है, बशर्ते हम आना बंद न करें। वह लौटती है। यही निर्णायक है।

संदर्भ

"जिन दिनों में न्यायी लोग राज्य करते थे" यह एक चेतावनी है। न्यायियों की पुस्तक अराजकता, हिंसा और आत्मिक भ्रष्टता से भरी है, जहाँ "हर एक अपनी दृष्टि में जो ठीक जान पड़े वही करता था।" इसी अंधकार के बीच यह छोटी सी घरेलू कहानी घटती है। मोआब इस्राएल का पुराना शत्रु था, लूत की संतान, और व्यवस्थाविवरण 23 में मोआबियों के मंडली में प्रवेश पर स्पष्ट निषेध था। एलीमेलेक का वहाँ जाना और बेटों का मोआबी स्त्रियों से विवाह करना, उस समय के इस्राएली पाठक के लिए झकझोर देने वाला था। नाओमी का लौटना केवल भूगोल नहीं, वाचा के लोगों के पास लौटना है।

अंतर्पाठ

रूत की प्रतिज्ञा (पद 16-17) की गूँज कई जगह सुनाई देती है। जब यहोशू ने कहा, "मैं और मेरा घराना तो यहोवा ही की सेवा करेंगे" (यहोशू 24:15), वह इस्राएली अगुवा था; पर रूत एक मोआबी है, और उसकी प्रतिज्ञा इसीलिए और भी अनोखी है। यशायाह 56 में परमेश्वर वादा करते हैं कि परदेशी जो उनसे लिपटेंगे, उन्हें उनके घर में स्थान मिलेगा; रूत उसी वादे की जीती-जागती पूर्व-झलक है। और नाओमी की शिकायत, "यहोवा ने मुझे खाली हाथ लौटाया है," अय्यूब की भाषा से मिलती है, "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया।" पर अय्यूब की तरह, नाओमी की कहानी भी अंत तक नहीं कही गई है। जौ की कटनी अभी शुरू हुई है।

प्रश्न

नाओमी कहती है, "यहोवा का हाथ मेरे विरुद्ध उठा है।" क्या वह सही कह रही है? पाठ इसका सीधा उत्तर नहीं देता। हम जानते हैं कि परमेश्वर पर्दे के पीछे कुछ बुन रहे हैं, पर नाओमी को यह नहीं दिखता, और लेखक उसकी शिकायत को सुधारता नहीं। यह हमें असहज करता है, क्योंकि हम चाहते हैं कि दुःखी विश्वासी की ज़ुबान पर हमेशा "स्तुति हो"

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Ruth 1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

रूत 1 का क्या अर्थ है?
"मैं भरी पूरी चली गई थी, परन्तु यहोवा ने मुझे खाली हाथ लौटाया है" (पद 21)। यह वाक्य पूरे अध्याय का भार अपने कंधों पर उठाए हुए है। एक स्त्री जो अपने पति और दो बेटों के साथ अकाल से बचने मोआब गई थी, अब अकेली, बूढ़ी और कड़वी होकर लौट रही है। उसके साथ केवल एक मोआबी बहू है, जो उस समय के हिसाब से "कुछ" नहीं थी। यह अध्याय हमें दिखाता है कि जब जीवन खाली हो जाए, तब भी परमेश्वर की कहानी में एक पंक्ति और लिखी जा रही होती है, यद्यपि दुःख झेलने वाला इसे उस क्षण देख नहीं पाता।
रूत 1 किस विषय में है?
न्यायियों के दिनों में बैतलहम में अकाल पड़ा, तो एलीमेलेक अपनी पत्नी नाओमी और दो बेटों के साथ मोआब चला गया। वहाँ पति मरा, बेटों ने मोआबी स्त्रियों से विवाह किया, फिर बेटे भी मर गए। नाओमी ने सुना कि यहोवा ने अपनी प्रजा की सुधि ली है, तो लौटने चली। ओर्पा वापस गई, पर रूत ने कहा, "तेरे लोग मेरे लोग होंगे, और तेरा परमेश्वर मेरा परमेश्वर होगा।" दोनों जौ कटने के समय बैतलहम पहुँचीं।
रूत 1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यह कहानी परमेश्वर के "छिपे हुए हाथ" के बारे में है। पूरे अध्याय में यहोवा एक बार भी सीधे कुछ नहीं करते, न कोई चमत्कार, न कोई आवाज। फिर भी नाओमी उन्हीं पर आरोप लगाती है, "सर्वशक्तिमान ने मुझ को बड़ा दुःख दिया है।" यह विश्वास की एक कठिन परिपक्वता है, जो सुख में भी और दुःख में भी यहोवा को ही केंद्र मानती है। और इसी छिपेपन के बीच रूत की प्रतिज्ञा गूँजती है, जो पूरी बाइबल की सबसे सुंदर धर्मपरिवर्तन-प्रतिज्ञाओं में से एक है। एक मोआबी स्त्री, इस्राएल के परमेश्वर को अपना कहती है, बिना किसी लाभ की आशा के, केवल प्रीति से बंधकर।
रूत 1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
बैतलहम, "रोटी का घर", जहाँ रोटी नहीं थी। सदियों बाद इसी बैतलहम में जीवन की रोटी जन्म लेंगे। और वह रूत जो यहाँ एक विदेशी विधवा के रूप में प्रवेश करती है, मत्ती 1 में यीशु मसीह की वंशावली में नाम पाएगी। परमेश्वर का उद्धार-कार्य ऐसे ही चलता है, टूटे परिवारों से, विदेशी स्त्रियों से, अकाल और मृत्यु के बीच से। रूत की प्रतिज्ञा, "जहाँ तू जाएगी उधर मैं भी जाऊँगी," उस समर्पण की झलक है जो मसीह अपनी कलीसिया से चाहते हैं, और जो वे स्वयं अपने लोगों से करते हैं, "मैं तुम्हें अनाथ न छोड़ूँगा।"
रूत 1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
नाओमी की कड़वाहट को सस्ते में मत टालिए। वह कहती है, "मुझे नाओमी (सुखदाई) न कहो, मुझे मारा (कड़वी) कहो।" वह अपना नाम बदल देना चाहती है क्योंकि उसका जीवन बदल गया है। क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है, कि जो नाम, जो पहचान लोग आप पर लगाते हैं, वह अब आपके भीतर के सच से मेल नहीं खाती?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Ruth 1 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 12

पिता, धन्यवाद कि नाओमी की तरह हम अपनी निराशा आपसे छिपाते नहीं। जब वह कहती है "मैं पति करने को बूढ़ी हूँ," तब भी आपकी योजना चलती रही। धन्यवाद कि जहाँ हमारी आशा खत्म होती है, वहाँ आपका काम शुरू होता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 2

एलीमेलेक नाम का अर्थ है, "मेरा परमेश्वर राजा है।" और यही आदमी रोटी के घर बैतलहम से निकलकर मोआब चला जाता है। वचन कहता है, "वे मोआब देश में जाकर वहीं रहे।" कुछ दिनों की सोच थी, पर "वहीं रहे" बन गई। सोचो, कौन सा छोटा समझौता, जो तुमने थोड़े समय के लिए किया था, अब तुम्हारा स्थायी पता बन चुका है?

प्रार्थना संपादकीय पर पद 7

पिता, कभी कभी हमें वह जगह छोड़नी पड़ती है जो जानी पहचानी थी, और आगे का रास्ता धुंधला लगता है। जब हम कदम बढ़ाते हैं, आप हमारे साथ चलिए। जो लोग इस सफर में हमारे संग हैं, उन्हें भी थामे रहिए, और घर लौटने की आशा हमारे दिल में जीवित रखिए।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 13

पिता, धन्यवाद कि आप नाओमी की कड़वी बातें सुनकर भी उससे दूर नहीं हुए। जब उसने कहा "यहोवा का हाथ मेरे विरुद्ध उठा है," तब भी आपने उसे थामा। धन्यवाद कि हमारा दुःख आपसे छिपाने की ज़रूरत नहीं, और आपकी कहानी हमारे आँसुओं पर खत्म नहीं होती।

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